23 January 2025

WISDOM ------

    ईरान  के  दार्शनिक  शेख  सादी  से  किसी  जिज्ञासु  ने  पूछा  ----- "  कृपया  बताएं  पहलवान  बड़े  होते  हैं  ,  या  धनी    बड़े  होते  हैं  या   फिर  परोपकारी  बड़े  होते  हैं  ? '   शेख  सादी  ने  उत्तर  देने  से  पहले   प्रश्नकर्ता  से  एक  प्रश्न  पूछा  ---- " बताओ  हातिम  के   जमाने  में  सबसे  बड़ा  पहलवान  या  धनी  कौन  था  ?  "    जिज्ञासु  ने याद  करने  का  बहुत  प्रयत्न  किया  लेकिन  दोनों  प्रकार  के  लोगों  में  से  उसे  किसी  का भी  नाम  याद नहीं आया  l  इस  पर  शेख  सादी  ने  कहा  --- "  देखो  ,  हातिम  के  परोपकार  बहुत  विख्यात  हैं   और  उसकी  उदारता   सभी  को  स्मरण  है   जबकि  उस  समय  पहलवान  और  धनवान   भी    अनेकों   हुए  होंगे  ,  पर  किसी  के  काम  न  आने  के  कारण   उनका  नाम  किसी  को  याद  तक  नहीं  है   l "  जिज्ञासु  का समाधान  हो  गया  l  उसने  समझ  लिया  कि  बलवान , धनवान  नहीं  ,  पुण्यात्मा  बड़े  होते  हैं  l  

22 January 2025

WISDOM ------

  ' दु:संग  भले  ही  कितना  मधुर  एवं  सम्मोहक  लगे  ,  किन्तु  उसका  यथार्थ   महाविष   की  भांति  संघातक  होता  है  l '     कहते  हैं   मित्रता  सोच -समझकर  करनी  चाहिए  l  यदि  संगति  सही  नहीं  है   तो   साथी  के  मन  में  गहरे  छुपे  दुर्गुण  उसके  सद्गुणों  को   ढक    देते  हैं  l  व्यक्ति  अपने   ही  सद्गुणों  और  अपने  भीतर  छिपी  ताकत  को  भूल  जाता  है   और  अपने  साथी  के  मन  की  गहराई  में  छिपे  अंधकार   को  समझ  नहीं  पाता  l  महाभारत  के  प्रमुख  पात्र  ' दुर्योधन '  वास्तव  में  इतना  बुरा  नहीं  था  कि  अपने  ही  वंश  का  विनाश   करने  के  लिए  जिम्मेदार  कहलाए  l  महाभारत  में  अनेक  प्रसंग  है  जो  यह  बताते  हैं  कि  दुर्योधन  अपने  वचन   को  निभाने  वाला  , बहुत  वीर   था  l  भगवान  श्री कृष्ण  के  बड़े  भाई  बलरामजी  से  उसने  गदा  युद्ध  सीखा  था  ,  वह  एक  कुशल  प्रशासक  था  , प्रजा  उससे  प्रसन्न  थी  ,  उसमे  उच्च  कोटि  की  संगठन  क्षमता  थी  ,  उस  समय  के  अनेकों  शक्तिशाली  राजाओं  ने  युद्ध  में  उसका  साथ  दिया  l  लेकिन  दुर्योधन  अपने  मामा  'शकुनि '  की   संगत  में  बाल्यकाल  से  ही  रहा  l  शकुनि  के  मन  में  कौरव  वंश  के  प्रति  अच्छी  भावना  नहीं  थी  ,  उसके  मन  में  इस  बात  का  कष्ट  था  कि  उसकी  बहन  गांधारी  का  विवाह   दबाव  में  धृतराष्ट्र  से  हुआ  जो  अंधे  थे  ,  इसलिए  वह  निरंतर  कुटिल  चालें  चलता  रहा  l  देखने  में  लगता  था  कि  वह  दुर्योधन  का  हितैषी  है  ,  लेकिन  वास्तव  में  वह  कौरव  वंश  की  जड़ें  काट  रहा  था  l  दुर्योधन  तो   हस्तिनापुर   युवराज  था  ,  सारा  जीवन  अपने  पिता  के  अंधे  मोह  का  फायदा  उठकर  उसने  राजसुख    भोगा  लेकिन  फिर  भी  पांडवों  पर  अत्याचार  करता  रहा  l  शकुनि  जैसे  कुटिल  व्यक्ति  की  संगति  के  कारण   दुर्योधन  अपने  ही  सद्गुणों  का  सदुपयोग  न  कर  सका   और  कौरव  वंश  के  पतन  का  जिम्मेदार  बना  l  

21 January 2025

WISDOM

   यह  संसार  गणित  से  चलता  है  l  सांसारिक  मनुष्यों  का व्यवहार  स्वार्थ पर  आधारित  है  ,  जितना   दोगे   , उतना  ही  मिलेगा  l  GIVE AND  TAKE  है  l  यही  स्वार्थ  जब  अपने  चरम  पर  पहुँच  जाता  है  ,  तब  स्वार्थी  केवल  लेता  है  ,  बदले  में  देता  कुछ  नहीं  l  यह  स्वार्थ  जब  अहंकार  से  जुड़  जाता  है  ,  तब  उसमें  बिना  बुलाए  ही  अनेक  बुराइयाँ   आती   हैं  ,  फिर  ऐसा  व्यक्ति  अपनी  ही  बुराइयों  के  ढेर  पर  बैठा  रहता  है  l  वह  अपनी  कमियों  को  देखना , समझना  ही  नहीं  चाहता  ,  तो  फिर  वे  कमियां  दूर  कैसे  हों   ?  आज  संसार  में  ऐसे  ही  लोगों  की  अधिकता  है  l  आज  लोग  एक  दूसरे  से   आत्मीयता  के  कारण  नहीं  ,  बल्कि  स्वार्थ  के  कारण  जुड़े  हैं  l  इसलिए  वे  भीड़  में  रहकर  भी  अकेले  हैं  l  उन्हें  परस्पर  किसी  का  विश्वास  भी  नहीं  है  ,  कब  किसका  स्वार्थ  टकरा  जाए   और  जिन्दगी  मुसीबतों  से  घिर  जाए  ?  जो  संसार  की  इस  रीति -नीति  को  समझता  है   वह  ईश्वर  को  ही  अपना  साथी  बना  लेता  है   और  सुख -शांति  से  सुकून  के  साथ  अपनी  जिन्दगी  जीता  है  l  

WISDOM ----

  पुराण  की  विभिन्न  कथाओं  में   जीवन  के  लिए  महत्वपूर्ण  मार्गदर्शक  सिद्धांत  हैं  l  श्रद्धा  और  विश्वास  से  जब  आप  उन्हें  सुनेंगे  -पढ़ेंगे  तो  आप  को  संसार  में  होने  वाली  विभिन्न  घटनाओं  का  कारण  और  उनका  समाधान  समझ  में  आएगा  l   पुराण    में  एक  कथा  है  ---- महाभारत  का  युद्ध    समाप्त  हो  गया  , अभिमन्यु  के  पुत्र  महाराज  परीक्षित   अपनी  प्रजा   की  समस्याओं   का  समाधान  करने  की  भवना  से  नगर -भ्रमण  को  निकले  ,  मार्ग  में  उन्होंने  देखा  एक  व्यक्ति  गाय , बैल  आदि  प्राणियों  को  बहुत  बेदर्दी  से  मार  रहा  है  l  उन्होंने  उसे   इस  दुष्कर्म  के  लिए  दंड  देना  चाहा  तो  वह  हाथ  जोड़  कर  बोला  ---महाराज  मैं  कलियुग  हूँ  , द्वापर युग  समाप्त  हो  गया  ,  अब  धरती  पर   शासक  चाहे  कोई  हो  ,  मेरा  ही  राज  रहेगा  l  चारों  ओर  अत्याचार , तबाही , युद्ध  , दंगे  , निर्दोष  प्राणियों  की  हत्या ----यही  सब  अत्याचार  अब  होने  का  समय  आ  गया  l  महाराज  परीक्षित  बड़े  चिंतित  हुए  ,  उन्होंने  कहा  --- ऐसे  तो  इस  धरती  पर  रहना  मुश्किल  हो  जायेगा  ,  तुम  अपने  लिए  कोई  स्थान  निश्चित  कर  लो  l  तब  महाराज  परीक्षित  ने  कलियुग  को  रहने  के  लिए  पांच  स्थान  बताए  ,  उनमें  से  एक  था  --' स्वर्ण ' अर्थात  वर्तमान  युग  में  इसका  अर्थ  है  --अमीरी , सुख  वैभव l  कथा  है  कि  महाराज  परीक्षित  ने  जब  अपपना  स्वर्ण  मुकुट  धारण  किया  तो  कलियुग  सबसे  पहले  उन  पर  ही  चढ़  बैठा   जिससे  उनकी  बुद्धि  भ्रष्ट  हो  गई , उन्होंने  ऋषि  के  गले  में  सांप  डाल  दिया   फिर  उन्हें  ऋषि  का  श्राप  मिला  ---- ऐसे  आगे  कथा  है  l  इस  कथा  को  हम  इस  काल  के  संदर्भ  में  देखें   तो  सबसे  महत्वपूर्ण  बात  यह  है  कि  अति  की  अमीरी  ईमानदारी  से  नहीं  ,  लोगों  का  शोषण  करने  से , बेईमानी  और  भ्रष्टाचार  से  ही  आती  है ,  इसलिए  इसका  अहंकार  भी  बहुत  बड़ा  होता  है  l  जो  जितना  बड़ा  अमीर  है  वह  चाहेगा  सारी  दुनिया उसके  अनुसार चले  ,  वो  जो  चाहे  वही  लोग  खाएं ,  वो  जो  पिलाना  चाहे  वही   पिएं l  खेती , शिक्षा , चिकित्सा , महामारी  सब  उसकी  इच्छा  से  हो  l    यहाँ  तक  कि  लोगों  के  मन  पर  भी  उसका  कब्ज़ा  हो  जाए  ,  वह  लोगों  को  कठपुतली  की  तरह  नचाए  ---- इसी  में  उसका  आनंद  है  l  धन  में  बहुत  ताकत  है   ,  धनी  जैसा  चाहता  है  वैसा  होता  भी  है  l  कलियुग  एक  प्रकार  का  डीमन  है ,  एक  पिशाच  की  तरह है  ,  उसे  अपनी  खुराक  चाहिए ,  उसकी  भूख  बहुत  है  l  इसलिए  वह  धन -शक्ति  संपन्न  लोगों  के  भीतर  घुस  जाता  है  ,  उनकी  बुद्धि  भ्रष्ट  कर  के  तबाही  मचाता  है  

19 January 2025

WISDOM ------

   इस  धरती  पर   मानव  जीवन  में  आपदाएं  विपदाएं  आती  रहती  हैं  l  कभी -कभी  इनका  रूप  बहुत  विकराल  होता  है ,  स्पष्ट  रूप  से  यह  समझ  में  आता  है  कि  प्रकृति  बहुत  क्रोधित  है  ,  किसी  तरह  उनका  क्रोध  शांत  ही  नहीं  हो  रहा  है  l  मनुष्य  अपनी  मानसिक  विकृतियों  के  कारण  अनेक  तरह  के  पापकर्म  करता  है  लेकिन  जब  कोई  भयंकर  पाप   समझदार  , सभ्रांत  और  समाज  के  सभ्य  कहे  जाने  वाले  लोगों द्वारा  सोच -समझकर  ,  समाज  से  छिपकर   निर्दोष  प्राणियों  , बच्चों और  बेसहारा  लोगों  पर  किया  जाता  है  ,  उसे  प्रकृति  सहन  नहीं  करती  l  ऐसे  पापकर्म  में  जो  भी  भागीदार  होते हैं ,  सब  जानते  हुए  चुप  रहते  हैं  ,  अपनी  शक्ति  से  उन्हें  रोकते  नहीं  बल्कि  उन्हें  और   छूट  देते  हैं  --- ऐसे   लोगों  को  प्रकृति  कभी  क्षमा  नहीं  करतीं  l  ऐसे  प्राकृतिक  प्रकोप , महामारी , भूकंप , तूफ़ान  में  गेहूं  के  साथ  घुन  भी   पिसता  है  l  जागरूक  न  होने  का  भी  दंड  मिलता  है   l    प्रकृति  को  शांत  कर  सुख  -शांति  से  जीवन  जीना   है  तो  संसार  में  मनुष्य  को  जागरूक  होना  होगा  ,  देखना  होगा  कहाँ  छोटे -छोटे  बच्चों  का  शोषण , उत्पीड़न  हो  रहा  है , कहाँ  मानव  शरीर  के  विभिन्न  अंगों  का  भी  बाजार  बना  है  ,  स्वाद  के  नाम  पर  कितने  प्राणियों  की  हत्या  हो  रही  है  ,  कम  उम्र  के  कितने  युवाओं  को  बहला -फुसलाकर  नशे  की  लत  लगाईं  जा  रही  है ---ये  सब  पापकर्म  मनुष्य  या ---- सिर्फ  अपने  लाभ  के  लिए  करता  है  l  ऐसे  ही  पापों  की  जब  अति  हो  जाती  है  तब  प्रकृति  सामूहिक  दंड  देती  है  l  कितने  ही  दंड  मिल  जाएँ  मनुष्य  सुधरता  नहीं  है  ,  वह  अपनी  ही  विकृतियों  का  गुलाम  है  ,  उसे  इन  सबकी  आदत  बन  गई  है  ,  इसी  का  नाम  संसार  है   l  भगवान  भी  अवतार  ले  लेकर  थक  गए  ,  कहाँ  तक  समझाएं  , मनुष्य  की  अक्ल  पर  परदा  पड़ा  है  l  

17 January 2025

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   महाभारत  में  एक  प्रसंग  है   जिसमें  धर्मराज  युधिष्ठिर  से  यक्ष  ने   कई    प्रश्न  पूछे  ,  उनमे  से  एक  प्रश्न  था  ---- इस  संसार  का  सबसे  बड़ा  आश्चर्य  क्या है  ? '  युधिष्ठिर  ने  उत्तर  दिया  --- " सबसे  बड़ा  आश्चर्य  है  कि  मृत्यु  को  सुनिश्चित  घटना  के  रूप  में  देखकर  भी  मनुष्य  इसे  अनदेखा  करता  है  l  वह  मृत्यु  की  नहीं  जीवन  की  तैयारी  कुछ  इस  अंदाज  में  करता  है  ,  जैसे  विश्वास हो  कि  वह  कभी  मरेगा  ही  नहीं  l  उसे  सदा -सदा  जीवित  रहना  है  l  "  यह  सत्य  है  ,  वैज्ञानिक  नित्य  नए  तरीकों  से  और  आध्यात्मिक  कहे  जाने  वाले  लोग  भी  पूजा -पाठ , मन्त्र , जप -तप  आदि   के  विभिन्न  प्रयोगों  से  निरंतर  प्रयासरत  हैं  , जिससे  रोग , बीमारी , बुढ़ापा  व  मृत्यु  से  बचा  जा  सके  l  बस !  यही  वह  बिंदु  है  ,  जहाँ  सब  हार  गए  l  ईश्वर  से  बड़ा  कोई  नहीं  है  l  अरबों  की  संपदा ,  सारी  सुख -सुविधाएँ , अनुभवी  चिकित्सक , तंत्र -मन्त्र  की  बड़ी  से  बड़ी  ताकत  भी  मृत्यु  को  नहीं  रोक  सकती  l  ईश्वर  ने  जितनी  सांसे  दी  है ,  सम्पूर्ण  पृथ्वी  का  वैभव  लुटाने  पर  भी  एक  पल  भी  अतिरिक्त  नहीं  मिलता  l  लेकिन  इसके  साथ  एक  सत्य  यह  भी  है  कि  यदि  कोई  व्यक्ति  ईश्वर  के  कार्य  के  लिए  स्वयं  को  समर्पित  कर  दे  तब  ईश्वर  उसकी  नियति  अपने  हाथ  में  ले  लेते  हैं   और  ईश्वरीय   योजना   को  पूर्ण  करने  में  उसकी  भागीदारी  के  लिए  उसे   जीवन  देते  हैं  l  जैसे  महाभारत  में  अर्जुन  ने  स्वयं  को  भगवान  श्रीकृष्ण  के  चरणों  में  समर्पित  किया  , तब  भगवान  स्वयं  उनके  सारथि  बने  और  भीष्म , द्रोणाचार्य   , कर्ण  जैसे  महारथियों  के  तीव्र  प्रहार  से  उनकी  रक्षा  की  l  इस  कलियुग  में  हम  अर्जुन  जैसे  न  भी  बन  पाएं  तो  भगवान  ने  श्रीमद् भगवद्गीता  में  कहा   है  --- निष्काम  कर्म  करो  ,  निष्काम  कर्म  से  तुम  अपने  लिए  सुंदर  दुनिया  बना  सकते  हो  l '  हमारे  ऋषियों  , आचार्य  ने  कहा  है  --- सत्कर्म  का  कोई  भी  मौका  हाथ  से  न  जाने  दो  ,  सत्कर्म  की  पूंजी  इकट्ठी करो  ,  यह  पूंजी  ही  जीवन  में  आने  वाली  विभिन्न  विपदाओं  से  हमारी  रक्षा  करती  है  l  आचार्य श्री  कहते  हैं ---  मृत्यु  के  सत्य  को  स्वीकार  कर  जीवन  को  सार्थक  बनाने  का  प्रयास  करो  l  '  मृत्यु   की  देवी   हमें  बहुत  कुछ   सिखाती  हैं  कि  ये  अहंकार ,  ऊँच -नीच , अमीर  -गरीब  का  भेदभाव  व्यर्थ  है  ,  केवल  मृत्यु  ही  ऐसी  है  जो  कोई  भेदभाव  नहीं  करती  , एक  ही  तरीका  है --- मुट्ठी  बांधे  आया  जग  में  , हाथ  पसारे  जाना  है  l  

16 January 2025

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   जापान  का  एक  युवा  तीरंदाज  स्वयं  को  दुनिया  का   सबसे  बड़ा  धनुर्धर  मानने लगा  था  l  वह  जहाँ  भी  जाता  ,  लोगों  को  मुकाबले  की  चुनौती  देता   और  उस  मुकाबले  में  उनको  हराकर  उनका  खूब  मजाक  उड़ाता  l  एक  बार  उसने  एक  झेन  गुरु   बोकोशु  को  चुनौती  दी  l  गुरु  ने  चुनौती  स्वीकार  कर  ली  l  युवक  ने  स्पर्धा  प्रारम्भ  होते  ही  लक्ष्य  के  बीचोंबीच  निशाना  लगाया   और  पहले  ही  तीर  में  लक्ष्य  भेद  दिया  l  वह  झेन  गुरु  से  दंभ पूर्वक  बोला  ---- " क्या  आप  इससे  बेहतर  कर सकते  हैं  ? "   झेन  गुरु  मुस्कराए  और   उसे  ऐसे  स्थान  पर  ले  गए  ,  जहाँ  दो  पहाड़ियों  को  जोड़ने  के  लिए   लकड़ी  का  एक  कामचलाऊ  पुल  बना  था  l  उस  पर  कदम   रखते  ही  वह  चरमराने  लगा  l  बोकोशु  ने  उसे  पुल  पर  अपने  पीछे आने को  कहा  l  बोकोशु  ने  पुल  के  बीच  पहुंचकर   सामने  दूर  खड़े  एक  पेड़  के  तने  पर  निशाना  लगाया  l  इसके  बाद  उन्होंने  उस  युवक  से  निशाना  लगाने  को  कहा  ,  परन्तु  कई  बार  के  प्रयास  के  बाद  भी  वह  निशाना  न  लगा  सका  l   उसे  निराशा  में  डूबा  हुआ  देखकर  झेन  गुरु  ने  कहा --- " वत्स  !  तुमने  निशाना  लगाना  तो  सीख  लिया  ,  पर  मन  पर  नियंत्रण  करना  नहीं  सीखा  ,  जो  किसी  भी  परिस्थिति  में  शांत  रहकर   निशाना  साध  सके  l  "  युवक  को  बात  समझ  में  आ  गई  l  उसने  अब  अहंकार  छोड़कर  मन  को  साधने  का  प्रयास  आरम्भ  किया  l