22 October 2022

WISDOM -----

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " जीवन  का  एक -एक  क्षण  बहुमूल्य  है  , पर  लोग  उसे  वासना  और  तृष्णाओं  के  बदले  कौड़ी  मोल  गँवाते  हैं  l  बहुत  गँवाकर  भी   अंत  में  यदि  कोई कोई  मनुष्य  संभल  जाता  है  ,  तो  वह  भी  बुद्धिमान  ही  माना  जाता  है  l   "  एक  कथा  है ----- एक  राजा  वन  भ्रमण  को  गया  l  रास्ता  भूल  जाने  पर   भूख -प्यास  से  पीड़ित  वह   एक  वनवासी  की  झोंपड़ी  पर  पहुंचा  l   वनवासी  के  पास  जो  भी  रुखा - सूखा   भोजन  था  और  कंदमूल , फल , ठंडा  पानी  आदि  से  उन्कुंका  स्वागत  किया  l  राजा  बहुत  तृप्त  हो  गया  l  चलते  समय  उसने  कहा  -- हम  इस  राज्य  के  शासक  हैं  , तुमने  समय  पर  जो  हमारा  आतिथ्य  किया  उससे  हम  बहत  प्रसन्न  हैं   और  यह  एक  बाग  तुम्हे  देते  हैं  ,  तुम्हारा  शेष  जीवन  आनंद  से  बीतेगा  l  वह  वनवासी  जंगल  से  लकड़ी  काटकर  उनका   कोयला  बनाकर  बेचता  था  l  अब  उसे  बाग  मिल  गया  तो  वह  उसके  पेड़ों  की  लकड़ी  काटकर  , सुखाकर  कोयला  बनाकर  बेचने  लगा  l  उसका  जीवन यापन  होने  लगा  l  धीरे -धीरे  सब  वृक्ष  समाप्त  हो  गए  , केवल  एक  वृक्ष  बचा  l   कई  दिनों  तक  वर्षा  होने  के  कारण  वह  कोयला  नहीं  बना  सका   l  उसने  उस  वृक्ष  की  लकड़ी  ही  बेचने  का  निश्चय  किया  l  लकड़ी  का  गट्ठा  लेकर  जब  वह  बाजार  में  पहुंचा   तो  उन  लकड़ियों  की  सुगंध  से  प्रभावित  होकर  लोगों  ने   उसका  भारी  मूल्य  चुकाया  l  आश्चर्य चकित  वनवासी  ने  इसका  कारण  पूछा   तो  लोगों  ने  कहा  --यह  चन्दन  की  लकड़ी  है  , बहुत  मूल्यवान  है  l  यदि  तुम्हारे  पास  ऐसी  ही  और  लकड़ी  हो  तो  उसका  प्रचुर  मूल्य  प्राप्त  कर  सकते  हो  l  वनवासी  अपनी  नासमझी  पर  पश्चाताप  करने  लगा   कि  उसने  इतना  बहुमूल्य  चन्दन  वन   कौड़ी  मोल  कोयला  बनाकर  बेच  दिया  l  पछताते  हुए  नासमझ  को   सांत्वना  देते  हुए   एक  विचारशील  व्यक्ति  ने  कहा  --- यह  सारी  दुनिया  तुम्हारी  ही  तरह  नासमझ  है  ,  इस  अनमोल  मानव जीवन  को   व्यर्थ  गँवा  देती  है  l  तुम्हारे  पास  जो  एक  वृक्ष  बचा  है  ,  अब  उसी  का  सदुपयोग  कर  लो  l  जब  जागो , तब  सवेरा  l  

21 October 2022

WISDOM -----

 गोस्वामी  तुलसीदास जी  ने  लिखा  है ---- मोहि  कपट , छल , छिद्र  न  भावा  l  निर्मल  मन  जन  सो  मोहि  पावा  l   जिनका  भी  मन  निर्मल  है , सरलता  है  उन्हें  कभी -न -कभी  और  किसी -न -किसी  रूप  में  ईश्वर  की  अनुभूति  अवश्य  हुई  है  l  जिनके  मन  में  कपट  है  , ईश्वर  उनसे  कोसों  दूर  है  l  एक  कथा  है -----  एक  गरीब  विधवा  स्त्री  थी  l  उसका  एक  बेटा  था  रामू  l   उसने  उसे  स्कूल  भेजा  l  उसके  घर  से  विद्यालय  बहुत  दूर  था  और  रास्ते  में  जंगल  पड़ता  था  l  रामू  बहुत  छोटा  था  इसलिए  उसे  जंगल  में  डर  लगता  था  l  वह  अपनी  माँ  से  कहता --- " माँ , मुझे  जंगल  में  डर  लगता  है  , तुम  मुझे  पहुँचाने  चलो  l "  माँ  ने  कहा --- " बेटा , मैं  घरों  में  काम  करने  जाती  हूँ  , तेरे  साथ  नहीं  जा  सकती  l  हाँ , जंगल  में  तेरा  भाई  गोपाल  रहता  है , वहीँ  गाय  चराता  है  ,  तू  उसे  बुला  लेना  l "   अब  जंगल  में  पहुँचते  ही   रामू  ने  पुकारा  --- 'गोपाल  भैया  जल्दी  आओ  , मुझे  डर  लग  रहा  है  l ' कृष्ण  भगवान  ग्वाले  के  रूप  में  आ  गए   और  रोज  उसे  विद्यालय  पहुंचा  देते  l  अब  रामू  बहुत  खुश  था  , माँ  से  कहता  -- 'माँ , गोपाल  भैया  रोज  आ  जाते  हैं , अब  मुझे  डर  नहीं  लगता  l '  माँ  को  कुछ  समझ  नहीं  आया  , वह  संतुष्ट  हो  गई  कि  उसका  बेटा  अब  डरता  नहीं  है , रोज  स्कूल  जाता  है  l   एक  दिन  स्कूल  में  उत्सव  था  , गुरु जी  ने  सब  बच्चों  से  कहा --- " कल  यहाँ  उत्सव  है , सब  बच्चे  कुछ  न  कुछ  लेकर  आना  l  "   रामू  घर  आया  और  अपनी  माँ  से  कहने  लगा --- माँ , कल  स्कूल  ले  जाने  के  लिए  तुम  भी  मुझे  कुछ  दो , गुरु जी  ने  कहा  है  l  सब  बच्चे  कुछ न  कुछ  लायेंगे  , इसलिए  मैं  खाली  हाथ   जाऊं  तो  अच्छा  नहीं  लगेगा  l  माँ , बेचारी  बहुत  गरीब  थी  , दो  वक्त  का  भोजन  तो  मुश्किल  था , उपहार  कहाँ  से  लाती  l  उसने  कहा --- "  बेटा , कल  गोपाल  भैया  से  कुछ  मांग  लेना , वो  किसी  को  मना  नहीं  करते  l "  जंगल  आने  पर  रामू  ने  पुकारा --- " गोपाल भैया  जल्दी  आओ  l " भगवान  कृष्ण  ग्वाले  के  वेश  में  आए , उनके  हाथ  में  छोटी  सी  मटकी  थी  l  उन्होंने  कहा -- ' मुझे  मालूम  था  कि  तुम्हारे  स्कूल  में  उत्सव  है   इसलिए  यह  दही  की  छोटी सी  मटकी  तुम  उपहार  में  ले  जाओ  l  "  रामू  बहुत  खुश  , बहुत  खुश  !  स्कूल  पहुंचा  ,  सब  बच्चे  बड़े -बड़े  उपहार  लाए  थे  , गुरु जी  ने  रामू  की  छोटी  सी  मटकी  को  देखा  तो  उपेक्षा  से  कहा --- 'जा  उस  कोने  में  रख  दे  l '  संयोगवश  खाना  खाते  समय  दही  समाप्त  हो  गया  l  गुरु जी  को  मटकी  की  याद  आई  l  मटकी  से  दही  निकला  तो  मटकी  खाली  नहीं  हुई  ,  जितने  भी  बरतन  वहां  थे  ,सब  भर  गए  लेकिन  मटकी  खाली  नहीं  हुई  l  इस  चमत्कार  से  सब  आश्चर्य चकित  थे  l  गुरूजी  ने  रामू  से  पूछा --- " यह  मटकी  कहाँ  से  लाए  हो  ?   "  रामू  ने  गर्व  से  कहा न--- " मेरे  गोपाल  भैया  ने  दी  है , मैं  डरता  हूँ   , इसलिए  वे  जंगल  में  मेरे  साथ  चलते  हैं  l  "  गुरु जी  ने  कहा --- " तू  मुझे  गोपाल  भैया  के  दर्शन  करा  दे  l  "  वे  रामू  के  साथ  चले  ,   रामू  ने  पुकारा  ,   गोपाल  भैया  आए   लेकिन  गुरु जी  को  वे  दिखाई  नहीं  दिए  l  रामू  कहता  रहा  --'देखिए , ये  हैं  मेरे  गोपाल  भैया  ,  लेकिन  गुरु जी  को   दर्शन  नहीं  हुए   l  रामू  के  पूछने  पर  भगवान  ने  कहा --- इनका  मन  तुम्हारे  जैसा  निर्मल  नहीं  है  l 

20 October 2022

WISDOM ----

 आज  की  सबसे  बड़ी  विडंबना  यह  है  कि  मनुष्य  के  पास  जो  कुछ  है  वह  उससे  खुश  नहीं  है , संतुष्ट  नहीं  है  l  इससे  भी  बड़ी  बात  ये  है  कि    जो  आसुरी   प्रवृत्ति   के  हैं   वे  तो   अपने  पड़ोसी,  रिश्ते -नाते  --- किसी  की  ख़ुशी  को  सहन  नहीं  कर  सकते   l   उनका   हर  संभव  प्रयास   यही  रहता  है  कि  कैसे  किसी  की  ख़ुशी  को  छीना  जाये  ,  उनको  दुखी  देखकर  ही   उनकी  आत्मा  को  संतुष्टि  मिलती  है  l  कलियुग  में  दुर्बुद्धि  के  कारण  ऐसे  लोगों  की  संख्या  अधिक  होने  के  कारण  ही   लोगों  के  जीवन  में  तनाव  है  , सुख -चैन  की  नींद  नहीं  आती  l   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- ' आज  मनुष्य  भौतिकवादी  बनकर  नास्तिक  बन  गया  है   l  अपने  लाभ  से  अधिक  उसे  इस  बात  की  चिंता  है  कि  पड़ोसी  की  हानि  कैसे  हो  ? '  एक  कथा  है  -------- एक  व्यक्ति  ने  भगवान  शिव  की  बहुत  पूजा -प्रार्थना  की  l   शिवजी  ने  प्रसन्न  होकर  दर्शन  देकर  कहा  ---- " मांग , क्या  मांगता  है  ? "  मन  की  गहराई  में  जिसकी  जैसी  सोच  होती  है ,  उसके  मुँह  से  वही  निकलता  है  l  उसने  कहा --- ' भगवान  ! पड़ोसी  हमसे  दूने  रहें  l '  भगवान  तो  भोलेनाथ  हैं , उनने  कहा  ---' तथास्तु  l '  और  अंतर्धान  हो  गए  l  वह  व्यक्ति  मन -ही -मन  खूब  खुश  हुआ  l  घर  पहुंचा  l  पूजा -पाठ  से , कर्मकांड  से  ईर्ष्या -द्वेष  गया  नहीं  , वह  बोला --- 'भगवान ! मेरा  एक  हाथ  टूट  जाए  l "  पड़ोसियों  के  दोनों  हाथ  टूट  गए  l   फिर  बोला --- " भगवान  !  मेरी  एक  आँख  फूट  जाए  l "  पड़ोसियों  की  दोनों  आँख  फूट  गई   l  फिर  भी  उसे  शांति  नहीं  मिली  l  कहने  लगा --- 'भगवान  !  मेरा  एक  पैर  टूट  जाए  l "  पड़ोसियों  के  दोनों  पैर  टूट  गए  l   स्वयं  काना  होकर  लंगड़ाते  हुए  पड़ोसियों  को  देखने  गया  ,  तब  कहीं  उसके  मन  को  तसल्ली  हुई  l     आज  मनुष्य  पर  नकारात्मकता  हावी  है , उसके  सोचने  का  ढंग  बदल  गया  इसलिए  स्वयं  भी  दुखी  है  तथा  औरों  को  भी  दुखी  करने  का  प्रयास  करता  है  l  

19 October 2022

WISDOM -----

 कर्म फल  प्रकृति  का  नियम  है  l  यह  नियम  सब  के  लिए  हैं  चाहे  वह  मनुष्य , हो  या  देवता , यक्ष  या  फिर  स्वयं  भगवान  ही  क्यों  न  हों   l  महाभारत  की  कथा   में  है   कि  युद्ध  में  अर्जुन  के  बाणों  से  घायल  हो  जाने  पर  वे  छह  महीने  तक  शर -शैया  पर  पड़े  रहे  l  एक  काँटा  चुभ  जाए  तो  कितना  कष्ट  होता  है   और  पूरे  शरीर  में  बाण  चुभे  हों   और  उन  नुकीले  बाणों  को  ही  छह  महीने  के  लिए  अपनी  शैया  बना  लेना  --- उस  असीम  कष्ट  को  हम  अनुभव  कर  सकते  हैं  l  उन्हें  इतना  कष्ट  उठाना  पड़ा  l   अपनी  भीष्म प्रतिज्ञा  के  कारण  अधर्म  और  अनीति  के  मार्ग  पर  चलने  वाले  दुर्योधन  का  साथ  देना  पड़ा  l  यह  सब  क्यों  हुआ  ?  इसके  पीछे  एक  कथा  है  -----   एक  बार  आठ  वसु   अपनी  पत्नी  सहित  मृत्यु लोक  में  भ्रमण  के  लिए  आए  और   कई  तीर्थों  के  दर्शन  करते  हुए  महर्षि  वशिष्ठ  के  आश्रम  पहुंचे  l  आश्रम  का  दर्शन  करते  हुए   एक  वसु 'प्रभास '  अपनी  पत्नी  सहित  महर्षि  के  उद्यान  में  आ  गए  ,  वहां  महर्षि  की   कामधेनु   गाय  नन्दिनी  थी  , जिसे  देखकर  वसु  की  पत्नी  उसे  पाने  के  लिए  व्याकुल  हो  गई  और  वसु  प्रभास  से  बोली  --- 'अभी  महर्षि  आश्रम  में  नहीं  है ,  इसे  हम  चुरा  लेते  हैं  l  '  वसु  ने  उसे  बहुत  समझाया  कि  लोगों  की  प्यारी  वस्तु  देखकर  लालच  करना  और  उसे  पाने  की  अनाधिकार  चेष्टा  करना  पाप  है  l  हम  अच्छे  कर्मों  के  कारण  ही  देवता  हुए  हैं  ,  बुराई  पर  चलने  से  कर्म-भोग  का  दंड  भुगतना  पड़ेगा  l  प्रभास  ने  उसे  हर  तरह  से  समझाया   लेकिन  वह  न  मानी   और  उसे  गाय  चुरानी  पड़ी  l   ऋषि  जब  आश्रम  वापस  आए  और  उन्होंने  नन्दिनी  को  नहीं  देखा  तो  सब  से  पूछा  l  कुछ  पता  न  चलने  पर  जब  उन्होंने  अपनी  दिव्य  द्रष्टि  से  देखा  तो  मालूम  हुआ  कि  यह  तो  वसुओं  की  करतूत  है  l  देवताओं  के  ऐसे  पतन  पर  उन्हें  बहुत  क्रोध  आया   और  उन्होंने  शाप  दे  दिया  कि  आठों  वसु   देव शरीर  त्याग  कर   पृथ्वी  पर  जन्म  लें  l   शाप  व्यर्थ  नहीं  हो  सकता  l  देव गुरु  के  कहने  पर   उन्होंने  सात  वसुओं  को  तो  धरती  पर  जन्म  लेते  ही  तत्काल  मुक्ति  का  वरदान  दे  दिया   लेकिन  अंतिम  वसु  प्रभास  को   जिसने  कामधेनु  चुराई  थी  उसे  चिरकाल  तक  मनुष्य  शरीर  में  रहकर  कष्टों  को  सहन  करना  पड़ा  l  ये  आठों  वसु  महाराज  शांतनु  और  गंगा  के  पुत्र  थे  ,  जिनमे  सात  की  तो  तत्काल  मृत्यु  हो  गई   परन्तु  आठवें  वसु  प्रभास  को  पितामह  के  रूप  में   जीवित  रहना  पड़ा  l  यह  कथा  उन्हें  समझाने  के  लिए  है  जो  बेईमानी  और  भ्रष्टाचार  में  लिप्त  हैं  l  ऋषि  कहते  हैं --- यह  न  समझा  जाए   कि  एकांत  में  किया  गया  अपराध  किसी  ने  देखा  नहीं   l  नियंता  की  द्रष्टि  सर्वव्यापी  है   उससे  कोई  बच  नहीं  सकता  l  

18 October 2022

WISDOM ----

 हमारे  महाकाव्य  --रामायण  और  महाभारत  -- केवल  सुनने , सुनाने  के  लिए  नहीं  हैं  ,  उनकी  शिक्षाओं  पर  अमल  करें  ,  विभिन्न  प्रसंगों  से   अपना  विवेक  जाग्रत  करें  तो  सुख -शांति  के  द्वार  खुल  जाएँ  l   महाभारत  का  ये  प्रसंग  हमें  राष्ट्रीय  एकता  का  पाठ  पढ़ाता  है  लेकिन  महाभारत  हुए  युग  बीत  गए  ,  हमने  वह  पाठ  सीखा  ही  नहीं   और  आपसी  फूट  से  सदियों  की  गुलामी  और  विदेशी  आक्रमणों  को  झेला  l  कहते  हैं  जब  जागो  तब  सवेरा   !   बाहरी  शक्तियां  तो  लाभ  उठाने  की  तैयारी  में  रहती  हैं  l  प्रसंग  है  ----  जुए  में  हार  जाने  के  बाद  पांडव  वन  में  निष्कासित  जीवन  व्यतीत  कर  रहे  थे  l  उन्हों  दिनों  की  बात  है   एक  यक्ष  ने   हस्तिनापुर  पर  आक्रमण  कर  दिया  l  जब  तक  सेना  तैयार  हो   उसने  दुर्योधन  को  छलपूर्वक  पकड़  लिया   और  विमान  द्वारा  युवराज  दुर्योधन  को  बंदी  बनाकर  अपने  यक्षपुरी   ले  चला  l  विमान  वहां  से  निकला  जहाँ  पांचों  पांडव  और  द्रोपदी  विश्राम  कर  रहे  थे  l   विमान  में  द्वन्द युद्ध  करते  दुर्योधन  को  युधिष्ठिर  ने  पहचान  लिया  l  उन्होंने  अर्जुन  को  बुलाकर  तुरंत  आज्ञा  दी  कि  --- जाओ  और  इस  यक्ष  से  युद्ध  कर  भाई  दुर्योधन  को  छुड़ा  दो  l  इस  पर   भीम  ने  विरोध  किया   और   उन्हें  दुर्योधन  द्वारा  किए  गए  षड्यंत्रों  और  अत्याचारों  की  याद  दिलाई  l   तब  युधिष्ठिर  ने  कहा ---- नीति  कहती  है   जब  बाहरी  आक्रमण  हो  तो  आंतरिक  द्वेष  भूलकर  परस्पर  मदद  करनी  चाहिए   l  हम  भाई -भाई  का  आपस  में  चाहे  वैर  है ,  लेकिन  बाहरी  आक्रमण  के  समय  हम  एक  सौ  पांच  है  l  '  अर्जुन  को  भी  बात  समझ  में  आ  गई   और  उसने  यक्ष  से  युद्ध  कर  के  दुर्योधन  को   छुड़ा  लिया  l   दुर्योधन  ने  विनीत  भाव  से   युधिष्ठिर  से  कहा --- आप  इस  उपकार  के  बदले  क्या  चाहते  हैं  ? '  युधिष्ठिर  ने  युवराज  दुर्योधन  को  सम्मान  दिया  और  कहा  --अभी  आप  हस्तिनापुर  लौट  जाएँ  ,  वहां  आपके  बिना  सब  चिंतित  होंगे  l  '

WISDOM---

   यमदूत  और  देवदूत  मृतकों  की  जीवन गाथा  पूछकर  उन्हें  स्वर्ग  और  नरक  में  ले  जाते  थे  l  एक  साधु  के  पास  वे  पहुंचे   तो  वे  बोले  ---- " मैं  भरी  जवानी  में  संन्यासी  हो  गया  l  यहाँ  तक  कि  छोटे -छोटे  बच्चे , पत्नी  तथा  माता  के   रोने -बिलखने  की  परवाह  नहीं  की  l  ऐसी  है  मेरी  भक्ति  l "  उस  साधु  को  यमदूतों  ने  नरक  पहुंचा  दिया  l   साधु  बड़ा  परेशान  हुआ  , तब  धर्मराज  ने  उसके  कर्मों  की  समीक्षा  करते  हुए  कहा ---- " कर्तव्यों  का  परित्याग  कर  के  कोई  भक्ति  नहीं  हो  सकती  l  "  वस्तुतः  कर्तव्य  सर्वोपरि  है  l   आचार्य श्री  लिखते  हैं  --- कर्तव्य  ही  धर्म  है  l  भगवद भक्ति  उसी  का  एक  अंग  है  l  

17 October 2022

WISDOM----

   ' जाके  पैर  न  फटे  बिवाई ,  वो  क्या  जाने  पीर  पराई  l  '----- यह  कहानी  है  उस  व्यक्ति  की  जिसका  नाम  था  पुन्नाग  ,  ये  अपराध  का  पर्याय  बन  चुका  था  l   पथ  पर  भटका  हुआ  कोई  भी  यात्री  उसके  रहते  सुरक्षित  घर  नहीं  पहुँच  सकता  था  l  मनुष्य  हो  या  जानवर , पशु -पक्षी  ,  उन्हें  पीड़ित  करना , मारना  यही  उसका  काम  था  l  उसकी  एक  छोटी  बेटी  थी  --विपाशा  l  जब  वह  हुई  थी  तभी  उसकी  माँ  का  देहांत  हो  गया  था  l  एक  छोटे  से  हिरण  के  शिशु  के  साथ  वो  खेला  करती  थी  l  पुन्नाग  बहुत  निर्दयी  था  लेकिन  अपनी  पुत्री  के  लिए  उसके  ह्रदय  में  बहुत  स्नेह  था  l   वह  उसे  बहुत  लाड़ -प्यार  से  रखता  l  विपाशा  नहीं  जानती  थी  कि  कष्ट -पीड़ा  क्या  होती  है   विपाशा  थोड़ी  बड़ी  हुई  तो  अपने  पिता  से  पूछा  करती  थी  कि  आप  मेरे  लिए  इतने  वस्त्र , आभूषण  आदि  कहाँ  से  लाते  है  ?  पुन्नाग  बात  को  टाल  जाता  l  धीरे -धीरे  वह  अपने  पिता  के  कृत्यों  को  समझ  गई  l  l   एक  दिन  उसके  हिरण  ने  ऐसी  छलांग  भरी  कि  उसकी  टांग  टूट  गई , वह  पीड़ा  से  छटपटाने  लगा , चल  भी  नहीं  पा  रहा  था  l  विपाशा  ने  उस  दिन  पहली  बार  पीड़ा  देखी  l  यह  पीड़ा  कैसी  होती  है  ?  यह  जानने  के  लिए  उसने  एक  बड़े  पत्थर  से  अपने  पैर  पर  प्रहार  किया   जिससे  उसके  पैर  की  हड्डी  टूट  गई  l  अब  वह  पीड़ा  से  छटपटाने  लगी  l  अब  उसे  समझ  में  आ  गया  कि  उसका  पिता  अब  तक  सहस्त्रों  प्राणियों  को   इस  तरह  कितनी  पीड़ा  दे  चुका  होगा  ,  कितना  तड़पाया  होगा  उसने  l  उसकी  आँखों  से   आँसू  रुक  नहीं  रहे  थे  l  वह  और  उसका  हिरन  दोनों  ही  घायल  अवस्था  में   थे  , हिरण  उसे  चाटकर  अपना  प्रेम   प्रकट  कर  रहा  था  l  शाम  हुई  जब  पुन्नाग  वापस  आया   तो  हमेशा  की  तरह  विपाशा  दौड़ती  हुई  बाहर  नहीं  आई  l  वह  घबरा  गया  ,  सब  तरफ  देखा  तो  बगीचे  में  विपाशा  और  हिरन  दोनों  घायल  पड़े  थे  l  विपाशा  को  ऐसी  हालत  में  देखकर  उसका  ह्रदय  चीत्कार  कर  उठा  ,  वह  बोला  --- यह  तुम्हे  क्या  हुआ  ?   विपाशा  ने  क्षीण  स्वर  में  कहा --- ' तात  !  मैं  देखना  चाहती  थी  कि  जीवों   को  किस  तरह  पीड़ा  होती  है  ,  सुना  है  आप  भी  तो  ऐसे  ही   लोगों  को  कष्ट  दिया  करते  हैं   l ' इतना  कहते  हुए  वह  बेहोश  हो  गई  l  अपनी  बेटी  का  कष्ट  देखकर  उसे  समझ  आया  कि  पीड़ा  कैसी  होती  है  l  उसने   प्राणियों  को  कितना  कष्ट  दिया  , वह  दर्द  उसे  समझ  में  आया  ,  उसके  ह्रदय  में  संवेदना  जाग  गई  l  उस  दिन  से  उसने  हिंसा  न  करने  की  सौगंध  ली  और  अपना  शेष  जीवन   पीड़ित  जानवरों  और  पशु -पक्षियों  के  उपचार  और  सेवा  में  लगा  दिया  l