15 July 2023

WISDOM ------

    बुझते  दीपक  को  देखकर  अंधकार  ने  ठहाका  लगाया  और  कहा ---- " क्यों  आ  गया  न  तेरा  अंत  l  छोटा  सा  दीपक  और  अंधकार  को  चुनौती  देने  चला  था  l "   दीपक  बोला --- " बंधु  ! अंत  तो  इस  संसार  में  हर  एक  का  निश्चित  है  l  यदि  हमेशा  उजाला  नहीं  रहता   तो  हमेशा  अँधेरा  भी  नहीं  रहता  l  प्रश्न  इस  बात  का  है   कि  हमने  किस  उदेश्य  के  लिए  जीवन  जिया   और  अंत  में  कैसी  भावनाएं  रखीं  l   मुझे  संतोष  है  कि  मैं  औरों  के  हित  जिया   और  औरों  के  हित  मरा  l  '  ---- जार्ज  बर्नार्ड  शा   का  जब  अंत  निकट  आ  गया  तो  उन्होंने  अपने  सेक्रेटरी  से  कहा  कि  वह  कोर्ट  से  एक  वकील  को    बुलाएँ  l   वकील  के  आने  पर  उन्होंने  डाक्टरों  के  सामने  ही   अपनी  वसीयत  लिखवाई  ----  मैं  जार्ज  बर्नार्ड  शा  शपथ  पूर्वक  कहता  हूँ   कि  मेरी  अंतिम  इच्छा  है  कि  जब  मैं  इस  संसार  से   और  अपने  इस  भौतिक  शरीर  से  आजाद  हो  जाऊं   और  जब  मेरे  शव  को  कब्रिस्तान  ले  जाया  जाए   तो  उस  वक्त  मेरी  शव  यात्रा  में   प्रथम  श्रेणी  में  पक्षी ,  द्वितीय  में  भेड़ें , मेमनें , गायें  और  अन्य  सभी  तरह  के  चौपाये    और  तृतीय  में  पानी  में  रहने  वाले  जीव  होंगे  l  इन  जीवों  के  गले  में  एक  विशेष  कार्ड  बंधा  होगा  l  जिस  पर  अंकित  होगा ---' हे  प्रभु  ! हमारे  हितचिन्तक  जार्ज  बर्नार्ड  शा  पर  दया  करना  ,  जिसने  दूसरे  जीवों  की  रक्षा  के  लिए   अपना  जीवन  निछावर  कर  दिया  l  "  कहा  जाता  है  कि  अपनी  इस  इच्छा  को  लिखवाने  के  बाद  जार्ज  बर्नार्ड  शा  ने  प्राण  त्याग  दिए   और  उनकी  अंतिम  इच्छा  को  ध्यान  में  रखते  हुए   उन्हें  कब्रिस्तान  तक  पशु -पक्षियों  के  एक  जुलूस  के  साथ  पहुँचाया  गया  l  जार्ज  बर्नार्ड  शा  जीवन  भर  अंडा  और  मांसाहार  से  दूर  रहे  l  एक  बार  बहुत  बीमार  होने  पर  डॉक्टर  ने  उन्हें  अंडा  और  मांस  का  शोरबा  लेने  को  कहा  लेकिन  उन्होंने   इसे  लेने  से  इनकार  कर  दिया  l   उनके  ह्रदय  की  संवेदना ,  करुणा   और  प्रेम  संसार  के  लिए  प्रेरणा  का  स्रोत  हैं  l  

14 July 2023

WISDOM -----

  श्रीमद भगवद्गीता  में  कहा  गया  है  कि  कर्म  करने  के  लिए  व्यक्ति  स्वतंत्र  है , वह  जैसे  चाहे  वैसे  कर्म  कर  सकता  है ,  लेकिन  उसके  परिणाम  से  नहीं  बच  सकता  l  कर्मों  का  फल  तो  देर -सवेर  भोगना  ही  पड़ता  है  l  इस  संसार  में  रहते  हुए  कर्मों  का  फल  तो  मिलता  ही  है  ,  मृत्यु  के  बाद  व्यक्ति  की  क्या  गति  होगी  यह  भी  उसके  कर्म  ही  तय  करते  हैं  l  अहंकारी  सोचता  है  कि  वह  धन  से  सब  कुछ  खरीद  सकता  है  लेकिन  मृत्यु  के  बाद   उसे  कौन  सा  लोक  मिलेगा  या  अतृप्त  आत्मा  युगों  तक  भटकती  रहेगी  ---- इस  संबंध  में  उसका  धन , पद -प्रतिष्ठा  कुछ  काम  नहीं  आते  ,  यहाँ  कर्म  का  और  उससे  जुड़ी  पवित्र  भावनाओं  का  सिक्का  चलता  है  l   एक  कथा  है ------  पिता  की  मृत्यु  के  बाद  उसका  पुत्र   उनकी  अस्थियों  का  कलश  लेकर  एक  संत  के  पास  गया   और  उनसे  प्रार्थना  की  कि  वह  कोई  ऐसा  अनुष्ठान  कर  दें  कि  उसके  पिता  को   उच्च  लोक  की  प्राप्ति  हो  जाये  l  संत  बोले --- "  ऐसा  करो  कि  तुम  एक  कलश  में  घी  और  पत्थर  भरकर  ले  आओ  और  उसे  पानी  में  डुबोकर  फोड़  दो  l  "  पुत्र  ने  सोचा  कि  यह  अनुष्ठान  के  लिए  जरुरी  होगा  तो  उसने  ऐसा  ही  किया  l  संत  ने  उससे  पूछा  ---- " घी  और  पत्थर  का  क्या  हुआ  ? ' वह  युवक  बोला ---- " महाराज  !  घी  तैरने  लगा  और  पत्थर  डूब  गए  l "   संत  ने  कहा ---- "  अब  तुम  किसी  पंडित  को  ले  आओ  और  उससे  ऐसा  मन्त्र  पढ़ने  को  कहो  जिससे   घी  डूब  जाए   और  पत्थर   ऊपर  आ  जाएँ   l " युवक  ने  कहा ---- " महाराज  !  क्यों  मजाक  करते  हैं , ऐसा  कैसे  संभव  है  ? "  संत  बोले ---- " बेटा  !  फिर  ऐसा  कैसे  संभव  है  कि   तुम्हारे  पिता  को  उनके  कर्मों  के  अतिरिक्त  प्रकृति  में  स्थान  दिला  दिया  जाये  l  यदि  उन्होंने  शुभ  कर्म  किए  होंगे   तो  वे  बिना  किसी  अनुष्ठान  के  श्रेष्ठ  लोक  को  प्राप्त  करेंगे   लेकिन  यदि  उन्होंने  अशुभ  कर्म  किए  होंगे  तो  स्रष्टि  की  कोई  शक्ति   उन्हें  उच्च  लोक  में  आरुढ़  नहीं  कर  सकती  l    इसलिए  इस  संबंध  में  चिंता  छोड़कर   श्रेष्ठ  कर्म  करने  में  जीवन  लगाओ  , यही  श्रेयस्कर  मार्ग  है  l " 

13 July 2023

WISDOM -----

 एक  वृद्धा  नियम  से  चर्च  जाती  और  पादरी  का  प्रवचन  मन  लगाकर  सुनती  ,  जब  भगवान  का  नाम  आता   तो  बुढ़िया  बड़े  भक्ति  भाव  से  सिर  झुकाती   और  जब  जब  शैतान  का  प्रसंग  आता    तो  भी  बुढ़िया  उसी  भाव  से   सिर  झुकाती  l  पादरी  चकित  हुआ  l  उसकी  उत्सुकता  बड़ी  l  वह  अपने  को  रोक  नहीं  सका  l   एक  दिन  प्रवचन  समाप्त  होते  ही   चर्च  के  बाहर   बुढ़िया  को  रोक  कर  पूछने  लगे  --- माँ , परमात्मा  का  नाम  आने  पर  सिर  झुकाने  की  बात   तो  समझ  में  आती  है  ,  किन्तु  शैतान  का  नाम  आने  पर   जो   सिर   झुकाती  हो   यह  बात  समझ  में  नहीं  आती  l '  बुढ़िया  बोली --- ' कौन  जाने  किस  वक्त   किससे   काम  पड़  जाए   ? '   

11 July 2023

WISDOM -----

   ऋषियों  का  वचन  है  कि  --- दुष्ट  लोगों  का  साथ  हमेशा  दुःख  देने  वाला  होता  है  l  दुष्ट  लोगों  का  कभी  कोई  एहसान  न  ले  और  उनकी   संगत  से  हमेशा  दूर  रहे  l  '    दुष्ट  की   संगत  यदि  हम  छोड़  भी  दें  ,  तो  वे  अपनी  दुष्टता  के  कारण  हमारा  पीछा  नहीं  छोड़ते   क्योंकि  दूसरों  को  कष्ट  पहुँचाना  ही  उनका  स्वभाव  होता  है  l ---- हकीम  लुकमान  ने  अपने  अंतिम  समय  में   अपने  बेटे  को   जीवनोपयोगी  शिक्षा  देने  के  लिए   उसे   एक  कोयला  और  एक  चन्दन  का  टुकड़ा  लाने  के  लिए  कहा  l  वह  दोनों  को  लेकर  पिता  के  पास  पहुंचा  l  पिता  ने  दोनों  को  नीचे  फेंक  देने  के  लिए  कहा  l  बेटे  ने  उन्हें  नीचे  फेंक  दिया   तो  लुकमान  ने   बेटे  से  हाथ  दिखाने  के  लिए  कहा  l  फिर  वह  उसका  कोयले  वाला  हाथ  पकड़  कर   बोले ---- "बेटा  !  देखा  तुमने  l  कोयला  पकड़ते  ही  हाथ  काला  हो  गया  l  उसे  फेंक  देने  के  बाद  भी  हाथ  में  कालिख  लगी  रह  गई  l  गलत  लोगों  की  संगति  ऐसी  ही  दुःखदाई   होती  है  l  दूसरी  ओर  सज्जनों  का  संग    इस  चन्दन  की  लकड़ी  की  तरह  है  ---- जो  साथ  रहते  हैं  तो  दुनुया  भर  का  ज्ञान  मिलता  है   और  उनका  साथ  छूटने  पर  भी   उनके  विचारों  की  महक  जीवन  भर  साथ  रहती  है  l  सदैव  अच्छे  लोगों  की  संगति  में  रहना  ,  तुम्हारा  जीवन  भी  सुखद  रहेगा  l  "       महाभारत  में  भी    इसी  सत्य  को  बताया  गया  है  -----  दुर्योधन  को  तो  बाल्यकाल  से  ही  शकुनि  की   संगत  मिली   इसलिए  वह  उसके  साथ  मिलकर  पांडवों  के  विरुद्ध  छल , कपट  और  षडयंत्र  करने  लगा   लेकिन  पितामह  भीष्म , गुरु  द्रोणाचार्य , कृपाचार्य    महाज्ञानी  ,  वीर  और  विद्वान्  थे   लेकिन   दुर्योधन  आदि  कौरवों  की  संगति  के  कारण  ,   और   दुर्योधन  युवराज  था  उसके  शासन  से  मिली  सुविधाओं  को  भोगने  के  कारण   वे  उसकी  हर  अनीति   और  षड्यंत्र   का  मौन  रहकर  समर्थन  करते  रहे  l  भीष्म  पितामह  को  तो  इच्छा मृत्यु  का  वरदान  था  ,  जिस  हस्तिनापुर  साम्राज्य  की  सुरक्षा  की  जिम्मेदारी  उन्होंने  ली  थी  ,  उसी  कौरव  वंश  का  अंत  उन्होंने  अपनी  आँखों  से  देखा  l  दुर्योधन   की   संगत   ने  उन्हें   शर शैया  पर    पहुंचा  दिया  l  वर्तमान  समय  में  भी  हम  देखें  तो  अधिकांश  लोग  क्षणिक  लाभ  के  लिए , अपनी  महत्वाकांक्षा  की  पूर्ति  के  लिए  दुष्टों  का  साथ  देते  हैं  l   इसका  दूरगामी  परिणाम  क्या  होगा  इसे  वे  समझ  नहीं  पाते  l  जब  ईश्वरीय  न्याय  होता  है  तब  विलाप  करते  हैं   l 

10 July 2023

WISDOM ------

   संसार  में  अनेक  धर्म  और  अनेक  जातियाँ  हैं  ,  इन  सभी  में  अनेक  रूढ़िवादी  परम्पराएँ  और  अन्धविश्वास  हैं  l  रूढ़िवादिता  में  जकड़ा  व्यक्ति  सबसे  पहले  अपना  और  अपने  परिवार  का  ही  अहित  करता  है  ,  वक्त  के  साथ  बदलना  नहीं  चाहता  l  ऐसी  रूढ़िवादी  विचारधारा  के  साथ  जब  अहंकार  भी  जुड़  जाए  तब   स्थिति  और  भी  विकट   हो  जाती   है  l   आचार्य श्री  लिखते  हैं  ---- यदि  मान्यता  उचित  है  तो  उसे  करने  में  कोई  परहेज  नहीं  है  लेकिन  यदि  वह  असंगत  और  अनुचित  है   तो  भले  ही  वह  सदियों  से  क्यों  न  चली  आ  रही  हो ,  उससे     परहेज   करना  ही  श्रेयस्कर  है  , परन्तु  इसे  करने  में  विवेक  के  साथ  साहस  की  भी  आवश्यकता  है  l  हमें  उचित  का  वरण  करना  चाहिए   और  दुराग्रही  मान्यताओं  को  द्रढ़ता  के  साथ  त्याग  देना  चाहिए  l  '         भगवान  श्रीकृष्ण  ने   अपनी  बाल -लीला  के  माध्यम  से  बताया  कि  हमें  परंपराओं  और  परिपाटियों  में  बंधना  नहीं  चाहिए  l  ईश्वर  चाहते  हैं  कि  हम  उन  बेड़ियों  से  निकलें  और  विवेक  व  साहस  का  वरण  करें  l -----------  '  नंदबाबा  इंद्र  यज्ञ  की  तैयारी  कर  रहे  थे  l  सभी  गोप  उसी  में  लगे  थे  l  श्रीकृष्ण  ने  नंदबाबा  से  पूछा ---" यह  आप  क्या  कर  रहे  हैं  ?  यह  शास्त्र  सम्मत  है  या  लौकिक  ? '  नंदबाबा  बोले ---- "  बेटा  !  इंद्र  मेघों  के  स्वामी  हैं  l  उन्हें  प्रसन्न  करने  के  लिए   हम  यज्ञ  करते  हैं  l  यह  क्रम  हमारी  कुल  परंपरा  से  चला  आया  है  l "  श्रीकृष्ण  बोले ---- " पिताजी  ! यह  त्रिविध  जगत   ईश्वर  की  स्रष्टि  है  ,  उसी  की  प्रेरणा  से  मेघ  जल  बरसाते  हैं  l  इसमें  भला  इंद्र  का  क्या  लेना -देना  !  हम  तो  सदा  वनवासी  हैं  l  हम  गौ  व  गिरिराज  का  भजन  करें  l  गिरिराज  को  भोग  लगाया  जाए  व  उनकी  प्रदक्षिणा  की  जाए  l  "  नंदबाबा  ने  वही  किया  जो  उनके  लाड़ले  पुत्र  ने   उन्हें  विद्वतापूर्ण  ढंग  से  समझाया  l   स्वर्ग  के  राजा  इंद्र  का  अहंकार   अपनी  चरम  सीमा  पर  पहुँच  चुका  था  ,  उस  पर  चोट  पहुंची  तो   उन्होंने  मेघों  से  कहा ---"  ब्रज  पर  जल  की  अनंत  राशि  बरसाओ , वहां  जल प्रलय  आ  जाए  l "  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  अपनी  योगमाया  से  जल प्रलय  से  ओत -प्रोत  व्रज  की  रक्षा  गोवर्धन  धारण  कर  की  l  इंद्र  का  अहंकार  चूर -चूर  हो  गया  l  ईश्वर  अवतार  लेकर  अपनी  लीलाओं  से  मानव  जाति  को  प्रेरणा  देने , उसे  जीवन  जीने  की  कला  सिखाने   और  अपनी  चेतना  को  विकसित  करने  की  प्रेरणा  देने  के  लिए  ही  इस  धरती  पर  आते  हैं  l  

5 July 2023

WISDOM ----

     श्रीमद् भगवद्गीता   में  भगवान  ने  कहा  है  कि  कोई  भी  कार्य  बड़ा  या  छोटा  नहीं  होता  ,  उस  कार्य  को  करने  के  पीछे  हमारी  भावना  क्या  है , हमारे  मनोभाव  क्या  हैं  ,  इस  पर  उस  का  परिणाम  निर्भर  करता  है  l  यज्ञ  को  एक  सात्विक  कर्म  माना  जाता  है   लेकिन  उसके  करने  के  पीछे  यज्ञ  करने  की  भावना  क्या  है , उसी  के  अनुरूप  उसे  परिणाम  मिलता  है  l  राम -रावण  युद्ध  में   भगवान  श्री  राम  और  रावण  दोनों  ने  ही   युद्ध  की  शुरुआत  यज्ञ  से  की  थी   l  भगवान  राम  का  उदेश्य  धर्म  की  स्थापना  और  अधर्म  का  नाश  था  l  असुरों  के  आतंक  से  मानवता  की  रक्षा  करना  था   l  इसके  विपरीत  रावण  का  उदेश्य  अपने  अहंकार  का  पोषण  करना  था   l  जैसे  मनोभाव  थे  वैसा  ही  परिणाम  मिला  श्रीराम  की  विजय  हुई   और  रावण  का  अपने  नाती -पोतों  सहित  अंत  हुआ  l  पुराण  में  कथा  है  कि  दक्ष  प्रजापति  ने  एक  विशाल  यज्ञ  किया  l  इस  यज्ञ  को  करने  का   उनका  एकमात्र  उदेश्य  अपने  दंभ  का  प्रदर्शन  करना  था   l  परिणाम स्वरुप  माता  सती  को  उस  यज्ञ  में  अपने  प्राणों  की  आहुति  देनी  पड़ी   और  अंततः  भगवान  शिव  के  रूद्र  रूप  ने  उस  यज्ञ  को  विनष्ट  कर  दिया  l  

3 July 2023

WISDOM ----

    ' सच्चे  गुरु  के  लिए  सैकड़ों  जन्म  समर्पित  किए  जा  सकते  हैं  l  सच्चा  गुरु  वहां  पहुंचा  देता  है  , जहाँ  शिष्य  अपने  पुरुषार्थ  से   कभी  नहीं  पहुँच  सकता  l  '   केवल  गुरु  का  नाम  लेना  ही  पर्याप्त  नहीं  है ,   गुरु  के  विचारों  को  अपने  जीवन  में  उतार कर  और  उसके  अनुरूप  आचरण  कर  के  ही   सच्चा  शिष्य  बना  जा  सकता  है  l  गुरु  ही  हैं  जो  हमारी  चेतना  को  जगाते  हैं  ताकि  हम  अध्यात्म  के  पथ  पर  आगे  बढ़  सकें  l ----  एक  प्रसंग  है  ---नाथ  परंपरा  में  दीक्षित  योगी  माणिकनाथ  के  जीवन  का  l   उन्हें  अपनी  सिद्धियों  का  बहुत  अहंकार  हो  गया  था  l  उनका  आश्रम  गुजरात  में  माणिक  नदी  के  तट  पर  था  l  उन  दिनों  वहां  के  शासक  अहमदशाह  थे  , वे  अपने  नाम  पर ' अहमदाबाद '  नगर  बसाना  चाहते  थे  ,  इसके  लिए   उस    स्थान  का  चयन  हुआ  जहाँ    माणिकनाथ    का  आश्रम  था  l   जब  आश्रम  के  सामने  निर्माण  कार्य  शुरू  हुआ   तो   माणिकनाथ  को  बहुत  गुस्सा  आया   कि  यदि  कोई  निर्माण  कार्य  करना  था  तो  हम  से  पूछ  लिया  होता  l  बिना  पूछे  करने  से  योगी  का  अपमान  होता  है  l  अब  वे  अपनी  सिद्धियों  के  बल  पर  निर्माण  कार्य  में  रूकावट  डालने  लगे  l  सुल्तान  परेशान  होकर  उनके  पास  गए  , उनकी  बहुत  प्रशंसा  की  और  कहा  आप  तो  सिद्धियों  के  स्वामी  है , कार्य  में  अड़चन  डालना  आपको  शोभा  नहीं  देता  l  अपनी  प्रशंसा  सुनकर  योगीजी  का  अहंकार  और  बढ़  गया  l  वे  कहने  लगे  --मैं  चाहूँ  तो  आकाश  में  उड़  जाऊं ,  मैं  चाहूँ  तो  तुम्हारे  सामने  रखे  इस  गंगासागर लोटे  में  समा  जाऊं ,  तुमने  मेरा  अपमान  किया  !     सुलतान  चतुर  थे  , उन्होंने  कहा  --- इतनी  बड़ी  काया  और  इतना  छोटा  सा  लोटा ,  आप  कैसे  इसमें  समा  सकते  हैं  , हमें  दिखाइए  l  सुलतान  ने  उनकी  तारीफ़  कर  के  उन्हें  उकसाया  l  योगी  माणिक नाथ  भी   फूले   नहीं  समाये  l  अपनी  सिद्धियों  का  प्रयोग  कर  के   उन्होंने  अपने  को  एकदम  लघु  बना  लिया  और  लोटे  में  प्रवेश  कर  गए  l  सुल्तान  ने  अपने  दीवान  को  इशारा  किया  कि  लोटे  का  मुँह  बंद  कर  दो  l  अब  तो  योगी  लोटे  में  बंद  बड़ी  मुश्किल  में  फंस  गए  l  अन्दर  से  धमकी  देने  लग  गए  कि  मैं   तुम्हारा  सर्वनाश  कर  दूंगा , राज्य  को  नष्ट  कर  दूंगा  l  जब  सुल्तान  नहीं  माने  तो  योगी  ने  कहा --- सावधान  !  मैं  लोटा  फोड़कर  बाहर  आ  रहा  हूँ  और  तुम्हे  सबक  सिखाऊंगा  l   माणिक नाथ  वज्रास्त्र  का  प्रयोग  करने  को  तत्पर  हुए  ,  लेकिन  यह  क्या   !  वे  तो  सब  सिद्धियाँ  भूल  गए   क्योंकि  उनके  गुरु  ने  उनको  पहले  ही  समझा  दिया  था   कि   सामान्य  मनुष्य  हो  या  योगी  , उसे  अहंकार  से  दूर  रहना  चाहिए ,  यदि  तुम   अहंकार  प्रदर्शन  करोगे  तो  संपूर्ण  विद्या  भूल  जाओगे  l   अपनी  ऐसी  हालत  देखकर  योगी  रो  पड़े  और  अपने  गुरु  गोरखनाथ जी  का  स्मरण  किया  l  बाबा  गोरखनाथ जी  उनके  लोटे  में  प्रकट  हुए  और  कहा --- अहंकार  उचित  नहीं  है ,  सुल्तान  के  काम  में  विध्न  पैदा  न  करो  l  इतना  कहकर  वे  अंतर्ध्यान  हो  गए  l   माणिक नाथ  ने  सुल्तान  से  निवेदन  किया  कि   लोटे  का  मुँह  खोल  दो  , मेरे  गुरु  मुझे  समझा  गए , अब  मैं  तुम्हारे  कार्य  में  बाधा  नहीं  डालूँगा  l   सुल्तान  के  संकेत  पर  लोटे  का  मुँह  खोल  दिया  गया  ,  वे  उससे  बाहर  आ  गए  l  सुल्तान  उनके  चरणों  में  गिरकर  क्षमा  मांगने  लगे  l  योगी  ने  उन्हें  अभयदान  और  आशीर्वाद  दिया  l  इसके  बाद  उसी  स्थान  पर  उन्होंने  अपने  शरीर  का  परित्याग  कर  दिया  l  उनकी  स्मृति  में  सुलतान  ने  नगर  के  परकोटे  के  एक  बुर्ज  का  नाम  माणिक बुर्ज   और  नगर  के  मुख्य  चौक  का  नाम  माणिक  चौक  रखा  l  अहमदाबाद  का  माणिक बुर्ज  और  माणिक  चौक  आज  भी  योगी  माणिकनाथ   की  याद  दिलाते  हैं  l