25 October 2023

WISDOM -----

    पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ----- " बात  परिवार  की  हो , समाज  की  हो  , देश  या  विश्व  की  हो  सब  तरफ  झगड़े  फैल  रहे  हैं  ,  सारा  विष  घुल  रहा  है   जीवन  में  l  इसके  पीछे  केवल  एक  कारण  है   कि  भीषण  रूप  से  छीना -झपटी  मची  हुई  है  ,  आधिपत्य  करने  की  होड़  है  l  "                                           त्रेतायुग  में  भगवान  श्रीराम  अपना  अधिकार  त्यागने  के  लिए  तत्पर  थे   और  भरत  अपना  सुख  त्यागने  के  लिए  तत्पर  थे   तो  कहीं  कोई  झगड़ा  ही  नहीं  था  l  झगड़ा  तो  तब  खड़ा  होता  है  जब  कोई   दुर्योधन  कहता  है  कि  मैं  पांडवों  को  पांच  गाँव  तो  क्या  सुई  की  नोक  बराबर   भी  भूमि  नहीं  दूंगा  l  कलियुग  में   वर्तमान  में  स्थिति  और  भी  भयावह  है  ,  अब  कुछ  देने  की  तो  बात  ही  नहीं  है  ,  अब  तो  केवल  छीनना  है  l  जिसके  पास  थोड़ी  भी  ताकत  है   वह  दूसरों  का  हक  छीनता  है  l  अब  लोग  किसी  को  सुख -शांति  से  जीवन  जीते  नहीं  देख  सकते   l  यदि  किसी  ने  अपनी  मेहनत  से  अपने  को  स्थापित  किया  है  तो  आसुरी  मानसिकता  के  लोग  उसे  मिटाने  की  जी  तोड़  कोशिश    करते  हैं  l  नकारात्मक  शक्तियां  इतनी  प्रबल  हैं   लेकिन  विधाता  के  लेख  पर  उनका   वश  नहीं  है  l  विज्ञानं  और  नकारात्मक  शक्तियों  का  सहारा  लेकर  अब  तो   आसुरी  प्रवृत्ति  के  लोग    विधाता  से  भी  दो -दो  हाथ  करने  को  तैयार  हैं  l      ये  असुर  ऐसे  क्यों  होते  हैं  ?    ऋषियों  का  कहना  है  --- वे  आत्महीनता  की  ग्रंथि  से  ग्रस्त  रहते  हैं  l  वे  अपने  अन्दर  खालीपन  महसूस  करते  हैं  ,  जिसको  वे  बाहर  पूरा  करना  चाहते  हैं  l  -------- कहते  हैं  एक  बार  तैमूरलंग  ने  एक  राज्य  पर  आक्रमण  किया  l  तैमूरलंग  लंगड़ा  था  इसलिए  उसे  तैमूरलंग  कहा  जाता  था  l  जिस  राज्य  पर  उसने  हमला  किया  वहां  का  सुल्तान  काना  था  l  हमले  के  बाद  सुलह  हुई  , समझौता  हुआ   और  उसके  बाद  दोनों  मिल  बैठकर  बातें  कर  रहे  थे  l  इस  अवसर  अनेक  लोगों  को  बुलाया  गया  था  ,  उनमे  कुछ   फकीर , संत महात्मा  भी  थे   l  उस  समय  तैमूर   परिहास  की  मनोदशा  में  था   ,   हँसता  हुआ  सुल्तान  से  बोला  कि  मैं  लंगड़ा   और  तुम  काने  ,  ये  खुदा  को  भी  क्या  हो  गया  है  ?  लंगड़े -कानों  को  सुल्तान  बनाता   रहता  है  l    इतने  लोगों  का  कत्लेआम  हुआ  , विधवाओं  और  अनाथ  बच्चों  और  घायलों  की  चीखें  अभी  तक  वातावरण  में  थीं   , उस  पर   तैमूर    का  परिहास  !  सभा  में  उपस्थित   एक  फकीर  ने  कहा ---- "हुजूर  ! दरअसल  लंगड़े -कानों  को  ही  सल्तनत  की  जरुरत  होती  है  l  वे  आत्महीनता  की  ग्रंथि  से  ग्रस्त  रहते  हैं  l  वे  अपने  अन्दर  कुछ  कमी  महसूस  करते  हैं  ,  जिसको  वे  बाहर  पूरा  करना  चाहते  हैं  l   जो  अपने  में  जितना  ज्यादा  संतुष्ट -संतृप्त  होता  है   वो  बाहर  की  उपलब्धियों  की   तरफ  आँख  उठाकर  भी  नहीं  देखता  है  l   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- सेवा -परोपकार  के  कार्यों  और  निष्काम  कर्म  से  जीवन  का  खालीपन  दूर  होता  है  , यह  आत्मा  की  खुराक  है  इसी  से  आत्मा  को  तृप्ति  और   मन  को  शांति  मिलती  है  l 

24 October 2023

WISDOM -----

    विजय दशमी  का  पर्व  इस  सत्य   की  बार -बार  गवाही  देता  है  कि  हर  अत्याचारी , आततायी  और  कुकर्मी  का  अंत  अवश्य  ही  होता  है  l  रावण  मायावी  था  , तंत्र विद्या  का  ज्ञाता  और  महान  तांत्रिक  था  l  उसने  अपने  अहंकार  और  दंभ  प्रदर्शन  के  लिए  अपनी  शक्तियों  का  दुरूपयोग  किया   इसलिए  उसका  अंत  करने  के  लिए  स्वयं  भगवान  श्रीराम  को  इस  धरती  पर  आना  पड़ा  l   तंत्र  विद्या  का  प्रयोग  आदिकाल  से  ही  इस  संसार  में  हो  रहा  है   और  ये  तांत्रिक   अपने  इष्ट  देवी -देवताओं  से  शक्ति  प्राप्त  कर  इस  विद्या  का  घोर  दुरूपयोग  करते  हैं  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- " सामर्थ्य  के  संग  जब  अहंकार  जुड़  जाता  है  , तो  विनाश  होता  है   और  जब  सामर्थ्य  के  संग  संवेदना  जुड़ती  है   तो  विकास  होता  है  l  "                                                 बाबा  गोरखनाथ जी  के  समय  का  प्रसंग  है  -----  उस  समय  तांत्रिक  अपनी  तंत्र  विद्या  का  दुरूपयोग  कर  भोले -भाले  इनसानों  को  भटका  रहे  थे   और  अपनी  तंत्र  विद्या  के  ऐसे  जघन्य  और  वीभत्स  प्रयोग  कर  रहे  थे   जिससे  मानवता  कराह  उठी  थी  l  इस  कारण  मानवीय  और  आध्यात्मिक  मूल्यों  की  रक्षा  के  लिए  बाबा  गोरखनाथ जी  इन   महा भ्रष्ट   तांत्रिकों   को  सबक  सिखा  रहे  थे  l  इन  तांत्रिकों  ने  स्वयं  को  बचाने  के  लिए  अपनी  आराध्या  एवं  इष्ट   माँ  चामुंडा  देवी  की  प्रार्थना  की  l  देवी  चामुंडा  प्रकट  हुईं   और  क्योंकि  तांत्रिक  उनके  भक्त  थे  इसलिए  उनकी  सुरक्षा  एवं  संरक्षण  के  लिए  माँ  चामुंडा  ने  बाबा  गोरखनाथ जी  पर  खड्ग  उठा  लिया  l  गोरखनाथ जी  ने  कहा ---- " माता  !  प्रत्येक  इनसान  अपने  भाग्य  से  प्राप्त  सुख -दुःख  को  भोगता  है   परन्तु  ये  तांत्रिक  अपनी  विद्या  के  बल  पर  लोगों  को  निरर्थक  कष्ट  दे  रहे  हैं  l  यह  न्यायोचित  नहीं  है  और  न  ही  धर्म  है  l  जो  भी  ऐसा  दुष्कर्म  करेगा  उसको  हम  अवश्य  दण्डित  करेंगे  l "  लेकिन  देवी  चामुंडा  अपने  भक्तों  को  दिए  वचन  से   बद्ध  थीं  अत:  उन्होंने   गोरखनाथ जी  के  ऊपर  भीषण  प्रहार  किया  l  बाबा  गोरखनाथ   महान  तपस्वी  थे  और  स्वयं  तंत्र  विद्या  में  पारंगत  थे   और   समाज  में  फैली     तंत्र  की  विकृति  को  दूर  कर   शुद्ध  सात्विक  और  लोकोपयोगी  तंत्र  विद्या  की  स्थापना  करना  चाहते  थे  l  इनके  गुरु  मत्स्येन्द्रनाथ  थे   जो  भगवान  शिव  के  शिष्य  थे  l  चामुंडा  देवी  के  सामने  गोरखनाथ जी  वज्र  के  समान  खड़े  रहे  l  कहते  हैं  दोनों  महान  शक्तियों   में  तीन  वर्षों  तक  युद्ध  चला  l  तीन  वर्ष  के  कड़े  संघर्ष  के  बाद  गोरखनाथ जी  ने  देवी  चामुंडा  को  कीलित  कर  लिया   और  धरती  से  तांत्रिकों  के  उपद्रवों  को  शांत  कर  दिया  l  गोरखनाथ जी  ने  अपनी  दिव्य  द्रष्टि  से  देखा  कि   ये  तांत्रिक  फिर  से   अपनी  शक्तियों  को  समेटकर  धरती  पर  उपद्रव  करने  आयेंगे   l                                                      उनका  यह  कथन  सत्य  है  , आज  संसार  के  अधिकांश  देशों  में   तंत्र , ब्लैक मैजिक  आदि  अनेक  तरह  की  नकारात्मक  शक्तियों  का  प्रयोग  होता  है  l  ये  शक्तियां  पीठ  पर  वार  करती  हैं  , समाज  और  कानून  की  पकड़  से  बाहर  होने  के  कारण  इनका  प्रयोग  करने  वाले   समाज  में  शरीफ  ही  बने  रहते  हैं   लेकिन  ईश्वर  की  निगाह  से  कोई  बच  नहीं  सकता  , इनका  अंत  बहुत  बुरा  होता  है  l   बाबा  गोरखनाथ जी  ने  जब  अपनी  दिव्य  द्रष्टि  से   यह  देखा  तो  संसार  को  आश्वासन  दिया   कि  इस  बार  इनको  दण्डित  करने  वाला  देवदूत  आएगा   और  इनका  संहार  करेगा  l  इसी  से  स्रष्टि  में  संतुलन  आएगा  और  सतयुगी  वातावरण  विनिर्मित  होगा   जिसकी  सुगंध  हजारों  वर्षों वर्षों तक  अनुभव  की  जाती  रहेगी  l  

22 October 2023

WISDOM -----

   विधाता  ने  स्रष्टि  की  रचना  की  l पेड़ -पौधे , पशु -पक्षी , वनस्पति  की  रचना  की   l  मनुष्य  की  रचना  करते  समय  उन्होंने  उसे  बुद्धि  दी  l  विधाता  ने  उसे  यह  बुद्धि  इस  विश्वास  पर  दी  कि   वह  ईश्वर  की  बनाई  इस  स्रष्टि  को  और  अधिक  सुन्दर  बनाएगा   l  लेकिन  संसार  के  सुख -भोग  और  विविध  आकर्षणों  ने  मनुष्य  को  स्वार्थी  बना  दिया  l  बुद्धि  होने  के  कारण  मनुष्य  में  अपने  ज्ञान  का  अहंकार  तो  था  ही ,  अब  उस  अहंकार  ने  स्वार्थ  और  महत्वाकांक्षा  से  दोस्ती  कर  ली   इसका  परिणाम  हुआ  कि  मनुष्य  की  बुद्धि ,     दुर्बुद्धि  में  बदल  गई  l  अब  स्थिति  इतनी  विकट   हो  गई  कि  मनुष्य  ही  मनुष्य  से  भयभीत  है  l  अब  जंगली  जानवरों  का  भय  नहीं  है  l  जंगली  जानवरों  से  तो  फिर  भी  सुरक्षा  संभव  है   लेकिन   दुर्बुद्धिग्रस्त  इस  संसार  में  कब  किसका  मास्क  उतर  जाये  , उसका  असली  रूप  सामने  आ  जाये  , कोई  नहीं  जानता  l  कई  बातों  में  जानवर  मनुष्य  से  ज्यादा  समझदार  हैं  l   जानवर  इसलिए  श्रेष्ठ  हैं  क्योंकि  वे  छल -कपट  नहीं  जानते ,  किसी  को  धोखा  नहीं  देते  l  वे    सिर्फ  प्रेम  की  भाषा  जानते  हैं   और  नि;स्वार्थ  प्रेम  के  सामने  अपनी  हिंसक  वृत्ति  भी  छोड़  देते  हैं  l          एक  कथा  है ----- जंगल  में  एक  शिकारी  के  पीछे  बाघ  पड़  गया  l   घबराकर  शिकारी  एक  पेड़  पर  चढ़  गया  l  उसी  वृक्ष  पर  एक  रीछ  भी  बैठा  था    बाघ  को  पेड़  पर  चढ़ना  नहीं  आता  था  , वह  भूखा  था  इसलिए  पेड़  के  नीचे  बैठकर  वह    रीछ    या  मनुष्य  के  नीचे  उतरने  का  इंतजार  करने  लगा  l   बहुत  देर  हो  गई   तब  बाघ  ने  धीरे  से  रीछ  से  कहा ---- "  यह  मनुष्य  हम  दोनों  का  शत्रु  है  l  तू  इसे  धक्का  मार  l  मैं  इसे  खाकर  चला  जाऊँगा    और  तेरा  जीवन  बच  जायेगा  l "  रीछ  ने  कहा ---- " नहीं , यह  मेरा  धर्म  नहीं  है  l  इसने  मेरा  कुछ  नहीं  बिगाड़ा ,   और  वैसे  भी  मैं  ऐसे  गिरे  हुए  कार्य  नहीं  करता  l "  अब  बाघ  ने  शिकारी  से  कहा --- " वह  रीछ  को  धक्का  मार  दे   तो  उसकी  जान  बच  जाएगी  l  "   शिकारी  बहुत  खुश  हुआ  और  अपनी  दुष्प्रवृत्ति  के  कारण  चुपचाप   रीछ  के  पीछे  जाकर   उसे  पीछे  से  धक्का  दे  दिया  l  गिरते -गिरते  पेड़  की  एक  डाल  रीछ  की  पकड़  में  आ  गई  l  अब  बाघ  ने  रीछ  से  कहा ---:देखा ,  जिस  मनुष्य  की  तूने  रक्षा  की  , वही  तुझे  मारने  को  तैयार  हो  गया  l  अब  तू  बदला  ले  और  इसे  धक्का  मार  l  :  रीछ  ने  कहा  ---- " नहीं  !   मैं  ऐसे  कायरतापूर्ण  कार्य  नहीं  करता  l  वह  भले  ही  अपने  धर्म  से  विमुख   हो  गया   हो  ,  लेकिन  मैं   ऐसा  नीचता  का  कार्य  नहीं  करूँगा  l  "  मनुष्यों  में  भी  अनेक  परोपकारी   और  भावनाशील  हैं  जिनके  जीवन  के  कुछ  सिद्धांत  है  और  वे  उन  सिद्धांतों  के  विरुद्ध   कोई  कार्य  नहीं  करते   l  

20 October 2023

WISDOM -----

   जब  मनुष्य  स्वयं  को  भगवान  मानने  लगता  है , कर्मफल  और  पुनर्जन्म  को  नहीं  मानता ,     ऐसा  व्यक्ति   हिरण्यकश्यप  की  तरह  अपने  -पराये  सभी  को  उत्पीड़ित  करता  है  l  छोटे  से  लेकर  बड़े  स्तर  तक  आज  संसार  में  ऐसे  लोगों  की  ही  भरमार  है  l  महाभारत  की  कथा  का  संसार  में  प्रचार -प्रसार  अवश्य  होना  चाहिए   ताकि  संसार  कर्मफल  को  समझे  l  महाभारत  का  एक  पात्र  है ---अश्वत्थामा  l  जब  दुर्योधन  युद्ध  भूमि  में  घायल  पड़ा  था  , उसे  अफ़सोस  था  कि  वह  किसी  भी  पांडव  को  विशेष  रूप  से  भीम  को  पराजित  नहीं  कर  सका   तब  अश्वत्थामा  ने  दुर्योधन  से  कहा  वह  उसे  पांडवों  के  सिर  लाकर  उसे  देगा  l  आमने -सामने  के  युद्ध  में  तो  पांडवों  को  पराजित  करना  असंभव  था  इसलिए  रात्रि  के  समय  जब  सब  पांडव  आदि  शिविर  में  सो  रहे  थे  तब   उसने    शिविर  में   चुपचाप  प्रवेश  किया  l  भगवान  श्रीकृष्ण  तो  अन्तर्यामी  थे  वह  उसके  आने  के  पूर्व  ही  पांडवों  को  शिविर  से  बाहर ले  गए  , उन्होंने  द्रोपदी  के  पांचों  पुत्रों  से  भी  चलने  को  कहा  लेकिन  उन्होंने  मना  कर  दिया  l  अँधेरे  की  वजह  से  अश्वत्थामा  देख  नहीं  सका  और  पांडवों  की  जगह  सोये  हुए  द्रोपदी  के  पाँचों  पुत्रों  के  सिर  काटकर  ले  गया  l  घायल  दुर्योधन  ने  उससे  कहा  कि  वह  उसे  भीम  का  सिर  दे  ताकि  वह  उसे  ही  कुचलकर  अपना  प्रतिशोध  ले  सके  l  जब  अश्वत्थामा  ने  उसके  हाथ  में  एक  सिर  दिया  तब  दुर्योधन  ने  देखा  कि  यह  तो  बहुत  कोमल  सिर  है  ,  यह  भीम  का  सिर  नहीं  हो  सकता  l  दुर्योधन  ने  उन  पांचों  सिर  को  हाथ  में  लेकर  देखा  ,  उसे  बहुत  अफ़सोस  हुआ   उसने  कहा ---' अश्वत्थामा  यह  तुमने  कैसा  जघन्य  कार्य  किया  , उफ़  !  ये  तो  द्रोपदी  के  पांच  पुत्र  हैं  , बदले  की  आग  में  यह  क्या  कर  दिया  !  दुर्योधन  ने  तो  पछतावे  के  साथ  अंतिम  साँस  ली   लेकिन  प्रकृति  ने   अश्वत्थामा  को  क्षमा  नहीं  किया  l   भीम  ने  अश्वत्थामा  को पकड़कर  भगवान  श्रीकृष्ण  के  सामने  प्रस्तुत  किया   और  कहा  कि  इसे  मृत्यु दंड  मिलना  चाहिए   l  तब  द्रोपदी  ने  कहा  --- जैसे  मैं  पुत्र वियोग  में  दुःखी  हूँ  वैसे  ही   इसकी  माता  भी  दुःखी  होगी  , इसे  छोड़  दो  l  तब  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  कहा  --इसने  जो  जघन्य  कर्म  किया  है  , उसे  इसकी  सजा  अवश्य  मिलनी  चाहिए  , उन्होंने  भीम  से  कहा  --इसके  माथे  पर  जो  मणि  है  उसे  निकाल  लो  l  मणि  निकल  जाने  से  उस  स्थान  पर  कभी  न  भरने  वाला  घाव  हो  गया  , जिसमें  से  हमेशा  मवाद  बहता  था  बदबू  आती  थी  l   हजारों  वर्षों  तक  यह  ऐसे  ही  भटकता  रहेगा   l   पुराने  लोग   कहा  करते  थे     कि  यदि  अचानक   कहीं  तेज  बदबू  आने  लगे  तो  समझो  कि  अश्वत्थामा  वहां  से  निकल  गया  l  यह  प्रसंग  लोगों  को  जागरूक  करने  के  लिए  है  कि   युद्ध , दंगे  और  बदले  की  भावना  के  कारण  बच्चों , महिलाओं  और  निर्दोष  प्राणियों   को  मत  सताओ ,  सोते  हुए  , नि:शस्त्र  लोगों  की  हत्या  मत  करो   !  प्रकृति  में  क्षमा  का  प्रावधान  नहीं  है  l  केवल  अपराध  करने  वाला  ही  नहीं , उसका  साथ  देने  वाले  भी   ईश्वर  के  क्रोध  से  बच नहीं  सकते  l  

19 October 2023

WISDOM -----

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ----' लोभ  का  अर्थ  है --- कुछ  पाने  की  लालसा  , इस  लालसा  से  प्रवृत्त  होकर  मनुष्य  में  कामनाएं , महत्वाकांक्षाएं  पनपती  हैं   और  उनके  पूरा  न  होने  पर   मन  में  अशांति  जन्म  लेती  है  l  मन  एक  भिखारी  की  तरह  है  सदा  कुछ  मांगता  ही  रहता  है  l  उसे  जितना  दें ,   उतनी  ही   उसकी  कामना  बढ़ती  जाती  है  l   जितना  पाने  की  लालसा  या  लोभ  बढ़ता  है  ,  उतनी  ही  इनसान  की  दौड़ -धूप  बढती  है  l  उतना  ही  व्यक्ति  नए -नए  तरीकों  से  उस    वस्तु   को  पाने  का  प्रयत्न  करता  है  l  एक  तरीके  से  न  मिले   तो  दूसरे  तरीकों  की  तलाश  करता  है   l  लालसा  जितनी  तीव्र  होती  है  --- उतना  ही  मनुष्य   नए -नए  विभिन्न  तरीकों  के  कर्मों  से  उस  लालसा  को  पूरा  करने  का  प्रयत्न  करता  है  l  इससे  भी  जब  सारी  कामनाएं  मन  की  पूरी  नहीं  हो  पातीं  तो  मनुष्य  विक्षिप्त , अशांत   हो  जाता  है  l  '       शास्त्रों  में  ययाति  की  कथा  आती  है  ---- वह  राजा  था  l  उसने  सौ  वर्ष  का  जीवन  जी  लिया   तो  यम  के  दूत  उसे  लेने  आ  गए l  वह  उनके  आगे   हाथ -पैर  जोड़ने  लगा  --- मेरे  मन  में  अनेकों  लालसाएं  हैं  जो  अभो  पूरी  नहीं  हुईं  ,  कृपया  एक  मौका  और  दें  l  यमदूत  बोले --- " यदि   तुम्हे  कोई  अपनी  आयु  दे  दे  ,  तो  तुम  उसकी  आयु  का  भोग  कर  लेना  l "  ययाति  के  एक  पुत्र  ने  उसे  अपनी  आयु  दे  दी  l  जब  ययाति  ने  वह  आयु  भोग  ली   तो  यमदूत  दोबारा  आए  ,  ययाति  फिर  उनसे  प्रार्थना  करने  लगा  क्योंकि  उसकी  कामनाएं  शेष  थीं  l  फिर  किसी  ने  उसे  अपनी  आयु  दे  दी  l  कहते  हैं  ऐसा  हजार  वर्ष  तक  होता  रहा  ,  परन्तु  तब  भी  उसकी  कामनाएं  शांत  नहीं  हुईं  l  अंत  में  वह  विक्षिप्त  की  तरह  हो  गया  l                                                                                                                       पुराण  की  यह  कथा  कलियुग  की  एक  बहुत  बड़ी  समस्या  की  ओर  इशारा  करती  है  l  कलियुग  में  मनुष्य  की  बुद्धि   विकृत  हो  गई  है  , मानसिक  विकार  चरम  पर  हैं ,  विज्ञानं  ने  बहुत  आगे  बढ़कर  मनुष्य  के  मन  पर  भी  कब्ज़ा  करने  का  प्रयत्न  किया  है  l  उस  युग  में  ययाति  ने   अपने  पुत्र -पौत्रों  से  आयु  मांगी  थी  लेकिन  इस  युग  में   संसार  में  एक  बहुत  बड़ा  वर्ग  ऐसा  भी  है   जो  आयु  मांगकर  किसी  का  एहसान  नहीं  लेता   , वह   ऐसे  गुप्त  तरीकों  से  शारीरिक  और  मानसिक  रूप  से  स्वस्थ  लोगों  की  एनर्जी  चुराकर  ,  चूसकर  उन्हें  खोखला  कर  देता  है  और  उनकी  एनर्जी  पर  स्वयं  भोग-विलास  का  जीवन  जीता  है   और  संभवतः  दूसरों  को  भी  इस  एनर्जी  की  सप्लाई  करता  है  इन्हें  एनर्जी वैम्पायर '  कहते  हैं  l  ऐसे  लोगों  से  अपनी  सुरक्षा  करने  के  लिए  ही  हमारे  धर्म ग्रंथों  में   नमस्कार  करने   का  प्रावधान  है , हाथ  मिलाने  का  नहीं  l  केवल  जागरूक  होकर  ही  ऐसे  लोगों  से  सुरक्षा  संभव  है  l  

17 October 2023

WISDOM ------

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- 'जब  तक  मनुष्य  की  चेतना  परिष्कृत  नहीं  होती  ,  विचारों  का  सुधार -परिष्कार  नहीं  होता   तब  तक  परिस्थितियों  में  सुधार  संभव  नहीं  है  l '  आज  हम  देखते  हैं  कि  संसार  में  हर  बुराई  के  उन्मूलन  के  लिए  कानून  है , नियम  हैं   लेकिन  बुराई  कम  नहीं  हुई  बढ़ती  ही  जा  रही  है  l  भ्रष्टाचार  और  नशा  विरोधी  कितने  भी  कानून  बना  दो  यदि  मन  में  बेईमानी  है , नशे  की  लत  है  तो  व्यक्ति  छुपकर  यह  कार्य  करेगा   और  जब  छुपकर  कोई  कार्य  किया  जाता  है  तो  उसमे  अपराध  का  प्रतिशत  और  बढ़  जाता  है  l  इसी  तरह  बहु विवाह  के  विरोध  में  नियम -कानून  बन  गए   लेकिन  संयम  न  होने  से  व्यभिचार  बढ़  गया , शक  और  वहम  की  बीमारी  बढ़  गई  l  यह  भी  सत्य  है  कि  यदि  कानून   न  हो  तो  जंगल  राज  से  भी  भयावह  स्थिति  हो  जाये  l  जब  मनुष्य  स्वयं  जागरूक  होगा  , उसका  विवेक  जागेगा  तभी  सुधार  संभव  होगा  l   सुधर  जाने  के  इंतजार  में  कहीं  देर  न  हो  जाये   क्योंकि  संसार  में  शांति  के  लिए   , बच्चों  की  सुरक्षा   उनके  स्वस्थ  जीवन    और  पर्यावरण   की  सुरक्षा    के  लिए  अंतर्राष्ट्रीय  स्तर  पर  अनेकों  प्रयास  किए  गए  हैं   लेकिन  ' समरथ  को  नहीं  दोष  गोंसाई  '  l  संसार  में  युद्ध  बढ़ते  ही  जा  रहे  हैं  ,  घातक  हथियारों  के  प्रयोग  से  पर्यावरण  प्रदूषित  हो  रहा  है   और  क्रोध  उन  पर  है  जो  बच्चे  पलट  कर  वार  भी  नहीं  कर  सकते  l  महाभारत  में  कथा  है  --- शिशुपाल  ने  भगवान  श्रीकृष्ण  को  100  गालियाँ   दीं  l  भगवान  मुस्कराते  हुए  गिनते  रहे  और  शिशुपाल  को  सचेत  करते  रहे ---95 ------98 , 99   शिशुपाल  !  रुक  जाओ  !  लेकिन  वह  माना  नहीं   और  जैसे  ही  उसने  101 बार  अपशब्द  बोला  , भगवान  श्रीकृष्ण  ने  सुदर्शन  चक्र  से  उसका  गला  काट  दिया  ,  वह  सब  तरफ  शरण  के  लिए  भागा  भी  लेकिन  किसी  ने  उसे  शरण  नहीं  दी  l  इसी  तरह  भगवान  मानव  जाति  को  समय -समय  पर  संकेत   भेजते  हैं   कि  मानवीय  गरिमा  के  अनुकूल  जीवन  जिओ, इनसान  बनो  लेकिन  मनुष्य   सुधरना   ही  नहीं  चाहता  , वह  तो  स्वयं  को  भगवान   समझने  लगा  है  l  आज  हर  व्यक्ति  को   अपने    अंतर्मन  में  झाँक कर  देखना  है  कि  वह  क्या  मानवता  के   विरुद्ध  काम  कर  रहा  है   और  जब  उस  पर  ईश्वरीय  प्रकोप  होगा   तो  उसे  कहाँ  छुपने  की  जगह  मिलेगी  ?

14 October 2023

WISDOM ----

  श्रीमद भगवद्गीता   में  भगवान  श्रीकृष्ण    अपने  प्रिय  सखा  अर्जुन  को  अपनी  विभूतियों  का   विवरण  देते   हैं   और  मर्यादा पुरुषोत्तम  श्रीराम  को  शस्त्र  धारण   करने  वालों  में  अपना  स्वरुप  बताते  हैं  l  श्रीराम  अति  विनम्र , शिष्ट  और  मर्यादापूर्ण  है , वे  क्रोधित  नहीं  होते  , उनके  मन  में  न  तो  हिंसा  है , न  ईर्ष्या , न  शत्रुता , न  प्रतिस्पर्धा   l  वे  किसी  को  दुःख  देना  नहीं  चाहते   इसलिए  उनके  हाथों  में  शस्त्र  विचित्र  लगता  है  l  लेकिन  भगवान  श्रीराम  के  हाथों  में   शस्त्र  होगा   तो  उससे  विनाश   रुकेगा  l  विध्वंसकारी  शस्त्र   भी  यदि  भगवान  राम  के  हाथ  में  होंगे   तो  वे  सृजन  का  माध्यम  बनेंगे  l  इसलिए  श्रीराम  शस्त्रधारी  होने  पर  भी  मर्यादा पुरुषोत्तम  हैं  , वे  मर्यादा  और  लोकहित  के  शिखर  हैं  l                                                                               लेकिन  यदि  ये  ही  शस्त्र  रावण  के  हाथों  में  होंगे   तो  विनाश  तय  है   क्योंकि  उसके  भीतर  हिंसा , लोभ , लालच , अहंकार    आदि  अनेक  दुर्गुण  है   l  उसका  ज्ञान  इन  दुर्गुणों  के  नीचे  दब  गया  है  l  वह  अपने  शस्त्रों  का   प्रयोग   जब  भी  करेगा  , तो  गलत  ही  करेगा  l  उसके  द्वारा  विनाश  के  सिवाय  अन्य  कुछ  भी  संभव   नहीं  है   l  कलियुग  में  शस्त्र   और  शक्ति     के  दुरूपयोग  के  कारण   ही   आज  संसार  ऐसी  बुरी  स्थिति  में  है  l