जो लोग वर्तमान में ही भविष्य की तैयारी नहीं करते वे अदूरदर्शी होते हैं और एक तरह से जीवन - पथ पर असफलता के बीज बोने जैसी भूल करते हैं l समय रहते पहले से तैयारी कर लेने पर निर्धारित योजनाओं में सौभाग्य का समावेश होना स्वाभाविक ही होता है l असफलता तो उन अदूरदर्शी व्यक्तियों को मिलती है जो तैयारी के समय आलस्य और उपेक्षा में पड़े सपने देखा करते हैं और कर्तव्य काल में व्यस्तता , व्यग्रता , त्वरा और अव्यवस्था के शिकार बनकर शक्ति तथा संतुलन को जीर्ण - शीर्ण करते रहने विवश होते हैं l
27 September 2017
26 September 2017
धर्मप्राण - महामना पं. मदनमोहन मालवीयजी
' मालवीयजी ने हिन्दू विश्वविद्यालय की सफलता और वहां के विद्दार्थियों तथा अध्यापकों को कर्तव्यपरायण तथा उन्नतिशील बनाने के लिए अपना जीवन ही अर्पण कर दिया l '
मालवीयजी केवल लड़कों की शिक्षा लिए ही प्रयत्नशील नहीं रहे वरन लड़कियों की शिक्षा को भी वे उतना ही आवश्यक और महत्वपूर्ण समझते थे l उन्होंने हिन्दू विश्वविद्यालय में लड़कों की शिक्षा की तरह कन्या - शिक्षा की भी उचित व्यवस्था की l उस समय में भी उन्होंने लड़कियों को वेद पढ़ने की अनुमति दी l
स्त्री - शिक्षा के महत्व पर उन्होंने कहा था ----- " हमारा सच्चरित्र होना , ब्रह्मचारी बनना अथवा अन्धविश्वास का परित्याग करना तभी हो सकता है जब हम अपने स्त्री - वर्ग का सुधार कर उसे अपने अनुकूल बना लें l जब तक हम नारी - शक्ति को अपने साथ लेकर नहीं चलते , तब तक हम कभी जातीय - जीवन की लहलहाती लता को देखकर आनन्दित नहीं हो सकते l क्योंकि मनुष्य समाज का कल्याण अथवा अकल्याण , उच्च अथवा नीच होना स्त्रियों के ही हाथ में है l ------ यदि स्त्रियाँ पुरुषों के साथ रहकर उनके लाभ अथवा सुख की सहायक न हों , तो पुरुष कभी सुखी अथवा आनन्दित नहीं रह सकते l पुरुषों की उन्नति अथवा अवनति वास्तव में स्त्रियों के हाथ में है l --------- स्त्रियों को ईश्वर की दी हुई विपुल शक्ति को जीवन के उच्च आदर्श के सामने लाकर सुगठित करना और कर्मशील बनाना ही हमारा उद्देश्य है और वही हमारे जातीय जीवन का मूल और कर्तव्य - कर्म है l "
मालवीयजी केवल लड़कों की शिक्षा लिए ही प्रयत्नशील नहीं रहे वरन लड़कियों की शिक्षा को भी वे उतना ही आवश्यक और महत्वपूर्ण समझते थे l उन्होंने हिन्दू विश्वविद्यालय में लड़कों की शिक्षा की तरह कन्या - शिक्षा की भी उचित व्यवस्था की l उस समय में भी उन्होंने लड़कियों को वेद पढ़ने की अनुमति दी l
स्त्री - शिक्षा के महत्व पर उन्होंने कहा था ----- " हमारा सच्चरित्र होना , ब्रह्मचारी बनना अथवा अन्धविश्वास का परित्याग करना तभी हो सकता है जब हम अपने स्त्री - वर्ग का सुधार कर उसे अपने अनुकूल बना लें l जब तक हम नारी - शक्ति को अपने साथ लेकर नहीं चलते , तब तक हम कभी जातीय - जीवन की लहलहाती लता को देखकर आनन्दित नहीं हो सकते l क्योंकि मनुष्य समाज का कल्याण अथवा अकल्याण , उच्च अथवा नीच होना स्त्रियों के ही हाथ में है l ------ यदि स्त्रियाँ पुरुषों के साथ रहकर उनके लाभ अथवा सुख की सहायक न हों , तो पुरुष कभी सुखी अथवा आनन्दित नहीं रह सकते l पुरुषों की उन्नति अथवा अवनति वास्तव में स्त्रियों के हाथ में है l --------- स्त्रियों को ईश्वर की दी हुई विपुल शक्ति को जीवन के उच्च आदर्श के सामने लाकर सुगठित करना और कर्मशील बनाना ही हमारा उद्देश्य है और वही हमारे जातीय जीवन का मूल और कर्तव्य - कर्म है l "
25 September 2017
पं . दीनदयाल उपाध्याय ----- निरंतर आत्मनिरीक्षण करते थे
पं. दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं के साथ मुंबई से नागपुर तीसरे दरजे में रेल द्वारा जा रहे थे l उन दिनों वे भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष थे l उसी ट्रेन की प्रथम श्रेणी में गुरु गोलवरकर जी भी जा रहे थे l उन्होंने किसी महत्वपूर्ण विषय पर विचार - विमर्श के लिए उपाध्याय जी को अपने पास बुलाया l दो स्टेशन तक उनका प्रथम श्रेणी के डिब्बे में ही वार्तालाप होता रहा l अपने डिब्बे में आने के बाद वह टी. टी. को खोजने का प्रयास करने लगे और हर स्टेशन पर नीचे उतर कर उसे खोजते l
श्री उपाध्याय जी को टी. टी. की खोज करते देख उनके साथी यह जानने के उत्सुक थे कि आखिर उन्हें टी. टी. से क्या काम है l पंडितजी की दौड़ - धूप का प्रयास सफल हुआ l उन्हें शीघ्र ही टी. टी. सामने आता दिखाई दिया l
दो स्टेशन वे वार्तालाप हेतु प्रथम श्रेणी में बैठे थे , अत: उन्होंने उससे अपना अधिक किराया जमा करने को कहा l उसे बहुत आश्चर्य हुआ किन्तु उसने चुपचाप हिसाब से पैसे ले लिए और पूछा --- " क्या आप रसीद भी चाहते हैं ? " पंडितजी ने कहा --- ' अवश्य l ' बिना रसीद दिए वह राशि टी. टी. स्वयं ही रखना चाहता था किन्तु उपध्याय जी ने कहा ---- " मेरे टिकट के पैसे न देने और टी. टी. के जेब में रख लेने के दोनों अपराध समान हैं l दोनों से ही देश खोखला होता है l "
श्री उपाध्याय जी को टी. टी. की खोज करते देख उनके साथी यह जानने के उत्सुक थे कि आखिर उन्हें टी. टी. से क्या काम है l पंडितजी की दौड़ - धूप का प्रयास सफल हुआ l उन्हें शीघ्र ही टी. टी. सामने आता दिखाई दिया l
दो स्टेशन वे वार्तालाप हेतु प्रथम श्रेणी में बैठे थे , अत: उन्होंने उससे अपना अधिक किराया जमा करने को कहा l उसे बहुत आश्चर्य हुआ किन्तु उसने चुपचाप हिसाब से पैसे ले लिए और पूछा --- " क्या आप रसीद भी चाहते हैं ? " पंडितजी ने कहा --- ' अवश्य l ' बिना रसीद दिए वह राशि टी. टी. स्वयं ही रखना चाहता था किन्तु उपध्याय जी ने कहा ---- " मेरे टिकट के पैसे न देने और टी. टी. के जेब में रख लेने के दोनों अपराध समान हैं l दोनों से ही देश खोखला होता है l "
24 September 2017
WISDOM ----- आप दूसरों से स्नेह , सम्मान और सहानुभूति चाहते हैं तो उनकी आलोचना , बुराई न करें
यदि किसी के मन में स्वयं के प्रति विद्वेष पैदा करना है , जो दशकों तक पलता रहे और मौत के बाद भी बना रहे , तो इसके लिए उसकी कुछ चुने हुए शब्दों में चुभती हुई आलोचना करनी होती है l जाने - अनजाने में ज्यादातर लोग ऐसा ही करते हैं और दूसरों के मन में खुद के लिए विषबीज बो देते हैं l
बॉब हूवर एक प्रसिद्ध टेस्ट पाइलट थे जो एयर शो में अक्सर प्रदर्शन किया करते थे l एक बार वे सैनडीएगो से एयर शो में हिस्सा लेने के बाद लास एंजिल्स में अपने घर को लौट रहे थे कि अचानक हवा में तीन सौ फीट की ऊंचाई पर उनके हवाई जहाज के दोनों इंजन बंद हो गए l कुशल तकनीक से उन्होंने जहाज को उतारा l हवाई जहाज का तो बहुत नुकसान हुआ परन्तु किसी को चोट नहीं आई l उन्होंने हवाई जहाज के ईंधन कि जाँच की तो पाया कि द्वितीय विश्व युद्ध के प्रसिद्ध हवाई जहाज में किसी ने गैसोलीन कि जगह जेट का ईंधन डाल दिया l
उन्होंने उस मैकेनिक को बुलाया जिसने हवाई जहाज की सर्विसिंग की थी l युवा मैकेनिक अपनी गलती पर बहुत शर्मिंदा था किन्तु बॉब हूवर ने उसे कोई फटकार नहीं लगाई, इसके बजाय अपने हाथ उसके कंधे पर रखकर कहा ----- " मुझे पूरा भरोसा है अब तुम दोबारा ऐसा नहीं करोगे l मैं चाहता हूँ कि कल तुम मेरे एफ--51 हवाई जहाज की सर्विसिंग करो l "
उनके इस व्यवहार से उस मैकेनिक के अन्दर हूवर के प्रति श्रद्धा - विश्वास का भाव पनपा और फिर कभी भी उसने अपनी पुरानी गलती नहीं दोहराई l
लोगों की आलोचना करने के बजाय उन्हें समझने की कोशिश करनी चाहिए l
बॉब हूवर एक प्रसिद्ध टेस्ट पाइलट थे जो एयर शो में अक्सर प्रदर्शन किया करते थे l एक बार वे सैनडीएगो से एयर शो में हिस्सा लेने के बाद लास एंजिल्स में अपने घर को लौट रहे थे कि अचानक हवा में तीन सौ फीट की ऊंचाई पर उनके हवाई जहाज के दोनों इंजन बंद हो गए l कुशल तकनीक से उन्होंने जहाज को उतारा l हवाई जहाज का तो बहुत नुकसान हुआ परन्तु किसी को चोट नहीं आई l उन्होंने हवाई जहाज के ईंधन कि जाँच की तो पाया कि द्वितीय विश्व युद्ध के प्रसिद्ध हवाई जहाज में किसी ने गैसोलीन कि जगह जेट का ईंधन डाल दिया l
उन्होंने उस मैकेनिक को बुलाया जिसने हवाई जहाज की सर्विसिंग की थी l युवा मैकेनिक अपनी गलती पर बहुत शर्मिंदा था किन्तु बॉब हूवर ने उसे कोई फटकार नहीं लगाई, इसके बजाय अपने हाथ उसके कंधे पर रखकर कहा ----- " मुझे पूरा भरोसा है अब तुम दोबारा ऐसा नहीं करोगे l मैं चाहता हूँ कि कल तुम मेरे एफ--51 हवाई जहाज की सर्विसिंग करो l "
उनके इस व्यवहार से उस मैकेनिक के अन्दर हूवर के प्रति श्रद्धा - विश्वास का भाव पनपा और फिर कभी भी उसने अपनी पुरानी गलती नहीं दोहराई l
लोगों की आलोचना करने के बजाय उन्हें समझने की कोशिश करनी चाहिए l
23 September 2017
शब्दों की शक्ति बड़ी ताकतवर है -------- स्वामी दयानंद
' वार्तालाप में सत्यता , नम्रता और शिष्टता का अपना प्रभाव है और कटुता या स्वार्थपूर्ण वार्ता का अपना l परिशोधित - परिष्कृत होने पर शब्द अमृत बन सकते हैं और विकृत होने पर विष का भी काम कर डालते हैं l '
घटना उन दिनों कि है एक नवयुवक स्वामी दयानंद के पास पहुंचा , उस समय स्वामीजी नाम स्मरण के सन्दर्भ में उपस्थित जन समुदाय के समक्ष भक्तियोग का उपदेश दे रहे थे l वह युवक तार्किक था प्रवचन के बीच में ही बोला ---" स्वामीजी ! नाम स्मरण से क्या फायदा ? यह शब्दों का जंजाल है , इससे किसी को कोई फायदा नहो l "
स्वामी दयानंद ने अपना उपदेश बीच में ही रोका और उसे समझाने के लिए जोर से बोले ---- " पागल कहीं का , जाने क्या बक रहा है ? जानता भी नहीं है , अहंकार इतना बढ़ा - चढ़ा है , जैसे कोई प्रकांड पंडित हो l "
स्वामीजी के इन अपशब्दों को सुनकर वह युवक तिलमिला गया और कहने लगा --- " आप एक संन्यासी हैं पर आपको बोलने का ढंग नहीं आया l "
स्वामीजी अब बड़े सहज और शांत स्वर में बोले ---- " अरे भाई ! मैंने दो - चार शब्द ही तो बोले हैं , इससे आपको विशेष चोट पहुंची क्या ? ये कोरे शब्द हैं , पत्थर तो नहीं जिनसे चोट लगती l आप स्वयं कह रहे थे नाम स्मरण केवल शब्द आडम्बर है , इससे कुछ नहीं होता l " स्वामीजी ने कहा ---- आप तनिक गहराई से विचार करें जिस प्रकार बुरे शब्दों की चोट ने आपको घायल किया , उसी प्रकार भागवान के पवित्र नाम स्मरण से सद्गुण विकसित होते हैं , दुःख -- दरद के घाव शीघ्र भर जाते हैं ---- संतप्त मन शांत होता है l ' स्वामी दयानंद का उपदेश सुनकर म वह युवक उनके पैरों पर गिर पड़ा और बोला ---- गुरुदेव l आपके कथन से मेरी शंका दूर हुई , मैं समझ गया कि मन्त्र जप , नाम स्मरण , स्रोत पाठ आदि भाषा का विषय नहीं है , वरन व्यक्ति के अन्तराल की भाव - संवेदनाओं को जगाने वाली ऐसी अलौकिक शक्ति - सामर्थ्य है , जिसके फलस्वरूप अहंकार एवं अन्य विकारों को विसर्जित होने में जरा भी देर नहीं लगती l "
घटना उन दिनों कि है एक नवयुवक स्वामी दयानंद के पास पहुंचा , उस समय स्वामीजी नाम स्मरण के सन्दर्भ में उपस्थित जन समुदाय के समक्ष भक्तियोग का उपदेश दे रहे थे l वह युवक तार्किक था प्रवचन के बीच में ही बोला ---" स्वामीजी ! नाम स्मरण से क्या फायदा ? यह शब्दों का जंजाल है , इससे किसी को कोई फायदा नहो l "
स्वामी दयानंद ने अपना उपदेश बीच में ही रोका और उसे समझाने के लिए जोर से बोले ---- " पागल कहीं का , जाने क्या बक रहा है ? जानता भी नहीं है , अहंकार इतना बढ़ा - चढ़ा है , जैसे कोई प्रकांड पंडित हो l "
स्वामीजी के इन अपशब्दों को सुनकर वह युवक तिलमिला गया और कहने लगा --- " आप एक संन्यासी हैं पर आपको बोलने का ढंग नहीं आया l "
स्वामीजी अब बड़े सहज और शांत स्वर में बोले ---- " अरे भाई ! मैंने दो - चार शब्द ही तो बोले हैं , इससे आपको विशेष चोट पहुंची क्या ? ये कोरे शब्द हैं , पत्थर तो नहीं जिनसे चोट लगती l आप स्वयं कह रहे थे नाम स्मरण केवल शब्द आडम्बर है , इससे कुछ नहीं होता l " स्वामीजी ने कहा ---- आप तनिक गहराई से विचार करें जिस प्रकार बुरे शब्दों की चोट ने आपको घायल किया , उसी प्रकार भागवान के पवित्र नाम स्मरण से सद्गुण विकसित होते हैं , दुःख -- दरद के घाव शीघ्र भर जाते हैं ---- संतप्त मन शांत होता है l ' स्वामी दयानंद का उपदेश सुनकर म वह युवक उनके पैरों पर गिर पड़ा और बोला ---- गुरुदेव l आपके कथन से मेरी शंका दूर हुई , मैं समझ गया कि मन्त्र जप , नाम स्मरण , स्रोत पाठ आदि भाषा का विषय नहीं है , वरन व्यक्ति के अन्तराल की भाव - संवेदनाओं को जगाने वाली ऐसी अलौकिक शक्ति - सामर्थ्य है , जिसके फलस्वरूप अहंकार एवं अन्य विकारों को विसर्जित होने में जरा भी देर नहीं लगती l "
22 September 2017
स्वतंत्रता आन्दोलन में अग्रणी ----- भगिनी निवेदिता
निवेदिता का उदय धार्मिक पृष्ठभूमि में हुआ था l उस समय आवश्यकता इस बात कि थी कि पहले भारतीय अपने स्वाभिमान को समझें , उनमे शिक्षा और संस्कृति का विस्तार हो l इसके लिए आवश्यक था कि भारत स्वतंत्र हो l अत: भारतवर्ष को स्वतंत्र कराना ही उस समय उनका प्रमुख उद्देश्य बन गया l उन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश किया , स्वतंत्रता - आन्दोलन में भाग लिया l अब वह पूरी तौर से क्रांतिकारी थीं l महर्षि अरविन्द ने कहा था -- वे अग्निस्वरुपा थीं l स्वामी विवेकानन्द ने उन्हें सिंहनी बना दिया था l राष्ट्र निर्माण हेतु भारत की आजादी के समर्थन में वे सतत लिखती रहती थीं l
लार्ड कर्जन जो बंग भंग के लिए जिम्मेदार थे , उन तक शिकायत पहुंची कि बेलूर मठ के रामकृष्ण मिशन का क्रांतिकारियों से सम्बन्ध है l तत्कालीन संचालक मंडल ने निवेदिता से कहा कि लाट साहब का सन्देश आ रहा है कि इस मठ को समाप्त कर देना है ताकि क्रांतिकारियों का गढ़ ही समाप्त हो जाये l तब निवेदिता ने लाटसाहब की पत्नी को समझाया कि यह हमारे गुरु व उनके गुरु का मंदिर है l यहाँ क्रान्तिकारी नहीं हैं , यह तो मनुष्य बनाने का तंत्र है l
बंगभंग आन्दोलन में उनने खुलकर भाग लिया , निवेदिता का निवास स्थान क्रांतिकारियों का आश्रय स्थान बन रहा था , क्रांतिकारियों के कारण मठ की बदनामी न हो , इस कारण अनेक लोग उनसे रुष्ट हो गए थे l पर भगिनी निवेदिता की यह गुरु निष्ठा थी कि उन्ही ने रामकृष्ण मिशन की , अपने गुरु के मंदिर की रक्षा की l वे आंतरिक रूप से योगिनी , साधिका और कल प्रेमी थीं , पर प्रत्यक्ष रूप से एक योद्धा , भारत प्रेमी और भारत की स्वतंत्रता के लिए सतत संघर्ष करने वाली महिला थीं l 44 वर्ष की आयु में शरीर छोड़ दिया , पर वे इतिहास में गुरु - शिष्य परम्परा में अमर हो गईं l
लार्ड कर्जन जो बंग भंग के लिए जिम्मेदार थे , उन तक शिकायत पहुंची कि बेलूर मठ के रामकृष्ण मिशन का क्रांतिकारियों से सम्बन्ध है l तत्कालीन संचालक मंडल ने निवेदिता से कहा कि लाट साहब का सन्देश आ रहा है कि इस मठ को समाप्त कर देना है ताकि क्रांतिकारियों का गढ़ ही समाप्त हो जाये l तब निवेदिता ने लाटसाहब की पत्नी को समझाया कि यह हमारे गुरु व उनके गुरु का मंदिर है l यहाँ क्रान्तिकारी नहीं हैं , यह तो मनुष्य बनाने का तंत्र है l
बंगभंग आन्दोलन में उनने खुलकर भाग लिया , निवेदिता का निवास स्थान क्रांतिकारियों का आश्रय स्थान बन रहा था , क्रांतिकारियों के कारण मठ की बदनामी न हो , इस कारण अनेक लोग उनसे रुष्ट हो गए थे l पर भगिनी निवेदिता की यह गुरु निष्ठा थी कि उन्ही ने रामकृष्ण मिशन की , अपने गुरु के मंदिर की रक्षा की l वे आंतरिक रूप से योगिनी , साधिका और कल प्रेमी थीं , पर प्रत्यक्ष रूप से एक योद्धा , भारत प्रेमी और भारत की स्वतंत्रता के लिए सतत संघर्ष करने वाली महिला थीं l 44 वर्ष की आयु में शरीर छोड़ दिया , पर वे इतिहास में गुरु - शिष्य परम्परा में अमर हो गईं l
21 September 2017
महापुरुष लेनिन
प्रसिद्ध मानवतावादी विचारक रोमारोलां ने लिखा है ---- " लेनिन वर्तमान शताब्दी का सबसे बड़ा कर्मठ और स्वार्थत्यागी व्यक्ति था l उसने आजीवन घोर परिश्रम किया पर अपने लिए कभी किसी प्रकार के लाभ की इच्छा नहीं की l "
उस समय रूस पर जार का निरंकुश शासन था l लेनिन के प्रचार कार्य से शोषण और अन्याय के प्रति मजदूरों में असंतोष भड़क उठा हड़ताल , प्रदर्शन आदि होने लगे और सरकार इनको सीधी तरह नहीं रोक सकी , तब जार के सलाहकारों ने उसे सलाह दी कि श्रमजीवियों और गरीबों को धर्म के नाम पर भड़का कर यहूदियों से लड़वा देना चाहिए l इससे उनका ध्यान शासन और सरकारी नियमों की बुराइयों की तरफ से हट जायेगा और उधर यहूदियों का भी सफाया हो जायेगा l जार के ये सलाहकार कितने निरंकुश और अत्याचारी थे इसका नमूना जार के प्रधान मित्र जनरल ट्रयोन के भाषण के एक अंश से जाना जा सकता है ------ " वे आन्दोलन कि बात करते हैं , उनको गोली से उड़ा दो l उनमे थोड़े से पुलिस के भेड़ियों को नकली क्रन्तिकारी बनाकर शामिल कर दो और वे तुरंत ही -- तुम्हारे जाल में फंस जायेंगे l " इस योजना के अनुसार निरंकुश शासक के कार्यकर्ता ईसाइयों के धर्म चिन्ह उठाकर , घंटा बजाते हुए जुलूस बनाकर निकलते और गरीब यहूदियों के घरों में घुसकर उनके तमाम कुटुम्ब की हत्या कर डालते , जो कुछ मिलता उसे लूट लेते l दूध पीते बच्चे और स्त्रियाँ भी उनके हाथों से नहीं बच सकती थीं l यद्दपि ये सरकारी नौकर नहीं थे तो भी जार उनकी प्रशंसा करता था और उन्हें राजभक्त बतलाता था l
रुसी क्रांति को लेनिन ने किस प्रकार अपना सर्वस्व होम कर खड़ा किया और कार्यरूप में परिणित हो जाने पर किस प्रकार प्राणों की बाजी लगाकर उसकी रक्षा की ----- यह रुसी इतिहास की अमर गाथा है l शासन सत्ता ग्रहण करने के कुछ ही दिन बाद जब जर्मन सेना के आक्रमण से रूस की रक्षा की समस्या उपस्थित हुई , उस समय अन्य नेता तो जर्मनी से सन्धि कर के अपनी पराजय स्वीकार करने को बहुत बुरा बतलाते थे , पर लेनिन ने कहा --- हमारी क्रान्ति जीवित रहेगी तो हम इस वर्तमान हानि का बदला आगे चलकर चुका लेंगे l पर यदि इस समय हम बिना तैयारी के शत्रु से भिड़ गए तो फिर रक्षा का कोई उपाय नहीं है l इसके लिए लेनिन ने अपने सिर पर जिम्मेदारी ली , रुसी साम्राज्य का कुछ हिस्सा जो जर्मनी कि सीमा से लगा था उसको दे दिया और जर्मनी के खतरे से बचने के लिए अपनी राजधानी पैट्रगार्ड से मास्को ले गए l इस कारण बहुत से साथी उनके विरोधी बन गए , पर अंत में लेनिन की सच्चाई और उचित निर्णय के लिए सबको उसके सामने नतमस्तक होना पड़ा l
कई पूंजीवादी नेताओं ने भी लेनिन के असाधारण गुणों की चर्चा करते हुए कहा है ----- " यद्दपि लेनिन का मार्ग हमसे भिन्न था तो भी इसमें संदेह नहीं कि उसकी राजनीतिज्ञता , दृढ़ निश्चय , और अगाध ज्ञान की तुलना मिल सकना कठिन है l "
उस समय रूस पर जार का निरंकुश शासन था l लेनिन के प्रचार कार्य से शोषण और अन्याय के प्रति मजदूरों में असंतोष भड़क उठा हड़ताल , प्रदर्शन आदि होने लगे और सरकार इनको सीधी तरह नहीं रोक सकी , तब जार के सलाहकारों ने उसे सलाह दी कि श्रमजीवियों और गरीबों को धर्म के नाम पर भड़का कर यहूदियों से लड़वा देना चाहिए l इससे उनका ध्यान शासन और सरकारी नियमों की बुराइयों की तरफ से हट जायेगा और उधर यहूदियों का भी सफाया हो जायेगा l जार के ये सलाहकार कितने निरंकुश और अत्याचारी थे इसका नमूना जार के प्रधान मित्र जनरल ट्रयोन के भाषण के एक अंश से जाना जा सकता है ------ " वे आन्दोलन कि बात करते हैं , उनको गोली से उड़ा दो l उनमे थोड़े से पुलिस के भेड़ियों को नकली क्रन्तिकारी बनाकर शामिल कर दो और वे तुरंत ही -- तुम्हारे जाल में फंस जायेंगे l " इस योजना के अनुसार निरंकुश शासक के कार्यकर्ता ईसाइयों के धर्म चिन्ह उठाकर , घंटा बजाते हुए जुलूस बनाकर निकलते और गरीब यहूदियों के घरों में घुसकर उनके तमाम कुटुम्ब की हत्या कर डालते , जो कुछ मिलता उसे लूट लेते l दूध पीते बच्चे और स्त्रियाँ भी उनके हाथों से नहीं बच सकती थीं l यद्दपि ये सरकारी नौकर नहीं थे तो भी जार उनकी प्रशंसा करता था और उन्हें राजभक्त बतलाता था l
रुसी क्रांति को लेनिन ने किस प्रकार अपना सर्वस्व होम कर खड़ा किया और कार्यरूप में परिणित हो जाने पर किस प्रकार प्राणों की बाजी लगाकर उसकी रक्षा की ----- यह रुसी इतिहास की अमर गाथा है l शासन सत्ता ग्रहण करने के कुछ ही दिन बाद जब जर्मन सेना के आक्रमण से रूस की रक्षा की समस्या उपस्थित हुई , उस समय अन्य नेता तो जर्मनी से सन्धि कर के अपनी पराजय स्वीकार करने को बहुत बुरा बतलाते थे , पर लेनिन ने कहा --- हमारी क्रान्ति जीवित रहेगी तो हम इस वर्तमान हानि का बदला आगे चलकर चुका लेंगे l पर यदि इस समय हम बिना तैयारी के शत्रु से भिड़ गए तो फिर रक्षा का कोई उपाय नहीं है l इसके लिए लेनिन ने अपने सिर पर जिम्मेदारी ली , रुसी साम्राज्य का कुछ हिस्सा जो जर्मनी कि सीमा से लगा था उसको दे दिया और जर्मनी के खतरे से बचने के लिए अपनी राजधानी पैट्रगार्ड से मास्को ले गए l इस कारण बहुत से साथी उनके विरोधी बन गए , पर अंत में लेनिन की सच्चाई और उचित निर्णय के लिए सबको उसके सामने नतमस्तक होना पड़ा l
कई पूंजीवादी नेताओं ने भी लेनिन के असाधारण गुणों की चर्चा करते हुए कहा है ----- " यद्दपि लेनिन का मार्ग हमसे भिन्न था तो भी इसमें संदेह नहीं कि उसकी राजनीतिज्ञता , दृढ़ निश्चय , और अगाध ज्ञान की तुलना मिल सकना कठिन है l "
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