21 April 2023

WISDOM -----

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " धन  का  आकर्षण  बड़ा  जबरदस्त  है  l  जब  लोभ  सवार  होता  है  तो  मनुष्य  अँधा  हो  जाता  है   और  पाप -पुण्य  में  उसे  कुछ  भी  फर्क  नजर  नहीं  आता  l  पैसों  के  लिए  वह  बुरे  से  बुरे  कर्म  करने  पर  उतारू  हो  जाता  है   और  अंत  में  स्वयं  भी  उस  पाप  के  फल  से  नष्ट  हो  जाता  है  l ------ इसी  सत्य  को  समझाने  वाली  एक  कथा  है ---- तीन  मित्र  किसी  कार्य  वश  जा  रहे  थे  l  रात्रि  में  जो  गाँव  पड़ता  , वहां  विश्राम  कर  लेते  l  एक  गाँव  में  उन्हें  पता  चला  कि  किसी  दबंग  ने  गरीबों  की  जमीन  हड़प  ली  और  बहुत  बड़ा  सेठ  बन  गया  l   दूसरी    रात्रि  जिस  गाँव  में  रुके  वहां  पता  चला  कि  एक  व्यक्ति  ने  चोरी ,डकैती  और  लूटपाट  से  अथाह  संपदा  एकत्र  कर  ली  थी ,  उसकी  संपदा  को   लूटने    के  लिए   किसी  ने  उसकी  हत्या  कर  दी  l  एक  अन्य  गाँव  में  पहुंचे  तो  वहां   देखा  कुछ  महिलाएं  सड़क  के  किनारे  बैठी  रो  रहीं  थीं  , पूछने  पर  पता  चला   कि  समर्थ  लोगों  ने  ही  उनका  सब  लूटकर  उन्हें  बेघर  कर  दिया  l  यह  सब  देख -सुनकर  वे  तीनों  बहुत  दुःखी  हुए  और  विचार  करने  लगे   कि  ये  पाप  उत्पन्न  कहाँ  से  होता  है  ?   आखिर  इस  पाप  का  बाप  कौन  है  ?   उसे  समाप्त  कर  देने  से  फिर  पाप  उत्पन्न  नहीं  होगा  l  अब  तीनों  पाप  के  उत्पत्ति  स्थान  का , कारण  का  पता  लगाने  चल  दिए  l  रास्ते  में  उन्हें  एक  वृद्ध  पुरुष  मिला  , उससे  उन्होंने  पूछा  कि   इस  पाप  का  बाप  कौन  है  ?  वृद्ध  ने  पहाड़  की  गुफा  की  ओर   इशारा  कर  दिया  l  तीनों  भागते -भागते  उस  गुफा  तक  पहुंचे   तो  देखा  उसमे   स्वर्ण ,हीरा , मोती , जवाहरात  जगमगा  रहे  हैं  l  अब  वे  तीनों  अपना  उदेश्य  तो  भूल  गए   और  यह  संपदा  इकट्ठी  करने  में  लग  गए  l  जितना  भर  सकते  थे  उतना  भर  लिया  और  चल  पड़े  l  रास्ते  में  भूख  लगी   तो  दो  मित्र  भोजन  लेने  गए   और  तीसरे  से  कहा  --तुम  इस  कीमती  माल  की  देखभाल  करो  l  अब  तीनों  के  मन  में  लोभ , लालच  आ  गया  l  जो  दो  भोजन  लेने  गए  थे  उनमें  से  एक  ने  चालाकी  से  दूसरे  की  हत्या  कर  दी   और    भोजन  में  विष  मिला  दिया  ताकि   जो  सामान  की  देखभाल  कर  रहा  है  वह  भोजन  खाकर  मर  जाये   तो  पूरी  संपदा  उसकी  हो  जाएगी  l  इधर  इसको  भी  लालच  आ  गया   और  दरवाजे  के  पीछे  छुपकर  बैठ  गया  l  जैसे  ही  उसका  मित्र  भोजन  लेकर  आया  उसने  तलवार  से  उसकी  हत्या  कर  दी   और  बड़ा  प्रसन्न  हुआ  कि  इस  संपदा  से  अब  वह  ऐशो आराम  का  जीवन  जिएगा  l  उसे  बड़ी  भूख  लगी  थी  , उसने  सोचा  पहले  खाना  खा  लें  फिर  चलें  l  भोजन  में  विष  था  , खाते  ही  उसके  हाथ -पैर  ऐंठने  लगे  औए  वह  भी  मर  गया  l   आचार्य श्री  कहते  हैं---- 'जब  भी  लालच  के  अवसर  आएं  तो  बुद्धि  को  सतर्क  रखना  चाहिए   l  लोभ  आते  ही  पाप  की  भावनाएं  बढ़ती  हैं , उत्पन्न  होती  हैं  l  बुद्धि  काम  नहीं  करती  , वह  इस  पाप  का  भयानक  परिणाम  समझ  नहीं  पाता  l  '   

19 April 2023

WISDOM ----

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " चिन्तन  परिक्षेत्र  बंजर  हो  जाने  के  कारण  कार्य  भी  नागफनी , बबूल  जैसे  हो  रहे  हैं  l  इससे  मानवता  का  कष्ट पीड़ित  होना  स्वाभाविक  है  l   कार्य  में  श्रेष्ठता  की  अभिव्यक्ति  होना   तभी  संभव  है  ,  जब  उसके  मूल  में  चिन्तन  की  उत्कृष्टता  हो  l  "         आचार्य जी  लिखते  हैं --- " प्रत्येक  व्यक्ति  समाज  पर  अपना  भला -बुरा  प्रभाव  छोड़ता  है  ,  किन्तु  सुगंध  की  अपेक्षा  दुर्गन्ध  का   विस्तार  अधिक  होता  है  l  एक   नशेड़ी   , जुआरी  , दुर्व्यसनी  , कुकर्मी    अनेकों  संगी  साथी   बना  सकने  में  सफल  हो  जाते  हैं   लेकिन  आदर्शों  का  , श्रेष्ठता  का   अनुकरण  करने  की  क्षमता  हल्की  होती  है   l  गीता  पढ़कर   उतने  आत्मज्ञानी  नहीं  बने   , जितने  कि   दूषित  साहित्य , अश्लील  द्रश्य   , अभिनय  से  प्रभावित  होकर   कामुक  अनाचार  अपनाने  में  प्रवृत्त  हुए  l    समाज  में  छाए  हुए  अनाचार , असंतोष   और  दुष्प्रवृतियों  का   मात्र  एक  ही  कारण  है  कि   जन -साधारण  की  आत्मचेतना  मूर्च्छित  हो  गई  है  l  "

18 April 2023

WISDOM -----

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " जीवन  में  उतार -चढ़ाव  तो  आते  ही  रहते  हैं  l  अनुकूलता  व  प्रतिकूलताओं  से  ही  जीवन  बना  है  l  ऐसा  कभी  नहीं  हो  सकता  कि  जीवन  में  सब  कुछ  अनुकूल  हो   और  ऐसा  भी  नहीं  हो  सकता  कि  जीवन  में  सब  कुछ  प्रतिकूल  हो  l   जीवन  की  परिस्थितियां  तो  बदलती  ही  रहती  हैं   l   यदि  व्यक्ति  अपनी  मन:स्थिति   को  परिस्थितियों  के  अनुरूप  ढाल  ले   तो  वह  अनावश्यक  उलझनों   से  बच  जाता  है   और  हर  स्थिति  का  लाभ  उठा  सकता  है  l  जीवन  में  कुछ  ऐसी  भी  परिस्थितियां   भी   आती  हैं  , जिन्हें  स्वीकार  करना  पड़ता  है   इसलिए  जिनकी  सोच  सकारात्मक  है    , वे  अनावश्यक  संघर्ष  में   अपना  समय  और  शक्ति  नहीं  गंवाते  ,  बल्कि  मन:स्थिति  बदलकर   उनका  लाभ  उठाते  हैं  l  ये  गुणग्राही  होते  हैं  , उनके  लिए  हर  स्थिति  विकास  का  अवसर  है  l  "     एक  प्रसंग  है -----   एक  दिन  एक     शिष्य  ने  अपने  गुरु  से  कहा --- "  गुरुदेव  !  एक   व्यक्ति    ने   आश्रम  के  लिए  गाय  भेंट  की  है   "  गुरु  ने  कहा  --- " अच्छा  हुआ  दूध  पीने  को  मिलेगा  l "  एक   सप्ताह   बाद  शिष्य  ने  आकर  कहा ---- "गुरूजी  !  जिस  व्यक्ति  ने  गाय  दी  थी  , वह  अपनी  गाय  वापस  ले  गया  l  "  गुरु  ने  कहा --- "अच्छा  हुआ   !  गोबर  उठाने  के  झंझट  से  मुक्ति    मिलेगी  l "  बदलती  परिस्थिति  के  साथ  सकारात्मकता  बनाये  रखना  ही  जीवन  में  सफलता   का   एकमात्र   सूत्र  है  l  

17 April 2023

WISDOM -----

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " नियत  के  अनुसार   नियति  होती  है  l  नियति  कर्मों  का  परिणाम  होती  है  l  जैसा  हम  सोचते  हैं   एवं  करते  हैं ,   वैसी  ही   हमारी  नियति  होती  है  l  सतत  सत्कर्म ,  सदाचरण   एवं   सद्भाव  के  द्वारा हमारी  नियति  श्रेष्ठता  से  परिपूर्ण  हो  जाती  है  l  लेकिन  इसके  विपरीत  स्थिति  में  नियति  अत्यंत   कष्टसाध्य  बन  जाती  है  l "       महाभारत  में  पांडवों  के  साथ  तो  भगवान  श्रीकृष्ण  थे   लेकिन  कौरव  सदा  से  षड्यंत्रकारी , फरेबी , झूठे  व  अहंकारी  थे  l   उनके  जीवन  का  उदेश्य  दूसरों  को  तरह -तरह  से  परेशान  करना   और   स्वयं   को  स्थापित  करना  था l   पांडवों  के  साथ  निरंतर  छल -कपट  और  षड्यंत्र  कर  के , भरी  सभा  में   अपनी  ही   कुलवधू  महारानी  द्रोपदी  का  अपमान  कर  के   दुर्योधन  ने  स्वयं  ही  कौरव  वंश  के  विनाश  की  नियति  लिख  ली  थी   l  नियति  के  अनुरूप  कौरव  मिट  गए   और  पांडवों  को  विजय  प्राप्त  हुई  l  अनीति  और  अत्याचार  जो  करता  है  , वह  तो  डूबता  ही  है  , जो  उसके  साथ  जुड़े  होते  हैं , वह  उन  सबको  ले  डूबता  है  l   किसी  भी  जाति  या  धर्म  में  पैदा  होना  व्यक्ति  के  वश  की  बात  नहीं  है  ,  लेकिन  श्रेष्ठ  कर्मों  से  , पवित्र  भावनाओं  से   और  छल -कपट  रहित  जीवन  से  हम  अपनी  श्रेष्ठ  नियति  का  निर्माण  कर  सकते  हैं  l  

16 April 2023

WISDOM ------

   अनमोल  वचन ----- पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " महत्वाकांक्षा  की  धुरी  पर  घूमने  वाला  जीवन वृत्त  ही  नरक  है  l  महत्वाकांक्षा  का  ज्वर  जीवन  को  विषाक्त  कर  देता  है  l  जो  इस  ज्वर  से  पीड़ित  हैं  , शांति  का  संगीत   और  आत्मा  का  आनंद  भला  उनके  भाग्य  में  कहाँ  ?    महत्वाकांक्षा  यों  तो   प्रगति  के  लिए   अत्यंत   आवश्यक  है  ,  पर  वह  अनियंत्रित  होने  पर   दुःख . शोक  का   कारण  बनती  है  l " 

 आचार्य जी  लिखते  हैं --- "  जब  तक  अहंकार  जिन्दा  है  ,  आदमी  दो  कौड़ी  का  है  l   जिस  दिन  वह  मिट  जायेगा  ,   आदमी    बेशकीमती   हो  जायेगा  l   अहं  ही  है   जिसके  कारण   न  सिद्धांत , न  सेवा  , न  आदर्श  आ  पाते  हैं  l  व्यक्ति  लोक सेवा  के  क्षेत्र    में   प्रवेश  कर  के  भी  अनगढ़  बना  रहता  है  l  "

15 April 2023

WISDOM -----

   इस  धरती  पर  असुरता  का  अंत  कर  देवत्व  की  अभिवृद्धि  के  लिए  भगवान  ने  समय -समय  पर  अवतार  लिए  l  ऋषियों  की  हड्डियों  का  पर्वत  देखकर  भगवान  राम  ने  हाथ  उठाकर  पृथ्वी  को  राक्षसों  से  विहीन  करने  की  प्रतिज्ञा  की  थी  l   ऋषि  विश्वामित्र  के  यज्ञ   में  विध्न  फ़ैलाने  वाले  ताड़का , सुबाहु ,  मारीचि  आदि  असुरों  का  वध  किया  l  छोटे  भाई  सुग्रीव  के  साथ  अन्याय  करने  वाले  बालि  का  अंत  किया  l  ऋषियों  को  त्रास   देने  वाले  खर -दूषण  का  दमन  किया   और  अंत  में  अधर्मी , अत्याचारी  सत्ताधीश  रावण  का  अंत  किया  l  असुरता  का  अंत  इसलिए  भी  आवश्यक  होता  है   क्योंकि  ये  असुर  स्वयं  तो  अत्याचार  करते  ही  हैं  , इसके  साथ  वे  जनता  के  सामने   अधार्मिकता  की  विजय  के  उदाहरण  प्रस्तुत  कर   उसे  भी  कुमार्ग  पर  चलने  का  लालच  उत्पन्न  करते  हैं  l  अच्छाई  की  अपेक्षा  बुराई  का  मार्ग  सरल  है  , इसलिए  असुरता  का  साम्राज्य  तेजी  से  फैलता  है  l  रावण  का  अंत  हो  गया  , लेकिन  द्वापर  युग  में  पुन:  असुरता  प्रबल  हो  गई   l  तब  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  अवतार  लेकर   अनीति  बरतने  वाले   त्रनासुर ,  अघासुर , बकासुर , पूतना , कालिया  नाग  आदि  का  अपनी  बाल्यावस्था  में  ही  अंत  किया  फिर  बड़े  होने  पर  अत्याचारी  अन्यायी  शासक  कंस  का  अंत  किया  l  अपनी  कुशल   नीति   से  अत्याचारी  और  अहंकारी  शासकों  जरासंध , शिशुपाल  आदि  का  अंत  किया   और  अंत  में  अनीति  और  अत्याचार , अधर्म  का  अंत  करने   के  लिए  महाभारत  में  अर्जुन  के  सारथि  बने  l  अधर्म  का  अंत  और  धर्म  की  स्थापना  हुई  l  लेकिन  समस्या  समाप्त  नहीं  हुई ,   कलियुग   में  सम्पूर्ण  धरती  पर  ही  असुरता  का  बोलबाला  है  l  छल , कपट , षड्यंत्र , अनीति , भ्रष्टाचार , स्वार्थ , लालच , महत्वाकांक्षा   जैसी  बुराइयों  से   कोई  परिवार , कोई  भी  संस्था ,  यहाँ  तक  कि  संसार  में  कोई  भी  अछूता  नहीं  बचा  है  l  संभवतः  ये  धरती  टिकी  रहे , उसके  लिए  जितने  अच्छे , सच्चे  लोगों  की  जरुरत  होगी  , केवल  मात्र  उतने  ही   अच्छे -सच्चे  धरती  पर  होंगे  l  समस्या  ये  है  कि  जब  असुरता  का  साम्राज्य  इतना  व्यापक  है  तो  उसका  अंत  कैसे  हो  ?  यह  समस्या  ईश्वर  के  भी  सामने  है  कि  कहाँ  तक  अवतार  लें  ?  ये  पृथ्वीवासी  तो  सुधरते  ही  नहीं  ,  असुरता  का  अंत  होना  तो  दूर  , संख्या  बढ़ती  ही  जाती  है  l  असुरों  के  नाम  पर  कुछ  का  अंत  कर  भी  दिया  तो  क्या  ?  रावण  एक  विचार  है  , उस  विचार  का  अंत  होना  जरुरी  है  l   लोगों  के  विचार  सकारात्मक  हों , चेतना  का  परिष्कार  हो  , इसी  कार्य  के  लिए   दैवी  शक्तियों  ने  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  को  धरती  पर  भेजा  l  उन्होंने  बताया  कि  गायत्री मन्त्र  में  ही  वह  शक्ति  है   जो  दुर्बुद्धि  का  नाश  करती  है   और  सद्बुद्धि  को  जाग्रत  करती  है  l  जब  विचार  अच्छे  होंगे , तो  कार्य  भी  सकारात्मक  होंगे  l  इसके  साथ  जरुरी  है  कि  अपने  आचरण  से  शिक्षा  दो , पहले  स्वयं  सुधरो , फिर  दूसरों  को  सुधारो  l  'अपना  सुधार  ही  संसार  की  सबसे  बड़ी  सेवा  है  l '

14 April 2023

WISDOM -----

   महाभारत  एक  ऐसा  महायुद्ध  था  जिसके  लिए  कहा  जाता  है  ---' न  भूतो  , न  भविष्यति  l '  उस  युग  में  अनीति  और  अत्याचार  अपनी  चरम सीमा  पर  था  l  महाभारत  की  यह  कथा  हमें  बताती  है  कि  अत्याचारी  कभी  अकेला  नहीं  होता  , अनेक  समर्थ  और  बुद्धिमान  लोग  सुख -वैभव  का  जीने  की  लालसा  में  उसके  साथ  होते  हैं  , उन्हीं  की   दम    पर  अत्याचार   फलता -फूलता  है  l  यदि  भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य , कृपाचार्य    ---- दुर्योधन  का  साथ  देने  से  इनकार  कर  देते   तो  महाभारत  का  युद्ध  टल  सकता  था  ,  लेकिन  आरम्भ  से  ही  उन्होंने  दुर्योधन  की  गलत  नीतियों  का  साथ  दिया  l  ये  सब  ज्ञानी  थे  ,  धर्म , अधर्म , नीति  अनीति  का  उन्हें  ज्ञान  था   और  जानते  भी  थे   कि   पांडवों  के  विरुद्ध  दुर्योधन  जो  षड्यंत्र  रचता  है  , उनका  मौन  रहकर  समर्थन  करने  से  उनका  भी  दर्दनाक  अंत  होगा  l  सब  जानते  हुए  भी   वे  दुर्योधन  के  ही  पक्ष  में  रहे  l  कहते  हैं  कि  दुर्योधन  को  सबसे  ज्यादा  कर्ण  पर  विश्वास  था  ,  यदि  कर्ण   , दुर्योधन  का  साथ  नहीं  देता  तो  यह  युद्ध  नहीं  होता  l  लेकिन  युद्ध  होना  ' दैवीय  विधान  '  था  l  उस  समय   अनीति , अत्याचार , छल , कपट , षड्यंत्र  आदि  बुराइयाँ  राजपरिवारों  तक   सीमित  थीं  ,  लेकिन  अब  ये  जन -जन  में  व्याप्त  हैं  l  इसलिए  अब  स्थिति  भयावह  है  l स्वार्थ , लालच , महत्वाकांक्षा   की  अति  है   l  हर  व्यक्ति  सोचता  है  कि  उसकी  दुकान  चलती  रहे , संसार  से  क्या  लेना -देना  ?   लेकिन   एक ' तीसरी  आँख  '  है  ,  जिसे  हर  पल  की  खबर  है  l  ईश्वर  स्वयं  किसी  को  दंड  नहीं  देते , बस !  उसके  कर्मानुसार  उसे  सद्बुद्धि  या  दुर्बुद्धि  दे  देते  हैं   l  व्यक्ति  स्वयं  अपनी    राह   चुनता  है   और  उसके  अनुरूप  परिणाम  प्राप्त  करता  है  l