13 November 2017

WISDOM ----- यदि हम समय का सदुपयोग नहीं करेंगे तो समय ही हमें बरबाद कर देगा l

  वृहत  भारत  के  विश्वकर्मा  श्री  विश्वेश्वरैया   कहा  करते  थे --- ' यदि  हम  जीवन  में  सफलता  प्राप्त  करना  चाहते  हैं  , तो  उसका  मूल  मन्त्र  है ----- समय  का  सदुपयोग   l '   अति - परिश्रम  के  साथ  समय पालन  का  उनमे  अद्भुत  गुण  था  l  विद्दार्थी  जीवन  से  ही  वे  समय  के  अत्यंत  पाबंद  थे  l  उनके  पढ़ने - लिखने ,  सोने - जागने  का  समय  नियत  था  l  आरम्भ  से  ही  टाइमटेबिल   बनाकर  कार्य  करने  कि  उनकी  आदत  थी  l  उनकी  महानता  का ,  उपलब्धियों  का  यही  रहस्य  था  l  उन्हें   ' भारत  रत्न ' से  सम्मानित  किया  गया  था   l
  श्री  विश्वेश्वरैया  प्रथम  श्रेणी  के  डिब्बे  में  सफर  कर  रहे  थे  l उसी  में  कुछ  अंग्रेज  भी  थे  l  अचानक  वे  हड़बड़ा कर  उठे  और  गाड़ी  खड़ी  करने  के  लिए  जंजीर  खींचने  लगे  l  अंग्रेजों  के  मना  करने  पर  भी  वे  न   माने  और  जंजीर  खींचकर  गाड़ी  खड़ी  कर  दी  l  गार्ड  सहित  रेल - कर्मचारी  आये  और  गाड़ी  रोकने  का  कारण  पूछा  तो  श्री  विश्वेश्वरैया  ने  कहा --- "कुछ  ही  आगे  रेल  की  पटरी  ख़राब  हो  गई  है  ,  गाड़ी  उलट  जाने  का  खतरा  है  l "  किसी  को  उनके  इस  कथन  पर  विश्वास  नहीं  हुआ  तो  उन्होंने  कहा ---- " मैं  हर  बात  को  बहुत  गंभीरता    से  सोचने  और  परखने  का  अभ्यस्त   रहा  हूँ    l  रेल  के  पहिये  और  पटरी   के  घिसने  से  जो  आवाज  निकलती  है  ,  वह  बताती  है  कि  आगे  पटरी  खराब  पड़ी  है  l  "  उन्होंने  कहा  कि  इस  कारन  गाड़ी  बहुत  धीरे  और  सावधानी  से  चलानी  चाहिए  l 
  उस  समय  तो  किसी  ने  उनकी  बात  का  भरोसा  नहीं  किया   किन्तु  थोड़ी  दूर  जाने  पर  जब  पटरी  उखड़ी   पाई  गई  तो  सब  अवाक  रह  गए   और  यात्रियों  की  जान   बचाने   का  धन्यवाद  देते  हुए  उन्हें  भविष्यवक्ता  कहने  लगे  l  विश्वेश्वरैया  यही  कहते  रहे कि --- "   गंभीरता  पूर्वक  सामान्य  बातों  को    भी  ध्यान  से  समझने   और  जानने  का  प्रयत्न  करने  वाला  हर   व्यक्ति   भविष्य वक्ता  हो  सकता  है   l  '                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                        

11 November 2017

WISDOM ------ सामाजिक मूल्य एवं आदर्श श्रेष्ठ व्यक्तित्व संपन्न महान व्यक्तियों के माध्यम से ही सुरक्षित रहते हैं l

वर्तमान  समय  में  श्रेष्ठ  व्यक्तित्व  संपन्न  मनीषियों  और  विचारकों  के  अभाव  के  कारण  समाज  रुग्ण और  जर्जर  हो  चुका  है  l  यदि  वातावरण   मूल्यहीनता  रूपी  प्रदूषण  से  ओत-प्रोत  हो  तो  समाज  में  अनैतिक  और  स्वार्थी  व्यक्तियों  की  भरमार  होती  है  l  आज  स्वार्थ  सर्वोपरि  हो  गया  है  और  मूल्य ,  नीति,  आदर्श  व  परम्पराएँ   बीते  दिनों  की  बातें  बन  गई  हैं   l   ऐसे  श्रीहीन  समाज में  अनीति ,  आतंक  और  अत्याचार  पनपते  हैं   l  समाज  में  शूरवीरों  की  संख्या  घटने  लगती  है   और  लोगों  में  कायरता  बढ़ने  लगती  है  l   इस  जर्जर  समाज  को  पुनर्जीवित  करने  के  लिए  समर्थ  मार्गदर्शकों  की  आवश्यकता  है  l 

10 November 2017

WISDOM ------ दुःख को सकारात्मक भाव से लिया जाये तो मन सशक्त होता है

    यदि  दुःख  को  सकारात्मक  भाव  से  लिया  जाये  तो  मन  धुलता  है , सशक्त  होता  है  l  महर्षि  अरविन्द  पांडिचेरी  तो  पहुँच  गए  ,  पर  वहां  उनकी  21  दिन  तक  खाने  की  कोई  सही  व्यवस्था  नहीं  हो  पाई  l  कई  बार  तो  मात्र  पानी  पीकर  ही  रह  जाते  थे  l  उनने  मोतीलाल  राय  को  उन  दिनों  एक  पत्र  में  लिखा  था ---- " भगवान  को  अंतिम  समय  में  मदद  करने  की  आदत  पड़  गई  है  l  मेरे  साथ  आये  सभी  कष्ट  में  हैं  ,  पर  यह  भी  तप  है  ,  यह  मानकर  सभी  मेरे  साथ  प्रसन्न  भाव  से  रह  रहे  हैं  l "  उन  दिनों  भी  श्री  अरविन्द  अपनी  दिनचर्या  के  अंतर्गत  नित्य  चार  मील  टहलते  थे  l  छ:  घंटे  साधना  करते  थे  l
    सोच  सकारात्मक  हो  और  ईश्वर  पर  अटूट  विश्वास  हो   तो  दुःख  को  ईश्वरीय  विधान  मानकर  खुशी  से  स्वीकार  करने  से  मन  शान्त  रहता  है  l 

8 November 2017

WISDOM ----- कृपण नहीं उदार बने

  कृपणता  एक  ऐसी  बुद्धिहीनता  है  कि  व्यक्ति  सारी  सुविधाएँ  होते  हुए  भी  स्वयं  क्षुद्रता  के  साथ  जीता  है   और  साथ  ही  किसी  अन्य  का  भी  कोई  लाभ  नहीं  कर  पाता ,  संसाधनों  के  होते  हुए  भी   कृपण  व्यक्ति  अभाव  के  मार्ग  का  चयन  करता  है   l  कृपणता  एक  ऐसी  मानसिकता  है  जो  धन  का  संग्रह  तो  करवाती  है  ,  लेकिन  उसका  उपयोग  करना  नहीं  सिखाती  l
  इस  सम्बन्ध  में  एक  कथा  है ---- एक  गाँव  में  एक  वृद्ध  महिला  थी  जो  अपने  छोटे  से  परिवार  के  साथ  रहती  थी  l  उसके  पास  इतना  खेत  था  कि  एक  वर्ष  की  फसल  तैयार  हो  जाती  थी  l   एक  बार  उसने  धान  का  चावल  करवाया  तो  ज्ञात  हुआ  कि  वर्ष  के  365  दिनों  में  से  364  दिन   का  ही  चावल  है ,  एक  दिन  के  लिए  चावल  कम  पड़  रहा  है  l  उसे  बड़ी  चिंता  हो  गई  कि  इस  एक  दिन  की  कमी  कैसे  पूरी  करे  l बहुत  सोच  कर  उसने  तय  किया  कि    आज  पहले   दिन  भूसी  खा  लें  ,  ताकि  शेष  364  दिन  सुख पूर्वक  कट  जाएँ  l  यह   सोचकर  वह  भूसी  खाकर ,  पानी  पीकर  सो  गई  l  वृद्ध  महिला  के  पेट  में  भूसी  इतनी  फूल  गई  कि  वह  पचा  न  सकी  और  वहीँ  मर  गई   l   
      संग्रहकर्ता  की  सोच  बहुत  संकीर्ण  होती  है    लेकिन  जिन्हें  ईश्वर  पर  विश्वास  है  वे  उदार  बनकर  जीते  हैं   l  जो  कुछ  अपने  पास  है  उसे  जरुरतमंदों  को  देना   उदारता    है  l  उदार रहने  पर  व्यक्ति  को  आंतरिक  संतोष  प्राप्त  होता  है   और  वह  बाहरी  सम्पदा  से  ओत-प्रोत  रहता  है   l 

7 November 2017

WISDOM ---- दुष्कर्म और अहंकार का परिणाम भीषण और भयावह होता है l

  ' सत्ता  होती  ही  ऐसी  है  कि  व्यक्ति  को  यथार्थ  से  परे   सांतवें  आसमान  में  पहुंचा  देती  है  , परन्तु  जब  वह  वहां  से  गिरता  है   तो  उसके  अस्तित्व  का  भी  पता  नहीं   चलता  है   l '
  औरंगजेब  के  क्रूर  अत्याचार  से  सर्वत्र  हाहाकार  मचा  हुआ  था  l  वह  स्वयं  खुदा  बन  बैठा  था  l  जो  कोई  उसकी  खुदाई  को  सलाम  न  करे , उसके  सामने  न  झुके  , वह  उसका  समूल  नाश  कर  देता  था  l  वह  अपने  बड़े  भाई  दाराशिकोह  को  अपना  सबसे  बड़ा  दुश्मन  समझता  था  l  उसने  दाराशिकोह  तथा  उससे  संबंधित  सभी  फकीरों  को  मृत्यु  या  भीषण  दंड  दिया  था  l  अब  इसी  क्रम  में  वह   लाल  बाबा  के  पास  आया  और  अपने  अहंकार  में  चूर  होकर  बोला ---- " बाबा ! तुम  तो  अपने  आप  को  बड़ा  महान  कहते  हो  , देखो  मैंने  दाराशिकोह  और  उसके  बेटे  की  हत्या  कर  दी  ,  उसके  गुरु  शरमन  को  भी  मार  गिराया   l  सुना  है  शर्मन  के  पास  अपार  शक्ति  थी  फिर  भी  वह  मेरा  बाल  बांका  भी  नहीं  कर  सका  l  अब  तुम्हारी  बारी  है   l "
  लाल  बाबा  फ़क़ीर  थे  और  भगवान  के  भक्त  थे   l  अति  निडर  थे ,  उन्होंने  औरंगजेब  के  सिर  पर  एक  छड़ी   मारी  जिससे  वह  कुछ  क्षणों  के  लिए  दिव्य  और  सतरंगी  दुनिया  में  चला  गया  l  उसने  देखा  कि  दाराशिकोह  एक  ऊँचे  सिंहासन  पर बैठा  है, उसके  चेहरे  पर  दिव्य  प्रकाश  है  l     जन्नत  की  पवित्र  आत्माएं    उसकी (औरंगजेब )  की  और  इशारा  कर  कह  रहीं  हैं  कि  यह  कौन  सा  घिनौना , बदबूदार  इन्सान  यहाँ  आ  गया ,  इसे  यहाँ  से  रुखसत  करो   l  दाराशिकोह  के  सामने  उसे  उपेक्षा ,  अपमान  और   तिरस्कार  की  द्रष्टि  से  देखा  जा  रहा  है  l " बाबा  ने   यह    सब  औरंगजेब   के  गरूर  और  दंभ  को  तोड़ने  तथा  दाराशिकोह  के  सत्कर्मों  के  प्रभाव  को  दिखाने  के  लिए  किया  था  l  यह  सब  देख  औरंगजेब  छटपटाने  लगा   l  बाबा  ने  उससे  कहा --- तुम  षड्यंत्र  रचते  हो ,  हत्या  करते  हो  ,  तुम्हे  दोजख  की  आग  में  जलने  से  कोई  नहीं  रोक  सकता  l                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

6 November 2017

WISDOM ------ जो ईश्वर से भय खाता है उसे दूसरा भय नहीं सताता l

   भय  का  सबसे  घ्रणित  पहलू  अपने  स्वार्थ  के  लिए  ,  दूसरों  पर  छाये  रहने   की    भावना  से  अधीनस्थ  लोगों  का  शोषण   करना   है  l   वैराग्य शतक  में   भतृहरि  ने  भय  की  स्थिति  का  बड़ा  सूक्ष्म  विश्लेषण   किया  है ---- ' भोग  में  रोग  का भय  है ,  सत्ता  में  गिरने  का  भय ,  धन  में  चोरी  होने  का  भय ,  सौन्दर्य  में  बुढ़ापे  का  भय ,  शरीर  में  मृत्यु  का  भय  l  इस  तरह  संसार  में  सब  कुछ  भय  से  युक्त  है  l   उनके  अनुसार  त्याग  का  मार्ग  ही  निर्भयता  की  अवस्था  की  ओर  ले  जाता  है   l 

5 November 2017

धर्म की सार्थकता इसमें है कि वह उन्नत और सदाचारी जीवन यापन की पद्धति को दर्शा सके ----- खलील जिब्रान

 उनका  कहना  था  कि  ऐसा  धर्म  जो  गरीब  और  असहाय  लोगों  का  गला  काटता  है  ---- धर्म  नहीं  कुधर्म  है   l  उन्होंने  आडम्बर  का  जमकर  विरोध  किया  l  जिस  पूजा पाठ  में   मानवता  को  विकसित  होने  के  द्वार  ही   बंद  कर  दिए  गए  हों  ,  वहां  भला  ईश्वर  की  अनुभूति  कहाँ  संभव  थी   l  धर्म  का   जो  आडम्बर युक्त  स्वरुप   आज  चल  रहा  है   वह  उस  विनाश  और  धरती  पर  निरंतर  बढ़ते  नारकीय  वातावरण   को  रोक  नहीं  सकता   क्योंकि  उसमे  उस  वैचारिक  सम्पदा  और  अध्यात्म  की  प्रेरणा  शक्ति  का  अभाव  होता  है   l