3 November 2023

WISDOM ------

     कहते  हैं   ' अति '  हर  चीज  की  बुरी  होती  है  l  महत्वाकांक्षा  भी  यदि  अति  की  हो    तो  उसका  दुष्परिणाम   परिवार  को , समाज  को  और  संसार  को  झेलना  पड़ता  है  l  ऐसा  व्यक्ति  जिस  भी  क्षेत्र  में  है   वह  चाहता  है   सब  उसे  प्रणाम  करें ,  उसकी  गरिमा  को  समझें  , उसके  कहे  अनुसार  आचरण  करे  l    पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ----' महत्त्व  को  जिस -तिस  तरह  हथिया  लेने  की  ललक    ऐसा  विष  है   जो  जिस  क्षेत्र  में  घुसेगा  उसे   विषैला    बना  देगा  l '     सिकंदर , हिटलर   को  विश्व विजयी  होने  का  सम्मान  पाने  की  ललक  थी  , इसके  लिए  लाखों -करोड़ों  को  मारने -काटने  में  उन्हें  कोई  तकलीफ  नहीं  हुई  l  अति  का  महत्त्व  पाने  की  इच्छा  धार्मिक  क्षेत्र  में  व्यक्ति  को  धूर्त  और  पाखंडी  बना  देती  है  l  अपने  भीतर  की  कमजोरियों  को  छिपाकर     -संत  का  वेश  विन्यास  कर  व्यक्ति  लाखों   से  अपनी  पूजा  भक्ति  करा  लेता  है  l  इस  महत्वाकांक्षा  ने  संसार  में  लाखों   गुरु , सैकड़ों  भगवान , अवतार  पैदा  कर  दिए   l  सामाजिक  क्षेत्र  में  महत्त्व  लूटने  की  , सम्मान  पाने  की   चाह    ने  कितने  ही  नकली  समाज सेवी    पैदा    कर  दिए  l    अमीरों  की  गिनती  में   आगे  बढ़ने  की    चाह  में   संसार  में  धन  कमाने  के  कितने  ही  गलत  तरीके  फ़ैल  गए  हैं  l  महत्त्व  पाने  की  इस  ललक  में  व्यक्ति   दोहरा  जीवन  जीता  है  l  अन्दर  से  नीति  , मर्यादा  की  अवहेलना  करते  हुए  बाहर  से   बहुत  मर्यादित  , अनुशासनप्रिय   दिखाने  का  प्रयत्न  करता  है  l  कई  लोग  तो  अपने  चेहरे  पर  इतने  चेहरे  लगा  लेते  हैं  कि  वे  स्वयं  ऐसी  मन;स्थिति  में  पहुँच  जाते  हैं  की  वे   अपना   सच  ही   भूल  जाते  हैं  , मानसिक  रूप  से  बीमार  हो  जाते  हैं  l    पं .  श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---' बुराई  बुराई  है   पर  अच्छाई  के  गर्भ  में   बुराई  को  भरण -पोषण  मिलना   और  अधिक  भयंकर  है  l  पाप  को  पाप  समझकर   उससे  बचा  जा  सकता  है  लेकिन  जो  पाप ,    पुण्य  की  आड़  में   किया  जाता  है   उससे  बच  पाना  बहुत  कठिन  है  l   शत्रु  से  बचाव  आसान  है  ,  पर  मित्र  बने  शत्रु  से  बच  पाना  असंभव  है   l "  जागरूक  रहें  और  अति  से  बचें  l 

31 October 2023

WISDOM ----

     कहते हैं  इस  धरती  पर  जब  भी  कोई  प्राणी  जन्म  लेता  है  तो  विधाता   आते  हैं  और  उसके  माथे  पर  उसका  भाग्य  लिख  कर  जाते  हैं  l  इन  भाग्य  की  रेखाओं  को  मिटाना  असंभव  है  l    अब  वह  व्यक्ति  अपने  पुरुषार्थ  से  अपने  भाग्य  को  कितना  संवार  सकता  है  या  अपने  आलस  से  कितना   बिगाड़  सकता  है  ,  यह  एक   अलग  समस्या  है  l  कलियुग  की  समस्या   कुछ  अजीब  ही  है  ----- अब  लोगों  में  ईर्ष्या , द्वेष , लालच  , महत्वाकांक्षा  इस  कदर  बढ़  गया  है   कि  वे  दूसरे  के  भाग्य  को  चुरा  लेना , छीन  लेना  चाहते  हैं  l  तांत्रिक  और  नकारात्मक  शक्तियों  की  मदद  से  वे  दूसरे  के  सुख  को  छीन  कर  स्वयं  भोगना  चाहते  हैं   l  अपने  धन , शक्ति , अहंकार  और  ज्ञान  के  दुरूपयोग  से  भगवान  को  चुनौती  देते  हैं  l   सर्वशक्तिमान  ईश्वर  के  लेख  को   मिटाने  का  दुस्साहस   करने  का  दुष्परिणाम  यह  होता  है  कि  ऐसे  तांत्रिकों  और  नकारात्मक  शक्तियों  के  साथ  काम  करने  वाले  और  उनका  साथ  देने  वालों  का  जीवन  असहनीय  कष्ट  और   गहन  अंधकार  में  डूबता  जाता  है  l  इसी  सत्य  को  बताने  वाला  एक   प्रसंग  है ----------  महर्षि  वर्ष  तंत्र  विद्या  के  बहुत  बड़े  ज्ञाता  थे  l  उनके  दो  शिष्यों  --व्याडि   और  इन्द्रदत्त  ने  उनसे  निवेदन   और  हठ  किया  वे  यह  गूढ़  विद्या  उन्हें  सिखा  दें  l  महर्षि  ने  उन्हें  बहुत  समझाया  कि   इस  विद्या  के  लिए  अपने  अंत:करण  को  शुद्ध  बनाना  पड़ता  है , सद्गुण  और  सन्मार्ग  पर  चलने  की  साधना  करनी  पड़ती  है  , अन्यथा  दुरूपयोग  की  संभावना  रहती  है  l   लेकिन  दोनों  शिष्यों  के  बहुत  तर्क  और  हठ  करने  पर  महर्षि  ने  सोचा  कि  कहीं  यह  विद्या  लुप्त  न  हो  जाये   और   उन  शिष्यों  के  कहने  पर  कि  वे  इस  विद्या  का  उपयोग  विश्व कल्याण  के  लिए  करेंगे   तब  महर्षि  ने   उन्हें  अनेक  योग , आसन  ,प्राणायाम , हठ  योग , परकाया  प्रवेश , अन्य  लोकों  में  अभिगमन  आदि  अनेक  गूढ़  विद्या  सिखा  दीं  l  दोनों  शिष्य  सब  सीखकर  इनके  बहुत  बड़े   ज्ञानी  बन  गए  l   जब  घर  चलने  का  समय  हुआ   तो  शिष्यों  ने  गुरु  से  कहा कहा  --- 'हम  आपको  गुरु  दक्षिणा    में  क्या  दें  ? '   गुरु  ने  कहा  ---- तुम    देश  , संस्कृति  और  विश्व कल्याण  के  लिए   कार्य  कर   इस  ज्ञान  को  सार्थक  करो  l   लेकिन  शिष्यों  को  तो  अपने  ज्ञान  का  अहंकार  था , उन्होंने  गुरु  से  कोई  भौतिक  वस्तु  मांगने  को  कहा  l  शिष्यों  की  जिद्द  पर  गुरु  ने  कहा ---- "  ठीक  है   तुम  एक  हजार  स्वर्ण  मुद्राएँ  लाकर  दो  , जिनसे  इस  आश्रम  का  जीर्णोद्धार   हो  सके  l "   दोनों  शिष्यों  में  बहुत  अहंकार  था  ,  परिश्रम  और  सही  दिशा   से   धन  कमाने  की  बजाय   वे  कोई  तरकीब  सोचने  लगे  , जिससे  तुरत -फुरत  धन  आ  जाये  l   जिस  दिन  वे  ऐसी  मंत्रणा  कर  रहे  थे  उसी  दिन  मगध  सम्राट  नन्द  की  मृत्यु  हो  गई  l    उन  दोनों  शिष्यों  ने  वररुचि  नामक  व्यक्ति  को  अपना  मित्र  बनाया   और  यह  तय  किया  कि  इन्द्रदत्त   मगध  सम्राट  नन्द  के  शरीर  में  परकाया  प्रवेश  करे  ,  फिर  इन्द्रदत्त  के  शव  की  रक्षा  व्याडि  करे  और  जब  इन्द्रदत्त  की   आत्मा   नन्द  के  शरीर  में  पहुँच  जाये  ,  तब  वररुचि  जाकर  उनसे   एक  हजार  स्वर्ण  मुद्राएँ  मांग  लाए   जिससे  गुरु  दक्षिणा  चुका  दी  जाए   और  अपने  लिए  भी  धन  प्राप्त  हो  जाये  l  सब  व्यवस्था  कर  ली  , फिर  जैसे  ही  इन्द्रदत्त  ने  अपने  शरीर  से  प्राण  निकाल  कर  नन्द  के  शरीर  में  प्रवेश  किया  , मगध  सम्राट  नन्द  जी  उठे   ,  सारी  जनता  चकित  रह  गई  l  इस  रहस्य  को  और  कोई  तो  नहीं  जान  पाया  ,  पर  नन्द  का  मंत्री  शकटारी   बहुत  बुद्धिमान  था  , वह  सारी  स्थिति  समझ  गया  l  उसने  तत्काल  पता  लगाकर   इन्द्रदत्त  के  शव  का   दाह   संस्कार  करा  दिया ,  व्याडि  को  बंदी  बनाकर  कारागृह  में  डाल  दिया  l  अब   इन्द्रदत्त  के  शरीर  का  तो  दाह  हो  चुका  था  इसलिए  इन्द्रदत्त   नन्द  के  शरीर  में  ही  रह रह  गया   और  भोग  वासनाओं  में  डूब  गया   और  चन्द्रगुप्त  के  हाथों  मारा  गया  और   व्याडि   कारागृह  में  यातनाओं  से  मर  गया  l    जो  योग  विद्या  जन  कल्याण  के  उदेश्य  से  सिखाई  गई  थी  वह  अहंकार  के  कारण  अपने  साधकों  को  ही  ले  डूबी  l  ------ ये  गूढ़  विद्या  है  l  व्यक्ति   स्वयं  ऐसा  ज्ञान  प्राप्त  कर  के  या  ऐसी  विद्या  के  जानकार  की  मदद  लेकर    परिवार  , समाज  से  लुक छिपकर   बहुत  अनर्थ  करता  है   लेकिन  अपनी  आत्मा  से  और  ईश्वर  की  निगाह  से  बच  नहीं  पाता   l  काल  के  अनुसार  निर्धारित  समय  पर  वह  अपने  किए  का  घोर  दंड  पाता  है  l  

29 October 2023

WISDOM -----

      एक  जिज्ञासु  ने  एक  विद्वान्  से  पूछा  ------  इस  संसार  में  अब  तक  इतने  महात्मा , साधु -संत  और  अवतार  हो  चुके  हैं  ,  सबने  इस  दुनिया  को  भला  बनाने  का  प्रयास  किया  ,  पर  किसी  के  प्रयत्नों  का  कोई  फल  नहीं  हुआ  l  संसार  जैसे  का  तैसा  पापपूर्ण  अभी  भी  बना  हुआ  है  , इसमें  सदा  ही  बुराइयों  की  भरमार  रहती  है  l '   जिज्ञासु  ने   उस  व्यक्ति  को  एक  कहानी  सुनाई  ----   एक  गरीब  आदमी  ने  किसी  तरह   भूत  को  अपने  वश  में  करने  की  सिद्धि  प्राप्त  कर  ली  l  भूत  सामने  आ  गया  और  बोला ---- महोदय  !   मुझसे  जो  चाहे  काम  करा  लो  लेकिन  मैं  ठाली  न  बैठूँगा  ,  जब  ठाली  रहूँगा  तो  आप  पर  ही  पिल  पडूंगा  l "    अब    गरीब  आदमी   ने  उससे  महल , नौकर , खजाना , सभी  सुख  सुविधाएँ  एक -एक  कर  के  जुटा  लीं  l    हर  कार्य  तुरंत  कर  के  उसके  सामने  खड़ा  हो  जाता  की  अब  और  काम  बताओ    l  वह  व्यक्ति  परेशान  हो  गया   l  एक  तांत्रिक  की  सलाह  पर  उसने   भूत  को  कुत्ते  की  पूंछ  सीधी   करने  का  काम  सौंप  दिया  l  अब  भूत  जितनी  बार  भी  उस  पूंछ  को  सीधी  करता  वह  फिर   टेढ़ी   हो  जाती  l  इस  तरह  उसे  उस   भूत  से  छुटकारा  मिला  l    यह  कथा   सुनाकर   विद्वान्  ने  जिज्ञासु   से  कहा  ---- हमारा  मन  भी  एक  प्रकार  का  भूत  है   जो  हर  समय  संसार  के  सुखों  के  पीछे  भागता  रहता  है  l  परमात्मा  ने  संसार  में  इतनी  बुराइयाँ  इसलिए   छोड़  रखी  हैं    कि  मनुष्य   अपने  मन  को   कुत्ते  की  पूंछ  को  सीधा  करने  यानि  इन  बुराइयों  को  दूर  करने  में  लगाये  l  ये  बुराइयाँ  आत्मउद्धार  का  अभ्यास  करने  के  लिए  हैं  l  निरंतर  अभ्यास  कर  के  मनुष्य  अपने  मन  पर  नियंत्रण  कर  अपने  विकारों  को  दूर  कर  सकता   और  अपनी  चेतना  को  परिष्कृत  कर  सकता  है  l  

WISDOM -----

   लघु  कथा ---- नि :शस्त्रीकरण ------ एक  चिड़ियाघर  के  जानवरों  ने  इकट्ठे  होकर  विचार  किया   कि  नि:शस्त्रीकरण  की  नीति  पर  चलना  चाहिए  l  गेंडे  ने  कहा --- दांत  और  पंजे  सबसे  अधिक  खतरनाक  होते  हैं  , उन  पर  प्रतिबन्ध  लगाया  जाये  ,  सींग  तो  केवल  रक्षा  का  साधन  मात्र  है  l "  भैंसा  और  हिरन  से  लेकर   कांटो  वाली  सेई  तक  ने   गेंडे  की  बात  का  समर्थन  किया  l    शेर  ने  दांतों  और  पंजे  को   खाने  और  चलने  का   साधारण  साधन  बताते  हुए  कहा --- " सींग  ही  निरर्थक  वस्तु  है  ,  सर्व सम्मति  से   सींग  का  प्रयोग  ही  निषिद्ध  करा  जाए  l "  बाघ ,  चीता   और  सियार  से  लेकर  वन बिलाव  ने   इस  तर्क  की  प्रशंसा  की  l  रीछ  की  बारी  आई  ,  तो  उसने  कहा ---- "  सींग  और  दांत , पंजे   यह  सभी  हानिकारक  हैं  l  जरुरत  पड़ने  पर  आलिंगन  करने   के  मित्रतापूर्ण   ढंग  पर    छूट    रखी  जानी  चाहिए  l "  जो  लोग  रीछ  की  आदत  को  जानते  थे   , वे  उसकी  चालाकी  ताड़  गए  और  मन  ही  मन  बहुत  कुढ़े  l     अपने  पक्ष  का  समर्थन  और   प्रतिपक्षी  का  विरोध   करने  के  जोश  में   बहुत  शोर  मचने  लगा  ,  एक  दूसरे  पर  गुर्राने  लगे  ,  यहाँ  तक  कि  टूट  पड़ने  की  बात  सोचने  लगे   l  चिड़ियाघर  के  मालिक  ने  जब  यह  शोर  सुना   तो  उसने  उन  सबको  अपने -अपने  बाड़े  में  खदेड़  दिया   और  कहा ---- " मूर्खों  !  तुम  भलमनसाहत  से  अपनी -अपनी   मर्यादाओं  का  पालन  करो  ,  तो  बिना  नि:शस्त्रीकरण   के  भी  काम  चल  सकता  है  ,  सब  जानवर  शांति  से  रह  सकते  हैं  l  लेकिन  तुम  में  जो  शक्तिशाली  है   वह  भी  अपने  हथियार  को  सुरक्षित  रखकर   दूसरे  पर  प्रतिबन्ध  लगाकर  उसे  अपने  आधीन  करना  चाहता  है  l  l "  क्रोध  में  मालिक  ने  बाड़े  का  दरवाजा  बंद  कर  दिया   l  

28 October 2023

WISDOM -----

  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " प्रतिद्वंदी  को  पछाड़ो  मत   l  अपनी  महानता  का  परिचय  देकर  उसे  क्षुद्र  बनने  दो  l   जीवन  एक  अवसर  है  , जिसे  यदि  गँवा  दिया  जाये  तो  हाथ  से  सब  कुछ  चला  जाता  है   और  यदि  उसका  सही  उपयोग  कर  लिया  जाये    तो  प्रगति  के  चरम  शिखर पर  पहुंचा  जा  सकता  है  l  "    यदि  ईश्वर  की  कृपा  से  किसी  के  पास  सद्बुद्धि  है , विवेक  है    तो  वह  अपने  अपमान  का  बदला  लेने  के  लिए    उससे  विवाद , झगडा , लड़ाई , युद्ध  आदि   करने  में  अपनी    ऊर्जा  को   बर्बाद  नहीं  करता  l  वह  अपना  समय  और  अपनी    ऊर्जा    को  स्वयं  को  ऊँचा  उठाने  में  लगाता  है   जिससे  प्रतिद्वंदी  स्वत:  ही  पराजित  हो  जाता  है  l  ----- एक  प्रसंग  है  -----  मरण  शैया  पर  पड़े  पिता  ने  अपने  पुत्र  बैजू  से  कहा ---- ' संगीत  के  दर्प  में  तानसेन  ने  मेरा  अपमान  किया ,  तू  उससे   बदला  अवश्य  लेना  l  "  अपने  पिता  की  अंतिम  इच्छा  को  पूरा  करने  के  लिए  बैजू  अँधेरी  रात  में   हाथ  में  परशु   लेकर   तानसेन  के  महल  में  पहुंचा  l   उसने  दरवाजे   की  झिरझिरी  से  झांककर  देखा    कि  देवी  सरस्वती  की  प्रतिमा   के  आगे  बैठ  वे  अध्ययन  कर  रहे  थे  l  आशीर्वाद  देती  हुईं  देवी  की  शांत  मुद्रा  की  प्रतिमा  को  देखकर  बैजू   सोचने  लगा  ---- "  ऐसा  प्रतिशोध  किस  काम  का  जिसमे  अपना  पतन  हो  जाये  l  वह  देवी  से  प्रार्थना  करने  लगा  कि  'माँ  मुझे  सद्बुद्धि  दो  l '  अब    वह  वापस  लौट  आया  और  अपनी   संगीत   साधना  के  आधार  पर  प्रतिशोध  लेने  का   विचार  करने  लगा  l   अपनी  वीणा  और  वाद्य  यंत्रों   को  लेकर  वह  दिन -रात  साधना  में  लीन  रहता  ,  उसे  खाने -पीने  की  भी  सुध  नहीं  थी  l   प्रतिशोध  की  भावना  नष्ट  हो  चुकी  थी   बैजू  की  ख्याति  फैलने  लगी  और  अकबर  के  कानों  तक  पहुंची  l  l  अकबर  उसका  संगीत  सुनने  उसकी  झोंपड़ी  में    पहुंचे   और  उसका  संगीत  सुनकर  मन्त्र -मुग्ध  हो  गए  ,  उन्होंने  तानसेन  की  ओर  देखा  ,  तो  तानसेन  ने  अपनी  पराजय  को    स्वीकार  किया   और  कहा  --- " जहाँपनाह  !  मैं  आपको  खुश  करने  के  लिए  गाता  हूँ  और  बैजू  ईश्वर  को  प्रसन्न  करने  के  लिए  गाता  है  l  जो  अंतर  ईश्वर  और  आप  में  है  , वही  अंतर   बैजू  और  मुझ  में  है  l  "    बैजू  का  प्रतिशोध  सकारात्मक  दिशा  में  पूरा  हुआ  , उसकी  अनवरत  साधना   के  कारण  संसार  ने  उसे  बैजू बावरा  के  नाम  से  जाना  l  

27 October 2023

WISDOM ----

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ----- " समय  परिवर्तनशील  है  किन्तु  किसी  भी  तरह  के  समय  को  परिवर्तित  करना  हमारे  हाथ  में  नहीं  होगा  ,  यह  परिवर्तन  स्वत:  होता  है  ,  जिसे  हमें  स्वीकार  करना  होता  है   जिस  तरह  हम  रात्रि  को  दिन  में  नहीं  बदल  सकते  ,  लेकिन  विद्युत  के  माध्यम  से   बल्ब  जलाकर  अंधकार  को  दूर  कर  सकते  हैं  ,  उसी  तरह   हम  जीवन  में  दुःख , कष्ट , पीड़ा  , अपयश , उपेक्षा , तिरस्कार   आदि  के  आने  पर   इन्हें  तुरंत  दूर  नहीं  कर  सकते  ,  लेकिन  इन  परिस्थितियों  में   ईश्वर  का  नाम  स्मरण  करते  हुए  और  शुभ  कर्म  ,  तप ( ईमानदारी  से  कर्तव्य पालन  )  कर  के   हम  इनकी  पीड़ा  को  कम  कर  सकते  हैं  और  लाभान्वित  हो  सकते  हैं  l  "  सुख -दुःख  के  चक्र  के  बारे  में  अकबर -बीरबल  का  एक  प्रसंग  है ----- एक  बार  अपने  सभाजनों  के  सामने  सम्राट  अकबर  ने  प्रश्न  किया --- " इस  संसार  में  ऐसा  क्या  है  , जिसको  जान  लेने  के  बाद  सुख  में  दुःख  का  अनुभव  हो    और   दुःख  में  सुख  का  अनुभव  हो  ? "  उनके  इस  प्रश्न  से  सभा  में  सन्नाटा  छ  गया  ,  सभी  की  नजरें  बीरबल  की  ओर  थीं  l   बीरबल  भी  हाजिरजवाब  थे  ,  वे  बोले  ---- " यह  समय  भी  गुजर  जायेगा   l "  बुद्धिमान  बीरबल  के  इस  जवाब  से  अकबर  बहुत  प्रसन्न  हुए  l  समय  गुजर  जाने  की  बात  से   सुखी  व्यक्ति  को  दुःख  का  एहसास   और  दुःखी   व्यक्ति  को  सुख  का  एहसास  होना  स्वाभाविक  है  l   

26 October 2023

WISDOM ---

   सुख -शांति  से  , तनाव रहित  जिन्दगी  जीने  का  एक  तरीका  यह  भी  है  कि   हम  अपने  जीवन  में   जो  भी  कठिनाइयाँ , दुःख , अपमान , संघर्ष  ---किसी  भी  तरह  की  नकारात्मकता  को  झेल  रहे  हैं   , तो  उन  सबके  बीच  कौन  सा  एक  सुख  भी  है  , उसे  ढूंढ  लें  l  हर  कष्ट  में , हर  दुःख  में  कहीं  न  कहीं  एक  छोटा  सा  सुख  अवश्य  छिपा  होता  है  ,  हमें  उसी  को  ढूंढना  है   क्योंकि  वही  एक  आशा  की  किरण  है  जो  हमें  जीवन  जीने  की  हिम्मत  और  प्रेरणा  देती है  l  जब  हर  तरफ  से  नकारात्मकता  ने   हम  पर  आक्रमण  किया  हो  , तब  उसके  बीच  सकारात्मकता  को  खोजना   केवल  ईश्वर  विश्वास  से  ही  संभव  है  l  यदि  हमें  ईश्वर  की  सत्ता  पर  विश्वास  है  तो  उस  सकारात्मकता  को  हम  अपने  अन्दर  महसूस  करते  हैं   और  उस  आंधी -तूफ़ान  के  बीच  भी  अटल  रहते  हैं   हमें  यह  अटल  विश्वास  होता  है  कि   अँधेरा  मिटेगा , सुबह  अवश्य  होगी  l     इसके  पीछे  एक  सत्य  यह  भी  है  कि  हमारी  शांति  देखकर  अन्य  लोग  अवश्य  तनाव  में  आ  जाएंगे   कि   इतनी  मुसीबतों  और   नकारात्मकता  के  बीच  यह  शांत  कैसे  है  ? एक   कथा  है  -----  एक  बार  बाबा  फरीद  रास्ते  से  गुजर  रहे  थे  l  उनके  शिष्य  भी  उनके  साथ  थे  l  शिष्य  उनका  बहुत  आदर , सम्मान  करते  थे  l  रास्ते  पर  चलते  हुए  बाबा  फरीद   के  पाँव  में  अचानक  पत्थर  से  चोट  लग  गई   और  वे  जमीन  पर  गिर  पड़े  l   उनके  पैर  से  खून  निकलने  लगा  l  इससे  उनके  शिष्यों  को  बड़ी  पीड़ा  हुई  l  शिष्यों  ने  कहा  , यह  जरुर  किसी  की  शरारत  है   l  कल  शाम  को  जब  हम  निकले  थे  ,  तब  यह  पत्थर  यहाँ  पर  नहीं  था  l  किसी  ने  जरुर  सोचा  होगा   कि  सुबह  यहाँ  से  निकलेंगे  और  मस्जिद  जाएंगे  , इसलिए  किसी  ने  जानबूझकर  इस  पत्थर  को  यहाँ  पर  रख  दिया  l  शिष्यों  की  इस  बात  पर  बाबा  फरीद  ने  उन्हें  समझाया  कि  तुम  सब  इन  व्यर्थ  की  बातों  में  मत  पड़ो   और  वे  स्वयं  घुटने  टेककर   खुदा  को  धन्यवाद  देने  बैठ  गए  l  अपनी  प्रार्थना  पूरी  करने  के  बाद   उन्होंने  कहा ---- " ऐ  खुदा  !  तेरी  बड़ी  कृपा  है  l  अपराध  तो  मेरे  ऐसे  हैं  कि  आज  मुझे  फाँसी  मिलती  ,  लेकिन  तूने  मुझे    सिर्फ  पत्थर  की  चोट  दी  l  तेरी  करुणा  अपार  है  l "