' स्वार्थी , अनीतिवान तथा कायर व्यक्ति के पास छल - कपट के सिवाय और कोई सम्बल नहीं होता । ऐसे व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए शत्रुओं के प्रति तो बड़े सच्चे और वफादार रहते हैं , लेकिन अपने देश व समाज के लिए नहीं रह पाते । जिस सच्चाई और भक्ति का प्रमाण वे विपक्षियों का हित साधन में देते हैं , उसका प्रमाण यदि वे देश , धर्म तथा समाज के हित में दें तो उनका अधिक सम्मान और अधिक लाभ हो सकता है , उनका नाम इतिहास के उज्ज्वल पृष्ठों में लिखा जाये । पर जिनका जीवन गर्सित और संस्कार विकृत रहे होते हैं उनकी मनोगति इसी प्रकार विपरीत दिशा में रहती है । उन्हें शत्रुओं की चाटुकारी करने और अपनों को हानि पहुँचाने में ही सुख - सन्तोष अनुभव होता है । ऐसे ही दुर्भाग्य वाले व्यक्ति अपनाम पाकर इतिहास के कलंकित पृष्ठों में लिखे जाया करते हैं । '
10 December 2016
8 December 2016
WISDOM
' उपासना के माध्यम से परमात्मा के समीप रहने वाले व्यक्तियों पर जिन गुणों का अनुग्रह होता है उनमे --- धैर्य और सहिष्णुता मुख्य हैं । संसार में दुःखद घटनायें सदा सम्भाव्य मानी गई हैं , वे प्राय: सभी के जीवन में आती हैं , तथापि धीर व्यक्ति उनको सामान्य घटनाओं की तरह सहकर अपनी आत्मा को प्रभावित नहीं होने देते ।
जीवन और जगत को ठीक से समझ लेने वाले बुद्धिमान व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में अपने को विचलित नहीं होने देते और ज्वाला के समान जलते हुए संयोगों के बीच से अप्रभावित निकल जाते हैं । '
जीवन और जगत को ठीक से समझ लेने वाले बुद्धिमान व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में अपने को विचलित नहीं होने देते और ज्वाला के समान जलते हुए संयोगों के बीच से अप्रभावित निकल जाते हैं । '
7 December 2016
अन्याय के विरुद्ध स्वर ऊँचा किया ----- रवीन्द्रनाथ टैगोर
' जब लोगों का एक समुदाय दूसरे समुदाय के साथ अमानवीय व्यवहार करे तो कवि का भी यह धर्म हो जाता है कि अन्याय के विरुद्ध स्वर ऊँचा करे । '
जब ' जलियाँवाला बाग़ ' की एक सार्वजानिक सभा में कई सौ व्यक्ति जनरल डायर द्वारा मशीनगन से भून डाले गए तो महाकवि ने उसका बड़ा विरोध किया और ऐसी सरकार से किसी प्रकार का सम्बन्ध रखना बुरा समझकर उसकी प्रदान की हुई ' सर ' की पदवी को वापस कर दिया । इस अवसर पर उन्होंने वाइसराय लार्ड चेम्सफोर्ड को एक लम्बा पत्र लिखा , जिसमे कहा गया था ------- " हमारी आँखें खुल गईं हैं कि हमारी अवस्था कैसी असहाय है । अभागी भारतीय जनता को इस समय जो दंड दिया गया है उस का उदाहरण किसी सभ्य सरकार में नहीं मिल सकता । पर हमारे शासक उल्टा इस कृत्य के लिए अपने को शाबाशी दे रहे हैं कि उन्होंने भारत वासियों को अच्छा सबक सिखा दिया । अधिकांश ऐंग्लो इंडियन समाचार पत्रों ने इस निर्दयता की प्रशंसा की और कुछ ने तो हमारी यातनाओं का उपहास भी किया ---------- इस अवसर पर मैं कम से कम इतना तो कर ही सकता हूँ कि भारी से भारी दुष्परिणाम भोगने के लिए तैयार होकर अपने उन करोड़ों देशवासियों की विरोध भावना को व्यक्त करूँ , जो आतंक और भय के कारण चुपचाप सरकारी दमन को सह रहें हैं । समय आ गया है जब सरकार द्वारा प्रदत्त ' सम्मान के पट्टे ' राष्ट्रीय अपमान के साथ मेल नहीं खा सकते । वे हमारी निर्लज्जता को और भी चमका देते हैं । अत: मैं विवश होकर सादर प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे सम्राट की दी गई ' नाईट ' की उपाधि से मुक्त कर दें । "
इस प्रकार महाकवि ने यह दिखला दिया कि जहाँ मानवता का प्रश्न उपस्थित हो , वहां प्रत्येक क्षेत्र के व्यक्ति को आगे बढ़कर उसके विरोध में अपना दायित्व निभाना चाहिए । अन्याय के सम्मुख सिर झुकाना बहुत बड़ी हीनता और कायरता की निशानी है ।
जब ' जलियाँवाला बाग़ ' की एक सार्वजानिक सभा में कई सौ व्यक्ति जनरल डायर द्वारा मशीनगन से भून डाले गए तो महाकवि ने उसका बड़ा विरोध किया और ऐसी सरकार से किसी प्रकार का सम्बन्ध रखना बुरा समझकर उसकी प्रदान की हुई ' सर ' की पदवी को वापस कर दिया । इस अवसर पर उन्होंने वाइसराय लार्ड चेम्सफोर्ड को एक लम्बा पत्र लिखा , जिसमे कहा गया था ------- " हमारी आँखें खुल गईं हैं कि हमारी अवस्था कैसी असहाय है । अभागी भारतीय जनता को इस समय जो दंड दिया गया है उस का उदाहरण किसी सभ्य सरकार में नहीं मिल सकता । पर हमारे शासक उल्टा इस कृत्य के लिए अपने को शाबाशी दे रहे हैं कि उन्होंने भारत वासियों को अच्छा सबक सिखा दिया । अधिकांश ऐंग्लो इंडियन समाचार पत्रों ने इस निर्दयता की प्रशंसा की और कुछ ने तो हमारी यातनाओं का उपहास भी किया ---------- इस अवसर पर मैं कम से कम इतना तो कर ही सकता हूँ कि भारी से भारी दुष्परिणाम भोगने के लिए तैयार होकर अपने उन करोड़ों देशवासियों की विरोध भावना को व्यक्त करूँ , जो आतंक और भय के कारण चुपचाप सरकारी दमन को सह रहें हैं । समय आ गया है जब सरकार द्वारा प्रदत्त ' सम्मान के पट्टे ' राष्ट्रीय अपमान के साथ मेल नहीं खा सकते । वे हमारी निर्लज्जता को और भी चमका देते हैं । अत: मैं विवश होकर सादर प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे सम्राट की दी गई ' नाईट ' की उपाधि से मुक्त कर दें । "
इस प्रकार महाकवि ने यह दिखला दिया कि जहाँ मानवता का प्रश्न उपस्थित हो , वहां प्रत्येक क्षेत्र के व्यक्ति को आगे बढ़कर उसके विरोध में अपना दायित्व निभाना चाहिए । अन्याय के सम्मुख सिर झुकाना बहुत बड़ी हीनता और कायरता की निशानी है ।
6 December 2016
सेवा धर्म के सच्चे उपासक ------ गोपालकृष्ण गोखले
' एक गरीब घर में जन्म लेकर अपनी कर्मठता और परिश्रम के बल पर भारत की सर्वोच्च शासन सभा के सदस्य के दर्जे तक पहुँच गये थे , पर उन्होंने अपनी उपलब्धियों का उपयोग सदैव कष्ट पीड़ित लोगों की सहायता के लिए ही किया । श्री गोखले ( जन्म 1866 ) जीवन के अंतिम समय तक एक मामूली घर में ही गुजारा करते रहे और इस लोक से विदा होते समय परिवार वालों के लिए नाममात्र की ही सम्पति छोड़ गये । '
बी. ए. पास करने के बाद वे अध्यापन कार्य करने लगे । यद्दपि उन्हें अंग्रेजी का प्रोफेसर नियुक्त किया गया था , पर आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने कई वर्षों तक गणित , इतिहास और अर्थशास्त्र का अध्यापन भी किया । जब उनको अपने कॉलेज में गणित पढ़ाना पड़ा तो उन्होंने निजी तौर पर गणित का अध्ययन करके योग्यता इतनी प्राप्त कर ली कि ' अर्थमेटिक ' की एक बहुत बढ़िया पुस्तक लिखकर तैयार कर दी जो समस्त महाराष्ट्र के स्कूलों में ऐसी पसंद की गई कि उसके पचासों संस्करण छप गए और लाखों कापियां बिक गईं ।
गणित के अध्ययन से श्री गोखले को यह लाभ हुआ कि अपने राजनीतिक और सामाजिक जीवन में उन्होंने जो भाषण दिए, उनमे प्रत्येक विषय के आंकड़े इतने प्रमाणिक ढंग से और स्पष्ट रूप से दिए जाते थे कि उन्हें कोई काट नहीं सकता था । इसी कारण गवर्नर जनरल की कौंसिल में उनके ' बजट ' सम्बन्धी भाषण बड़े महत्व की निगाह से देखे जाते थे और अंग्रेज अधिकारी भी उनका उत्तर देने से घबराते थे ।
बी. ए. पास करने के बाद वे अध्यापन कार्य करने लगे । यद्दपि उन्हें अंग्रेजी का प्रोफेसर नियुक्त किया गया था , पर आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने कई वर्षों तक गणित , इतिहास और अर्थशास्त्र का अध्यापन भी किया । जब उनको अपने कॉलेज में गणित पढ़ाना पड़ा तो उन्होंने निजी तौर पर गणित का अध्ययन करके योग्यता इतनी प्राप्त कर ली कि ' अर्थमेटिक ' की एक बहुत बढ़िया पुस्तक लिखकर तैयार कर दी जो समस्त महाराष्ट्र के स्कूलों में ऐसी पसंद की गई कि उसके पचासों संस्करण छप गए और लाखों कापियां बिक गईं ।
गणित के अध्ययन से श्री गोखले को यह लाभ हुआ कि अपने राजनीतिक और सामाजिक जीवन में उन्होंने जो भाषण दिए, उनमे प्रत्येक विषय के आंकड़े इतने प्रमाणिक ढंग से और स्पष्ट रूप से दिए जाते थे कि उन्हें कोई काट नहीं सकता था । इसी कारण गवर्नर जनरल की कौंसिल में उनके ' बजट ' सम्बन्धी भाषण बड़े महत्व की निगाह से देखे जाते थे और अंग्रेज अधिकारी भी उनका उत्तर देने से घबराते थे ।
5 December 2016
WISDOM
सार्वजानिक सेवा और राजनीतिक क्षेत्र में कार्य करने वालों के लिए अहंकार और प्रशंसा की भूख ----- ये दो ऐसी बाधाएं हैं , जो उच्च कोटि के व्यक्तियों में भी पायी जाती हैं । इसी के फलस्वरूप नेताओं में प्राय: मतभेद और प्रतिस्पर्धा की भावनाएं प्रबल होती हैं और वे लोक हित की अपेक्षा अपने हठ और पक्ष को अधिक महत्व देने लग जाते हैं । ऐसे लोग अनेक अवसरों पर जनता की सेवा के स्थान पर उनकी कुसेवा करने लग जाते हैं और उपयोगी सार्वजानिक आंदोलनों तथा संस्थाओं की असफलता का कारण बनते हैं ।
जो लोग धन या अन्य किसी निम्न कोटि की स्वार्थ भावना से मुक्त होते हैं और सच्चे ह्रदय से परोपकारी और त्यागी होते हैं , वे भी अहंकार या आत्म - प्रशंसा के फंदे में फंसकर मार्ग - भ्रष्ट हो जाते हैं ।
इसलिए भारतीय ऋषियों ने अपने सत्कर्मों को भी ' ईश्वर-अर्पण ' करने पर जोर दिया है जिससे अहंकार और स्वार्थ भावना को सिर उठाने का अवसर ही न मिले । उनका वचन है कि----
जब तक सेवा कार्यों को नि:स्वार्थ बुद्धि और ईश्वरीय आदेश के पालन के रूप में न करेंगे तब तक सच्ची और स्थायी सफलता नहीं मिल सकती और न ही आत्मिक शान्ति के अधिकारी बन सकते हैं । '
जो लोग धन या अन्य किसी निम्न कोटि की स्वार्थ भावना से मुक्त होते हैं और सच्चे ह्रदय से परोपकारी और त्यागी होते हैं , वे भी अहंकार या आत्म - प्रशंसा के फंदे में फंसकर मार्ग - भ्रष्ट हो जाते हैं ।
इसलिए भारतीय ऋषियों ने अपने सत्कर्मों को भी ' ईश्वर-अर्पण ' करने पर जोर दिया है जिससे अहंकार और स्वार्थ भावना को सिर उठाने का अवसर ही न मिले । उनका वचन है कि----
जब तक सेवा कार्यों को नि:स्वार्थ बुद्धि और ईश्वरीय आदेश के पालन के रूप में न करेंगे तब तक सच्ची और स्थायी सफलता नहीं मिल सकती और न ही आत्मिक शान्ति के अधिकारी बन सकते हैं । '
4 December 2016
जो ईश्वर से भय खाता है , उसे दूसरा भय नहीं सताता
अध्यात्म्वेत्ताओं के अनुसार ---- ' संकीर्ण स्वार्थ , वासना और अहं से युक्त अनैतिक जीवन भय का प्रमुख कारण है । भय का सबसे घ्रणित पहलू अपने स्वार्थ के लिए , दूसरों पर छाये रहने की भावना से अधीनस्थ लोगों का शोषण करना है ।
' त्याग का मार्ग ही निर्भयता की अवस्था की और ले जाता है । '
' त्याग का मार्ग ही निर्भयता की अवस्था की और ले जाता है । '
3 December 2016
WISDOM
समय रहते जो कुटिल व्यक्ति की या समुदाय की कुटिलताओं को समझते नहीं , उनके हाथ पछताने के सिवा कुछ नहीं आता l ईमानदारी, परिश्रमशील और कर्तव्यनिष्ठ के साथ साथ सजग चातुरी भी हो तो सुखद फल प्राप्त किये जा सकते हैं ।
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