14 October 2018

WISDOM -----------------

  एक  कुष्ठी  भिक्षा  मांग  रहा  था  l  उधर  से  जो  कोई निकलता  ,  कुष्ठी  अपना  हाथ  फैलाकर  कहता  ,  जो  दे  उसका   भी  भला  , और  जो  न  दे  उसका  भी  भला    l   एक  युवक  ने    सिक्का  उसके  हाथ  पर  डालते  हुए  कहा --- " क्यों  भाई  !  तुम्हारा पूरा  शरीर  गला  जा  रहा  है  l  हाथ और  पैर  की  उँगलियाँ  तक  ऐसी  नहीं  रहीं   कि कुछ  कार्य  कर  सको  l  फिर  इस  कष्ट  में   जीवन  जीने  से क्या  लाभ  ?   यह  तो जीवित  अवस्था  में   लाश  ढोने जैसी  स्थिति  है  l
  कुष्ठी  ने  कहा ------ मित्र  !  तुम  बात  तो  ठीक  कहते  हो   l  पर  मुझे  ऐसा  लगता  है  कि  ईश्वर  इसलिए  जीवित  रखे  हुए  है  कि  लोग  कम  से  कम  मुझे  देखकर  समझ   सकें  कि----- इस  संसार में  कभी  भी   तू  मेरे   जैसा   हो  सकता    है   l  अत:  इस  संसार  में   काया  की  सुन्दरता  का  घमंड  करने  से  कोई  लाभ नहीं  है   l 

13 October 2018

WISDOM ---------------------

   प्राचीन  काल   में  जब  राजतन्त्र  था  ,  तब  राजा  वेश  बदलकर   राज्य  में  भ्रमण  करते  और   सही  स्थिति  को समझकर   अपनी  प्रजा  के   कष्टों  को  दूर करने   का  प्रयास  करते  थे  l  ऐसे  में  कभी  राजा  को  सामान्य जनों  से  महत्वपूर्ण  शिक्षा  भी  मिल  जाती  थी   l   इस  सम्बन्ध  में  एक  कथा  है -----
    एक  बार  राजा  जनमेजय  वेश  बदलकर  भ्रमण    करते   हुए  एक  गाँव  से  गुजरे  l   वहां  उन्होंने  देखा  कि  कुछ  किशोर  खेल  रहे  हैं  l  उनमे  से  एक  शासक  बना  है  और  अन्य  सभासद  l  शासक  बना  किशोर   जिसका  नाम  है  ' कुलेश '  सभासदों  को  संबोधित  करते  हुए  कह  रहा  है ---- "  सभासदों  !  जिस  राज्य  के कर्मचारीगण    वैभव - विलास  में  डूबे  रहते  हैं  ,  उसका  राजा  कितना  ही  नेक  और  प्रजावत्सल  क्यों  न  हो  ,  उस  राज्य  की  प्रजा   कभी  सुखी  नहीं  रहती  l  मैं  चाहता  हूँ  ,  जो  भूल  जनमेजय  के  राज्याधिकारी  कर  रहे  हैं  ,  वह  आप  लोग  न  करें  ,  ताकि  मेरी  प्रजा  असंतुष्ट  न  हो  l  आप  सबको  वैभव - विलास  का  जीवन  छोड़कर   त्यागपूर्वक  जीवन  जीना  चाहिए   l  जो  ऐसा नहीं  कर  सकता ,  वह  अभी  शासन  सेवा  से  अलग  हो  जाये  l  "  
   राजा  जनमेजय  उस  किशोर  के  गंभीर  चिंतन  से   बहुत  प्रभावित  हुए   और  उसे  महामंत्री  का  पद  प्रदान  किया  l   उसके  महामंत्रित्व   काल  में   अन्य    मंत्रियों ,  सामंतों   एवं  राज्य - कर्मचारियों  के  लिए  आचार - संहिता   बनाई  गई  ,  अतिरिक्त  आय  के  स्रोत  बंद  कर  दिए  गए  ,  इससे  बचा  हुआ  धन  प्रजा  की  भलाई  में  लगने  लगा  ,  कर्मचारी  व जनता  सभी के  लिए  परिश्रम  अनिवार्य  कर  दिया  गया   l  समस्त  प्रजा  में  खुशहाली  छा  गई  l  

12 October 2018

WISDOM ------- आडम्बर नहीं , आचरण है धर्म

 ' धर्म  हमें  त्याग  और  तपस्या  का  पाठ  पढ़ाता  है  l   धर्म  उस  संवेदनशीलता  का  पर्याय   है  ,  जिसमे  हम  दूसरों  के  सुख - दुःख ,  कष्ट - कठिनाइयों  का  अनुभव  करते  हैं   l  '
   एक  व्यक्ति  प्रतिदिन  महात्मा  बुद्ध   के  प्रवचन  सुनने   जाता  था  l  उसका  यह  क्रम  एक  माह  तक  चला  ,  लेकिन  उसके  जीवन  पर  कोई  प्रभाव  न  पड़ा  l  एक  दिन  उसने   परेशान  होकर   भगवन  बुद्ध  से  कहा  ---- " भगवन  !  मैं  एक  माह  से   आपका  प्रवचन  सुन  रहा  हूँ  ,  परन्तु  मुझे  अपने  जीवन  में  कोई  अंतर  दिखाई  नहीं  पड़ा  l  "
  बुद्ध  बोले ----- "  ज्ञान  को  आचरण  में  लाए  बिना   व्यक्तित्व  का  रूपांतरण   असंभव  है  l   जो  सुनते  हो  उसे  अपने  जीवन  में  धारण  करो  ,  तभी  परिवर्तन  दिखाई  पड़ेगा   l  "  

11 October 2018

WISDOM ------ शासक स्तर के व्यक्ति को बुद्धि , शक्ति और चरित्र जैसी विभूतियों से संपन्न होना चाहिए ---- चाणक्य

 चाणक्य  द्वारा  लिखित  ' अर्थशास्त्र '    राज्य  व्यवस्था  का  प्रमुख  मार्गदर्शक  माना  जाता  है  l   चाणक्य  ने  अपने  निष्ठावान  शिष्य  चन्द्रगुप्त  को  शस्त्र  और  शास्त्र  दोनों  की  शिक्षा  दी  l  उसके  साथ  ही   चरित्र  गठन  की  ओर  भी  ध्यान  दिया  l  उनका  मत  था  कि  चरित्र  ही  समस्त  सफलताओं  और  सदुद्देश्यों  को  प्राप्त  करने  का  मुख्य  आधार  है  l  इसके   अभाव  में  बड़े - बड़े   शक्तिशाली  साम्राज्य   और  सम्राटों  का  नाश  और  पतन  हुआ  है  l   साधारण  से  साधारण  व्यक्ति  के  लिए   भी  चरित्र  उतना  ही  उपयोगी  है   जितना  कि  उच्च  प्रतिष्ठित  और  शासन  तथा  अधिकारियों  के  लिए   क्योंकि  चिरस्थायी  शान्ति   और  अपने  उत्तरदायित्व   को  समझने  तथा  उसे  पूरा  करने  की  क्षमता  चरित्र - साधना  से  ही  उत्पन्न  होती  है  l  
  यथा  राजा   तथा  प्रजा   के  अनुसार  चन्द्रगुप्त  के  शासन  काल  में   लोग  भी  उतने  ही  सदाचारी  और  एक  दूसरे  का  ध्यान  रखने  वाले  हो  गए  थे   l   बाहर  का  कोई  भी  शत्रु   राष्ट्र  की  सीमा  को  वेध  नहीं  सकता  था   l   चन्द्रगुप्त  मौर्य  ने  भारतीय  इतिहास  में   एक  स्वर्ण  अध्याय  ---- अपनी  कर्म  लेखनी  से  लिख  डाला  l  

9 October 2018

WISDOM ------ सुख - शांति से जीना है तो जीवन जीने का ढंग रूपांतरित करना होगा

 संसार  में   ऐसे  बहुत  लोग  हैं    जिनके  पास  दूसरों  की   कमियां  निकलना ,  दूसरों  की  निंदा  करना ,  उन्हें   नीचा  दिखाना  ही  सबसे  बड़ा  काम  है  l  ऐसे  लोगों  को  बदला  नहीं  जा  सकता   , लेकिन  यदि  हम  अपने  जीवन  जीने  के  ढंग  को  रूपांतरित  कर  लें ,  अपने  आत्मबल  को  मजबूत  बना  लें  तो  उनके  सारे   प्रयास   विफल  हो  जायेंगे  ,  हमें  प्रभावित न  कर  सकेंगे  और  हम   अपने  आनंद    में  मग्न  रहेंगे  l 
  इसे  समझाने   की  एक    कथा  है ----     पहाड़ियों  के  नीचे  की   घाटियों   में  बसा  एक  गाँव  था  l  उस  गाँव  के  लोग  बड़े  कष्ट  में  थे  l  वर्षा  होती ,  नदियों  में  बाढ़  आती  तो  सब  खेती - बारी  नष्ट  हो  जाती ,  जानवर  बह  जाते , बच्चे  डूब  जाते , आंधी  आती  तो  पहाड़  से  पत्थर  गिरते , लोग  दब  कर  मर  जाते  l  उस  गाँव  के  लोगों  ने  यह  मान  लिया  था  ऐसा  कष्टप्रद  जीवन  उनके  पुरखों  ने  जिया  , अब  वे  जी  रहे  हैं  ,  उनके  बाद  उनके  बच्चे  भी  ऐसी  मुसीबत  की  गाथा  कहकर  जीवन  जीने वाले  हैं  l 
           लेकिन   एक    दिन  एक  यात्री  उस  पहाड़ी  गाँव  में  पहुंचा  l  उसने  उन्हें  समझाया   कि  तुम  सब  नासमझी  का  जीवन  जी  रहे  हो  l  तुम  सब  इस  खाईनुमा  घाटी  को  छोड़ो  और  अपने  मकान  थोड़ी  ऊँचाइयों  पर  बनाओ  l  ये  जो  चारों  और  सुन्दर  पहाड़  हैं  उनके  उतार  पर  अपने  मकान  बनाओ  l 
 पुराने  जीवन  के  ढंग  को  बदलने  के  लिए  बड़ी  हिम्मत  चाहिए  l  गाँव  वालों  ने  अनेक  तर्क  किये  कि  वर्षा ,  आंधी , बाढ़  को  रोका  नहीं  जा  सकता  ,  कैसे  समस्या   हल  होगी  ?  यात्री  ने  कहा ,  ऊंचाई  पर  मकान  बनने  से  नीचे  घाटी  वाली  समस्या  नहीं  रहेंगी ,  समस्याओं  का  स्वरुप  असहनीय  नहीं  रहेगा  l    गाँव  के  लोग  हिम्मती  थे  l  उन्होंने  अपने  जीवन में ,  अपने  मकानों  की  स्थिति  में  परिवर्तन  कर  लिया  इस  बदली  हुई  स्थिति  से  उन्हें  बड़ा  आश्चर्य  हुआ  ------- वर्षा  खूब  हुई ,    नदियाँ  भी  उफनी ,  आंधियां  भी  उठी ,  पहाड़  से  पत्थर  भी  गिरे    लेकिन  अब  उनके  मकान  न  बहे ,  बच्चे  भी  नहीं  डूबे,   जानवर  भी  सुरक्षित  रहे   और  पत्थरों  से  कोई  दबा  भी  नहीं      क्योंकि  उनके  जीवन  जीने  का  ढंग  रूपांतरित   हो  चुका  था  l  उन्होंने  अपने  इस  जीवन  का  भरपूर  आनंद  मनाया  l     

8 October 2018

WISDOM ---- पृथ्वी पर सद्गुण देह छूटने के बाद भी अमर रहता है l

  एक  बार  मालवा  के  राजा  भोज  अपने  रथ  से  उद्दान  की  और  जा  रहे  थे  ,  रास्ते  में  योगी  एवं  तपस्वी  गोविन्द  को  देखकर  उन्होंने   रथ  को  रोकने  का  आदेश  दिया   और  रथ  से  उतारकर  उनका  अभिवादन  किया  l  गोविन्द  ने  राजा  के  अभिवादन  का  उत्तर  न  देकर   अपनी  दोनों  आँखें  मूंद  लीं   l   गोविन्द  की  प्रतिक्रिया  से   विस्मित  राजा  ने  कहा  --- हे  महा तपस्वी  !  आपने  हमें  आशीर्वाद  देना  तो  दूर  ,  अपनी  आँखें  ही  बंद  कर  लीं   l  ऐसी  क्या भूल  हो  गई  हमसे    ?  कृपा  कर  के  स्पष्ट  करें  l 
  गोविन्द ने कहा --- "  सत्य  को  सह  पाना  बहुत  कठिन  होता  है  l  मैं  सत्य  वचन  कहता   हूँ   l  "
  राजा  भोज  ने  कहा --- "  आप  सत्य  कहें ,  मैं  सुनने  को  उत्सुक  हूँ  l  '
   महा तपस्वी ,  गायत्री  के  सिद्ध  साधक  गोविन्द  ने  कहा  ---- " राजन  ! लोकोक्ति   है  कि  प्रात:  किसी  कृपण  का  मुंह  देखकर  नेत्र  बंद  कर  लेना  चाहिए  ,  इसी  कारण  मैंने  अपनी  आँखें  मूंद  लीं  l  "
  अपनी  गलती  सुनना  भी  अत्यंत  साहस  का  काम  है   l  राजा  के  माथे  पर  पसीना  आ  गया  l  किसी  तरह  अपने    को  संयत  कर  राजा  भोज  ने  कहा --- : " हमने  तो  कईयों  को   दान  किया  , फिर  हम  कृपण  कैसे  हो  गए  l  ? "
  गोविन्द  ने  कहा --- "  आपने  जो  दान  दिया  वह  अपने  अहंकार  की  तुष्टि  के  लिए  दिया    जबकि  दान   किसी  सत्पात्र  को   उदारता  के  साथ  दिया  जाता  है   l  आपके  दिए  दान  में   उदारता  के  स्थान  पर अहंकार  का  पुट  है  l   आपने  दान  उसको  दिया   जिसे  उसकी  आवश्यकता  नहीं  थी ,  केवल  चाटुकारों  को  आपने  दान दिया   l    आप  राजा  हैं ,  राजा  प्रजा  का    भगवान  होता  है  l  जो  राजकोष  का  उपयोग  केवल   अपने   सुख - भोग ,  वासना - तृष्णा  की  पूर्ति  के  लिए  करता  है   , एक  दिन  उसका  पतन  सुनिश्चित  है   फिर  चाहे  वह   कितना  ही  धनबल , जन बल  और  बाहुबल  से  संपन्न  क्यों  न  हो  l  अत:  ऐसे  राजा  का  मुंह  नहीं  देखना  चाहिए  ,  इसीलिए  हमने  अपनी  आँखे  मुंद  लीं   l  "
  गोविन्द   बोल  रहे  थे  और  राजा  का  ह्रदय  सत्य  के  इन  बाणों  से  बिंधता  जा  रहा  था   l  गोविन्द  आगे  बोले ---- "  महाराज  ! प्रगल्भ  की  विद्दा , कृपण  का  धन  और  कायर  का  बहुबल  ---- ये  तीनो   व्यर्थ  हैं  , पर  सदगुण  देह   छूटने  के  बाद  भी   अमर  रहते    हैं   l 
तपस्वी  गोविन्द  के   वचन  सुन  कर  राजन  के  जीवन  को  एक  दिशा  मिली   l   उसने  अपने  धन  का  अधिकतम  उपयोग   प्रजा  के  हित में , जन कल्याण  में  किया  और  इतिहास  में  अमर  हो  गया  l  

6 October 2018

WISDOM ----- असंयम ही हमारे सभी प्रकार के दुःखों का कारण है l

 भगवान  बुद्ध  के  समय  का  एक  प्रसंग  है -----  एक  बार  एक  धनी  व्यक्ति  भगवान  बुद्ध  के  दर्शन  के  लिए  पहुंचा  l  उसका  शरीर  बहुत  भारी - भरकम  और  बेडौल  था  ,  उसे  चलने  व  झुकने  में  भी  बहुत  कठिनाई  थी  l  उसने  खड़े - खड़े  ही  भगवान  का  अभिवादन  किया   और  विनम्रता  से  बोला  ---- भगवन !  मेरा  शरीर  व्याधियों  का  घर   बन  चुका  है   l  रात  को  न  तो  नींद  आ  पाती  है  और  न  दिन  को  चैन  से  बैठ  पाता  हूँ    l  मुझे  रोगमुक्त  होने  का   कोई  उपाय  बताएं  l "
  भगवन  बुद्ध उसकी  और  करुणा भरी  द्रष्टि  से  देखते  रहे    फिर  बोले ---- " भंते  ! प्रचुर  भोजन  करने  से   उत्पन्न  आलस्य  और  निद्रा ,  भोग  व  अनंत  इच्छाओं  की  कामना,  शारीरिक  श्रम  का  अभाव---- ये  सब  रोग  पनपने  के  कारण  हैं  l   जीभ  पर  नियंत्रण  रखने  ,  संयमपूर्वक  सादा  भोजन  करने ,  शारीरिक  श्रम  करने  ,  सत्कर्म  करने  और   अपनी  इच्छाएं  सीमित  करने  से  ये  रोग विदा  हो  जाते  हैं  l   असीमित  इच्छाएं   शरीर    को   घुन  की  तरह  जर्जर  बना  डालती  हैं  ,  इसलिए  उन्हें  त्यागो   l  '
  सेठ  ने  भगवान  बुद्ध  की  बातों  का  मर्म  समझा   और  उनके  पालन  करने  का  संकल्प  लिया   l   इन  वचनों  को  जीवन  में  धारण   करने  के  साथ    संयमित  जीवन  शैली   को  अपनाकर   वह  सेठ  कुछ  दिनों  में  स्वस्थ  हो  गया  l
  अब  वह  पुन:  भगवान  बुद्ध  से  मिलने  गया ,  उसने  झुककर  प्रणाम  किया   और  कहा --- " शरीर  का  रोग  तो  आपकी  कृपा  से  दूर  हो  गया  ,  अब  चित  कैसे  शांत  हो  ? "
 बुद्ध  ने  कहा ---- "  अच्छा  सोचो , अच्छा  करो   और  अच्छे  लोगों  का  संग  करो   l  विचारों  का  संयम  चित  को  शांति  और  संतोष  देगा   l  "