पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----' अहंकार से ईर्ष्या , द्वेष और क्रोध उत्पन्न होता है l अहंकार सारी अच्छाइयों के द्वार बंद कर देता है l " अहंकारी व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ समझकर दूसरों का अपमान करता है l अपमानित व्यक्ति के भीतर कभी बदले की भावना उत्पन्न हो जाती है तो उसका परिणाम घातक होता है l महाभारत का एक प्रसंग है --- द्रोणाचार्य और द्रुपद लड़कपन में गहरे मित्र थे l साथ -साथ खेले -कूदे , उठे -बैठे l लेकिन जब द्रुपद राजा बन गए तो ऐश्वर्य के मद में आकर द्रोणाचार्य को भूल गए l उनकी गरीबी देखकर उनका अपमान किया और कहा --- राजा ही राजा के साथ मित्रता कर सकता है l द्रोणाचार्य इस अपमान को भूले नहीं , उन्हें सही वक्त का इंतजार था l उन्होंने कौरव -पांडवों को धर्नुविद्या सिखाई l जब राजकुमारों की शिक्षा पूर्ण हो गई तो उन्होंने गुरु दक्षिणा के रूप में महाराज द्रुपद को कैद कर लाने के लिए कहा l उनकी आज्ञानुसार पहले दुर्योधन ने द्रुपद के राज्य पर धावा बोला , पर पराक्रमी द्रुपद के आगे वे ठहर नहीं सके l तब द्रोणाचार्य ने अर्जुन को भेजा l अर्जुन ने द्रुपद की सेना को तहस -नहस कर दिया और राजा द्रुपद को उसके मंत्री सहित कैद कर गुरु द्रोणाचार्य के सामने ला खड़ा कर दिया l अब द्रोणाचार्य ने द्रुपद को पुरानी बात याद दिलाई कि तुमने कहा था --- राजा ही राजा के साथ मित्रता कर सकता है ' , इसलिए तुम्हारा आधा राज्य ही तुम्हे वापस कर रहा हूँ क्योंकि मेरा मित्र बनने के लिए तुम्हे भी तो राज्य चाहिए l द्रोणाचार्य ने इसे अपने अपमान का काफी बदला समझा और द्रुपद को सम्मान के साथ विदा किया l इस प्रकार द्रुपद का घमंड तो चूर हुआ लेकिन उनके अभिमान को ठेस पहुंची और उनमें द्रोणाचार्य से बदला लेने की भावना बलवती होती गई l इस उदेश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने कई कठोर तप किए कि उन्हें एक ऐसा पुत्र हो जो द्रोणाचार्य को पराजित कर सके और एक पुत्री हो जिसका विवाह अर्जुन से हो l उनकी यह कामना पूर्ण हुई l महाभारत के युद्ध में उनके पुत्र धृष्टद्द्युमन ने द्रोणाचार्य का वध किया और द्रुपद की पुत्री द्रोपदी से अर्जुन का विवाह हुआ l
15 May 2023
14 May 2023
WISDOM -----
यह कथा उस समय की है जब कौरव -पांडव बहुत छोटे बालक थे l ये सब राजकुमार नगर से बाहर कहीं गेंद खेल रहे थे कि इतने में उनकी गेंद एक अंधे कुएं में जा गिरी l युधिष्ठिर उसको निकालने का प्रयत्न करने लगे तो उनकी अंगूठी भी कुएं में जा गिरी l सभी राजकुमार कुएं के चारों ओर खड़े हो गए , उन्हें गेंद निकालने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था l एक ब्राह्मण मुस्कराता हुआ यह सब देख रहा था , उसने उन राजकुमारों से कहा ---- " राजकुमारों ! तुम क्षत्रिय हो ,भरत वंश के दीपक हो l जरा सी धर्नुविद्या जानने वाले जो काम कर सकते हैं , वह भी तुम लोगों से नहीं हो सकता l बोलो , मैं गेंद निकाल दूँ तो तुम मुझे क्या दोगे ? " युधिष्ठिर ने हँसते हुए कहा --- " ब्राह्मण श्रेष्ठ ! आप यदि गेंद निकाल देंगे तो कृपाचार्य के घर आपकी बढ़िया दावत करेंगे l " तब द्रोणाचार्य ने पास में पड़ी एक सींक उठा ली और मन्त्र पढ़कर उसे कुएं में फेंका l सींक गेंद में जाकर ऐसे लगी जैसे कोई तीर हो l फिर इस तरह वे लगातार मन्त्र पढ़कर सींक कुएं में डालते रहे l सीकें एक -दूसरे के सिरे से चिपकती गईं l जब आखिरी सींक का सिरा कुएं के बाहर पहुंचा तो द्रोणाचार्य ने उसे पकड़कर खींचा और गेंद बाहर निकल आई l सब राजकुमार आश्चर्य से यह करतब देखकर उछल पड़े l उन्होंने ब्राह्मण से विनती की कि युधिष्ठिर की अंगूठी भी निकाल दें l द्रोणाचार्य ने तुरंत धनुष चढ़ाया और कुएं में तीर मारा l पल भर में बाण अंगूठी को अपनी नोक में लिए ऊपर आ गया l राजकुमारों के आश्चर्य की सीमा न रही l उन्होंने द्रोणाचार्य के आगे आदर पूर्वक सिर झुकाया और कहा --- " आप अपना परिचय दीजिये और हमें आगया दें कि हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं l " द्रोणाचार्य ने कहा ---" राजकुमारों ! यह सारी घटना सुनाकर पितामह भीष्म से ही मेरा परिचय प्राप्त करो l राजकुमारों ने जाकर पितामह भीष्म को सारी बात सुनाई तो वे समझ गए कि वे सुप्रसिद्ध आचार्य द्रोणाचार्य ही हैं , उन्होंने बड़े सम्मान के साथ द्रोणाचार्य का स्वागत किया और राजकुमारों को आदेश दिया कि वे गुरु द्रोणाचार्य से धर्नुविद्या सीखा करें l
13 May 2023
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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' दुर्लभ है मनुष्य का जीवन पाना l इससे भी दुर्लभ है , सम्पूर्ण स्वस्थ होना l यदि यह भी संभव हो तो दुर्लभ है , शिक्षित और विचारशील होना l यदि किसी को यह भी मिल जाए तो फिर दुर्लभ है , विज्ञानं और अध्यात्म में एक साथ आस्थावान होकर वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रयोगों के लिए स्वयं को समर्पित करना l यदि कोई ऐसा निष्काम दिव्य जीवन जीने लगे , तो उसके स्वागत में न केवल देवदूत स्वर्ग का द्वार खोलते हैं , बल्कि स्वयं परमेश्वर अपनी बाहें पसारकर उसे स्वयं से एकाकार कर लेते हैं l " आचार्यश्री लिखते हैं ---- "इनसान के पास जो भी संपदाएं हैं , वे एक अमानत के रूप में हैं और वे इसलिए मिली हैं कि दुनिया में इस दुनिया में खुशहाली पैदा करें , इस दुनिया में शांति पैदा करें l ईश्वर ने मनुष्यों को बुद्धि दी है , और यह इसलिए मिली है कि हम इसका सदुपयोग करें l ' आचार्य श्री कहते हैं ---- हमें कम से कम भेड़ के बराबर समझदार तो होना ही चाहिए l भेड़ों से हमको नसीहत लेनी चाहिए l भेड़ अपने बदन पर ऊन पैदा करती है और इस ऊन को वह उन लोगों को मुहैया कराती है , जिन लोगों को सर्दियों में कंबल और गरम कपड़ों की जरुरत है l अपने बदन पर से वह बार -बार ऊन कटवाती है और भगवान उस ऊन का मुआवजा बार -बार देते हैं l जितनी बार ऊन काटी जाती है , उतनी ही बार नई ऊन पैदा होती चली जाती है l मनुष्य को कम से कम भेड़ जैसा तो होना ही चाहिए l उसे रीछ जैसा नहीं होना चाहिए l रीछ के बदन पर भी भगवान ने ऊन दी थी लेकिन रीछ ने अपनी ऊन किसी को नहीं दी , जो भी मांगने आया था , उसे काटने के लिए दौड़ा l इस कारण कुदरत ने उसे ऊन देना बंद कर दिया l जन्म के समय जितनी ऊन भगवान से लेकर आया , उसमें उसके अंतिम समय कोई वृद्धि नहीं होती जबकि भेड़ को प्रकृति हर बार देती है l '
11 May 2023
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महान दार्शनिक सुकरात हर सुबह घर से निकलने के पहले आईने के सामने खड़े होकर खुद को देर तक निहारते रहते थे l एक दिन उनके एक शिष्य ने उन्हें ऐसा करते देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कान तैर गई l सुकरात समझ गए l वे शिष्य से बोले ---- " तुम जरुर यह सोचकर मुस्करा रहे हो कि यह कुरूप व्यक्ति आईने में खुद को इतने ध्यान से क्यों देख रहा है ? " पकड़े जाने पर शिष्य थोडा झेंप सा गया l वह कुछ कहता , इसके पहले ही सुकरात उससे बोले --- " मैं आईने में हर दिन सबसे पहले अपनी कुरूपता देखता हूँ , ताकि उसके प्रति सजग रह सकूँ l इससे मुझे जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है , जिससे मेरे सद्गुण इतने निखरें कि वे मेरी कुरूपता पर भारी पड़ जाएँ l " शिष्य ने कहा ---- " तो क्या सुन्दर मनुष्यों को क्या आईना नहीं देखना चाहिए ? " सुकरात ने उत्तर दिया ---- " नहीं वत्स ! आईना उन्हें भी देखना चाहिए , लेकिन जब वे स्वयं को आईने में देंखें तो यह अनुभव करें कि उनके गुण भी उतने ही सुन्दर हों , जितना सुन्दर भगवान ने उन्हें शरीर दिया है l "
10 May 2023
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लघु -कथा ---- ' कर्म फल ----- बहुत वर्ष पूर्व की बात है , मथुरा नगरी में धनासुर नामक एक धनी व्यक्ति रहता था l सुख -सुविधा के सभी साधन होते हुए भी वह बहुत कंजूस था l एक दिन उसे समाचार मिला कि व्यापार के लिए निकला उसका जहाजी बेड़ा समुद्र में डूब गया l उसके अगले ही दिन उसे ज्ञात हुआ कि उसके गोदामों में आग लग गई l अभी वो इन शोक समाचारों से उबार भी नहीं पाया था कि उसके महल में चोरी हो गई और उसका सारा खजाना लूट लिया गया l धनासुर के दुःख का पारावार न रहा l अचानक सम्पन्नता छीन जाने से उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ गई और वह नगर की गलियों में विक्षिप्त की भांति घूमने लगा l ऐसी ही दशा में घूमते -घूमते एक दिन उसकी भेंट मुनि धम्म कुमार से हुई l उनके मुख पर एक गंभीर शांति , धैर्य एवं मुस्कराहट थी l धनासुर ने मुनि से पूछा --- मुनिवर ! मुझे बताएं कि किन कर्मों के कारण मैं इतने अकूत धन का स्वामी बना और किन कर्मों के कारण कंगाल होकर इस स्थिति में हूँ l " मुनि बोले --- ' वत्स ! वर्षों पूर्व अम्बिका नगरी में दो भाई रहा करते थे l बड़ा भाई धर्म , दान , पुण्य के मार्ग पर चलता था और छोटा भाई सदैव अधर्म , अनाचार का पथ अपनाता l निरंतर दान करने के बाद भी बड़े भाई की संपदा में निरंतर वृद्धि होती गई जबकि कंजूसी और लालच के पथ पर चलने के कारण छोटे भाई के व्यापार में कोई वृद्धि नहीं हुई , जितना था वैसा ही रहा l ईर्ष्यावश छोटे भाई ने बड़े भाई की हत्या करा दी l कालान्तर में बड़ा भाई साधु रूप में जन्मा और छोटे भाई का जन्म एक धनी परिवार में असुर संस्कारों के साथ हुआ l वो छोटे भाई तुम ही हो , जो अपने पूर्व जन्म के पापों का दंड भुगत रहे हो l " धनासुर ने प्रश्न किया ---- " मेरे बड़े भाई का क्या हुआ ? " मुनि हँसे और बोले ---- " तुम अभी उनसे ही बात कर रहे हो l " यह सुनते ही धनासुर का ह्रदय परिवर्तन हो गया , वह समझ गया कि कर्मों का फल अवश्य मिलता है , उसके लिए चाहे कितने ही जन्म क्यों न लेने पड़ें l इसलिए तृष्णा , लालच , ईर्ष्या से दूर रहकर सन्मार्ग को चुनें l यह विवेक जाग्रत होते ही उसने मुनि धम्म कुमार से दीक्षा ली और भिक्षु बन गया l
9 May 2023
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लघु कथा --- राजू एक चंचल लड़का था , जंगल में सैर के लिए जाता था l एक दिन उसने देखा कि एक शेर बैठा है , उसकी आँख में आंसू है , पैर में काँटा चुभा हुआ है , वह दर्द से कराह रहा है l राजू ने हिम्मत की और आगे बढ़कर शेर के पैर से काँटा निकाल दिया और अपने पास जो मरहम रखे था , वह उसकी चोट में लगा दिया l शेर को बहुत आराम मिला और अब उसकी राजू से दोस्ती हो गई l इस अहसान के बदले वह राजू को अपनी पीठ पर बैठकर जंगल की सैर कराया करता था l एक दिन कुछ गाँव वालों ने राजू को शेर के साथ देखा तो शेर से डरकर भागने लगे l राजू ने उन्हें रोकते हुए कहा --- अरे ! भागो मत ! यह तो मेरा पालतू कुत्ता है l ' शेर को यह सुनकर बहुत बुरा लगा , वह गुर्रा कर चला गया l उसके बाद उसने कभी राजू को अपनी पीठ पर नहीं बैठाया , उसके पास भी नहीं आया l यह कथा इस सत्य को बताती है कि प्रेम , अपनापन , मान -सम्मान जानवर भी समझते हैं , मजाक में भी झूठ बोलकर कभी किसी का अपमान नहीं करना चाहिए l
8 May 2023
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लघु कथा ----- एक माली के लड़के बड़े आलसी थे l वे कामकाज से जी चुराते थे और व्यर्थ की बातों में अपना समय नष्ट करते थे l जब माली मरने लगा , तो उसने लड़कों को बुलाया और कहा --- " तुम लोग आलस्य में पड़े रहकर घर में जो कुछ है , सबको अवश्य बरबाद कर लोगे , पर मैंने तुम्हारे भविष्य का ध्यान रखा और बाग़ में प्रत्येक पेड़ के नीचे थोडा -थोडा सोना गाढ़ रखा है l जब जरुरत हो तब निकाल लेना l यह कहकर माली गया l घर में जो थोड़ी सी पूंजी थी वह भी समाप्त हो गई l लड़के भूखों मरने लगे l उन्होंने सोचा कि चलो पेड़ों के नीचे से सोना निकालें l अब वे खुदाई करने में जुट गए और एक -एक कर के सभी पेड़ों को खोदते गए पर किसी के नीचे कुछ नहीं निकला l लड़के जानते थे कि हमारा बाप कभी झूठ नहीं बोलता था , फिर उनकी यह सोने वाली बात कैसे झूठ निकली , इसका उन्हें आश्चर्य था l कुछ दिनों बाद वर्षा हुई , पेड़ों के नीचे की जमीन खुद जाने के कारण जड़ों में काफी पानी पहुंचा और हर पेड़ ने काफी संख्या में फल दिए l आमदनी इतनी हुई कि हर पेड़ के नीचे सोना निकलने की बात सच हो गई l श्रम और संयम से मनुष्य अपना जीवन सफल बना सकता है l