हमारे धर्म ग्रन्थ युगों पहले लिखे गए , वे केवल इसलिए नहीं हैं कि हम घंटी बजा कर उनका पाठ कर लें , युग के अनुकूल वे हमें जीवन जीना सिखाते हैं l असुरता तो आदिकाल से ही धरती पर है , हमें उस असुरता पर विजय हासिल करनी है और रामायण का अध्ययन - मनन हमें सिखाता है कि यह जंग हम कैसे जीतें l रावण , मंथरा , सूपर्णखा आज भी इस धरती पर हैं , हमें आसुरी चाल को समझना है , और सीखना है कि उनके लगातार आक्रमण से कैसे बचें ? असुरता सबसे पहले फूट डालती है , मंथरा के मन पर नकारात्मकता का आक्रमण हुआ जो इतना तीव्र था कि राजा दशरथ के प्राण चले गए , परिवार बिखर गया l असुरता आज इसी तरह माइंड गेम खेलती है , परिवार और समाज में फूट डालती है l इसलिए जरुरी है कि हम चौकन्ने रहें , कान के कच्चे न हों l असुरता की सबसे बड़ी चाल यह है कि वह लोगों के अपनों से ही उनके प्राण लेने का , उन्हें घायल करने का प्रयास करती है ताकि वे असुर परदे के पीछे बचे रहें , उन पर कोई आंच न आये l इस बात को इस प्रसंग से समझ सकते हैं कि जब श्री हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर आ रहे थे तब भरत जी ने उन्हें बाण मारा था , तब हनुमान जी ने भगवान श्रीराम का नाम लिया l इससे यह शिक्षा मिलती है कि हम अपनी पूरी सामर्थ्य से कर्तव्य का पालन करें , उसमे कोई त्रुटि न हो , फिर ईश्वर को पुकारें , तब दैवी शक्तियाँ मदद करती हैं , संजीवनी बूटी जैसी कृपा मिलती है l
20 February 2022
19 February 2022
WISDOM -----
लकड़हारे एक बड़े जंगल के मजबूत पेड़ों को काटने का इरादा कर के आये थे l वे चारों ओर घूमे l पेड़ों ने भी उनका इरादा समझा l जब वे चले गए तो पेड़ हँसकर बोले --- इनकी क्या बिसात है जो हम लोगों को काट सकें l इनके हाथ में लोहे की कुल्हाड़ी भर ही तो है l कुछ दिन बाद पेड़ काटने वाले फिर आये l उनके हाथ में लकड़ी के बैंट लगी हुई कुल्हाड़ियाँ थीं l इसे देखकर पेड़ घबराने लगे और कहने लगे --- जब शत्रु पक्ष में अपने ही लोगों का सहयोग जुड़ गया तो अनर्थ होने में कोई संदेह नहीं l लकड़ी के बेंत वाली कुल्हाड़ियों ने सारा जंगल धराशायी कर दिया l ------ स्वार्थ और लालच जब मन पर हावी हो जाता है तब मनुष्य पथभ्रष्ट हो जाता है l
WISDOM -------
हमारे पुराणों में देवासुर संग्राम की अनेक कथाएं हैं l वे कथाएं केवल मनोरंजन की कहानी नहीं हैं , वे कथाएं हमें बहुत कुछ सिखाती हैं ---- आसुरी प्रवृति का व्यक्ति किसी का भी सगा नहीं होता , उसमे अहंकार और स्वार्थ कूट - कूटकर भरा होता है और उसके अत्याचारों की शुरुआत परिवार से ही होती है l कोई बाहरी व्यक्ति या सुरक्षा कर्मी परिवार की समस्याओं में दखल नहीं देता इसलिए ऐसे असुर बड़ी आसानी से अपने ही परिवार के बच्चों और महिलाओं को उत्पीड़ित करते हैं , अपने अहंकार की पूर्ति के लिए बाहरी लोगों की भी सहायता लेते हैं l उनकी यही प्रवृति मजबूत होकर समाज में दंगे - फसाद , अपराध को अंजाम देती है l पुराण में कथा है ---- हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद पर ही सबसे ज्यादा अत्याचार किए , उसे मारने के लिए अपनी शक्ति , छल - छद्द्म , तंत्र - मन्त्र सबका सहारा लिया l इस घृणित कार्य में उसने अनेकों की मदद ली l यहाँ ये बात महत्वपूर्ण है कि ईश्वर ने नृसिंह अवतार लेकर उन अनेकों को नहीं मारा , ईश्वर ने उसी को दंड दिया जो इन सब कृत्यों की जड़ था , उस हिरण्यकश्यप का ही पेट फाड़कर उसे मृत्युदंड दिया l इसी तरह सीताजी ने अशोक वाटिका में उनको विभिन्न तरीकों से सताने वाली राक्षसियों को क्षमा कर दिया और कहा कि वे तो रावण के इशारों पर यह सब अपना पेट पालने के लिए कर रहीं थीं l ये कथाएं यही शिक्षा देती हैं कि चाहें परिवार हो , समाज , राष्ट्र या अंतर्राष्ट्रीय स्तर की बात हो , अत्याचार , उत्पीड़न , अन्याय का जो मूल है , जड़ है , उस हिरण्यकश्यप , उस रावण का अंत करो , शांति अपने आप आ जाएगी
18 February 2022
WISDOM-----
सफलता जिस ताले में बंद रहती है वह दो चाबियों से खुलता है -- एक परिश्रम और दूसरा सत प्रयास l कोई भी ताला यदि बिना चाबी के खोला गया तो आगे उपयोगी नहीं रहेगा l इसी प्रकार परिश्रम और प्रयास के बिना थोपी गई सफलता टिक न सकेगी l जीवन में किए गए सत्कार्य ही स्वर्ग की घंटी बजाते हैं, दरवाजा अवश्य खुलेगा l
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भगवान महावीर एक गांव से गुजर रहे थे , तो एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया ---- " महाराज ! साधु और असाधु में क्या अंतर् है ? साधु कौन ? और असाधु कौन ? क्या हमारे जैसे गृहस्थ भी साधु की संज्ञा पा सकते हैं ? " भगवान महावीर ने जवाब दिया ---- " जिसने स्वयं को साध लिया , वास्तविक साधु वही है l असाधु तो वह है जो केश और वेश से साधु बनने का प्रपंच रचता है l यदि तुमने अपने आप को साध लिया और सुधार लिया , तो निश्चय ही तुम गृहस्थ होते हुए भी साधु हो l " आज संसार में अशांति है , सुविधाएँ बहुत हैं लेकिन सुख नहीं है , लोग तनाव में हैं l इसका कारण यही है कि आज संसार में शराफत का नकाब पहन कर चलने वालों की संख्या बहुत अधिक है , इसकी आड़ में लोग अनैतिक और अमर्यादित काम करते हैं , दूसरों को भी तनाव देते हैं और स्वयं भी तनाव और अशांति का जीवन जीते हैं l बाहरी चमक - धमक सुख का पैमाना नहीं है , दो नावों पर पांव रखकर चलना ---- संतुलन संभव नहीं है l संसार में अच्छे और सन्मार्ग पर चलने वाले भी बहुत हैं लेकिन नकारात्मकता इतनी प्रबल है कि वो अच्छाई को आगे नहीं आने देती l जन्म से कोई बुरा नहीं होता , अपनी मानसिक कमजोरियों के वशीभूत होकर व्यक्ति गलत राह पकड़ लेता है और फिर उसमें उलझता जाता है l इस समस्या का समाधान पं. श्रीराम शर्मा जी ने बताया है ----- ' अपनी गलती को मान लेना , दोषों को न छिपाना , अज्ञानवश हुई गलती का सुधार कर लेना , अपने जीवन की खुली तस्वीर रखना , ताकि सब उसको देख व परख सकें , यही जीवन का विकास करने और आनंद प्राप्त करने की उत्तम कसौटी है l "
17 February 2022
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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- ' बगुला उस आकार की मछली पकड़ता है जो उसकी चोंच में समा सके और गले के नीचे उतर सके , जो इससे बड़ी होती है उसे वह नहीं छेड़ता l समाज में कुछ व्यक्ति ऐसे ही होते हैं जो हर समय शिकार ढूंढते हैं और घात लगाते हैं l अपने से कमजोर पड़ने वाले पर हमला बोलते हैं l सीधे आक्रमण महंगा पड़ता दीखे तो छल - छद्म की कुटिलता बरतते हैं l विरोधियों को आपस में लड़ा कर कमजोर करते हैं फिर दोनों को ही एक - एक कर के निगल जाते हैं l चोर - चोर आपस में लड़ते नहीं ,, वरन मतलब की दोस्ती गांठते हैं और मौसेरे भाई बन जाते हैं , अनाचारों में एक दूसरे का सहयोग देते और लाभ में हिस्सा बंटाते हैं l शिकार ढूंढते समय वे इस बात का ध्यान रखते हैं कि दुर्बल या सज्जन पर ही हमला बोला जाये l " आचार्य श्री कहते हैं ये दोनों ही प्रतिरोध नहीं करते इसलिए उनके आक्रमण का शिकार होते हैं l अनेक मित्र संबंधी उनकी मंडली में होते हैं , इन्हे नर पिशाच कहते हैं l
16 February 2022
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " बुद्धि एक महान ईश्वरीय विभूति है , इस विभूति का सदुपयोग जरुरी है l वे कहते हैं ----' हम उत्कृष्ट बुद्धिवादी बने l परम्परागत बुद्धिवाद छोटे - मोटे भेद , रूढ़िग्रस्त धार्मिकता के कारण ही भयानक नर - संहार करता है , लोगों को तलवार के घाट उतार देता है लेकिन उत्कृष्ट बुद्धिवादी विकास पथ का यात्री है , वह घोषणा करता है कि विश्व में शांति का मार्ग भेद फ़ैलाने में नहीं ,-- मेल कराने में है l लाखों वर्षों से हम सब एक दूसरे के दोष देखते रहे , भेदों को बढ़ाते रहे , द्वेष को फैलाते रहे l हमने कभी भी यह नहीं सोचा कि हम में समता अधिक बातों में है और भेद कम विषयों में है l किन्तु हम भेदों पर ही जोर देते रहे l विभिन्न धर्मों में आपस में समानताएं बहुत हैं , भेद जरा सा है l किन्तु इन नगण्य से भेदों के कारण ही भयंकर खून - खराबा हुआ l उत्कृष्ट बुद्धिवादी कहता है भेद को दूर भगाइये और परस्पर मेल के प्रसंग तलाश करिए और उन पर मिलकर काम कीजिए l नवीन युग की नवीन समस्याएं हैं , उनका हल भी नए ढंग से सोचना चाहिए l उत्कृष्ट बुद्धिवादी संत सुकरात और महान वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन की तरह अपना हृदय प्रकाश के लिए सदा खुला रखता है l उनमे अहंकार नहीं था l एक व्यक्ति ने महान वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन से कहा ----- " लगता है आपने तो पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है l " तब उन्होंने उत्तर दिया ---- " मेरे सामने ज्ञान का अथाह समुद्र फैला हुआ है , जिसके किनारे बैठकर कुछ ही घोंघे और सीपियाँ उठा पाया हूँ l " ऐसे विनयशील स्वभाव के उत्कृष्ट बुद्धिवादी अपने पीछे आने वाले हर यात्री के प्रति सहानुभूति रखता है l न उस पर रौब दिखाता है और न अपना अहंकार प्रकट करता है l " आज इस बात पर चिंतन - मनन करना जरुरी है कि हमने इतनी वैज्ञानिक प्रगति विकास के लिए की है या मानवता के विनाश के लिए ?