लुकमान जिस नगर में रहते थे , वहीँ एक सेठ भी रहता था , जो अपने नौकरों पर सख्ती के लिए मशहूर था l उसका एक नौकर जो हकीम लुकमान के ही रंग रूप का था , एक दिन भाग खड़ा हुआ l उसकी खोज करते हुए सेठ की भेंट लुकमान से हो गई l उसने लुकमान को ही नौकर समझकर पकड़ लिया और घर लाकर काम पर लगा लिया l लुकमान ने भी कोई प्रतिरोध नहीं किया और मेहनत से काम में जुट गए l एक वर्ष में मकान बन गया , तब एकाएक वह पुराना नौकर भी उपस्थित हुआ और अपनी भूल के लिए सेठ से क्षमा याचना करने लगा l सेठ वह बात तो भूल गया , उसे यह चिंता छा गई कि धोखे से किसे पकड़ लिया l वह लुकमान के पास गया और बोला ---- " सच -सच कहिए आप कौन हैं ? मुझसे बड़ी गलती हो गई l " लुकमान ने हंसकर कहा ---- " हकीम लुकमान l अब जो हुआ उसका दुःख न करो l मुझे इस एक वर्ष में मकान बनाने की विद्या मालूम हो गई l "
28 April 2024
WISDOM -------
हिमालय की तराई में दो संन्यासी साथ -साथ रहते थे l उनमें एक वृद्ध और दूसरा नौजवान था l एक बार वे कई दिनों की तीर्थयात्रा के पश्चात् जब अपने ठिकाने पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि हवा -आँधी ने उनकी कुटिया को तबाह कर दिया l यह देख युवा संन्यासी बड़बड़ाने लगा ----" जो छल -फरेब करते हैं , उनके मकान सुरक्षित हैं और हम जो दिन -रात प्रभु स्मरण करते हैं , हमारी कुटिया तहस -नहस हो गई l " वृद्ध संन्यासी बोला ---- " दुःखी मत हो , इसमें भी कुछ अच्छा ही होगा l " पर युवा संन्यासी वृद्ध की बात से सहमत नहीं हुआ , वह दुःखी होकर रात भर जागता रहा , जबकि वृद्ध सुबह सोकर उठा तो बोला --- " धन्यवाद ईश्वर आज खुले आसमान के नीचे बहुत अच्छी नींद आई , काश यह छप्पर पहले ही उड़ गया होता l " इस पर युवा संन्यासी बोला ---- " एक तो कुटिया नहीं रही , ऊपर से आप ईश्वर को धन्यवाद दे रहे हैं l " वृद्ध बोला ---- " तुम हताश हो गए और इसलिए रातभर जागते रहे और उदास रहे l मैं प्रसन्न था , इसलिए चैन की नींद सो गया l " इनसान को हर परिस्थिति में प्रसन्न रहना चाहिए l
27 April 2024
WISDOM ------
संत एकनाथ के विषय में प्रसिद्ध था कि उनकी सहनशीलता अपूर्व है l एक बार उनकी परीक्षा लेने के उदेश्य से एक व्यक्ति उस पेड़ पर चढ़ गया , जिसके नीचे से संत एकनाथ प्रतिदिन नदी स्नान को नकलते थे l उस दिन जैसे ही वे नदी स्नान के पश्चात् घर वापस जाने लगे और जैसे ही उस पेड़ के नीचे से गुजरे , उस दुष्ट व्यक्ति ने उन पर कुल्ला कर दिया l एकनाथ कुछ बोले नहीं और वापस जाकर नदी स्नान कर आए l दोबारा लौटने लगे तो उस व्यक्ति ने फिर से उन पर कुल्ला कर दिया l इस बार भी संत एकनाथ कुछ न बोले और पुन: स्नान करने चले गए l ऐसा 108 बार हुआ , एकनाथ जी स्नान कर आते और वह व्यक्ति उन पर कुल्ला कर देता l इतनी बार कुल्ला करने पर वह व्यक्ति अवश्य थक गया होगा लेकिन संत एकनाथ बिलकुल विचलित नहीं हुए और उस दुष्ट व्यक्ति के उन पर कुल्ला करने पर शांत मन से स्नान कर के लौटते रहे l आख़िरकार वह व्यक्ति शर्मिंदा होकर उनके चरणों पर गिर पड़ा और बोला --- " भगवन ! मुझे क्षमा करें l मैं पापी हूँ , मैंने आपको अन्यथा कष्ट दिया l " संत एकनाथ पूर्ण धैर्य के साथ बोले --- " नहीं पुत्र ! मैं तो तुम्हे धन्यवाद दूंगा कि तुम्हारे कारण आज मुझे नदी में 108 बार स्नान करने का अवसर मिला l ऐसा सौभाग्य कहाँ रोज -रोज मिलता है l " संत के कथन से वह व्यक्ति बहुत शर्मिंदा हुआ l
26 April 2024
WISDOM ----
युग बीत गए लेकिन धरती पर से अत्याचार , अन्याय , अधर्म समाप्त ही नहीं होता l इसका कारण यह है कि अत्याचारी कुटिल और दूरदर्शी होता है और उसके अत्याचार , अन्याय का समर्थन करने वाले विभिन्न मजबूरियों से घिरे होते हैं l जब अत्याचारी , अहंकारी का समर्थन करने वाले , उसके गलत कार्यों की सराहना करने वाले असंख्य होंगे तो अत्याचार क्यों खत्म होगा , वह तो और तेजी से बढ़ेगा l कहते हैं जो महाभारत में है , वही इस धरती पर भी है -- महारथी , महादानी कर्ण को सूतपुत्र होने के कारण समाज में हर ओर से तिरस्कार मिला l दुर्योधन ने उसकी योग्यता को , उसके महत्त्व को समझा और उसे अंगदेश का राजा बनाकर उसे अपना ऋणी बना लिया l यह जानते हुए भी कि दुर्योधन षड्यंत्रकारी है , अत्याचारी है , अधर्म पर है , फिर भी उसने आखिरी सांस तक दुर्योधन का साथ दिया क्योंकि एक राजा का सम्मान तो उसे दुर्योधन की वजह से ही मिला था l इसी तरह द्रोणाचार्य , कृपाचार्य को भी राजसुख दुर्योधन की वजह से था , यदि वे उसकी नीतियों का विरोध करते तो उन्हें भी विदुर की भांति शाक -पात पर रहना पड़ता l यह स्थिति हर युग में है l हर व्यक्ति चाहता है कि उसकी दुकान चलती रहे , उसके परिवार का पालन -पोषण होता रहे , इसलिए वह क्या सही है और क्या गलत है यह देखना ही नहीं चाहता l जो बुद्धिजीवी हैं और जानते हैं कि अन्याय का , अधर्म का साथ देने का अंतिम परिणाम क्या होगा , फिर भी अपनी आत्मा की आवाज को दबाकर वे अत्याचारी , अन्यायी का साथ देते है ,संसार में रहने की मजबूरियों की वजह से l महात्मा विदुर जैसे लोग बहुत कम होते हैं इसलिए यह सिलसिला युगों से चलता आया है और आगे भी चलता रहेगा l यही कर्म बंधन है जिसके कारण मनुष्य विभिन्न योनियों में भटकता रहता है l महाभारत युद्ध के दौरान कर्ण ने भीष्म पितामह से पूछा ----" अर्जुन से अधिक पराक्रमी होने के बावजूद और यह विश्वास मन में होते हुए भी कि युद्ध में मैं उसे हरा दूंगा , जब भी मैं अर्जुन के समक्ष जाता हूँ , तब -तब पराजय का भाव मेरे मन में आता है l " भीष्म ने कहा ---- " ऐसा इसलिए होता है कर्ण कि तुम जानते हो कि तुम गलत हो , तुम जानते हो कि दुर्योधन बिना वजह पांडवों के विरुद्ध षड्यंत्र रचता है , उसकी अनीति और अधर्म के साथी तुम भी हो , तुम्हारे अन्दर अपराधबोध है l उसी का बोझ तुम्हारे मन पर है l भावनाओं का अवरोध ही तुम्हारी क्षमताओं को रोकता है l तुम विचारशील होने के नाते यह भी जानते हो कि पांडव धर्म पर हैं , उनके साथ अन्याय हो रहा है और तुम अन्याय के पक्ष में खड़े हो l तुम्हारा अंतर्मन तुम्हे बार -बार कचोटता है , कर्ण ! तुम अधर्म के साथ खड़े हो l "
24 April 2024
WISDOM ------
लघु कथा ----- एक पंडित जी गंगा में स्नान कर के निकल रहे थे कि उनका स्पर्श एक निम्न जाति के व्यक्ति से हो गया l स्पर्श होते ही उन्हें क्रोध आ गया और वे उसे जोर से डांटने -डपटने लगे l उनका क्रोध इतना बढ़ गया कि उन्होंने उस व्यक्ति को दो छड़ियाँ भी जमा दीं l फिर यह कहते हुए दोबारा स्नान करने चले गए कि इस व्यक्ति ने मुझे अपवित्र कर दिया l नहाते समय उन्होंने देखा कि वह व्यक्ति भी स्नान कर रहा है l उसे स्नान करते देख पंडित जी को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने उससे पूछा ---- ' मैं तो तुम्हारे से स्पर्श होने के कारण दोबारा स्नान करने गया , लेकिन तुम क्यों नहाने गए ? " वह व्यक्ति बोला --- " पंडित जी ! मानव मात्र तो एक समान हैं , जाति से पवित्रता तय नहीं होती , लेकिन सबसे अपवित्र तो क्रोध है l जब आपके क्रोध ने मुझे स्पर्श किया तो उन नकारात्मक भावों से मुक्त होने के लिए मुझे गंगा स्नान करना पड़ा l " यह सुनकर पंडित जी बहुत लज्जित हुए और उनका जाति -अभिमान दूर हो गया l
23 April 2024
WISDOM ----
पुराण में एक रोचक कथा है ---- एक बार स्वर्ग के राजा इंद्र और मरुत देव में विवाद हुआ कि तपस्या श्रेष्ठ है या सेवा l मरुत देव का कहना था तपस्या श्रेष्ठ है और तपस्वियों में विश्वामित्र श्रेष्ठ हैं l वे तपस्वी होने के साथ त्यागी भी हैं l उन्होंने देवराज पर व्यंग करते हुए कहा --- ' आपको अपने सिंहासन का भय बना रहता है लेकिन विश्वामित्र त्यागी हैं , उन्हें इन्द्रासन का कोई लोभ नहीं है , उन्होंने बहुत सिद्धियाँ अर्जित की हैं और वे आत्म कल्याण के लिए तप कर रहे हैं l ' इंद्र ने कहा --- " सिद्धियाँ प्राप्त कर लेने के बाद यह आवश्यक नहीं कि व्यक्ति उनका उपयोग लोक कल्याण के लिए करे l शक्ति अर्जित होने पर अहंकार आ जाता है लेकिन सेवा में अहंकार का दोष नहीं होता इसलिए मैं सेवा को श्रेष्ठ मानता हूँ l महर्षि कण्व में सेवा भाव है , वे समाज और संस्कृति के उत्थान के लिए निरंतर प्रयत्नशील हैं इसलिए मैं महर्षि कण्व को विश्वामित्र से श्रेष्ठ मानता हूँ l ' इसी विवाद के समय महारानी शची आ गईं और यह तय हुआ कि क्यों न कण्व और विश्वामित्र की परीक्षा ली जाये l स्वर्गपुरी में बात फ़ैल गई कि देखें तपस्या से प्राप्त सिद्धि की विजय होती है या सेवा की ? अब देवराज किसी की परीक्षा लेने आ जाएँ तो क्या होगा ? इंद्र ने स्वर्ग की सबसे सुन्दर अप्सरा मेनका को ऋषि विश्वामित्र की तपस्या भंग करने भेजा l फिर क्या था , रूप और सौन्दर्य के इंद्रजाल ने विश्वामित्र को आकाश से धरती पर ला दिया , उन्होंने अपना दंड , कमंडलु एक ओर रख दिया l सारी धरती पर कोलाहल मच गया कि विश्वामित्र का तप भंग हो गया l तप के साथ उनकी शांति , उनका यश , सिद्धि , वैभव सब नष्ट हो गया l कई वर्ष बीत गए l जब विश्वामित्र को होश आया तो पता चला कि उनसे अपराध हो गया , युगों की तपस्या व्यर्थ हो गई , क्रोध में उन्होंने मेनका को दंड देने का निश्चय किया लेकिन प्रात: काल होने तक मेनका अपनी पुत्री को आश्रम में छोड़कर इन्द्रलोक पहुँच चुकी थी l रोती -बिलखती , भूख से कलपती अपनी कन्या पर भी विश्वामित्र को दया नहीं आई कि उसे उठाकर दूध व जल की व्यवस्था करें , उन्हें तो बस अपने आत्म कल्याण की चिन्ता थी इसलिए बालिका को वहीँ बिलखता छोड़कर वे पुन: तप करने चले गए l दोपहर के समय ऋषि कण्व लकड़ियाँ काटकर लौट रहे थे , मार्ग में विश्वामित्र का आश्रम पड़ता था l बालिका के रोने का स्वर सुनकर उन्होंने सूने आश्रम में प्रवेश किया तो देखा अकेली बालिका दोनों हाथों के अंगूठे मुंह में चूसती हुई अपनी भूख मिटाने का प्रयत्न कर रही है l उसे देख स्थिति का अनुमान कर कण्व की आँखें छलक उठीं l उन्होंने बालिका को उठाया , चूमा , प्यार किया और गले लगाकर अपने आश्रम की ओर चल पड़े l अब इंद्र ने मरुत से पूछा --- " तात ! बोलो जिस व्यक्ति के ह्रदय में विश्वामित्र के प्रति जो अबोध बालिका को भूख से बिलखती छोड़ गए , कोई दुर्भाव नहीं है और अबोध बालिका की सेवा वे माता की तरह करने को तैयार हैं , तो बोलो कण्व श्रेष्ठ हैं या विश्वामित्र ? मरुत कुछ न बोल सके , उन्होंने अपना सिर झुका लिया l इंद्र ने कहा --- 'श्रेष्ठ तपस्वी तो वह है जो अपने लिए कुछ चाहे बिना समाज के शोषित ,उत्पीड़ित , दलित और असहाय जनों को निरंतर ऊपर उठाने के लिए परिश्रम किया करता है l इस द्रष्टि ने महर्षि कण्व श्रेष्ठ हैं , उनकी तुलना विश्वामित्र से नहीं कर सकते l
22 April 2024
WISDOM -----
लघु -कथा ---- 1 . लोमड़ी और खरगोश पास -पास रहते थे l खरगोश घास चरता था और खेत को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता था l किसान भी उसकी सज्जनता से परिचित था , इसलिए उसे रहने के लिए एक कोने में जगह दे दी l एक दिन एक लोमड़ी उधर आई और खरगोश से पूछने लगी ----" मक्की पक रही है , कहो तो पेट भर लूँ ? " खरगोश ने कहा --- " खेत से पूछ लो l वह कहे , वैसा करना l " लोमड़ी ने आवाज बदलकर खेत की ओर से कहा --- " खा लो , खा लो l " इतने में किसान का पालतू कुत्ता आ गया l वह सब देख -सुन रहा था l उसने आते ही खेत से पूछा --- " बताओ तो इस धूर्त लोमड़ी को मजा चखा दूँ ? " फिर स्वर बदलकर कहा ---- " धूर्त लोमड़ी की टांग तोड़ दो l ' कुत्ते को झपटते देख लोमड़ी नौ -दो -ग्यारह हो गई l सज्जनता का व्यवहार छद्म युक्त होने के कारण आकर्षक तो लगता है , परन्तु उसकी पोल अंतत: खुल ही जाती है l