' अपने पुरुषार्थ , पराक्रम और शक्ति का व्यक्तित्व की परिधि से बाहर निकलकर सर्वहित के लिए समर्पण करना ------ व्यक्ति को इतिहास पुरुष बनाने में समर्थ होता है | देश - प्रेम , स्वतंत्रता की रक्षा , संस्कृति और धर्म के क्षरण को रोकने के लिए जिन - जिन महापुरुषों ने भी बलिदान किये हैं वे भले ही स्थूल जीवन का आनंद अधिक समय तक न ले सके हों पर काल पर विजय प्राप्त कर महामानव बनने का श्रेय उन्हें ही प्राप्त होता रहा है | '
26 December 2015
25 December 2015
मानव - प्रेम ही जिनका धर्म था ------ राजा महेन्द्र प्रताप
राजा महेन्द्र प्रताप ऐसे महान और निस्पृह देशभक्त थे जिन्होंने राजा होते हुए भी राष्ट्र - सेवा के लिए साधारण और कष्ट का जीवन बिताया । '
मुरसान रियासत के राजकुमार और हाथरस राज्य के दत्तक उत्तराधिकारी राजा महेन्द्र प्रताप भारत माता के उन सपूतों में से हैं जिन्होंने उसकी स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया । राजा महेन्द्र प्रताप शिक्षा - दीक्षा के लिए इंग्लैंड गये , वहां रहे किन्तु जैसे ही भारत वापस आये उन्होंने सारी वैदेशिकता झाड़ फेंकी और विशुद्ध भारतीयता में आ गये । उन्हें देशभक्ति के मूल्य पर संसार का कोई भी वैभव और कोई भी सुख - सुविधा स्वीकार नहीं थी ।
उनका कहना था मनुष्य का सच्चा धर्म प्रेम में है और सच्ची सुख - शान्ति समानता में निवास करती है । उनका धर्म मानव - प्रेम था जिसका उद्देश्य एक अविभाजित संसार और विश्व - बंधुत्व की भावना को प्रोत्साहित करना था ।
उन्होंने वृन्दावन में ' प्रेम - महाविद्यालय ' की स्थापना की , इस संस्था को उन्होंने पुत्र की तरह प्रेम किया और इसे अपनी जागीर का बड़ा अंश दान किया । इस महाविद्यालय में पढ़ाई के साथ विद्दार्थियों को लकड़ी , लोहा , बुनाई, फोटोग्राफी , गलीचा बुनना आदि शिल्प कार्यों में से एक अनिवार्य रूप से सिखाया जाता था ।
उनका विश्वास था कि देश के सामान्य स्तर का जीवन ग्रहण किये बिना किसी को भी उसके अभावों , कष्टों और आवश्यकताओं की सच्ची अनुभूति नहीं हो सकती और जब तक सच्ची अनुभूति नहीं होती तब तक सेवा भी सच्चे ह्रदय से नहीं की जा सकती । इसलिए जिस दिन उन्हें देश की दयनीय दशा का बोध हुआ , राजसी जीवन त्यागकर सामान्य - जनों सा जीवन चलाने और समाज सेवा में लग गये ।
मुरसान रियासत के राजकुमार और हाथरस राज्य के दत्तक उत्तराधिकारी राजा महेन्द्र प्रताप भारत माता के उन सपूतों में से हैं जिन्होंने उसकी स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया । राजा महेन्द्र प्रताप शिक्षा - दीक्षा के लिए इंग्लैंड गये , वहां रहे किन्तु जैसे ही भारत वापस आये उन्होंने सारी वैदेशिकता झाड़ फेंकी और विशुद्ध भारतीयता में आ गये । उन्हें देशभक्ति के मूल्य पर संसार का कोई भी वैभव और कोई भी सुख - सुविधा स्वीकार नहीं थी ।
उनका कहना था मनुष्य का सच्चा धर्म प्रेम में है और सच्ची सुख - शान्ति समानता में निवास करती है । उनका धर्म मानव - प्रेम था जिसका उद्देश्य एक अविभाजित संसार और विश्व - बंधुत्व की भावना को प्रोत्साहित करना था ।
उन्होंने वृन्दावन में ' प्रेम - महाविद्यालय ' की स्थापना की , इस संस्था को उन्होंने पुत्र की तरह प्रेम किया और इसे अपनी जागीर का बड़ा अंश दान किया । इस महाविद्यालय में पढ़ाई के साथ विद्दार्थियों को लकड़ी , लोहा , बुनाई, फोटोग्राफी , गलीचा बुनना आदि शिल्प कार्यों में से एक अनिवार्य रूप से सिखाया जाता था ।
उनका विश्वास था कि देश के सामान्य स्तर का जीवन ग्रहण किये बिना किसी को भी उसके अभावों , कष्टों और आवश्यकताओं की सच्ची अनुभूति नहीं हो सकती और जब तक सच्ची अनुभूति नहीं होती तब तक सेवा भी सच्चे ह्रदय से नहीं की जा सकती । इसलिए जिस दिन उन्हें देश की दयनीय दशा का बोध हुआ , राजसी जीवन त्यागकर सामान्य - जनों सा जीवन चलाने और समाज सेवा में लग गये ।
24 December 2015
धार्मिक साम्य के प्रचारक ------- महात्मा ईसा
ईसा ने कहा था ----- ' कोई व्यक्ति बुरा नहीं होता और न खतरनाक l उससे कुछ भूलें होती हैं जिनका परिमार्जन निश्चित रूप से संभव है । प्रायश्चित अंत:करण की संरचना में फेरबदल कर डालने के लिए उतारू प्रबल पुरुषार्थ है । इसके द्वारा हर कोई अपने विगत पापकर्मों का शमन करके नव - जीवन प्राप्त कर सकता है l "
ईसा ने कहा है ---- " दुनिया को हम ठग सकते हैं , लेकिन परमात्मा प्रभु हमारा ह्रदय जानता है , वह न्याय करता है | "
ईसा की असाधारण सफलता एवं उनके अभिनव उत्कर्ष में उनके व्यक्तित्व के गुण ---- प्रबल आत्मविश्वास , धैर्य और साहस प्रमुख थे । उन्होंने अपने 12 प्रमुख शिष्य चुने और तीन वर्षों तक अपनी पूरी क्षमता से इन बारह व्यक्तियों का शिक्षण कर उनमे अभिनव संस्कार डाले ।
तीन वर्ष के प्रयासों के बाद भी शिष्य गण ईसामसीह को पूर्णत: समझ नहीं पाए । ये शिष्य गण सदैव ही यह पूछते रहते थे इतना सब कर ईसा कौन सा राज्य स्थापित करने जा रहे हैं और उस राज्य में उन शिष्यों को कौन सा पद मिलने वाला है । शिष्यों के इस प्रकार के नैराश्य पूर्ण व्यवहार से भी ईसा ने धैर्य नहीं खोया , वे निरंतर अपने लक्ष्य की पूर्ति में लगे रहे और फिर विश्व ने देखा कि अंततः ईसा के विश्वास , धैर्य व साहस को सफलता मिली ।
ईसा ने कहा था --- तुम बड़े बनना चाहते हो तो उन गुणों को पूजो जिनके कारण मुझे बड़ा मानते हो l सुख चाहते हो तो दूसरों को सुख दो l
ईसा ने कहा है ---- " दुनिया को हम ठग सकते हैं , लेकिन परमात्मा प्रभु हमारा ह्रदय जानता है , वह न्याय करता है | "
ईसा की असाधारण सफलता एवं उनके अभिनव उत्कर्ष में उनके व्यक्तित्व के गुण ---- प्रबल आत्मविश्वास , धैर्य और साहस प्रमुख थे । उन्होंने अपने 12 प्रमुख शिष्य चुने और तीन वर्षों तक अपनी पूरी क्षमता से इन बारह व्यक्तियों का शिक्षण कर उनमे अभिनव संस्कार डाले ।
तीन वर्ष के प्रयासों के बाद भी शिष्य गण ईसामसीह को पूर्णत: समझ नहीं पाए । ये शिष्य गण सदैव ही यह पूछते रहते थे इतना सब कर ईसा कौन सा राज्य स्थापित करने जा रहे हैं और उस राज्य में उन शिष्यों को कौन सा पद मिलने वाला है । शिष्यों के इस प्रकार के नैराश्य पूर्ण व्यवहार से भी ईसा ने धैर्य नहीं खोया , वे निरंतर अपने लक्ष्य की पूर्ति में लगे रहे और फिर विश्व ने देखा कि अंततः ईसा के विश्वास , धैर्य व साहस को सफलता मिली ।
ईसा ने कहा था --- तुम बड़े बनना चाहते हो तो उन गुणों को पूजो जिनके कारण मुझे बड़ा मानते हो l सुख चाहते हो तो दूसरों को सुख दो l
23 December 2015
आनन्दपूर्ण, संतोषयुक्त सफल जीवन -------- केशवचंद्र सेन
' संसार के मनुष्य किसी सफल मनोरथ और सौभाग्यशाली व्यक्ति के बाहरी रूप को देखकर यह अभिलाषा तो करते हैं कि हम भी ऐसे ही बन जाएँ , पर इस बात पर बहुत कम ध्यान देते हैं कि इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए उन्होंने त्याग , तपस्या , कष्ट सहन , एकांतवास आदि का जीवन व्यतीत करके अपने आचरण को सुद्रढ़ बनाया | '
इस तथ्य को समझाने के लिए एक लेखक ने लिखा है ----- " देश के युवा और वृद्ध पुरुषों से में यही कहूँगा कि यदि आप भी केशवचंद्र सेन की भांति सुख - शान्ति प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको उनकी तरह सदाचारी भी बनना पड़ेगा । विनय और प्रसन्नता सदाचारियों को ही प्राप्त होती है । जो आदमी सर्वदा अपने अंत:करण की रक्षा करता है , परमात्मा उसी की सहायता करता है ।"
श्री केशवचंद्र सेन ( जन्म 19 नवम्बर 1838 ) के बाल्य - मित्र और बंगाल के प्रसिद्ध नेता श्री प्रतापचन्द्र मजूमदार ने उनका चरित्र - चित्रण करते हुए लिखा है --- " उन दिनों बंगाली लड़कों का जीवन प्राय: दुराचार से परिपूर्ण था । पर केशव बाबू इससे बिलकुल बचे हुए थे । बुरे लड़कों की संगत को वे घ्रणा की द्रष्टि से देखते थे । "
वे ब्रह्मचर्यं के आदर्श पर विश्वास रखते थे कि शास्त्रीय आदेशानुसार यदि 24 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्यं का पालन किया जाये तो उससे जीवन के विकास और विद्दा - बुद्धि की उन्नति में महत्वपूर्ण लाभ मिलेगा |
उस समय की परम्परा के अनुसार 18 वर्ष की आयु में इनका विवाह एक 10 वर्ष की लड़की के साथ कर दिया गया । इससे उन्हें बड़ा क्षोभ हुआ ।
उस समय पूर्ण युवावस्था होने पर भी उन्होंने विवाह के बाद कई वर्षों तक ब्रह्मचर्यं का कठोर तपस्वी जीवन व्यतीत किया | इन दिनों वे गंभीर रहते थे , उन्होंने कुछ धार्मिक प्रार्थना बना ली थीं , जिन्हें वे प्रात: व सांयकाल किया करते थे । वे स्वयं और उनके मित्र आस -पास के लड़कों को नि:शुल्क दिया करते थे , जिसमे नैतिक शिक्षा प्रमुख थी , भाषणों व नाटकों से वे समाज - सुधार व आध्यात्मिकता का प्रचार करते थे |
एक लेखक ने लिखा है ----- " इस समय 40 वर्ष की आयु में वे बहुत स्वस्थ हैं , उनके कई बच्चे हैं । उनका चेहरा इतना प्रसन्नतापूर्ण है कि मुस्कराहट और तेज उनके चारों ओर छाया रहता है | उन्होंने अपने जीवन को इतना सफलतापूर्ण बनाया है कि प्रत्येक आदमी उनकी आज्ञा को मानता हुआ दीख पड़ता है । उनकी शान्ति , स्वास्थ्य और कलह के अभाव को देखकर यही प्रतीत होता है कि ये बातें उन्हें परमात्मा से प्राप्त हुई हैं । "
इस तथ्य को समझाने के लिए एक लेखक ने लिखा है ----- " देश के युवा और वृद्ध पुरुषों से में यही कहूँगा कि यदि आप भी केशवचंद्र सेन की भांति सुख - शान्ति प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको उनकी तरह सदाचारी भी बनना पड़ेगा । विनय और प्रसन्नता सदाचारियों को ही प्राप्त होती है । जो आदमी सर्वदा अपने अंत:करण की रक्षा करता है , परमात्मा उसी की सहायता करता है ।"
श्री केशवचंद्र सेन ( जन्म 19 नवम्बर 1838 ) के बाल्य - मित्र और बंगाल के प्रसिद्ध नेता श्री प्रतापचन्द्र मजूमदार ने उनका चरित्र - चित्रण करते हुए लिखा है --- " उन दिनों बंगाली लड़कों का जीवन प्राय: दुराचार से परिपूर्ण था । पर केशव बाबू इससे बिलकुल बचे हुए थे । बुरे लड़कों की संगत को वे घ्रणा की द्रष्टि से देखते थे । "
वे ब्रह्मचर्यं के आदर्श पर विश्वास रखते थे कि शास्त्रीय आदेशानुसार यदि 24 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्यं का पालन किया जाये तो उससे जीवन के विकास और विद्दा - बुद्धि की उन्नति में महत्वपूर्ण लाभ मिलेगा |
उस समय की परम्परा के अनुसार 18 वर्ष की आयु में इनका विवाह एक 10 वर्ष की लड़की के साथ कर दिया गया । इससे उन्हें बड़ा क्षोभ हुआ ।
उस समय पूर्ण युवावस्था होने पर भी उन्होंने विवाह के बाद कई वर्षों तक ब्रह्मचर्यं का कठोर तपस्वी जीवन व्यतीत किया | इन दिनों वे गंभीर रहते थे , उन्होंने कुछ धार्मिक प्रार्थना बना ली थीं , जिन्हें वे प्रात: व सांयकाल किया करते थे । वे स्वयं और उनके मित्र आस -पास के लड़कों को नि:शुल्क दिया करते थे , जिसमे नैतिक शिक्षा प्रमुख थी , भाषणों व नाटकों से वे समाज - सुधार व आध्यात्मिकता का प्रचार करते थे |
एक लेखक ने लिखा है ----- " इस समय 40 वर्ष की आयु में वे बहुत स्वस्थ हैं , उनके कई बच्चे हैं । उनका चेहरा इतना प्रसन्नतापूर्ण है कि मुस्कराहट और तेज उनके चारों ओर छाया रहता है | उन्होंने अपने जीवन को इतना सफलतापूर्ण बनाया है कि प्रत्येक आदमी उनकी आज्ञा को मानता हुआ दीख पड़ता है । उनकी शान्ति , स्वास्थ्य और कलह के अभाव को देखकर यही प्रतीत होता है कि ये बातें उन्हें परमात्मा से प्राप्त हुई हैं । "
22 December 2015
स्वाधीनता के मन्त्र - द्रष्टा ------ दादाभाई नौरोजी
दादाभाई का जन्म 4 सितम्बर 1825 को एक निर्धन परिवार में हुआ था । बड़े परिश्रम और कठिनाई से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी । उनका कहना था कि जिस राष्ट्र और समाज ने हमें जन्म और जीवन दिया है , उस पर हमारा अधिकार न होकर समाज और देश का ही अधिकार है । मेरा तन , मन , धन जो कुछ भी मेरे पास है उस सबका उपयोग जन हित में करना ही मेरा कर्तव्य है ।
यह एक ज्वलंत सत्य है कि दादाभाई ने अपने लिए न तो कभी कुछ चाहा और न कभी कुछ किया , उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भी किया वह सब जनता और देश की भलाई के लिए किया । उनकी इस उन्नत और उदात्त परमार्थ भावना ने , उन्हें जिस प्रतिष्ठा पर पहुँचा दिया उसे जानकर विश्वास करना पड़ता है कि निष्काम कर्म , योग्य कर्तव्य और निर्लोभ सेवाओं का परिपाक उच्चतम स्वर्गीय सफलताओं के रूप में ही होता है ।
उन्हें प्रथम भारतीय प्राध्यापक होने का गौरव प्राप्त हुआ ।
वे ही प्रथम भारतीय हैं , जिन्हें सर्वप्रथम भारतीय जनता के सामाजिक , बौद्धिक और राजनीतिक विकास के लिए अनेक संस्थाएं स्थापित करने का श्रेय प्राप्त हुआ ।
वे ही सर्वप्रथम भारतीय हैं जिन्हें ब्रिटिश संसद का सदस्य होने का सम्मान प्राप्त हुआ ।
वे उस शाही कमीशन के भारतीय सदस्य नियुक्त हुए जिसे भारत को आर्थिक न्याय दिलाने के मंतव्य ने गठ्त्त किया गया था ।
वे ही सबसे पहले भारतीय हैं , जो भारत के लिए स्वशासन की मांग कर भारतीय स्वाधीनता के पितामह कहकर प्रतिष्ठित किये गये ।
यह एक ज्वलंत सत्य है कि दादाभाई ने अपने लिए न तो कभी कुछ चाहा और न कभी कुछ किया , उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भी किया वह सब जनता और देश की भलाई के लिए किया । उनकी इस उन्नत और उदात्त परमार्थ भावना ने , उन्हें जिस प्रतिष्ठा पर पहुँचा दिया उसे जानकर विश्वास करना पड़ता है कि निष्काम कर्म , योग्य कर्तव्य और निर्लोभ सेवाओं का परिपाक उच्चतम स्वर्गीय सफलताओं के रूप में ही होता है ।
उन्हें प्रथम भारतीय प्राध्यापक होने का गौरव प्राप्त हुआ ।
वे ही प्रथम भारतीय हैं , जिन्हें सर्वप्रथम भारतीय जनता के सामाजिक , बौद्धिक और राजनीतिक विकास के लिए अनेक संस्थाएं स्थापित करने का श्रेय प्राप्त हुआ ।
वे ही सर्वप्रथम भारतीय हैं जिन्हें ब्रिटिश संसद का सदस्य होने का सम्मान प्राप्त हुआ ।
वे उस शाही कमीशन के भारतीय सदस्य नियुक्त हुए जिसे भारत को आर्थिक न्याय दिलाने के मंतव्य ने गठ्त्त किया गया था ।
वे ही सबसे पहले भारतीय हैं , जो भारत के लिए स्वशासन की मांग कर भारतीय स्वाधीनता के पितामह कहकर प्रतिष्ठित किये गये ।
21 December 2015
स्वतंत्रता , स्वाभिमान और संस्कृति के रक्षक ----------- महाराजा छत्रसाल
' शिवा को सराहौं के सराहौं छत्रसाल को । '
इतिहासकारों द्वारा वीर छत्रसाल बुन्देलखण्ड के शिवाजी कहे जाते थे ।
वीर छत्रसाल तब किशोर थे और बगीचे में देवी पूजा के लिए फूल चुन रहे थे । एक घुड़सवार ने बगीचे के पास रूककर पूछा ----- " तुम लोग जिस देवी की पूजा करते हो उस देवी का मंदिर कहाँ है ? "
किशोर छत्रसाल ने कहा --- " क्या आप भी माँ की पूजा करने आये हो , जरा ठहरो , में फूल चुन लूँ फिर हम साथ - साथ चलते हैं । "
घुड़सवार ने अहंकार पूर्वक कहा ---- " हमारे पास समय नहीं है और हमें पूजा से कोई भी मतलब नहीं है । हम तो सल्तनत के आदमी हैं , हमें वह मंदिर तोड़ना है । "
वीर छत्रसाल की भवें तन गईं, उन्होंने घुड़सवार से कहा ---- " जरा तमीज से बात करो सरदार । देवी माँ के लिए ऐसी बात मुँह से निकाली तो जबान खींच लूँगा । "
घुड़सवार को युवक से ऐसे उत्तर की आशा नहीं थी , उनका ऐसा उत्तर उस अहंकारी को सहन नहीं हो रहा था । वह घोड़े से उतर कर उन्हें मारने के उद्देश्य से उनके पास आ ही रहस था कि वीर छत्रसाल ने अपनी कमर से तलवार निकाल ली और उस सरदार की छाती में घोंप दी , वह सरदार वहीँ ढेर हो गया । तब तक उनके और साथी आ गये , उन्होंने युद्ध कर शत्रु पर काबू पा लिया l किशोर वय में ही अपनी संस्कृति के प्रति इतना भक्तिभाव रखने वाले थे --- वीर छत्रसाल ।
इतिहासकारों द्वारा वीर छत्रसाल बुन्देलखण्ड के शिवाजी कहे जाते थे ।
वीर छत्रसाल तब किशोर थे और बगीचे में देवी पूजा के लिए फूल चुन रहे थे । एक घुड़सवार ने बगीचे के पास रूककर पूछा ----- " तुम लोग जिस देवी की पूजा करते हो उस देवी का मंदिर कहाँ है ? "
किशोर छत्रसाल ने कहा --- " क्या आप भी माँ की पूजा करने आये हो , जरा ठहरो , में फूल चुन लूँ फिर हम साथ - साथ चलते हैं । "
घुड़सवार ने अहंकार पूर्वक कहा ---- " हमारे पास समय नहीं है और हमें पूजा से कोई भी मतलब नहीं है । हम तो सल्तनत के आदमी हैं , हमें वह मंदिर तोड़ना है । "
वीर छत्रसाल की भवें तन गईं, उन्होंने घुड़सवार से कहा ---- " जरा तमीज से बात करो सरदार । देवी माँ के लिए ऐसी बात मुँह से निकाली तो जबान खींच लूँगा । "
घुड़सवार को युवक से ऐसे उत्तर की आशा नहीं थी , उनका ऐसा उत्तर उस अहंकारी को सहन नहीं हो रहा था । वह घोड़े से उतर कर उन्हें मारने के उद्देश्य से उनके पास आ ही रहस था कि वीर छत्रसाल ने अपनी कमर से तलवार निकाल ली और उस सरदार की छाती में घोंप दी , वह सरदार वहीँ ढेर हो गया । तब तक उनके और साथी आ गये , उन्होंने युद्ध कर शत्रु पर काबू पा लिया l किशोर वय में ही अपनी संस्कृति के प्रति इतना भक्तिभाव रखने वाले थे --- वीर छत्रसाल ।
20 December 2015
सेवा एवं मानवता की मूर्ति -------- महामना मालवीयजी
' उनके धर्म का ध्येय मोक्ष अथवा निर्वाण न होकर मानवता की सेवा मात्र था , जिसको वे जीवन भर सच्चाई के साथ निभाते हुए एक दिन उसी मार्ग पर चलते - चलते परम तत्व में विलीन हो गये | '
मालवीयजी नेताओं के विषमतापूर्ण व्यवहार पर आँसू बहाते हुए कहा करते थे ------- " यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि देश के नेता जनता से दूर सजे हुए बंगलों और वातानुकूल कोठियों में बैठकर उसकी गरीबी पर विचार - विमर्श करते हैं , सोफों पर पड़े - पड़े उसका उपाय सोचा करते हैं । अपने चांदी जैसे चमकते कपड़ों को गरीबों के स्पर्श से बचाते हैं और अपने कमरों में बिछी कालीनो को किसी आगन्तुक गरीब के पैरों से मैला होने देने में संकोच करते हैं । यह कैसा नेतृत्व है , यह कैसी हिमायत है ? जिसने गरीबों का अभिशाप नहीं देखा , उनकी आहों - कराहों को नहीं सुना , वह भला गरीब जनता का नेता कैसे हो सकता है ------------ मैं भगवान से नित्य यही प्रार्थना करता हूँ कि देश को ऐसे नायक दे जो समाज की आवश्यकता , उसकी पीड़ा और परेशानी को ठीक - ठीक अनुभूत कर सकें । "
मालवीयजी नेताओं के विषमतापूर्ण व्यवहार पर आँसू बहाते हुए कहा करते थे ------- " यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि देश के नेता जनता से दूर सजे हुए बंगलों और वातानुकूल कोठियों में बैठकर उसकी गरीबी पर विचार - विमर्श करते हैं , सोफों पर पड़े - पड़े उसका उपाय सोचा करते हैं । अपने चांदी जैसे चमकते कपड़ों को गरीबों के स्पर्श से बचाते हैं और अपने कमरों में बिछी कालीनो को किसी आगन्तुक गरीब के पैरों से मैला होने देने में संकोच करते हैं । यह कैसा नेतृत्व है , यह कैसी हिमायत है ? जिसने गरीबों का अभिशाप नहीं देखा , उनकी आहों - कराहों को नहीं सुना , वह भला गरीब जनता का नेता कैसे हो सकता है ------------ मैं भगवान से नित्य यही प्रार्थना करता हूँ कि देश को ऐसे नायक दे जो समाज की आवश्यकता , उसकी पीड़ा और परेशानी को ठीक - ठीक अनुभूत कर सकें । "
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