' लालच बुरी बला '------- पुराण की एक कथा है ----- महापंडित कौत्स स्नान कर एक ऊँची शिला पर बैठकर सूर्य को अर्घ्य दान दे रहे थे l एक घड़ियाल उन्हें बहुत देर से ताक रहा था , पर वे सावधान थे , अत: पानी से हटकर बैठे थे l यमुना की तलहटी से रत्नों की राशि उछलकर उस घड़ियाल ने कौत्स के आसपास बिखेर दी और स्वयं पानी में छिप गया l कौत्स ने जब देखा कि रत्न बिखरे हुए हैं , कोई देख नहीं रहा , तो उन्होंने जल्दी -जल्दी बीनकर उन्हें अपने उत्तरीय में बाँध लिया l घड़ियाल को मौका मिल गया l उसने सिर ऊपर कर कहा --- " आचार्य ! यह तो एक तुच्छ भेंट थी l आप मुझे त्रिवेणी तक पहुंचा दें l मैंने वहां का मार्ग नहीं देखा l आपको पीठ पर बैठा लेता हूँ l मैं आपको वहां अनगिनत रत्न दूंगा l " महापंडित कौत्स को लालच आ गया और उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया l अभी वह घड़ियाल बीच धार में ही था कि हँस पड़ा l कौत्स ने पूछा ---- "ग्राहराज ! आप हँसे क्यों ? " ग्राह बोला ---- " पंडितप्रवर ! आप जीवनभर दूसरों को उपदेश देते रहे कि लालच नहीं करना चाहिए , पर स्वयं उसका पालन नहीं कर पाए l आज आपका सर्वनाश सुनिश्चित है l " यह कहकर उसने उन्हें उछाला और उदरस्थ कर लिया l
1 May 2023
30 April 2023
WISDOM -----
1 . लघु -कथा ---- एक बिच्छू की कछुए से दोस्ती हो गई l बिच्छू बोला --- " तुम मुझे पार पहुंचा दो , डंक नहीं मारूंगा l " कछुआ राजी हो गया और बिच्छू को पीठ पर बैठाकर पानी में तैर चला l अभी कुछ ही दूर चला था कि बिच्छू ने डंक मार दिया l कछुए ने पूछा --- ' यह क्या किया ? " बिच्छू बोला --- "यह तो मेरा स्वभाव है l " कछुए ने कहा --- " अच्छा हुआ मैंने अपने को सुरक्षित किया हुआ है , पर तेरे आततायीपन का दंड तो तुझे मिलना ही चाहिए l " यह कहकर कछुए ने पानी में दुबकी मार ली और बिच्छू पानी में डूबकर मर गया l ' अपने ही दोष अंततः विनाशकारी सिद्ध होते हैं l '
2 . लघु -कथा ---- एक भला खरगोश था l सभी पशुओं की सहायता करता और मीठा बोलता था l जंगल के सभी जानवर उसके मित्र थे l एक बार खरगोश बीमार पड़ा , उसने आड़े समय के लिए कुछ चारा -दाना अपनी झाड़ी में छिपा रखा था l सहानुभूति प्रदर्शन के लिए जिस मित्र ने सुना वही दौड़ा आया और आते ही संचित चारे -दाने में मुंह मारना शुरू किया l एक ही दिन में वह सब समाप्त हो गया l खरगोश अच्छा तो होने लगा , पर कमजोरी में चारा ढूंढने के लिए जा न सका और भूखों मर गया l उथली मित्रता और कुपात्रों की सहानुभूति सदा हानिकारक ही सिद्ध होती है l सच्चे मित्र थोड़े ही हों पर भले हों , वक्त पर काम आ सकें l
27 April 2023
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचार और उनके द्वारा लिखे गए ' प्रेरणाप्रद द्रष्टान्त ' हमें जीवन जीने की कला सिखाते हैं l आज की परिस्थितियों में जब लोग बड़ी जल्दी निराश होकर आत्महत्या कर लेते हैं , ऐसे में आचार्य जी के विचार मनुष्यों को सकारात्मक सोच प्रदान करते हैं l आचार्य जी लिखते हैं ------- -----" जो उपलब्ध है उसे कम या घटिया मानकर अनेक लोग दुःखी रहते हैं l यदि हम इन लालसाओं पर नियंत्रण कर लें और अपना स्वाभाव संतोषी बना लें तो शांतिपूर्वक रह सकते हैं l अपने से अधिक सुखी , अधिक साधन संपन्न लोगों के साथ यदि अपनी तुलना की जाये तो प्रतीत होगा कि सारा अभाव और दारिद्रय हमारे ही हिस्से में आया है l परन्तु यदि उन असंख्य दीन -हीन , पीड़ित , परेशान लोगों के साथ अपनी तुलना करें तो अपने सौभाग्य की सराहना करने को जी चाहेगा l l केवल मात्र द्रष्टिकोण के परिवर्तन से सुख -शांति से जीवन जिया जा सकता है l " एक कथा है ----- एक अँधा भीख माँगा करता था l जो पैसे मिल जाते उसी से अपनी गुजर -बसर करता l एक दिन एक व्यक्ति ने उसके हाथ में पांच रूपये का नोट रखा l उसने उस कागज को टटोला और समझा कि किसी ने ठिठोली की है l उसका मन उदास हो गया और उसने खिन्न मन से उसे जमीन पर फेंक दिया l एक सज्जन ने उसे वह नोट उठाकर दिया और कहा यह पांच रूपये का नोट है , तब वह प्रसन्न हुआ और उससे अपनी आवश्यकता पूरी की l आचार्य जी लिखते हैं ---- " ज्ञान चक्षुओं के अभाव में हम भी परमात्मा की अपार देन को देख और समझ नहीं पाते हैं और सदा यही कहते रहते हैं कि हमारे पास कुछ नहीं है , हम साधनहीन हैं , पर यदि हम जो कुछ हमें नहीं मिला है , उसकी शिकायत करना छोड़कर , जो मिला है , उसी की महत्ता समझें तो मालूम होगा कि जो कुछ मिला हुआ है वह अद्भुत है l "
26 April 2023
WISDOM ----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " जो कार्य अभी हो सकता है , उसे कल के लिए न छोड़ें , उसे तत्काल करें l अभी हो सकने वाले कार्य को घंटे भर बाद करने की मनोवृत्ति आलस्य की निशानी है l आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है l " एक लघु कथा है ----- ------ पत्नी ने पति को सुझाव दिया --- 'वर्षा समीप है , अब छत पर मिटटी डाल लेनी चाहिए l ' पति थे आलसी , बोले ---- " ऐसी क्या जल्दी है , डाल लेंगे l मिटटी डालने में कितना समय लगता है l " पत्नी चुप हो गई l फिर आकाश में कुछ बदल घिर आए , पत्नी बोली --- 'देखिए , बरसात सिर पर आ गई अब मिटटी डाल लेनी चाहिए l ' पति महोदय ऊँघते हुए बोले --- " बादल तो रोज ही आते हैं l रात में ही बादल नहीं बरस पड़ेंगे l " वह दिन भी निकल गया और मिटटी छत पर नहीं पड़ी l फिर एक दिन एकाएक आँधी आई और अपने साथ बादलों का एक झुण्ड भी बहा लाइ l देखते ही देखते आकाश में काले बादल छा गए l बिजली चमकी और तेज वर्षा आरम्भ गिल कई दिन तक घनघोर वर्षा हुई , परिणाम यह हुआ कि पूरा मकान धराशाई हो गया l पति महोदय रोने लगे -- " अब इन बच्चों का क्या होगा ? " पत्नी ने धीरे से कहा --- " वही जो आलसियों के बच्चों का होता आया है l "
WISDOM ----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'प्रत्येक छोटे से लेकर बड़े कार्यक्रम शांत और संतुलित मस्तिष्क द्वारा ही पूरे किए जा सकते हैं l संसार में मनुष्य ने अब तक जो कुछ भी उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं , उनके मूल में धीर -गंभीर शांत मस्तिष्क ही रहे हैं l कोई भी साहित्यकार , वैज्ञानिक , कलाकार -शिल्पी , यहाँ तक की बढ़ई , लोहार , सफाई करने वाले श्रमिक तक अपने कार्य , तब तक भली भांति नहीं कर सकते , जब तक उनकी मन:स्थिति शांत न हो l ' कार्ल मार्क्स ने अपनी विश्वविख्यात कृति ' दास कैपिटल ' एक पैर पर खड़े होकर लिखी , क्योंकि उन दिनों उनके नितंब पर फोड़ा निकला हुआ था , जिससे वह बैठ नहीं पाते थे l कार्ल मार्क्स ने अपने मित्र से एक बार हँसी में कहा था कि मेरा यह फोड़ा पूंजीपतियों को बहुत दरद देगा और उनकी यह बात सच निकली l
25 April 2023
WISDOM ----
लघु कथा ---- बंदरों का एक दल आम के बाग़ में निवास करता था l बन्दर जब भी आम तोड़ने का प्रयास करते तो आम तो कम हाथ लगते , पर बाग़ के रखवालों के पत्थर ज्यादा झेलने पड़ते l तंग आकर बंदरों के सरदार ने एक दिन बंदरों की सभा बुलाई और उसमे घोषणा की कि ' आज से हम लोग अपना अलग बाग़ लगाएंगे और उसमें आम के पेड़ लगाएंगे l इससे रोज -रोज के इस झंझट से मुक्ति मिलेगी l बात बाकी बंदरों को जँच गई l सबने आम की एक -एक गुठली ली और जमीन में गड्ढा कर के बो डाली l बंदरों में प्रसन्नता की लहर व्याप्त हो गई कि अब शीघ्र ही हर बन्दर आम के एक पेड़ का स्वामी होगा l लेकिन कुछ ही घंटे गुजरे थे कि बंदरों ने जमीन खोदकर गुठलियाँ बाहर निकाल लीं , ताकि ये देख सकें कि गुठलियों से पेड़ निकला या नहीं l देखते ही देखते सारा बाग़ उजड़ गया l दूर से यह द्रश्य देखकर संत ने अपने शिष्यों से कहा ----- 'कर्मों का इच्छानुसार फल प्राप्त करना हो तो प्रयत्न के अतिरिक्त धैर्य की भी आवश्यकता होती है l अधीर मनुष्यों का हाल भी इन मूर्ख वानरों के समान ही होता है l हर विकास के लिए एक समय विशेष अनिवार्य है l '
23 April 2023
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने से संबंधित किसी भी सच्चाई को स्वीकारना ही नहीं चाहते और सच्चाई को छुपाने के लिए भांति -भांति के आडम्बर ओढ़ते हैं , झूठ बोलते हैं l इस कारण उनके व्यक्तित्व के ऊपर इतने नकाब चढ़ जाते हैं कि वे अपनी वास्तविक पहचान से बहुत दूर हो जाते हैं l ओढ़े गए आडम्बर कभी भी जीवन में सुकून और शांति नहीं देते और इसका परिणाम भी कभी हितकारी नहीं होता l गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है -------' उधरहिं अंत न होइ निबाहू , कालनेमि जिमि रावण राहू l अर्थात जो वेशधारी ठग हैं , उन्हें भी अच्छा साधु का वेश बनाये हुए देखकर उनके वेश के प्रताप से जग उन्हें पूजता है , परन्तु एक न एक दिन उनका भेद खुल जाता है , अंत तक उनका कपट नहीं निभता , जैसे कालनेमि , रावण और राहू का हाल हुआ l राक्षसराज रावण के कहने पर कालनेमि ने साधु का वेश धारण किया और जब श्री हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने के लिए हिमालय जा रहे थे , तब उनका मार्ग रोका l साधु वेशधारी कालनेमि की राम भक्ति से हनुमान जी बहुत प्रभावित हुए लेकिन जब उन्हें सच्चाई का पता चला कि यह कालनेमि तो राक्षस है , उनका मार्ग रोकने के लिए यह कार्य कर रहा है , तो उन्होंने तत्क्षण उसका वध कर दिया l इसी तरह रावण ने साधु का वेश धारण कर के और स्वयं को तपस्वी बताकर सीताजी का अपहरण किया l इस कपट का दंड सम्पूर्ण राक्षस वंश को अपने प्राण देकर चुकाना पड़ा और अंत में महाज्ञानी , शक्तिशाली रावण का भी इस कपट के कारण अंत हुआ l यही हाल राहु का भी हुआ l समुद्र मंथन में जब अमृत निकला और भगवान विश्वमोहिनी रूप धारण कर अमृत बाँट रहे थे तब राहु देव रूप धारण कर देवताओं के समूह में बैठ गया और अमृत पान कर लिया किन्तु जैसे ही सूर्य और चन्द्र देव ने भगवान को बताया कि यह तो असुर है तो भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया l तब तक राहु अमृत पी चुका था इसलिए मरा नहीं और दो भागों में विभाजित -राहु और केतु --नवग्रह में अपना स्थान पाया l आचार्य श्री लिखते हैं --- व्यक्ति को आडम्बर युक्त जीवन का चयन नहीं करना चाहिए , बल्कि सच्चाई के साथ जीवन जीना चाहिए l ऐसा जीवन ही व्यक्ति को आत्मबल प्रदान करता है l