अनमोल मोती ----- ' एक भेड़िये के गले में हडडी अटक गई l वह सियार के पास पहुंचा और बोला ---- --- " आपकी लम्बी थूथनी है l कृपा कर के मेरे गले में उसे डालकर हडडी निकाल दीजिए l वक्त आने पर मैं तुम्हारे काम आऊंगा l " सियार ने वह हडडी निकाल दी l एक दिन सियार को भेड़िये की सहायता की आवश्यकता पड़ी l उसने पिछला अहसान याद दिलाया l भेड़िये ने कहा --- " मेरा यह अहसान क्या कम है , जो मुँह के अन्दर पहुंची हुई तुम्हारी गर्दन बख्श दी l " इस कथा से हमें यही शिक्षा मिलती है कि दुष्ट व्यक्ति के साथ कभी कोई सरोकार न रखे l यदि जाने - अनजाने उनसे कभी कोई सरोकार हो भी जाता है तो उनसे प्रत्युपकार की आशा कभी न करे l
11 July 2022
10 July 2022
WISDOM ----
अनमोल मोती ----- 1. किसी ने एक संत से पूछा ---- " महाराज ! अब संत और धूर्त सब एक ही तरह के कपड़ों में विचरण करने लगे हैं l हम लोगों के सामने बड़ी कठिन समस्या खड़ी हो जाती है l कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे धूर्तों से बचकर हम संतों की सेवा कर सकें l " संत ने कहा ---- " इसमें कौन सी बड़ी बात है ! धूर्त सेवा कराने के फेर में रहते हैं और संत सेवा करने के फेर में l संत सेवा जैसा व्यवहार करता है और धूर्त का व्यवहार अपनी कार्यसिद्धि के लिए चापलूसी और चतुराई से भरा रहता है l धूर्त मांगता है और संत देता है l "
2. एक बार वाराणसी में गंगा घाट पर एक वृद्ध नहाने उतरे , उनका पाँव फिसल गया और डूबने लगे l एक युवक तुरंत कूदा और वृद्ध को बचा लाया l वृद्ध की प्रार्थना पर भी युवक ने कोई पुरस्कार लेना स्वीकार नहीं किया l इस पर वृद्ध ने कहा --- 'आवश्यकता पड़ने पर कलकत्ता आना , मैं अवश्य तुम्हारी सहायता करूँगा और उन्होंने अपना पता युवक को दे दिया l कुछ महीने बाद युवक वृद्ध से मिला और कुछ कविताएँ सामने रखता हुआ बोला ---- इन्हें आप अपनी पत्रिका में छाप दें l कविताओं का स्तर देखकर और युवक की अनुचित मांग को देखते हुए वे बहुत दुःखी हुए और बोले ---- ' एक बात कहूँ ? मैं इन्हें छाप नहीं सकता l तुम चाहो तो उस उपकार के बदले में मुझे फिर गंगा में धकेल दो l " यह थी उनकी आदर्शवादिता और सिद्धांत निष्ठा l ऐसे ही व्यक्तियों के कारण हमारी संस्कृति सुरक्षित थी l ऐसे व्यक्ति जीवन व्यापर में भले ही असफल हो जाएँ , लेकिन उनका अंत:करण उन्हें सदा आशीष देता है तथा उन्हें जन - सम्मान भी मिलता है l
9 July 2022
WISDOM ------
अनमोल मोती ----- समुद्र में भारी तूफान आया l नाव डगमगाने लगी l मल्लाहों में से एक लड़का मस्तूल पर चढ़ा और पाल को मजबूती से बांधकर रस्सी के सहारे नीचे उतरने लगा l लड़के की निगाह गरजते और उफनते समुद्र पर गई तो वह डर के मारे घबरा गया l कांपते हुए स्वर में चिल्लाया ---- " कोई बचाओ , नहीं तो मैं गिरकर मर ही जाऊँगा l " बूढ़े मल्लाह ने कड़ककर कहा ---- " बेवकूफ छोकरे नीचे को मत देख , आँखें आसमान पर रख और धीरज के साथ रस्सी के सहारे नीचे चला आ l " लड़के ने हिम्मत बाँधी और आसमान को देखता हुआ नीचे उतर आया l बूढ़े ने कहा ---- " जिंदगी में रोज ही आँधी -तूफान आते हैं l उनसे जो डरा , सो मरा l आशा की किरणों से भरे आकाश पर जिस की निगाह रहेगी , वही तो अपने पैरों पर खड़ा रह सकेगा l "
WISDOM -----
अनमोल मोती ----- 1. ' शिष्य ने पूछा --- काँसा आवाज करता है , सोना क्यों नहीं ? गुरु ने उत्तर दिया ----- " आडंबर की आवश्यकता जो निस्सार हैं , उन्ही को पड़ती हैं l जिनके पास स्व -अर्जित ज्ञान होता है , उन्हें व्यर्थ हल्ला करने की आवश्यकता नहीं होती l "
2. ' एक द्रष्टिहीन व्यक्ति हाथ में लालटेन लिए अँधेरी रात में रास्ते के निकट एक बड़े गड्ढे के पास खड़ा था और रास्ते से गुजरते लोगों से चिल्ला -चिल्लाकर कह रहा था ---- " भाइयों ! उधर बड़ा गड्ढा है l उधर से मत जाना l " राह गुजरते एक व्यक्ति ने उससे कहा ---- " क्यों भाई ! तुम्हे स्वयं तो दिखाई नहीं पड़ता , फिर ये लालटेन हाथ में लिए क्यों खड़े हो ? " अँधा व्यक्ति बोला ---- " बंधु ! मेरी बाहर की आँखें नहीं हैं तो क्या हुआ , ह्रदय तो खुला हुआ है l बहुत से ऐसे हैं , जो आँख होते हुए भी इस गड्ढ़े में जा गिरेंगे l l ये लालटेन उन्ही को मार्ग दिखाने के लिए है l "
7 July 2022
WISDOM -----
परिवार , समाज हो या राष्ट्र --- उसकी अधिकांश समस्याएं आपसी फूट , एक दूसरे को न समझ पाने की वजह से उत्पन्न होती है l इस संसार में भांति -भांति के लोग हैं , सबके अपने विचार , अपना जीने का तरीका है l यदि हम सबसे छोटी इकाई परिवार को लें ---- तो कभी परिवार के सदस्यों की अपनी कमियों और नासमझी के कारण परिवार में फूट होती है , लड़ाई - झगड़े होते हैं l लेकिन कलियुग में ऐसे लोगों की भरमार है जो ईर्ष्या -द्वेष के कारण किसी परिवार , समाज या राष्ट्र को आगे बढ़ता हुआ नहीं देख सकते , उनका जन्म ही इसलिए है कि फूट डालकर अपना स्वार्थ सिद्ध करें l जब मनुष्य में सद्बुद्धि होगी , उसका विवेक जाग्रत होगा तभी वह ऐसे नकारात्मक तत्वों से स्वयं को प्रभावित नहीं होने देगा और आंख -कान खुले रखकर , जागरूक होकर अपने जीवन का सफ़र तय करेगा l ------- एक कथा है ------ एक जंगल में हिरन , कौआ , कछुआ और चूहा रहते थे l विपरीत बुद्धि के कारण परस्पर झगड़ते रहते थे l शिकारी अक्सर उन्हें मारते रहते थे , सो उनका वंश नष्ट हो चला था l एक दिन एक संत ने उन्हें हिल -मिलकर रहने का उपदेश दिया l वे चारों मिल -जुलकर रहने को सहमत हो गए l एक दिन एक शिकारी आया l दिनभर कोई शिकार न मिलने पर उसने रेंगते हुए कछुए को पकड़ा और जाल में रखकर चलने लगा l शेष तीनों मित्र अलग -अलग तो कमजोर थे लेकिन अब उन्होंने मिल -जुलकर सूझ -बूझ से काम लिया l हिरन शिकारी के सामने से लंगड़ाते हुए चलने लगा l कौआ उसकी पीठ पर बैठ गया l शिकारी ने सोचा इस स्थिति का लाभ उठाकर हिरन को पकड़ना आसान है इसलिए उसने जाल नीचे रख दिया और हिरन के पीछे दौड़ने लगा l इतने में चूहे ने जाल काट दिया और कछुआ भागकर एक झाड़ी में छुप गया l बहुत देर पीछा करने के बाद जब हिरन ने कुलाँचे भरीं तो निराश शिकारी वापस लौटा तो जल कटा देखा और कछुए को गायब पाया l शिकारी को उस क्षेत्र में किसी भूत -प्रेत की उपस्थिति एवं करतूत प्रतीत हुई , सो वह रात्रि में उधर रुके बिना ही भयभीत होकर तत्काल घर लौट पड़ा l मित्रता और सूझबूझ के सहारे मनुष्य कठिनाइयाँ आसानी से पार कर लेता है लेकिन जब आपस में ही लड़ते हैं तब छोटी मुसीबत में भी भारी हानि उठाते हैं l
6 July 2022
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है ----- " मनोरोग और कुछ नहीं दबी -कुचली रौंदी गई भावनाएं मात्र हैं l भाव -संवेदना का अभाव व्यक्ति के व्यक्तित्व को खंडित बना देता है और एक दर्द भरा , त्रासदी युक्त जीवन जीते हुए उन्हें देखा जा सकता है l " आज संसार में बौद्धिक विकास और भौतिक सुख सुविधाओं में वृद्धि अपनी पराकाष्ठा पर है लेकिन फिर भी संसार में चारों तरफ धूर्तता , मनोरोग , छल -कपट , षड्यंत्र , धोखा , कलह -क्लेश ही दिखाई पड़ता है इसका कारण यही है कि मनुष्य ने केवल अपनी बुद्धि के विकास पर ध्यान दिया , भावनाओं की उपेक्षा कर दी l वैज्ञानिकों का भी मत है कि सुख -शांति और तनाव रहित जीवन जीने के लिए मनुष्य के बुद्धि और ह्रदय में संतुलन अनिवार्य है अर्थात बुद्धि के साथ संवेदनशीलता , दूसरों के दरद को समझना भी अनिवार्य है l ------ एक जमींदार था l साम , दाम , दंड , भेद -हर तरीका अपनाकर दूसरों की जमीन , सम्पत्ति हड़प कर वैभव - विलासिता का जीवन जीता था लेकिन उसे शांति न थी , मानसिक रूप से बहुत परेशान था l एक बार उसने विधवा बुढ़िया का खेत खेत बलपूर्वक छीन लिया l बुढ़िया ने गाँव के सभी लोगों के पास इस अत्याचार से बचाने की पुकार की , पर किसी की हिम्मत जमींदार के सामने मुंह खोलने की नहीं हुई l दुःखी बुढ़िया ने स्वयं ही साहस समेटा और जमींदार के पास यह कहने पहुंची कि खेत नहीं लौटाते तो उसमें से एक टोकरी मिटटी खोद लेने दे , ताकि उसे कुछ तो मिलने का संतोष हो जाये l जमींदार राजी हो गया और बुढ़िया को साथ लेकर खेत पर पहुंचा l उसने रोते -धोते एक बड़ी टोकरी मिटटी से भर ली और कहा --- इसे उठवाकर मेरे सिर पर रखवा दे l टोकरी बहुत भारी हो गई थी l जमींदार ने अकड़कर कहा --- ' बुढ़िया ! इतनी सारी मिटटी सिर पर रखेगी तो दब कर मर जाएगी l बुढ़िया ने उलटकर पूछा ---- यदि इतनी सी मिटटी से मैं दब कर मर जाऊँगी तो तू पूरे खेत की मिटटी मिटटी लेकर कैसे जीवित रहेगा ? ' जमींदार सोच में पड़ गया , उसके ह्रदय के किसी कोने में संवेदना जाग उठी और उसने बुढ़िया का खेत उसे लौटा दिया l उस दिन जमींदार को लगा कि उसके सिर पर से कोई बोझ उतर गया , मन हल्का हो गया l रात को चैन की नींद सो कर जब सुबह आँख खुली तब उसने जाना संवेदना की कीमत क्या होती है l
5 July 2022
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने अपनी लेखनी से संसार को जीवन जीने की कला सिखाई l छोटे - छोटे प्रसंग में बहुत गहरी बात छुपी है ------- 1. " नन्ही सी चिनगारी ! तुम भला मेरा क्या बिगाड़ सकती हो , देखती नहीं , मेरा आकार ही तुमसे हजार गुना बड़ा है , अभी तुम्हारे ऊपर गिर पडूँ तो तुम्हारे अस्तित्व का पता भी न लगे l " तिनकों का ढेर अहंकार पूर्वक बोला l चिनगारी बोली कुछ नहीं , चुपचाप ढेर के समीप जा पहुंची l तिनके उसकी आंच में भस्मसात होने लगे l अग्नि की शक्ति ज्यों -ज्यों बढ़ी , तिनके जलकर नष्ट होते गए , देखते -देखते भीषण रूप से आग लग गई और सारा ढेर राख में परिवर्तित हो गया l यह द्रश्य देख रहे आचार्य ने अपने शिष्यों को बताया ---- " बालकों ! जैसे आग की एक चिनगारी ने अपनी प्रखर शक्ति से तिनकों का ढेर खाक कर दिया l वैसे ही तेजस्वी और क्रियाशील एक व्यक्ति ही सैकड़ों बुरे लोगों से संघर्ष में विजयी हो जाता है l "
2. " बार -बार रंग बदलने की अपनी पटुता का प्रदर्शन करते हुए गिरगिट ने कछुए से कहा --- " महाशय ! देखा मैं संसार का कितना योग्य व्यक्ति हूँ l " कछुए ने धीरे से कहा ---- " महाशय ! दूसरों को धोखा देने की इस योग्यता से तो तुम अयोग्य ही बने रहते तो अच्छा था l कम -से -कम लोग भ्रम में तो न पड़ते l "