27 June 2022

WISDOM ---

   एक  दिन  नदी   से    समुद्र   ने   पूछा ----- "  मेरे  पास  कोई  फटकता  भी  नहीं  है   और  न  कोई  आदर  करता  है  ,  पर  तुम्हे  लोग  प्यार  करते  हैं  l  इसका  क्या  कारण  है  ? "    नदी  ने  कहा ---- " आप  केवल  लेना  ही  जानते  हैं   l  जो  मिलता  है , उसे  जमा  करते  हैं   l  मैं  जो  इस  हाथ  पाती  हूँ ,  उस  हाथ  आगे  बढ़ा  देती  हूँ   l  लोग  मुझसे  जो  पाते  हैं  ,  उसी  के  बदले  में  तो  प्यार  देते  हैं  l  "  जो  केवल  लेना  ही   लेना  जानते  हैं   ,  वे  उपेक्षित  रह  जाते  l   जिन्हें  देना   भी  आता  है  ,  वे  सबके  प्री प्रियपात्र  बनते  हैं  l 

26 June 2022

WISDOM -----

   इस  संसार  में  अंधकार  है  , तो  प्रकाश  भी  है  l   दैवी  शक्तियां  हैं  तो  असुरता  भी  है  l  यह  व्यक्ति  के  अपने  संस्कार  हैं ,  उसका  चुनाव  है   कि  वो  अपने  जिंदगी  के  सफ़र  में   आगे  बढ़ने  के  लिए  दैवी  शक्तियों  की  मदद  लेना    चाहता  है  या  आसुरी  तत्वों  की  मदद  लेता  है   l   परिणाम  निश्चित  है ---असुरता  को , अंधकार  को  मिटना  ही  पड़ता  है  l  विजय  हमेशा  सत्य  की  , देवत्व  की  होती  है  l   असुर  अपनी  सफलता  के  लिए  तांत्रिक  शक्तियों  की  मदद  लेते  हैं   l   पुराण   की    भक्त   प्रह्लाद   की   यह   कथा  बताती  है  कि  ईश्वर  का  नाम ,  उनकी  भक्ति   तांत्रिकों  के  सम्राट  को  भी  पराजित  कर  देती  है  ------ भक्त  प्रह्लाद  असुरराज  हिरण्यकश्यप   के  पुत्र  थे  l  अपने  बल , पराक्रम  और   कठोर  तपस्या  से  वह  स्वयं  को  भगवान  समझने  लगा  था   और  चाहता  था  कि  प्रह्लाद  उसे  ही  अपना  इष्ट  माने , उसे  ही  परमात्मा  मानकर  पूजा  करे  l लेकिन  प्रह्लाद  का  कहना  था  --- आप  तो  पिता  हैं , परमपिता  कैसे  हो  सकते  हैं   ?  पिता  तो  हमारी  देह  के   सर्जक  हैं  ,  परन्तु  परमपिता  तो  हमारी  आत्मा  के  सर्जक  हैं  l  ईश्वर  से  बड़ा  कोई  नहीं  l  जब  से  प्रह्लाद  ने  बोलना  शुरू  किया  हमेशा   'नारायण -नारायण  जपते   l  यह  सब  देख  हिरण्यकश्यप  को  बहुत  क्रोध  आया  , उसने  अपने  पांच  वर्ष  के  अबोध  बालक  को  भयंकर  कष्ट  दिए   और  दैत्यगुरु , स्रष्टि  के  महान  तांत्रिक  शुक्राचार्य    को   प्रह्लाद  को  अपनी   तांत्रिक  क्रियाओं   से  वश  में  करने  को  कहा  l   -----  बालक  प्रह्लाद  अपनी  माता  कयाधू  की  गोद  में  लेते  थे  , राजवैद्यों  के  हर  संभव  इलाज   के  बावजूद  उनका  बुखार  नहीं  उतर  रहा  था  , कोई  दवा  कारगर  नहीं  थी ,  बार -बार  बेहोश  हो  जाते , जब  थोडा  सा  होश  आता  तो  नारायण -नारायण  बुदबुदाते  l  पांच  दिन  बीत  गए  ,  माता  कयाधू  ने  देवर्षि  नारद  को  याद  किया  ,  नारद जी  ने  आकर  प्रह्लाद  को  गोद  लिया   विष्णु  भगवान  की  कथा  सुनाई  तो  बालक  प्रह्लाद  का  बुखार  उतर  गया  और  स्वस्थ  हुए  l  तब  माता  कयाधू  ने  पूछा ---- ' हे  देवर्षि  !  मेरे  पुत्र  की  बीमारी  का  मूल  कारण  क्या  है  ? '  तब  नारद जी  ने  बताया  --- " यह  कोई  रोग  नहीं  है   l  यह  दैत्यगुरु  शुक्राचार्य  द्वारा   की  गई   अनवरत   तांत्रिक  क्रियाओं  का  परिणाम  है  l "  माता  के  यह  पूछने  पर  कि  इतने  छोटे  बालक  से  दैत्यगुरु  का  क्या  बैर  है  ?  नारद जी  ने  कहा ---- " हे  देवी  !  यह  अहंकार  सबसे  खतरनाक  चीज  है  l  अहंकार  विवेकरूपी  आँखों  पर  पट्टी  बांध  देता  है  ,  वह  अपनी  शक्ति  का  प्रयोग  अबोध  बालक  पर  भी  करने  से  नहीं  चूकता  l  शुक्राचार्य  को  अपने  तंत्र  पर  बड़ा  गर्व  है  ,  वे  तंत्र  के  माध्यम  से  प्रह्लाद  के  मन  में  यह   विचार  डालना  चाहते  थे  कि  वे  अपने  पिता  को  ही  परमात्मा  माने   लेकिन  प्रह्लाद  ने  उनकी  बात  नहीं  मानी , वे  तो  विष्णु  भगवान  को  ही  हर  पल  याद  करते , और  परमात्मा  मानते  l  इसलिए  शुक्राचार्य  ने   उन  पर  मारण  जैसी  क्रिया  का  प्रयोग  किया  था  जिससे  उन्हें  बुखार  और  शरीर  में  भयंकर  पीड़ा  हुई  l  आप  चिंता  न  करें ,  शुक्राचार्य  का  बड़े  से  बड़ा  मारक  तंत्र  प्रह्लाद  का  कुछ  नहीं  बिगाड़  सकता   ,  परमात्मा  के  प्रति  उनकी  निष्ठां  और  भक्ति  उनका  सुरक्षा  कवच  है  l  " --------   आखिर  वो  दिन  आ  ही   गया  जब  भगवान  ने  नृसिंह  अवतार  लेकर  हिरण्यकश्यप   का  वध  किया   l    

24 June 2022

WISDOM -------

   पुराण  की  अनेक  कथाएं  हैं  जो  यह  बताती  हैं  कि  छल -कपट ,  ईर्ष्या -द्वेष , लोभ , पद  का  लालच ,  महत्वाकांक्षा ,--  ये  सब  बुराइयाँ  केवल  धरती  पर  ही  नहीं  है ,  स्वर्ग  भी  इनसे  अछूता  नहीं  है   l  वहां  भी  षड्यंत्र ,    धोखा   , छल  है  l  ये  कथाएं  हमें  जीवन  जीने  की  कला  सिखाती  हैं   कि  कैसे  इन  विपरीत  परिस्थितियों   के  साथ  तालमेल    बैठाकर    धैर्य  और  शांति  से  रहा  जाये  l  --------  दैत्यकुल  के  राजा  बलि  अपनी  तपस्या , भक्ति   और  सद्गुणों  के  कारण  स्वर्ग  में  इंद्र के  पद  पर  सुशोभित   थे  l  देवताओं  को  यह  बात  सहन  नहीं  हो  रही  थी   l    उन्होंने  भगवान  विष्णु   से  प्रार्थना  की  कि  कोई  उपाय  करें   जिससे  महाराज  बलि  उस  पद  से  हट  जाएँ   l  जिसे  बल  से  न  हराया  जा  सके  उसे  हराने  के  लिए  स्वर्ग  में  भी  छल -कपट  होता  है   l  भगवान  विष्णु  वामन  रूप  धरकर  बलि  को  छलने  आए  l  महाराज  बलि  को  उनके  गुरु  शुक्राचार्य  ने   भगवान  विष्णु  के  इस  छल  के  प्रति  आगाह  किया , समझाया  कि  वे  उन्हें  दान  न  दें  ,  परन्तु  बलि  ने  कहा ---- " हे  गुरुवर  ! जब  भगवान  स्वयं  वामन  बनकर  मेरे  दरवाजे  याचक  बन  कर   ,  हाथ  फैलाकर  कुछ  मांगने  आए  हैं  , तो  मैं  उन्हें  मना    कैसे  कर  सकता   हूँ  ?  मैं  अपना  दान  का  कर्म  अवश्य  पूरा  करूँगा  l "  वामन  बनकर  भगवान  विष्णु  ने  कहा --- " बलि  !  दान  में  मुझे  केवल  तीन  पग  जमीन  ही  चाहिए   l  "   जैसे  ही  बलि  ने  संकल्प  लेकर  कहा --- " मैं  आपको  तीन  पग  जमीन  दान  देता  हूँ  ,  "   भगवान  विष्णु  ने  वामन  से  विरत  रूप  धरकर  दो  पग  में  सारी  धरती  और  आसमान  नाप  लिया  l  अब  तीसरा  पग  कहाँ  धरें  ?  बलि  ने  कहा ---   अब  कहाँ  बताएं  ?  तीसरा  पग  मेरे  सिर  पर  धर  लो  l   भगवान  ने  उसके  सिर  पर  पग  धरकर  बलि  को  सीधा   पाताल  भेज  दिया   l  बलि  ने  समझ  लिया  कि  यह  तो  काल  चक्र  की  विपरीतता  है  l  वे  तो  भगवान  के  भक्त  थे   l   एक  साधारण  इनसान  बनकर  पाताल  में  भी  प्रसन्न  रहने  लगे  l   परिजनों  को   यह    मंजूर  नहीं  था  , तब  महाराज  बलि  ने  परिजनों  को   काल  की  महत्ता   को  स्पष्ट  करते  हुए  कहा ---- " काल  की  महिमा  से  जो  अवगत  होते  हैं  ,   वे  उसे  प्रणाम  कर  के  स्वयं  को   उसके  अनुकूल  ढाल  लेते  हैं   l  बड़े -बड़े  साम्राज्य   जिनका  सूर्य  कभी  ढलता  नहीं  है ,  उन्हें  काल  क्षण  भर  में   धूल  -धूसरित  कर  देता  है  l   काल  उठाता  है  तो  एक  तिनका  भी  पहाड़  बन  जाता  है  l  एक  गरीब  कुबेर  जैसा  समृद्ध , संपन्न  बन  जाता  है   l  काल  साथ  देता  है  तो  कठिन  परिस्थितियां  भी  सरल  हो  जाती  हैं  l     आज  काल  हमारे  साथ   नहीं  खड़ा  है   l  ऐसे  विपरीत  समय  में  कोई  साधन , तप , ज्ञान  काम  नहीं  आता  l  सब  कुछ  धरा - का -धरा  रह  जाता  है   l  अत:  ऐसे  विपरीत  समय  हमें  शांत  और  स्थिर  रहना  चाहिए   और  प्रभु  द्वारा  निर्धारित  स्थान  पर    अपनी  भक्ति  के  सहारे  अनुकूल  समय   की  प्रतीक्षा  के   अलावा  और  कोई  विकल्प  नहीं  है   l  ऐसे  समय  कोई  अपना  साथ  नहीं  देता ,  केवल  भगवान  ही  सुनते  हैं  l  "

23 June 2022

WISDOM -----

   लघु -कथा ---- एक  गिद्ध  था  l  उसके  माता -पिता  अंधे  थे  l  गिद्ध  प्रतिदिन  अपने  साथ -साथ  अपने  माता -पिता  के   भोजन    की  व्यवस्था  भी  जुटाता  था   l एक  दिन  वह  किसी  बहेलिये  के  जाल  में  फंस  गया   l  वह  बेहद  दुःखी   हुआ  कि  मैं  मर  जाऊंगा  तो  माता -पिता  का  क्या  होगा   ?  वह  जोर- जोर   से   विलाप  करने  लगा  l  बहेलिये  ने  उसके  रोने  का  कारण  पूछा  तो   गिद्ध  ने  अपनी  व्यथा  कही   l  बहेलिया  बोला --- "  गिद्धों  की  द्रष्टि  तो  इतनी  तेज  होती  है   कि  सौ  योजन  ऊपर   आसमान  से  भी  देख  लेती  है  ,  लेकिन  तू  जाल  को  कैसे  नहीं  देख  पाया   ? "  गिद्ध   बोला  ---- " बुद्धि  पर  जब  लोभ  का  पर्दा  पड़  जाता  है   तो  उसे  ठीक -ठीक  दिखाई  नहीं  देता  l  जीवन  भर  मांस  के  पिंड   के  पीछे  भागते - भागते  मेरी  नजर  को  अब  उसके  सिवाय   कुछ  और  दिखाई  ही  नहीं  देता   l  इसी  कारण  मैं  तेरा  जाल  नहीं  देख  पाया   l  "  बहेलिये  को  गिद्ध  की  ज्ञान  भरी  बातें अच्छी  लगीं   l   उसने  कहा ---- ' गिद्धराज  !  जाओ  मैं  तुम्हे  मुक्त  करता  हूँ  l  अपने  अंधे  माता - पिता  की  सेवा  करो   l  तुमने  मुझे  लोभ  का  दुष्परिणाम  बता  दिया  l  '

22 June 2022

WISDOM -------

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- ' जीवन  का  स्वरुप  कोई  भी  हो , व्यक्तिगत  अथवा  सामूहिक  ,  उसके  साथ  काल , कर्म   और  स्थान  की  निरंतरता  अनिवार्य  रूप  से  जुड़ी  है   l  सभी  को  अपने  कर्मों  के  अनुसार  स्थान  मिला  है ,  साथ  ही  नए  कर्मों  की  स्वतंत्रता  भी  ,  लेकिन  इनके  परिणाम  तो  काल  ही  तय  करता  है   l  कहते  हैं ---- परमेश्वर  ने  स्वयं  इस  युग  में  महाकाल  का  रूप  धारण  किया  है   l  वे  व्यक्ति  को  और  समूह  को  ,  राष्ट्र  और  विश्व  को   उसके  कर्मों  का  उचित  दंड  देकर   नए  युग  का  आरम्भ  करेंगे   l  युग  का  प्रत्यावर्तन  करेंगे   l    श्रीमद् भगवद्गीता  में   भगवान  अपना  परिचय  देते  हुए  कहते  हैं ---- ' मैं  काल  हूँ  l '  उन्होंने  मंदिरों  में ,  विभिन्न   देवस्थानों  में   पूजे  जाने  वाले    किसी  देवी -देवता  के  रूप  में   स्वयं  का  परिचय  नहीं  दिया   l  सीधा - सपाट  कहा ---- ' मैं  काल  हूँ  l '  महाभारत  में  परमेश्वर  काल  रूप  में   कुरुक्षेत्र  में  महायुद्ध  का  दंड   लेकर  प्रकट  हुए  हैं    l  अर्जुन  से  कहते  हैं  --- तुम  इन  प्रतिपक्षी  योद्धाओं  को   मारो  या  न  मारो  ,  पर  ये  मरेंगे  अवश्य   l  इन्हें  मारने  का  माध्यम   तुम  बनो  या  फिर   कोई  और  ,  इनका  मरना  सुनिश्चित  है  ,  क्योंकि  व्यक्ति  अथवा  समूह  को    कोई  परिस्थिति   या  घटनाक्रम  नहीं  मारता    l  उसे  मारता  है  ,  उसका  कर्म   l  भीष्म  और  द्रोणाचार्य  अपने  व्यक्तिगत   जीवन  में  भले  ही  अच्छे  हों  ,  पर  दुर्योधन  के  अनगिनत   दुष्कर्मों  के  साथ   उनकी  मौन  स्वीकृति  ने  उन्हें   दंड  का  भागीदार  बना  दिया    l  यही  स्थिति   अन्य   सभी  की  है  l    जीवन  में  शुभ  और  अशुभ  के  लिए  प्रत्यक्ष  में  जिम्मेदार   कोई  भी  हो  ,  पर  यथार्थ  में   उत्तरदायी  होता  है  कर्म  l   इस  कर्म  के  अनुसार  ही  काल  नियत  समय  और  नियत  स्थान  पर  परिस्थितियों   और  घटनाक्रमों  का  सृजन  कर  देता  है   l  कर्म  जितना  व्यापक  और  तीव्र  होता  है  ,  उसी  के  अनुरूप   काल  भी   अपना  आकार  बढ़ा  लेता  है   l   

21 June 2022

WISDOM -------

     लघु -कथा  -----  एक  बार  अमेरिका  की   एक  पचास  मंजिली  इमारत  का  लिफ्ट  खराब  हो  गया   l  सबसे  ऊपरी  मंजिल  में  स्थित  एक  कार्यालय   के  कर्मचारी   जब  सीढियाँ  चढ़कर   ऊपर  जाने  लगे   तो  उन्होंने  समय  काटने  के  लिए   तय  किया  कि   प्रत्येक  बारी -बारी  से   एक  छोटी -छोटी  कहानी   सुनाता  चलेगा  l   कहानी  सुनने  का  जब  दौर  चल  रहा  था  ,  तो  एक  कर्मचारी  बीच  में   टोकने  का  बार -बार  प्रयत्न  करता  ,  किन्तु  सब  लोग  उसे  चुप  करा  देते   l  मंजिल  निकट  आने  पर  जब  उसकी  बारी  आई   तो  लोगों  ने  उससे  कहा -- "  हाँ  भाई ,  अब  तू  सुना  ,  तब  से  क्या  बीच  में  टोक  रहा  था   l  "  उसने  बड़ी  स गंभीरता  से  कहा --- " मैं  केवल   यही  कहना  चाहता  था  कि   कार्यालय  की  चाबी  तो  नीचे   कार  में  ही  रह  गई  है   l   इतनी  देर  से  कोई  मेरी  सुनता  ही  नहीं  है   l  " ----

20 June 2022

WISDOM ------

   हकीम  लुकमान  कहते  थे ---- ' भोजन  का  असंयम  कर   मनुष्य  अपनी  जीभ  से   अपनी  कब्र  खोदता  है  l '   ---एक  सेठ जी  थे ,  वे  खाँसी  से  बहुत  परेशान  थे  l   वैद्य जी  के  पास  गए  ,  तो  वैद्य जी   ने  उनसे  परहेज  करने  को  कहा   l  सेठ जी  ने  कहा ---- " आप  चाहें   तो  जितनी  कड़वी  दवा   दें  दे,    पर  मैं  परहेज  नहीं  कर  सकता  l  "  वैद्य जी  ने  कहा --- फिर  आप  परहेज   भी  मत  कीजिए  ,  दवा   भी    मत  लीजिए  ,  क्योंकि  खांसी  के  तीन  लाभ  आपको  अवश्य  ही  होंगे  l  एक  लाभ  तो  यह   कि  आप   रात   भर  खांसते  रहेंगे  तो   ,  घर  में  चोर  नहीं  आयेंगे  l    दूसरे    आपको  कुत्ते  नहीं  काटेंगे   क्योंकि  कमजोरी  के  कारण  आप   बिना  लाठी  नहीं  चल   सकेंगे  l   तीसरा  लाभ  यह  है  कि  बुढ़ापा   नहीं  आएगा  ,  क्योंकि  खांसी  के  कारण   जीवन  जल्दी  ही  समाप्त  हो  जायेगा   l  यह  सुनकर  सेठजी  को   वैद्य जी  की  बात  समझ  में  आ  गई   और  उन्होंने  खाने -पीने  पर  नियंत्रण  कर  अपने  को  स्वस्थ  कर  लिया  l