' मनुष्य चाहे छोटे - से - छोटे काम में हाथ डाले , पर यदि वह उसे सच्चाई , ईमानदारी और नि:स्वार्थ भाव से पूरा कर दिखाता है , तो वह अवश्य लोगों की प्रशंसा और सम्मान का अधिकारी बन सकेगा इसके विपरीत जो केवल दिखावटी , चालाकी और धूर्तता के आधार आगे बढ़ने की चेष्टा करेगा और भीतर स्वार्थ की भावना रख कर ऊपर से नि:स्वार्थता का ढोंग करेगा , वह अगर लोगों के भ्रम में पड़ जाने से ' आदरणीय ' बन भी जाये , तो उसकी यह सफलता क्षणिक होगी । '
3 July 2016
2 July 2016
दृढ़ निश्चयी , ईमानदार और अहंकार शून्य व्यक्ति -------- महापुरुष लेनिन
' किसी भी देश के स्वाधीनता आन्दोलन में उचित मार्ग चुनने का बड़ा महत्व है । यदि ऐसा न किया जाये तो प्रकट में बड़ा परिश्रम , त्याग , कष्ट सहन करते हुए भी हम अपनी शक्ति को बर्बाद करते रहते हैं और प्रगति के मार्ग पर बहुत कम अग्रसर हो पाते हैं । '
लेनिन के समान व्यक्ति समस्त राष्ट्र में बहुत कम ही होते हैं जो समय की गति को बिलकुल ठीक समझ सकते हैं और अनुकूल विधान बना सकते हैं ।
रुसी क्रान्ति को लेनिन ने किस प्रकार अपना सर्वस्व होम करके खड़ा किया और कार्यरूप में परिणित हो जाने पर किस प्रकार प्राणों की बाजी लगाकर उसकी रक्षा की ------ यह रुसी इतिहास की अमर गाथा है । लेनिन ( जन्म 1870 ) ने जब से होश संभाला निरंतर जनता के अधिकारों और गरीबों के उद्धार की लगन उन्हें लगी रही । लेनिन का बड़ा भाई अलेक्जैन्डर भी क्रान्तिकारी था और विद्दार्थी अवस्था में ही उसने कार्ल मार्क्स की एक पुस्तक का रुसी भाषा में अनुवाद किया था ।
1887 में उसने जार की हत्या के षडयंत्र में प्रमुख भाग लिया । पकड़े जाने पर उसने अदालत के सामने कहा --- " रूस के वर्तमान निरंकुशतापूर्ण शासन में गुप्त हत्याओं के सिवाय और किसी उपाय से राजनीतिक सुधार नहीं हो सकता है । मुझे मृत्यु का डर नहीं है । मेरे बाद अवश्य ही अन्य लोग आगे बढ़ेंगे और एक दिन जारशाही को जड़मूल से उखाड़ कर फेंक देंगे ।
उस समय अलेक्जैन्डर को इस बात की कल्पना भी न थी कि उसका छोटा भाई ही उसकी इस मनोकामना को पूरा करेगा । अपने भाई का इस प्रकार असामयिक अंत होने से लेनिन के ह्रदय को तीव्र धक्का लगा और वह सदा के लिए जारशाही का दुश्मन बन गया ।
पर साथ ही लेनिन ने यह अनुभव किया कि यह षडयंत्र और गुप्त हत्याओं का मार्ग सही नहीं है । उस अवसर पर उसके मुंह से निकला ---- " नहीं , यह रास्ता ठीक नहीं है , हम इस पर चलकर सफलता नहीं पा सकते । " उसी समय से वह उस नवीन पथ का पथिक बन गया जो उसकी समझ में रूस को जार की निरंकुश सत्ता से मुक्त कराने के लिए कारगर था ।
लेनिन का विश्वास था कईयदि वह सच्चाई के साथ कर्तव्य मार्ग पर डटा रहेगा तो अंतिम विजय उसी की होगी । वह अपने साथियों को भी उत्साहित किया करता था ---- " निराश मत हो । यह अंधकार अवश्य दूर होगा । । "
लेनिन यश और सम्मान की लालसा से बहुत ऊँचा उठा हुआ था , वह एक अँधेरी कोठरी में बैठकर गुप्त रूप से अपना काम किया करता था ।
लेनिन के समान व्यक्ति समस्त राष्ट्र में बहुत कम ही होते हैं जो समय की गति को बिलकुल ठीक समझ सकते हैं और अनुकूल विधान बना सकते हैं ।
रुसी क्रान्ति को लेनिन ने किस प्रकार अपना सर्वस्व होम करके खड़ा किया और कार्यरूप में परिणित हो जाने पर किस प्रकार प्राणों की बाजी लगाकर उसकी रक्षा की ------ यह रुसी इतिहास की अमर गाथा है । लेनिन ( जन्म 1870 ) ने जब से होश संभाला निरंतर जनता के अधिकारों और गरीबों के उद्धार की लगन उन्हें लगी रही । लेनिन का बड़ा भाई अलेक्जैन्डर भी क्रान्तिकारी था और विद्दार्थी अवस्था में ही उसने कार्ल मार्क्स की एक पुस्तक का रुसी भाषा में अनुवाद किया था ।
1887 में उसने जार की हत्या के षडयंत्र में प्रमुख भाग लिया । पकड़े जाने पर उसने अदालत के सामने कहा --- " रूस के वर्तमान निरंकुशतापूर्ण शासन में गुप्त हत्याओं के सिवाय और किसी उपाय से राजनीतिक सुधार नहीं हो सकता है । मुझे मृत्यु का डर नहीं है । मेरे बाद अवश्य ही अन्य लोग आगे बढ़ेंगे और एक दिन जारशाही को जड़मूल से उखाड़ कर फेंक देंगे ।
उस समय अलेक्जैन्डर को इस बात की कल्पना भी न थी कि उसका छोटा भाई ही उसकी इस मनोकामना को पूरा करेगा । अपने भाई का इस प्रकार असामयिक अंत होने से लेनिन के ह्रदय को तीव्र धक्का लगा और वह सदा के लिए जारशाही का दुश्मन बन गया ।
पर साथ ही लेनिन ने यह अनुभव किया कि यह षडयंत्र और गुप्त हत्याओं का मार्ग सही नहीं है । उस अवसर पर उसके मुंह से निकला ---- " नहीं , यह रास्ता ठीक नहीं है , हम इस पर चलकर सफलता नहीं पा सकते । " उसी समय से वह उस नवीन पथ का पथिक बन गया जो उसकी समझ में रूस को जार की निरंकुश सत्ता से मुक्त कराने के लिए कारगर था ।
लेनिन का विश्वास था कईयदि वह सच्चाई के साथ कर्तव्य मार्ग पर डटा रहेगा तो अंतिम विजय उसी की होगी । वह अपने साथियों को भी उत्साहित किया करता था ---- " निराश मत हो । यह अंधकार अवश्य दूर होगा । । "
लेनिन यश और सम्मान की लालसा से बहुत ऊँचा उठा हुआ था , वह एक अँधेरी कोठरी में बैठकर गुप्त रूप से अपना काम किया करता था ।
1 July 2016
समय का सदुपयोग किया ------ महापुरुष लेनिन
' मनस्वी और कर्मठ व्यक्ति किसी भी दशा में क्यों न रहें , वह समाज सेवा का कोई न कोई कार्य कर ही सकते हैं l '
लेनिन को साइबेरिया में तीन वर्ष के लिए निर्वासन का दंड दिया गया l उच्च न्यायालय के जजों ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे असाधारण विचार वाले व्यक्तियों का जनता के बीच रहना अवांछनीय है , उनके लिए उपयुक्त निवास स्थान साइबेरिया का बर्फिस्तान है । इस आदेश के अनुसार लेनिन को शुसेनिस्क नामक गाँव में जाकर नजरबंदी का जीवन बिताना पड़ा । साइबेरिया उस ज़माने में रूस का ' काला पानी ' समझा जाता था ।
जारशाही का विरोध करने वाले राजनीतिक कैदियों को वहीँ सजा भोगने के लिए भेजा जाता था ।
' शुसेनिस्क ' के छोटे से घर में लेनिन नजरबंदी का जीवन व्यतीत करने पहुँचा । वहां ठण्ड इतनी अधिक पड़ती थी की रात के समय खून जम सा जाता था । रास्ते सुनसान पड़े रहते थे । ऐसे एकांत स्थान में जहाँ बात करने को , सुख - दुःख का हाल पूछने को एक भी प्राणी न हो , एक शिक्षित और सभ्यता की गोद में पले व्यक्ति का जीवन असहनीय हो जाता था । अनेक राजनीतिक कैदी वहां के कष्टों में मर -खप जाते थे ।
लेकिन लेनिन के दिमाग में इतने अधिक विचार थे और अध्ययन की प्रबल आकांक्षा थी कि उसने अपना तमाम वक्त इसी में खर्च किया । उसने वहां रहते हुए दो पुस्तकें लिखीं जो आगे चलकर श्रमजीवी आन्दोलन के कार्यकर्ताओं के लिए बड़ी प्रेरणादायक सिद्ध हुईं । वह यहाँ रहकर भी रूस के श्रमजीवी आन्दोलन और राजनीतिक परिवर्तनों का पता रखता था और गुप्त रूप से अपनी कमेटी वालों को हिदायतें देकर आन्दोलन को जीवित रखे हुए था । इसी का परिणाम था कि जब तीन वर्ष बाद वह निर्वासन से लौटे तो उन्हें फिर से कार्य आरम्भ करने में अधिक समय बर्बाद नहीं करना पड़ा । यहीं पर रहकर उन्होंने रूस के श्रमजीवी आन्दोलन को ठीक से चलाने के लिए एक नियमित अखबार निकालने की योजना भी बनाई ।
लेनिन ने जो कानून का अध्ययन किया था वह ' शुसेनिस्क ' में काम आया । वह फुर्सत के समय वहां के किसान , मजदूरों आदि से मिलकर उन्हें मुकदमों तथा अन्य शिकायतों के संबंध में सलाह दिया करते थे । इससे वह लोगों में 'वकील ' के नाम से मशहूर हो गये । इससे अनेक लोगों का बड़ा उपकार हो जाता था और वे सरकारी कर्मचारियों के अन्याय से बच जाते थे ।
लेनिन लन्दन के हाइगेट कब्रिस्तान में कार्ल मार्क्स की कब्र के पास घंटों बैठकर जार शाही का तख्ता पलटने और असीम शक्तिशाली बोलशेविक दल का स्वप्न देखा करता था | अपनी कर्मठता , मनोयोग और नि:स्वार्थभाव से जन - कल्याण के लिए कर्तव्यपालन कर उस स्वप्न को साकार किया । प्रसिद्ध मानवतावादी विचारक रोमारोलां ने लिखा है ----- " लेनिन वर्तमान शताब्दी का सबसे बड़ा कर्मठ और स्वार्थ त्यागी व्यक्ति था । उसने आजीवन घोर परिश्रम किया पर अपने लिए कभी किसी प्रकार के लाभ की इच्छा नहीं की । "
लेनिन को साइबेरिया में तीन वर्ष के लिए निर्वासन का दंड दिया गया l उच्च न्यायालय के जजों ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे असाधारण विचार वाले व्यक्तियों का जनता के बीच रहना अवांछनीय है , उनके लिए उपयुक्त निवास स्थान साइबेरिया का बर्फिस्तान है । इस आदेश के अनुसार लेनिन को शुसेनिस्क नामक गाँव में जाकर नजरबंदी का जीवन बिताना पड़ा । साइबेरिया उस ज़माने में रूस का ' काला पानी ' समझा जाता था ।
जारशाही का विरोध करने वाले राजनीतिक कैदियों को वहीँ सजा भोगने के लिए भेजा जाता था ।
' शुसेनिस्क ' के छोटे से घर में लेनिन नजरबंदी का जीवन व्यतीत करने पहुँचा । वहां ठण्ड इतनी अधिक पड़ती थी की रात के समय खून जम सा जाता था । रास्ते सुनसान पड़े रहते थे । ऐसे एकांत स्थान में जहाँ बात करने को , सुख - दुःख का हाल पूछने को एक भी प्राणी न हो , एक शिक्षित और सभ्यता की गोद में पले व्यक्ति का जीवन असहनीय हो जाता था । अनेक राजनीतिक कैदी वहां के कष्टों में मर -खप जाते थे ।
लेकिन लेनिन के दिमाग में इतने अधिक विचार थे और अध्ययन की प्रबल आकांक्षा थी कि उसने अपना तमाम वक्त इसी में खर्च किया । उसने वहां रहते हुए दो पुस्तकें लिखीं जो आगे चलकर श्रमजीवी आन्दोलन के कार्यकर्ताओं के लिए बड़ी प्रेरणादायक सिद्ध हुईं । वह यहाँ रहकर भी रूस के श्रमजीवी आन्दोलन और राजनीतिक परिवर्तनों का पता रखता था और गुप्त रूप से अपनी कमेटी वालों को हिदायतें देकर आन्दोलन को जीवित रखे हुए था । इसी का परिणाम था कि जब तीन वर्ष बाद वह निर्वासन से लौटे तो उन्हें फिर से कार्य आरम्भ करने में अधिक समय बर्बाद नहीं करना पड़ा । यहीं पर रहकर उन्होंने रूस के श्रमजीवी आन्दोलन को ठीक से चलाने के लिए एक नियमित अखबार निकालने की योजना भी बनाई ।
लेनिन ने जो कानून का अध्ययन किया था वह ' शुसेनिस्क ' में काम आया । वह फुर्सत के समय वहां के किसान , मजदूरों आदि से मिलकर उन्हें मुकदमों तथा अन्य शिकायतों के संबंध में सलाह दिया करते थे । इससे वह लोगों में 'वकील ' के नाम से मशहूर हो गये । इससे अनेक लोगों का बड़ा उपकार हो जाता था और वे सरकारी कर्मचारियों के अन्याय से बच जाते थे ।
लेनिन लन्दन के हाइगेट कब्रिस्तान में कार्ल मार्क्स की कब्र के पास घंटों बैठकर जार शाही का तख्ता पलटने और असीम शक्तिशाली बोलशेविक दल का स्वप्न देखा करता था | अपनी कर्मठता , मनोयोग और नि:स्वार्थभाव से जन - कल्याण के लिए कर्तव्यपालन कर उस स्वप्न को साकार किया । प्रसिद्ध मानवतावादी विचारक रोमारोलां ने लिखा है ----- " लेनिन वर्तमान शताब्दी का सबसे बड़ा कर्मठ और स्वार्थ त्यागी व्यक्ति था । उसने आजीवन घोर परिश्रम किया पर अपने लिए कभी किसी प्रकार के लाभ की इच्छा नहीं की । "
30 June 2016
सेवा - धर्म की महत्ता ---- पीड़ित मानवता की सेविका ------ फ्लोरेंस नाइटिंगेल
फ्लोरेंस नाइटिंगेल ( 1820 - 1910 ) का जन्म इंग्लैंड के एक धनी परिवार में हुआ था । वह सदैव यही सोचती थीं कि इस प्रकार खाने - पीने और सुख पूर्वक समय व्यतीत कर देने में जीवन की सार्थकता नहीं है । अच्छा भोजन , वस्त्र - मकान आदि तो भले - बुरे , सज्जन - दुष्ट , परिश्रमी , आलसी सभी को मिल सकता है पर यदि हमारा जीवन उपयोगी सिद्ध नहीं होता , हम भगवान की स्रष्टि को अधिक उत्तम , रहने योग्य बनाने में कुछ योगदान नहीं करते तो वह जीवन ' सार्थक ' नहीं कहा जा सकता ।
नाइटिंगेल ने नर्स के पेशे में पदार्पण करने का निश्चय किया । सामान्य विद्दा - बुद्धि की और अनेक बंधनों में जकड़ी हुई स्त्री होने पर भी केवल सेवा - धर्म का पालन करके इतनी उच्च पदवी प्राप्त कर ली थी कि संसार के सबसे बड़े साम्राज्य की आदर्श माने जाने वाली अधीश्वरी विक्टोरिया तथा उनकी पुत्री --- जो जर्मनी के कैसर की पुत्रवधू थीं ----- उनसे मित्रवत व्यवहार करती थीं और अनेक सम्राट तथा सेनाध्यक्ष भी उन्हें बड़ी शिष्टता और विनय पूर्वक पत्र लिखते थे ।
यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है और जो लोग समझते हैं कि संसार में किसी बड़ी सत्ता या बड़ी धनराशि का स्वामी होने पर ही मनुष्य उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर सकता है , उनकी आँख खोलने वाला है ।
धन और सत्ता का महत्व अवश्य है पर तभी जब उसे सच्चाई और सदाचार के साथ प्राप्त किया जाये , अन्यथा एक डाकू के पास और गलत रास्ते से कमाने वालों के पास असीमित धन होता है , पर किसी की प्रशंसा सभ्य समाज में नहीं सुनी गई ।
नाइटिंगेल ने नर्स के पेशे में पदार्पण करने का निश्चय किया । सामान्य विद्दा - बुद्धि की और अनेक बंधनों में जकड़ी हुई स्त्री होने पर भी केवल सेवा - धर्म का पालन करके इतनी उच्च पदवी प्राप्त कर ली थी कि संसार के सबसे बड़े साम्राज्य की आदर्श माने जाने वाली अधीश्वरी विक्टोरिया तथा उनकी पुत्री --- जो जर्मनी के कैसर की पुत्रवधू थीं ----- उनसे मित्रवत व्यवहार करती थीं और अनेक सम्राट तथा सेनाध्यक्ष भी उन्हें बड़ी शिष्टता और विनय पूर्वक पत्र लिखते थे ।
यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है और जो लोग समझते हैं कि संसार में किसी बड़ी सत्ता या बड़ी धनराशि का स्वामी होने पर ही मनुष्य उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर सकता है , उनकी आँख खोलने वाला है ।
धन और सत्ता का महत्व अवश्य है पर तभी जब उसे सच्चाई और सदाचार के साथ प्राप्त किया जाये , अन्यथा एक डाकू के पास और गलत रास्ते से कमाने वालों के पास असीमित धन होता है , पर किसी की प्रशंसा सभ्य समाज में नहीं सुनी गई ।
29 June 2016
आत्म विश्वास के धनी -------- डॉ . राजेन्द्र प्रसाद
' मनोयोग और श्रमशीलता के बल पर अर्जित आत्मविश्वास की नींव पर खड़ा उनका व्यक्तित्व महानता के मार्ग पर लोगों को प्रेरित करता है । '
बात उन दिनों की है जब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद विद्दालय में पढ़ते थे । उस दिन परीक्षा फल घोषित होना था । सभी छात्र अधीर थे । परीक्षा फल घोषित हो गया तो एक छात्र ने उठकर पूछा ---- साहब , मेरा नाम क्यों नहीं आया ?
अध्यापक ने कहा ---- " नाम नहीं आया तो स्पष्ट है कि तुम अनुतीर्ण हो गये हो । "
छात्र ने कहा --- " नहीं , ऐसा नहीं हो सकता । "
शिक्षक ने सह्रदयता से कहा ---- " ऐसा क्यों नहीं हो सकता । में जनता हूँ तुम परिश्रमी और अध्ययनशील हो परन्तु इस वर्ष परीक्षा के पूर्व ही तुम्हारे स्वास्थ्य का बिगड़ना तुम्हारे परीक्षा फल के लिए घातक सिद्ध हुआ । "
विद्दार्थी ने बड़े आत्मविश्वास से कहा ---- " भले ही मेरा स्वास्थ्य ख़राब हो गया हो , परन्तु मैं मेहनत से पढ़ा हूँ और फेल नहीं हो सकता । "
अध्यापक समझे लड़का जिद कर रहा है , अत: कठोरता से कहा ----- " बैठ जाओ । "
" नहीं बैठूँगा । मेरे परीक्षा फल की पुन: जाँच होनी चाहिए । "
शिक्षक महोदय को गुस्सा आ गया , उन्होंने कहा ----- बैठते हो या नहीं , अन्यथा तुम्हे दण्डित किया जायेगा । "
" भले ही दण्डित किया जाये , परन्तु मेरा विश्वास है कि मैं फेल नहीं हुआ हूँ । परीक्षा का नक्शा मेरी आँखों के सामने है और मुझे अपने उत्तरों पर पूरा विश्वास है । "
आचार्य ने पांच रूपये जुर्माना कर दिया , फिर भी छात्र नहीं माना । जुर्माना पचास रूपये तक बढ़ गया लेकिन छात्र टस से मस नहीं हुआ ।
बात प्राचार्य तक पहुंची । उन्होंने सोचा क्यों अपनी जिद पर अड़े रहा जाये , संभव है कार्यालय से भूल हो गई हो । अन्यथा इतने आत्मविश्वास के साथ कौन अपनी बात पर अड़ा रहेगा ।
परीक्षा फल की पुन: जाँच की गई , पता चला कि उस लिपिक की भूल से ही उस छात्र का नाम उत्तीर्ण छात्रों की सूची में चढ़ने से रह गया है । --भूल सुधार किया गया --- वह छात्र सबसे अधिक अंकों से उत्तीर्ण हुआ । ---- यह छात्र थे ---- भारत के प्रथम राष्ट्रपति ---- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
बात उन दिनों की है जब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद विद्दालय में पढ़ते थे । उस दिन परीक्षा फल घोषित होना था । सभी छात्र अधीर थे । परीक्षा फल घोषित हो गया तो एक छात्र ने उठकर पूछा ---- साहब , मेरा नाम क्यों नहीं आया ?
अध्यापक ने कहा ---- " नाम नहीं आया तो स्पष्ट है कि तुम अनुतीर्ण हो गये हो । "
छात्र ने कहा --- " नहीं , ऐसा नहीं हो सकता । "
शिक्षक ने सह्रदयता से कहा ---- " ऐसा क्यों नहीं हो सकता । में जनता हूँ तुम परिश्रमी और अध्ययनशील हो परन्तु इस वर्ष परीक्षा के पूर्व ही तुम्हारे स्वास्थ्य का बिगड़ना तुम्हारे परीक्षा फल के लिए घातक सिद्ध हुआ । "
विद्दार्थी ने बड़े आत्मविश्वास से कहा ---- " भले ही मेरा स्वास्थ्य ख़राब हो गया हो , परन्तु मैं मेहनत से पढ़ा हूँ और फेल नहीं हो सकता । "
अध्यापक समझे लड़का जिद कर रहा है , अत: कठोरता से कहा ----- " बैठ जाओ । "
" नहीं बैठूँगा । मेरे परीक्षा फल की पुन: जाँच होनी चाहिए । "
शिक्षक महोदय को गुस्सा आ गया , उन्होंने कहा ----- बैठते हो या नहीं , अन्यथा तुम्हे दण्डित किया जायेगा । "
" भले ही दण्डित किया जाये , परन्तु मेरा विश्वास है कि मैं फेल नहीं हुआ हूँ । परीक्षा का नक्शा मेरी आँखों के सामने है और मुझे अपने उत्तरों पर पूरा विश्वास है । "
आचार्य ने पांच रूपये जुर्माना कर दिया , फिर भी छात्र नहीं माना । जुर्माना पचास रूपये तक बढ़ गया लेकिन छात्र टस से मस नहीं हुआ ।
बात प्राचार्य तक पहुंची । उन्होंने सोचा क्यों अपनी जिद पर अड़े रहा जाये , संभव है कार्यालय से भूल हो गई हो । अन्यथा इतने आत्मविश्वास के साथ कौन अपनी बात पर अड़ा रहेगा ।
परीक्षा फल की पुन: जाँच की गई , पता चला कि उस लिपिक की भूल से ही उस छात्र का नाम उत्तीर्ण छात्रों की सूची में चढ़ने से रह गया है । --भूल सुधार किया गया --- वह छात्र सबसे अधिक अंकों से उत्तीर्ण हुआ । ---- यह छात्र थे ---- भारत के प्रथम राष्ट्रपति ---- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
28 June 2016
राष्ट्र धर्म का प्रचारक -------- मेजिनी
' इटली का जोजेफ मेजिनी ' राष्ट्र - धर्म ' का दृढ़ अनुयायी था ---- जब किसी देश पर शत्रु का आक्रमण हो तो , वहां के प्रत्येक निवासी का यह धर्म हो जाता है कि वह मातृभूमि को अत्याचारियों के पंजे से छुड़ाने का प्रयत्न करे । यदि वह अपने निर्दोष देशभाइयों पर अत्याचार होते देखता रहता है और केवल एकान्त में बैठकर पूजा - पाठ करके ही अपने धार्मिक कर्तव्य की पूर्ति समझ लेता है तो वह वास्तव में भ्रम में है । '
देश को पराधीनता के अभिशाप से मुक्त करने के लिए मेजिनी ने ' युवा इटली ' नाम की एक संस्था की स्थापना की । ' युवा इटली ' के उद्देश्यों में एक महत्वपूर्ण बात यह रखी कि ---- ऊँचे आदर्शों और कर्तव्य का प्रभाव तो शिक्षित और मध्यम श्रेणी के व्यक्तियों पर पढ़ सकता है |
परन्तु देश के अशिक्षित और साधारण श्रेणी के व्यक्तियों की समझ में ये बातें नहीं आ सकतीं ।
यह तो स्पष्ट है कि जब तक साधारण जनता में जाग्रति न हो जाये और वह स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग न लेने लगे तब तक सफलता की आशा नहीं करनी चाहिए । इसलिए हमको अपने प्रचार में विशेष ध्यान गरीबों , दुःखियों और समाज के पैरों तले रौंदे जाने वाले लोगों की तरफ देना चाहिए । हम जिस प्रजातंत्र शासन का स्वप्न देख रहे हैं उसमे सब व्यक्ति समान भाव से एक दूसरे के हित का ध्यान रखकर ही व्यवहार करेंगे और न दूसरों के कल्याण के लिए अपने सुख और विलास को त्याग करने की भावना रखेंगे । समाज के सब अंगों के सुखी होने पर ही सम्पूर्ण मानव - समाज यथार्थ सुख भोग सकता है । "
मेजिनी के उपदेशों से इटली ही नहीं समस्त पराधीन देशों के जन - सेवकों को बड़ी प्रेरणा मिली ।
देश को पराधीनता के अभिशाप से मुक्त करने के लिए मेजिनी ने ' युवा इटली ' नाम की एक संस्था की स्थापना की । ' युवा इटली ' के उद्देश्यों में एक महत्वपूर्ण बात यह रखी कि ---- ऊँचे आदर्शों और कर्तव्य का प्रभाव तो शिक्षित और मध्यम श्रेणी के व्यक्तियों पर पढ़ सकता है |
परन्तु देश के अशिक्षित और साधारण श्रेणी के व्यक्तियों की समझ में ये बातें नहीं आ सकतीं ।
यह तो स्पष्ट है कि जब तक साधारण जनता में जाग्रति न हो जाये और वह स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग न लेने लगे तब तक सफलता की आशा नहीं करनी चाहिए । इसलिए हमको अपने प्रचार में विशेष ध्यान गरीबों , दुःखियों और समाज के पैरों तले रौंदे जाने वाले लोगों की तरफ देना चाहिए । हम जिस प्रजातंत्र शासन का स्वप्न देख रहे हैं उसमे सब व्यक्ति समान भाव से एक दूसरे के हित का ध्यान रखकर ही व्यवहार करेंगे और न दूसरों के कल्याण के लिए अपने सुख और विलास को त्याग करने की भावना रखेंगे । समाज के सब अंगों के सुखी होने पर ही सम्पूर्ण मानव - समाज यथार्थ सुख भोग सकता है । "
मेजिनी के उपदेशों से इटली ही नहीं समस्त पराधीन देशों के जन - सेवकों को बड़ी प्रेरणा मिली ।
27 June 2016
ह्रदय के कोमल व उदार ------- महामना मालवीय जी
' सच्चे महापुरुष का यही लक्षण होता है कि उनके घर के या उनके दल वाले ही उनका गुणगान नहीं करते वरन मतभेद रखने वाले , उदासीन और प्रतिपक्षी भी उनकी प्रशंसा करते हैं । कारण यही होता है कि वे जो कुछ करते हैं वह परोपकार की भावना से होता है , उसमे प्यार और नि:स्वार्थता का पूरा समावेश होता है । '
मालवीय जी का प्रतिदिन का यह नियम था कि वे नित्य कर्म से निवृत होकर कभी अकेले और कभी आचार्य ध्रुव जी के साथ छात्रावास या कॉलेज में जाकर निरीक्षण करते । छात्रावास में विद्दार्थियों का सुख - दुःख पूछते । वे पूछते व्यायाम करते हो या नहीं ? संध्या - वंदन करते हो या नहीं ? दूध पीते हो या नहीं ? आदि । एक दिन वे छात्रावास में जा रहे थे , एक लड़का आता हुआ दिखाई दिया । मालवीय जी ने उसे देखकर पूछा कि दूध पीते हो या नहीं ? उसने उत्तर दिया कि वह बहुत गरीब है , दूध के लिए पैसे कहाँ से लाये । मालवीय जी जब घर लौटे तो उसके लिए दूध का प्रबंध करा दिया ।
" जयकुमार नाम का छात्र आचार्य के अंतिम वर्ष की परीक्षा देने वाला था । पिता का स्वर्गवास हो जाने से वह घर गया । उसको लौटने में देर हो गई जिससे उपस्थिति में कमी पड़ गई और नियमानुसार परीक्षा में सम्मिलित होना असंभव हो गया । उसने मालवीय जी के सामने जाकर अपना प्रार्थना - पत्र रखा और यह श्लोक पढ़ा -------
या त्वरा द्रोपदी त्राने या त्वरा गजमोक्षणे ।
मध्यार्ते करुणानाथ ! सा त्वरा क्व गताहिते ।
" द्रोपदी के उद्धार और गजराज की रक्षा में आपने जो शीघ्रता प्रकट की थी , हे करुणामय ! मेरी विपत्ति के समय वह शीघ्रता कहाँ चली गई ? "
इसे बोलते हुए उसके नेत्रों से आँसू बहने लगे । मालवीय जी के नेत्रों में भी आँसू आ गये और प्रार्थना पत्र पर उसी समय उसे परीक्षा में सम्मिलित होने की स्वीकृति दे दी । तत्पश्चात वह छात्र प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो गया । "
ऐसी सैकड़ों घटनाएँ मालवीय जी के जीवन की हैं , जिनमे उन्होंने तरह -तरह से सहायता देकर बहुसंख्यक युवकों के जीवन को बर्बाद होने से बचा लिया और उनको भावी जीवन में सफलता प्राप्त करने का अवसर दिया ।
हिन्दू विश्वविद्दालय की सफलता और वहां के छात्रों तथा अध्यापकों को कर्तव्यपरायण तथा उन्नतिशील बनाने के लिए उन्होंने अपना जीवन ही अर्पण कर दिया ।
मालवीय जी का प्रतिदिन का यह नियम था कि वे नित्य कर्म से निवृत होकर कभी अकेले और कभी आचार्य ध्रुव जी के साथ छात्रावास या कॉलेज में जाकर निरीक्षण करते । छात्रावास में विद्दार्थियों का सुख - दुःख पूछते । वे पूछते व्यायाम करते हो या नहीं ? संध्या - वंदन करते हो या नहीं ? दूध पीते हो या नहीं ? आदि । एक दिन वे छात्रावास में जा रहे थे , एक लड़का आता हुआ दिखाई दिया । मालवीय जी ने उसे देखकर पूछा कि दूध पीते हो या नहीं ? उसने उत्तर दिया कि वह बहुत गरीब है , दूध के लिए पैसे कहाँ से लाये । मालवीय जी जब घर लौटे तो उसके लिए दूध का प्रबंध करा दिया ।
" जयकुमार नाम का छात्र आचार्य के अंतिम वर्ष की परीक्षा देने वाला था । पिता का स्वर्गवास हो जाने से वह घर गया । उसको लौटने में देर हो गई जिससे उपस्थिति में कमी पड़ गई और नियमानुसार परीक्षा में सम्मिलित होना असंभव हो गया । उसने मालवीय जी के सामने जाकर अपना प्रार्थना - पत्र रखा और यह श्लोक पढ़ा -------
या त्वरा द्रोपदी त्राने या त्वरा गजमोक्षणे ।
मध्यार्ते करुणानाथ ! सा त्वरा क्व गताहिते ।
" द्रोपदी के उद्धार और गजराज की रक्षा में आपने जो शीघ्रता प्रकट की थी , हे करुणामय ! मेरी विपत्ति के समय वह शीघ्रता कहाँ चली गई ? "
इसे बोलते हुए उसके नेत्रों से आँसू बहने लगे । मालवीय जी के नेत्रों में भी आँसू आ गये और प्रार्थना पत्र पर उसी समय उसे परीक्षा में सम्मिलित होने की स्वीकृति दे दी । तत्पश्चात वह छात्र प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो गया । "
ऐसी सैकड़ों घटनाएँ मालवीय जी के जीवन की हैं , जिनमे उन्होंने तरह -तरह से सहायता देकर बहुसंख्यक युवकों के जीवन को बर्बाद होने से बचा लिया और उनको भावी जीवन में सफलता प्राप्त करने का अवसर दिया ।
हिन्दू विश्वविद्दालय की सफलता और वहां के छात्रों तथा अध्यापकों को कर्तव्यपरायण तथा उन्नतिशील बनाने के लिए उन्होंने अपना जीवन ही अर्पण कर दिया ।
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