संसार के जितने भी उन्नत और विचारशील देश हैं , वे सब एकाएक ही उन्नत या समृद्ध नहीं हो गए वरन उन्हें ऊँचा उठाने के लिए कितने ही प्रबुद्ध व्यक्तियों ने अपना असाधारण योगदान दिया है l बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक पच्चीस - तीस वर्षों तक रूस की तीन चौथाई से भी अधिक जनसँख्या अशिक्षित थी l फिर 1917 में वहां क्रान्ति हुई , जिसे सफल बनाने में रूस के बुद्धिजीवियों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की l उस क्रांति की सफलता के पीछे पढ़े - लिखे विचारशीलों की लगन , निष्ठा , परिश्रम और त्याग था l उनका एक ही उद्देश्य था -- राष्ट्र में वैज्ञानिकों , लेखकों , कलाकारों एवं विशेषज्ञों के अभाव की पूर्ति करते हुए राष्ट्र का नव निर्माण l इस आन्दोलन में लेनिन , कोस्तांतिन , इवान पावलोव जैसे व्यक्ति अगुआ थे l इनके अथक परिश्रम और अपूर्व त्याग का परिणाम यह हुआ कि 1960 तक पहुँचते - पहुँचते प्रत्येक व्यक्ति औसत शैक्षणिक योग्यता के साथ राष्ट्र प्रेम अर्जित कर चुका था , और आज रूस की सुद्रढ़ स्थिति से समूचा संसार परिचित है l समाज का मस्तिष्क कहे जाने वाले बुद्धिजीवी , जनमानस को जिस प्रकार का मार्गदर्शन देते हैं , लोकजीवन वैसी ही धारा अपनाता है l
25 March 2018
24 March 2018
WISDOM ----- ' ऐसा धर्म जो गरीब और असहाय लोगों का गला काटता है -- धर्म नहीं कुधर्म है ---- सन्त खलील जिब्रान
खलील जिब्रान ने कहा कि जो धार्मिक सिद्धांत , कर्मकांड मनुष्यता से परे हैं , जिस पूजा - पाठ में मानवता को विकसित होने के द्वार बंद कर दिए हों , वह धर्म नहीं पाखण्ड है l
' बढ़ती हुई भौतिक और वैज्ञानिक प्रगति के साथ यदि मानवता और अध्यात्मवादिता को नहीं अपनाया गया तो यह दुनिया किसी भी दिन विनष्ट हो सकती है l '
इस कटु सत्य को दार्शनिक खलील जिब्रान ने भली प्रकार समझा था l उन्होंने अपने ' निफ्स ऑफ वेली ' नामक संग्रह में इस सत्य को उद्घाटित किया कि -- आनंद और सुख समृद्धि मात्र भौतिक प्रगति में निहित नहीं है l
धर्म का जो आडम्बर युक्त स्वरुप आज चल रहा है वह उस विनाश और धरती पर निरंतर बढ़ते नारकीय वातावरण को रोक नहीं सकता क्योंकि उसमे वैचारिक सम्पदा और आध्यात्मिक प्रेरणा शक्ति का अभाव होता है l
' बढ़ती हुई भौतिक और वैज्ञानिक प्रगति के साथ यदि मानवता और अध्यात्मवादिता को नहीं अपनाया गया तो यह दुनिया किसी भी दिन विनष्ट हो सकती है l '
इस कटु सत्य को दार्शनिक खलील जिब्रान ने भली प्रकार समझा था l उन्होंने अपने ' निफ्स ऑफ वेली ' नामक संग्रह में इस सत्य को उद्घाटित किया कि -- आनंद और सुख समृद्धि मात्र भौतिक प्रगति में निहित नहीं है l
धर्म का जो आडम्बर युक्त स्वरुप आज चल रहा है वह उस विनाश और धरती पर निरंतर बढ़ते नारकीय वातावरण को रोक नहीं सकता क्योंकि उसमे वैचारिक सम्पदा और आध्यात्मिक प्रेरणा शक्ति का अभाव होता है l
23 March 2018
WISDOM ------
ईश्वर किसी को सम्पदा , विभूति अथवा सामर्थ्य देता है तो निश्चित रूप से उसके साथ कोई न कोई सद्प्रयोजन जुड़ा होता है l मनुष्य को समझना चाहिए कि वह विशेष अनुदान उसे किसी समाज उपयोगी कार्य के लिए ही मिला है l अत: उस पर अपना अधिकार न मानकर सम्पूर्ण समाज का अधिकार मानना चाहिए l जहाँ वह व्यक्तिगत सम्पदा - सामर्थ्य मान लिया जाता है वहीँ वह अहंकार का कारण बन जाता है l यह अहंकार ही व्यक्ति के पतन का कारण बनता है l
22 March 2018
WISDOM --------
' स्वार्थी , अनीतिवान तथा कायर व्यक्ति के पास छल , कपट के सिवाय और कोई सम्बल नहीं होता l ऐसे व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए शत्रुओं के प्रति तो बड़े सच्चे और वफादार रहते हैं लेकिन अपने देश और समाज के प्रति नहीं रह पाते l जिस सच्चाई और भक्ति का प्रमाण वे विपक्षियों के हित साधन में देते हैं , उसका प्रमाण यदि वे देश , धर्म तथा समाज हित में दें तो उनका अधिक सम्मान व अधिक लाभ हो सकता है लेकिन जिनके संस्कार विकृत होते हैं उन्हें शत्रुओं की चाटुकारी करने और अपनों को हानि पहुँचाने में ही सुख - संतोष अनुभव होता है l
21 March 2018
WISDOM ----- जिसका आचरण शुद्ध, चरित्र उज्ज्वल और मन्तव्य नि:स्वार्थ है उसके विचार तेजस्वी होंगे, जिन्हें कोई भी व्यक्ति स्वीकार करने के लिए सदैव तत्पर रहेगा
साधारणत: मनुष्य अपने संस्कारों के प्रति बड़ा दुराग्रही होता है l बुरे से बुरे अनुपयोगी तथा अहितकर संस्कारों के स्थान पर वह शुभ एवं समय सम्मत संस्कारों को आसानी से सहन नहीं कर पाता l समाज में इस प्रकार के प्राचीन संस्कार रखने वाले लोगों की कमी नहीं होती और वे उनके प्रति किसी सुधार का सन्देश सुनते ही अनायास ही संगठित होकर नवीनता के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं l ऐसे अवसर पर किसी शक्ति का सहारा लेकर उन्हें नवीन संस्कारों में दीक्षित करने का प्रयत्न किया जाता है तो एक संघर्ष की स्थिति पैदा हो जाती है जिससे समाज अथवा राष्ट्र शक्तिशाली होने के बजाय निर्बल ही बन जाता है l
अत: समझदार समाज सुधारक , बुद्धिमान राष्ट्र नायक विचार बल से ही किसी परिवर्तन को लाने का प्रयत्न किया करते हैं l हठ से हठ का जन्म होता है l किसी बाह्य शक्ति का सहारा लेने की अपेक्षा अपने उन विचारों को ही तेजस्वी बनाना ठीक होता है जिनको कोई हितकर समझकर समाज अथवा व्यक्ति में समावेश करना चाहता है l
जिसका आचरण शुद्ध , चरित्र उज्ज्वल और मन्तव्य नि:स्वार्थ है , उनके विचार तेजस्वी होंगे , जिन्हें क्या साधारण और क्या असाधारण कोई भी व्यक्ति स्वीकार करने के लिए सदैव तत्पर रहेगा l
अत: समझदार समाज सुधारक , बुद्धिमान राष्ट्र नायक विचार बल से ही किसी परिवर्तन को लाने का प्रयत्न किया करते हैं l हठ से हठ का जन्म होता है l किसी बाह्य शक्ति का सहारा लेने की अपेक्षा अपने उन विचारों को ही तेजस्वी बनाना ठीक होता है जिनको कोई हितकर समझकर समाज अथवा व्यक्ति में समावेश करना चाहता है l
जिसका आचरण शुद्ध , चरित्र उज्ज्वल और मन्तव्य नि:स्वार्थ है , उनके विचार तेजस्वी होंगे , जिन्हें क्या साधारण और क्या असाधारण कोई भी व्यक्ति स्वीकार करने के लिए सदैव तत्पर रहेगा l
20 March 2018
WISDOM------
जो लोग वर्तमान में ही भविष्य की तैयारी नहीं करते , आलस्य एवं उपेक्षा में पड़े सपने देखा करते हैं , वे अदूरदर्शी होते हैं और एक तरह से जीवन - पथ पर असफलता के बीज बोने जैसी भूल करते हैं l समय रहते पहले से तैयारी कर लेने पर निर्धारित योजनाओं में सौभाग्य का समावेश होना स्वाभाविक ही होता है l
19 March 2018
WISDOM ----- कुटिल की मित्रता और अपना अति अभिमान व्यक्ति , परिवार और राज्य पर संकट का कारण होता है
राजा जसवंतसिंह जोधपुर के राजा थे l उन्हें अपनी वीरता पर आवश्यकता से अधिक गर्व था l इतिहास इस बात का साक्षी है कि राजपूत चरित्र , वीरता , साहस , शौर्य और आन - बान में बहुत श्रेष्ठ थे l परन्तु एकता की भावना का उनमे अभाव था l उनके मिथ्याभिमान और अविवेक का लाभ मुगलों ने उठाया l
जब अन्यायी औरंगजेब ने राजा जसवंतसिंह से मित्रता का हाथ बढ़ाया तो राजा जसवंतसिंह ने इसे स्वीकार कर लिया l उन्होंने यह सोचने का प्रयास नहीं किया कि यह क्रूर ,निर्दयी , अन्यायी औरंगजेब जब अपने पिता को कैद कर सकता है , भाइयों को कत्ल करवा सकता है तो समय आने पर उन्हें भी दगा दे सकता है l उनके परिवार पर संकट ला सकता है , उनका राज्य हथिया सकता है l उन्होंने औरंगजेब के दरबार में रहना स्वीकार कर लिया l जसवंतसिंह की वीरता और पराक्रम से औरंगजेब ने जी भरकर लाभ उठाया l वह शंकालु प्रवृति का था और भीतर ही भीतर वह उनके पराक्रम से भयभीत रहता था l औरंगजेब ने जसवंतसिंह को ही नहीं , उसके पुत्रों को भी धोखे से मरवा दिया , जोधपुर का राज्य भी उसने हथिया लिया l उनकी रानी और नवजात शिशु अजीतसिंह को स्वामिभक्त वीर दुर्गादास औरंगजेब के चंगुल से बचाने में सफल रहे , अन्यथा उनका वंश ही मिट जाता l
राजा जसवंतसिंह के पास जो बल विक्रम था , वह सही दिशा में न होकर गलत दिशा में प्रयुक्त हुआ l वह स्वयं उनके लिए , उनकें परिवार के लिए और राज्य के लिए निरुपयोगी ही सिद्ध हुआ l उसका लाभ उठाकर औरंगजेब ने अपना स्वार्थ सिद्ध किया l
' अत: सच्चाई , ईमानदारी और नैतिकता को व्यक्तिगत क्षेत्र में ही उपयोगी और अपने अहं का कारण ही नहीं बनाना चाहिए l सच्चे लोगों को संगठित होना चाहिए l यह भी देखना चाहिए कि उसका लाभ गलत व्यक्ति तो नहीं उठा रहें हैं l नहीं तो ये अच्छाइयाँ भी राजा जसवंतसिंह के पराक्रम की तरह निरर्थक चली जाएँगी l
जब अन्यायी औरंगजेब ने राजा जसवंतसिंह से मित्रता का हाथ बढ़ाया तो राजा जसवंतसिंह ने इसे स्वीकार कर लिया l उन्होंने यह सोचने का प्रयास नहीं किया कि यह क्रूर ,निर्दयी , अन्यायी औरंगजेब जब अपने पिता को कैद कर सकता है , भाइयों को कत्ल करवा सकता है तो समय आने पर उन्हें भी दगा दे सकता है l उनके परिवार पर संकट ला सकता है , उनका राज्य हथिया सकता है l उन्होंने औरंगजेब के दरबार में रहना स्वीकार कर लिया l जसवंतसिंह की वीरता और पराक्रम से औरंगजेब ने जी भरकर लाभ उठाया l वह शंकालु प्रवृति का था और भीतर ही भीतर वह उनके पराक्रम से भयभीत रहता था l औरंगजेब ने जसवंतसिंह को ही नहीं , उसके पुत्रों को भी धोखे से मरवा दिया , जोधपुर का राज्य भी उसने हथिया लिया l उनकी रानी और नवजात शिशु अजीतसिंह को स्वामिभक्त वीर दुर्गादास औरंगजेब के चंगुल से बचाने में सफल रहे , अन्यथा उनका वंश ही मिट जाता l
राजा जसवंतसिंह के पास जो बल विक्रम था , वह सही दिशा में न होकर गलत दिशा में प्रयुक्त हुआ l वह स्वयं उनके लिए , उनकें परिवार के लिए और राज्य के लिए निरुपयोगी ही सिद्ध हुआ l उसका लाभ उठाकर औरंगजेब ने अपना स्वार्थ सिद्ध किया l
' अत: सच्चाई , ईमानदारी और नैतिकता को व्यक्तिगत क्षेत्र में ही उपयोगी और अपने अहं का कारण ही नहीं बनाना चाहिए l सच्चे लोगों को संगठित होना चाहिए l यह भी देखना चाहिए कि उसका लाभ गलत व्यक्ति तो नहीं उठा रहें हैं l नहीं तो ये अच्छाइयाँ भी राजा जसवंतसिंह के पराक्रम की तरह निरर्थक चली जाएँगी l
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