लघु -कथा ---- एक गिद्ध था l उसके माता -पिता अंधे थे l गिद्ध प्रतिदिन अपने साथ -साथ अपने माता -पिता के भोजन की व्यवस्था भी जुटाता था l एक दिन वह किसी बहेलिये के जाल में फंस गया l वह बेहद दुःखी हुआ कि मैं मर जाऊंगा तो माता -पिता का क्या होगा ? वह जोर- जोर से विलाप करने लगा l बहेलिये ने उसके रोने का कारण पूछा तो गिद्ध ने अपनी व्यथा कही l बहेलिया बोला --- " गिद्धों की द्रष्टि तो इतनी तेज होती है कि सौ योजन ऊपर आसमान से भी देख लेती है , लेकिन तू जाल को कैसे नहीं देख पाया ? " गिद्ध बोला ---- " बुद्धि पर जब लोभ का पर्दा पड़ जाता है तो उसे ठीक -ठीक दिखाई नहीं देता l जीवन भर मांस के पिंड के पीछे भागते - भागते मेरी नजर को अब उसके सिवाय कुछ और दिखाई ही नहीं देता l इसी कारण मैं तेरा जाल नहीं देख पाया l " बहेलिये को गिद्ध की ज्ञान भरी बातें अच्छी लगीं l उसने कहा ---- ' गिद्धराज ! जाओ मैं तुम्हे मुक्त करता हूँ l अपने अंधे माता - पिता की सेवा करो l तुमने मुझे लोभ का दुष्परिणाम बता दिया l '
23 June 2022
22 June 2022
WISDOM -------
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' जीवन का स्वरुप कोई भी हो , व्यक्तिगत अथवा सामूहिक , उसके साथ काल , कर्म और स्थान की निरंतरता अनिवार्य रूप से जुड़ी है l सभी को अपने कर्मों के अनुसार स्थान मिला है , साथ ही नए कर्मों की स्वतंत्रता भी , लेकिन इनके परिणाम तो काल ही तय करता है l कहते हैं ---- परमेश्वर ने स्वयं इस युग में महाकाल का रूप धारण किया है l वे व्यक्ति को और समूह को , राष्ट्र और विश्व को उसके कर्मों का उचित दंड देकर नए युग का आरम्भ करेंगे l युग का प्रत्यावर्तन करेंगे l श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान अपना परिचय देते हुए कहते हैं ---- ' मैं काल हूँ l ' उन्होंने मंदिरों में , विभिन्न देवस्थानों में पूजे जाने वाले किसी देवी -देवता के रूप में स्वयं का परिचय नहीं दिया l सीधा - सपाट कहा ---- ' मैं काल हूँ l ' महाभारत में परमेश्वर काल रूप में कुरुक्षेत्र में महायुद्ध का दंड लेकर प्रकट हुए हैं l अर्जुन से कहते हैं --- तुम इन प्रतिपक्षी योद्धाओं को मारो या न मारो , पर ये मरेंगे अवश्य l इन्हें मारने का माध्यम तुम बनो या फिर कोई और , इनका मरना सुनिश्चित है , क्योंकि व्यक्ति अथवा समूह को कोई परिस्थिति या घटनाक्रम नहीं मारता l उसे मारता है , उसका कर्म l भीष्म और द्रोणाचार्य अपने व्यक्तिगत जीवन में भले ही अच्छे हों , पर दुर्योधन के अनगिनत दुष्कर्मों के साथ उनकी मौन स्वीकृति ने उन्हें दंड का भागीदार बना दिया l यही स्थिति अन्य सभी की है l जीवन में शुभ और अशुभ के लिए प्रत्यक्ष में जिम्मेदार कोई भी हो , पर यथार्थ में उत्तरदायी होता है कर्म l इस कर्म के अनुसार ही काल नियत समय और नियत स्थान पर परिस्थितियों और घटनाक्रमों का सृजन कर देता है l कर्म जितना व्यापक और तीव्र होता है , उसी के अनुरूप काल भी अपना आकार बढ़ा लेता है l
21 June 2022
WISDOM -------
लघु -कथा ----- एक बार अमेरिका की एक पचास मंजिली इमारत का लिफ्ट खराब हो गया l सबसे ऊपरी मंजिल में स्थित एक कार्यालय के कर्मचारी जब सीढियाँ चढ़कर ऊपर जाने लगे तो उन्होंने समय काटने के लिए तय किया कि प्रत्येक बारी -बारी से एक छोटी -छोटी कहानी सुनाता चलेगा l कहानी सुनने का जब दौर चल रहा था , तो एक कर्मचारी बीच में टोकने का बार -बार प्रयत्न करता , किन्तु सब लोग उसे चुप करा देते l मंजिल निकट आने पर जब उसकी बारी आई तो लोगों ने उससे कहा -- " हाँ भाई , अब तू सुना , तब से क्या बीच में टोक रहा था l " उसने बड़ी स गंभीरता से कहा --- " मैं केवल यही कहना चाहता था कि कार्यालय की चाबी तो नीचे कार में ही रह गई है l इतनी देर से कोई मेरी सुनता ही नहीं है l " ----
20 June 2022
WISDOM ------
हकीम लुकमान कहते थे ---- ' भोजन का असंयम कर मनुष्य अपनी जीभ से अपनी कब्र खोदता है l ' ---एक सेठ जी थे , वे खाँसी से बहुत परेशान थे l वैद्य जी के पास गए , तो वैद्य जी ने उनसे परहेज करने को कहा l सेठ जी ने कहा ---- " आप चाहें तो जितनी कड़वी दवा दें दे, पर मैं परहेज नहीं कर सकता l " वैद्य जी ने कहा --- फिर आप परहेज भी मत कीजिए , दवा भी मत लीजिए , क्योंकि खांसी के तीन लाभ आपको अवश्य ही होंगे l एक लाभ तो यह कि आप रात भर खांसते रहेंगे तो , घर में चोर नहीं आयेंगे l दूसरे आपको कुत्ते नहीं काटेंगे क्योंकि कमजोरी के कारण आप बिना लाठी नहीं चल सकेंगे l तीसरा लाभ यह है कि बुढ़ापा नहीं आएगा , क्योंकि खांसी के कारण जीवन जल्दी ही समाप्त हो जायेगा l यह सुनकर सेठजी को वैद्य जी की बात समझ में आ गई और उन्होंने खाने -पीने पर नियंत्रण कर अपने को स्वस्थ कर लिया l
19 June 2022
WISDOM -----
मोह के कारण मनुष्य की कैसी दुर्गति होती है , इसे बताने के लिए पुराणों में अनेक कथाएं हैं l ऐसी ही एक कथा है ------ एक आदमी बूढ़ा हुआ तो नारद जी उसके पास गए और कहा कि अब जिन्दगी का आखिरी पड़ाव है , भगवान को याद कर लो l शरीर चाहे वृद्ध हो जाये ,इच्छाएं समाप्त नहीं होतीं l वह बोला --- अभी सुख - वैभव भोग लें , नाती -पोते देख लें फिर भगवान को याद करेंगे l कुछ दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई l दूसरी योनि मिलने से पूर्व नारद जी उसके पास गए और कहा -- तुमने अपना जीवन धन कमाने और भोग विलास में बिताया , भगवान को याद नहीं किया , कोई सत्कर्म नहीं किए इसलिए अब तुम्हे बैल का जन्म मिलेगा l बैल का जन्म लेकर भी बेटे - बेटी के यहाँ रहा , उसे पूर्व जन्म की याद थी , खूब दौड़ -दौड़ कर काम करता l नारद जी आए और बोले -अब भगवान का नाम ले लो तो इस योनि से मुक्ति मिल जाएगी l वह बोला -- यह हमारी ही जमीन है , अपने ही बच्चों के लिए काम कर रहे हैं l अब मरा तो कुत्ते की योनि मिली l मोह उसी घर में खींच लाया , अब अपने बच्चों के घर की सुरक्षा करता l नारद जी फिर आए और बोले -- अब तो भगवान को याद कर , मुक्ति मिल जाये जाए l कुत्ता बोला ---- अब नाती -पोते का घर बस जाये l अब मृत्यु हुई तो सांप का जन्म मिला , मोह नहीं छूटा तो अपने गाड़े हुए खजाने की रक्षा करने लगा l बच्चों को खजाने का पता चला तो सब मिलकर उसे मारने लगे जिससे खजाना मिल जाये l अब वह नारद जी से बोला --- हमने आपकी बात मान ली होती तो यह दुर्गति नहीं होती l अब न जाने कौन सी योनि मिलेगी l यह कथा मनुष्य को समझाने के लिए है कि ये मोह कर्तव्य पालन तक सीमित रहे तो ठीक है अन्यथा दुर्गति करा देता है l
18 June 2022
WISDOM ------
लुकमान से किसी ने प्रश्न किया कि आपने इतनी शिष्टता कहाँ से सीखी ? लुकमान ने उत्तर दिया --- " भाई , मैंने शिष्ट व्यवहार अशिष्ट लोगों के बीच रहकर ही सीखा है l लुकमान का उत्तर सुनकर लोग अचरज में पड़ गए l लुकमान ने और आगे स्पष्ट करते हुए कहा कि अशिष्ट लोगों लोगों के बीच रहकर ही मैंने जाना कि अशिष्ट व्यवहार क्या है l मैंने पहले उनकी बुराइयों को देखा l फिर देखा कि कहीं ये बुराइयाँ मुझ में तो नहीं हैं l इस तरह के आत्म निरीक्षण से मैं बुराइयों से दूर होता गया और आत्मसुधार के फलस्वरूप लोग मुझे लुकमान से हजरत लुकमान कहने लगे l
WISDOM --------
एक दिन राजा भोज गहरी निद्रा में सोए हुए थे l उन्हें स्वप्न में एक अत्यंत तेजस्वी वृद्ध पुरुष के दर्शन हुए l भोज ने उससे पूछा ----- " महात्मन ! आप कौन हैं ? " वृद्ध ने कहा ---- " राजन ! मैं सत्य हूँ l तुझे तेरे कार्यों का वास्तविक रूप दिखाने आया हूँ l मेरे पीछे -पीछे चला आ और अपने कार्यों की वास्तविकता को देख l " राजा उस वृद्ध के पीछे -पीछे चल दिए l राजा भोज बहुत दान , पुण्य , यज्ञ , व्रत , तीर्थ , कथा - कीर्तन करते थे , उन्होंने अनेक कुएं , मंदिर , तालाब , बगीचे आदि भी बनवाये थे l राजा के मन में इन कार्यों के कारण बहुत अभिमान आ गया था l वृद्ध पुरुष के रूप में आया सत्य राजा भोज को अपने साथ उसकी कृतियों के पास ले गया l वहां जैसे ही सत्य ने पेड़ों को छुआ , सब एक - एक कर के ठूंठ हो गए l राजा आश्चर्य चकित रह गया l इसके बाद सत्य राजा भोज को मंदिर ले गया l सत्य ने जैसे ही उसे छुआ , वह खंडहर के रूप में परिणत हो गया l वृद्ध पुरुष ने राजा के यज्ञ , तीर्थ , कथा , पूजन , दान आदि के निमित्त बने स्थानों , उपादानों , व्यक्तियों को जैसे ही छुआ , वे सब राख हो गए l राजा यह सब देखकर विक्षिप्त सा हो गया l सत्य ने कहा ---- " राजन ! यश की इच्छा से और अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति के लिए जो कार्य किए जाते हैं , वह दिखावा है , उनसे केवल अहंकार की पुष्टि होती है l सच्ची सद्भावना से निस्स्वार्थ होकर कर्तव्य भाव से जो कार्य किए जाते हैं , उन्ही का फल पुण्य रूप में मिलता है l " इतना कहकर सत्य अन्तर्धान हो गया l राजा ने निद्रा टूटने पर स्वप्न पर गहरा विचार किया और सच्ची भावना से कर्म करना प्रारम्भ कर दिया l