8 June 2023

WISDOM ----

 संवेदना -करुणा -मानव धर्म ------ पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- " संवेदना  होश  का  बोध  का  दूसरा  नाम  है  l  जिसके  ह्रदय  में  संवेदना  है , आसपास  का  दुःख  उसे  बेचैन  करता  है  l  विकास  की  अंतिम  सीढ़ी  संवेदना , करुणा  का  विस्तार  है   और  यही  मानव  धर्म  है  l " ---------  एक  बार  युद्ध  के  मैदान  में  दो  घायल  सैनिक  पास -पास  पड़े  थे  l  एक  सिपाही  था  दूसरा  उसका  अफसर  l  अफसर  बुरी  तरह  घायल  हो  चुका  था , उसका  प्यास  से  गला  सूख  रहा  था l  उसने  अपनी  कमर  से  बंधी   पानी  की  बोतल  निकाली   और  प्रयत्न  कर  के   उसे  पीने  ही  जा  रहा  था   कि  उसकी  द्रष्टि   अपने  पास  उससे  भी  अधिक  घायल  हुए  सिपाही  पर  पड़ी  l  वह  मरणासन्न  था , मुंह  से  बोल  भी  नहीं  फूट  रहे  थे  , लेकिन  टकटकी  लगाकर  वह  सिपाही   उसके  पानी  की   बोतल   की  ओर  देख  रहा  था  l  उसकी  आँखों  में  याचना  थी  l  वह  जीवन  के  अंतिम  क्षणों  में   पानी  की  एक  बूंद  चाहता  था  l  अफसर  में  इंसानियत  जागी  l  उसके  अंदर  के  इनसान  ने  कहा  कि  मुझसे  ज्यादा  पानी  की  जरुरत  इस  सिपाही  को  है  l  वह  घिसटता  हुआ  सिपाही  के  पास  पहुंचा   और  पानी  की  बोतल   किसी  तरह   घायल  सिपाही  के  मुंह  से  लगा  दी  l  सिपाही  ने  पानी  पिया , उसे  तृप्ति  हुई  , उसने  अपनी  आधी  बंद  पलकें  पूरी  खोल  दीं  l    आचार्य  श्री  कहते  हैं  यही  मानव  धर्म  है  l  दूसरों  के  हित  के  लिए  कार्य  करने  से  ही  जीवन  सार्थक  और  सफल  बनता  है  l  l "          आज  के  युग    की  सबसे  बड़ी  विडंबना  है  कि  मनुष्य  संवेदनहीन  हो  गया  है  l  बिना  वजह  के  युद्ध , साम्प्रदायिक  दंगे   और  विभिन्न  अमानवीय  तरीकों  से  नकारात्मकता  फ़ैलाने  के  कारण   मानवता  और  सम्पूर्ण  प्रकृति  ही  घायल  है  !  ' समरथ  को  नहीं  दोष  गुंसाई  '  l  संसार  को  नवजीवन  कौन  दे  ?  

7 June 2023

WISDOM -----

   लघु  कथा ---- एक    राजा  वेश  बदलकर  नगर  में  यह  जानने  के  लिए   अक्सर  निकलता  था  कि  उसकी  प्रजा  सुखी  है  या  नहीं  l  एक  दिन  वह  एक  ग्रामीण   के  वेश  में  था  l  उसने  देखा  कि  एक  बहुत  बूढ़ा  आदमी   एक  बाग़  के  किनारे  काजू  का  पेड़  लगा  रहा  है  l  राजा  रुक  गया  l  उसने  उस  बूढ़े  आदमी  से  पूछा  --- "  बाबा  !  यह  पेड़  तुम  किसके  लिए  लगा  रहे  हो  ?  जब  इसमें  फल  लगेंगें  , तब  तुम  इसे  देखने  के  लिए  नहीं  रहोगे  l  फल  भी  तुम्हारे  किसी  काम  न  आएंगे  l  तुम्हारे  जीवन  के  थोड़े  से  ही  दिन  शेष  रह  गए  हैं  , फिर  इसे  लगाने  से  तुम्हे  क्या  फायदा  ? "   वृद्ध  ने  सहज  स्वर  में  उत्तर  दिया --- " फलों  के  पेड़  इसलिए  नहीं  लगाए  जाते   कि  हम  लगाते  ही  उनके  फल  खायेंगे  l  पेड़  को   लगाता    कोई  और  है  और  खाता  कोई  और  है  l  यह  दुनिया  की  बहुत  पुरानी    रीत  है  l  जो  फल  मैं  आज  खा  रहा  हूँ  , उसके  पेड़  मेरे  पूर्वजों  ने  लगाए  थे  l  मेरे  इस  पेड़  के  फल  आने  वाली  पीढियां  खाएँगी  l "  नदी  अपने  लिए  नहीं  बहती  ,  पेड़  अपने  फल  नहीं  खाता  l  इससे  यह  सीख  मिलती  है  कि  व्यक्ति  को  सदैव  दूसरों  के  हित  के  लिए  कार्य  करना  चाहिए  l  सबके  हित  में  ही   हमारा  हित  है  l   

6 June 2023

WISDOM -----

लघु  -कथा -----1 .  एक  धनी    व्यक्ति  बहुत  कंजूस  था  l  उसने  घर  की  स्त्रियों  को  भी  कुछ  दान  देने  से  मना  कर  रखा  था  l  एक  दिन  एक  भिखारी  उसके  यहाँ  भीख  मांगने  आया   तो  धनिक  की  नव विवाहिता   पुत्र वधू   भिखारी  से  बोली --- " हमारे  यहाँ  तुम्हे  देने  के  लिए  कुछ  नहीं  है  l "  भिखारी  बोला --- "फिर  तुम  लोग  क्या  खाते  हो  ?  "  वह  बोली ---- " हम  बासी  खाना  खाते  हैं  , जब  यह  भी  समाप्त  हो  जायेगा   तो  हम  भी  तुम्हारी  तरह  भीख  मांगेंगे  l  "  सेठ  ऊपर  बैठा  भिखारी  और  पुत्र वधू  की  बातें  सुन  रहा  था  l  उसने  अपनी  पुत्रवधू  से  कहा कहा ---- " तुम  यह  क्या  कह  रही  हो  कि  हम  भी  भीख  मांगेंगे  l "  पुत्रवधू  बोली ---- " पिताजी  , हमारे  पास  अभी  जो  धन  है  , उसे  हमने  पिछले  जन्म  में  किए  गए  परमार्थ  कार्यों  के  पुण्य स्वरुप  पाया  है  , परन्तु  अब  हम  परमार्थ रूपी  पुण्य  कार्य   नहीं  कर  रहे  हैं  , इसलिए   पिछला  पुण्य  समाप्त  होते  ही   हमें  भीख  मांगनी  पड़ेगी  l  "   यह  सुनकर  सेठ  को  अपनी  भूल  का  भान  हुआ  , उसका  जीवन  बदल  गया  और  उसने  निर्धनों  , जरुरतमंदों  की  नि:स्वार्थ  भाव  से  सेवा -सहायता   करना  शुरू  कर  दिया  l  

5 June 2023

WISDOM ---

   1 . ' मन  से  भी  संयमी  बनो '----  एक  व्यक्ति  ने  कन्फ्यूशियस  से  प्रश्न  किया ---- 'संयमित  जीवन  बिताकर  भी  मैं  रोगी  हूँ  , महात्मन ! ऐसा  क्यों  ? '  कन्फ्यूशियस  ने  कहा ---- "भाई , तुम  शरीर  से  संयमित  हो  ,  पर  मन  से  नहीं  l  अब  जाओ  ईर्ष्या , द्वेष , छल -कपट   करना  बंद  कर  दो   तो  तुम्हे  संयम  का  पूर्ण  लाभ  मिलेगा  l " 

2 .' ह्रदय  शुद्धि  ' -----  भक्त  कर्माबाई  भगवान  पंढरीनाथ  को  पुत्र भाव  से  पूजती  थीं   और  प्रेम  करतीं  l  वे  प्रात:काल  बिना  स्नान  किए  ही  खीर  बनातीं   और  भगवान  का  बाल -भोग  इस   भाव  से   लगातीं  कि  भगवान  को  शैया  त्यागते  ही  भूख  लगती  है  l   एक  दिन  एक  पंडितजी   ने  उन्हें  इस  तरह  बिना  स्नान  के  भोग  लगाते  देखा  तो  कहा --- कर्माबाई  !  भगवान  को  भोग   नहा -धोकर  ही  लगाना  चाहिए  , बिना  स्नान   के  भोग  लगाना  उचित  नहीं  l " कर्माबाई  को  बात  समझ  में  आ  गई   और  उस  दिन  उन्होंने  स्नान  कर  के  ही  भोग  लगाया  l  स्वाभाविक  है  स्नान  आदि  से  निवृत्त  होने  में  कुछ  देर  हो  गई  l  रात  उन्होंने  स्वप्न  में  देखा  ---भगवान  पंढरीनाथ  खड़े  भूख -भूख  चिल्ला  रहे  हैं  l  कर्माबाई  ने  पूछा --- " देव  !  आज  खीर  नहीं  खाई  क्या  ? "  भगवान  बोले ---- " माँ  !  खीर  तो  मैंने  खा   ली  ,  पर  आज  तेरा  वह  प्रेम ,  वह  भावना  नहीं  मिली   जो  रोज  मिला  करती  थी  l "  कर्माबाई  उस  दिन  से   बिना  नहाए  ही   फिर  भोग  चढ़ाने  लगीं  l  

4 June 2023

WISDOM ------

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- ' कर्तव्य  की  चोरी  सबसे  बड़ी  चोरी  है  l  '  कलियुग  में  कर्तव्यपालन  को  ही  सबसे  बड़ा  तप  कहा  गया  है  l  जो  जहाँ  हैं , जिस  भी  क्षेत्र  में  है  , वहां  अपना  कर्तव्यपालन  ईमानदारी  से  करे  तो   यही  सबसे  बड़ी  पूजा  है , तप  है  l   कर्तव्य  धर्म  को  मनीषियों  ने   ' ऋण  से  मुक्ति  '  माना  है  l    ऋण  चुका  दिया  तो  उसका   कोई  पुरस्कार  नहीं  ,  नहीं  चुकाया  तो  वह  अपराध  है  और  उसका  दंड  मिलेगा  l   कर्तव्य  का  ईमानदारी  से  पालन  करना   धर्म  है  , उस के  लिए  किसी  पुरस्कार  या  सम्मान  का  दावा  नहीं  किया  जा  सकता    लेकिन  कर्तव्यपालन  में  चूक  करने  पर   लिया  गया  ऋण  नहीं  चुकाने  की  तरह  ही  अपराध  है  l   योग  की  विभिन्न  साधनाएं  भी  तप  के  बिना  अधूरी  हैं  l  पहले  लोग  हिमालय  पर   जाकर   , एकांत  में  तप  किया  करते  थे   लेकिन   यदि  मन  को  नहीं  साधा  गया  तो  वह  एकांत  साधना  व्यर्थ  है   l  इसलिए   भगवान  ने  गीता  में  कर्मयोग  को  प्रधानता  दी  l  संसार  में  रहकर  ईमानदारी  से  अपना  कर्तव्य  करना  ही   सबसे  बड़ा  तप  है  l  ऋषियों  का  कहना  है --- कर्तव्यपालन  में  नैतिकता  अनिवार्य  है   l  कलियुग  में  दुर्बुद्धि  का  प्रकोप  होने  के  कारण   और  धन -वैभव  को  बहुत  अधिक  महत्त्व  देने  के  कारण  व्यक्ति  बेईमानी , भ्रष्टाचार , जालसाजी , हेराफेरी  , आर्थिक , सामाजिक  अपराध  में  लिप्त  हो  जाता  है   और  इसे  ही  अपना  कर्तव्य  समझकर  इसमें  ही  विशेषज्ञ  हो  जाता  है  l  ऐसे  अनैतिक  और  अमर्यादित  कार्यों  के  कारण  ही   विभिन्न  बीमारियाँ , तनाव , दुःख , पर्यावरण   प्रदूषण , बड़े  पैमाने  पर  धन-जन  की  हानि , आपदाएं  आती  हैं  l  प्रकृति  का  क्रोध  कब  और  किस  रूप  में  सामने   आ  जाए     , यह  कोई  नहीं   जानता  l  आचार्य श्री  कहते  हैं --- मनुष्य  जन्म  बार -बार  नहीं  मिलता   इसलिए  सन्मार्ग  पर  चलो , सत्कर्म  कर  अपने  जीवन  को  सार्थक  करो  l  

3 June 2023

WISDOM ------

     लघु कथा ---- 1 . मूर्ख  को  सीख  न  दो ---  पेड़  पर  एक  बन्दर  बैठा  ठंड  से  सिकुड़  रहा  था  l  उसके  पास  ही  एक  टहनी  पर  बया  नामक  पक्षी  का  घोंसला  था  l  बया    ने  बन्दर  की  दुर्दशा  देखकर  उससे  कहा --- " ए  बन्दर  !  तेरे  हाथ -पाँव  मनुष्य  के  समान  हैं  , फिर  भी  तू  इस  प्रकार  क्यों  कष्ट  पाता  है  ,  अपने  लिए  एक  घोंसला  क्यों  नहीं  बना  लेता   ?  देख  मैं  तो  एक  छोटा  सा  पक्षी  हूँ  ,  फिर  भी  मैंने  अपने  लिए  एक  घोंसला  बना  लिया  है   और  उसमें  सुख  से  रहता  हूँ   l  "  बन्दर  को  बया  का  यह  कहना  बहुत  बुरा  लगा   और  उससे  उसका  सुख  से  होना  भी   सहन  नहीं  हुआ   उसने  हाथ  मारकर  उसका  घोंसला  तोड़  दिया  l   बया  तो  बहुत  मेहनती  थी  उसने  पुन :  अपना  घोंसला  बना  लिया    और  वह  समझ  गई  कि  मूर्ख  को  कोई  उपदेश  नहीं  देना  चाहिए   l  

2 . बड़ा  कौन ---- स्वामी  रामकृष्ण  परमहंस  के  दो  शिष्यों  में   विवाद  छिड़  गया  कि  उनमें  बड़ा  कौन  है  ?  अंत  में  दोनों   स्वामी जी  के  सम्मुख  गए  l  स्वामी जी  ने  उत्तर  दिया ---- " बड़ा  सरल  हल  है  ,  तुममे  से  जो  दूसरे  को  बड़ा  समझे  , वही  बड़ा  है  l  "  अब  तो  विवाद  का  स्वरुप  ही  बदल  गया   l  दोनों  एक  दूसरे  को   " तू  बड़ा , तू  बड़ा  "  कहने  लगे  l  

2 June 2023

WISDOM -----

   महाभारत  के  कुछ  प्रसंग  इस  सत्य  को  बताते  हैं  कि    मनुष्य  के  जीवन  में  आने  वाली   समस्या    या  दुर्घटना   के  लिए  ईश्वर  उसे  सचेत  करते  हैं   l  अब  यह  व्यक्ति  के  विवेक  पर  निर्भर  है   कि  वह  ईश्वर  के  उन  संकेतों  को  समझ  पाता  है  या  नहीं ,  और  यदि  समझ  गया  है  तो  उसके  अनुरूप  आचरण  करता  है  या  नहीं  l   जैसे ---- महाभारत  में  --- कर्ण  के  शरीर  में  जन्मजात  कवच  और  कुंडल  थे   , जो  अभेद्य  थे  , उनके  रहते  उसे  कोई  भी  मार  नहीं  सकता  था  l  एक   रात  भगवान  सूर्यदेव  स्वयं  उसके  स्वप्न  में  आए  और  उससे  कहा  कि  देवराज  इंद्र   तुम्हारे  कवच -कुंडल  मांगने  आयेंगे  l  तुम्हारी  सुरक्षा  के  लिए  इनका  होना  जरुरी  है  इसलिए  तुम  उन्हें  कवच -कुंडल  देने  से  मना  कर  देना  l  कर्ण  था  महादानी  ,  उसने   सूर्यदेव  की  बात  नहीं  मानी   और  जब देवराज  वेश  बदलकर  आए  , कवच कुंडल  माँगा  तो  कर्ण  ने  सहर्ष  ही   अपने  शरीर  से  निकालकर  उन्हें  कवच कुंडल  दान  कर  दिया  और  स्वयं  ही  अपनी   सुरक्षा  में  एक  कमी  कर  ली  l               पांडव  प्रभु  की  हर  बात  को  बिना  किसी  प्रतिरोध  के  स्वीकार  कर  लेते  थे , उनमे  समर्पण  का  भाव  था  l  जब  महाभारत  का  युद्ध  समाप्त  हो  गया   और  अश्वत्थामा  ने  सोचा  कि  पांडवों  को  सोते  समय  कपट  से  मार  दूंगा  l  भगवान  कृष्ण  तो  अन्तर्यामी  थे , सब  जान  गए , उन्होंने  पांडवों  को  सोते  से  जगाया   और  कहा --- मेरे  साथ  गंगा  किनारे  चलो  l  पांडवों  ने  बिना  किसी  प्रतिरोध  के  उनकी  बात  मन  ली   और  उठकर  चल  दिए  l  श्रीकृष्ण  ने  द्रोपदी  पुत्रों  से  भी  साथ  चलने  को  कहा , परन्तु  बाल बुद्धि   होने  के  कारण   उन्होंने  इनकार  कर  दिया   और  कहा --- आप  जाओ  , हमें  तो  नींद  आ  रही  है  , सोयेंगे  l   अश्वत्थामा  ने  शिविर  में  आग  लगा  दी  l  प्रभु  के  जगाने  पर  जो  जग  गए  , वे  बच  गए   और  जिन्होंने  सोने  की  जिद  की ,   वे  लंबी  नींद  सो  गए  l  आज  भी  हमारे  ह्रदय  में   विद्यमान  परमेश्वर  हमें  समय -समय  पर  विभिन्न  संकेत  देते  हैं   l  यदि  हमारा  मन  निर्मल  है   और  कुछ  समय  हम  मौन  रहते  हैं   तो  उन  ईश्वरीय  संकेतों  को  समझकर  , उनके  अनुरूप  आचरण  कर  अपने  जीवन  को  सँवार  सकते  हैं   l