हम सब अपनी जिन्दगी में स्वयं को श्रेष्ठ व बड़ा सिद्ध करने के लिए आपस में लड़ने - भिड़ने में अपनी ऊर्जा व समय दोनों को बरबाद कर देते हैं और अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं l रामचरितमानस का एक प्रसंग है जिससे हमें शिक्षा मिलती है कि हमें व्यर्थ के झगड़ों में अपना समय व ऊर्जा बर्बाद न कर , लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए ---------- जब श्रीहनुमानजी सीता माता की खोज के लिए जाते हैं तो उनके सामने सुरसा नाम की राक्षसी आती है l इन्हें खाने के लिए उसने अपना मुंह बड़ा कर के खोला तो हनुमानजी ने भी अपना रूप बड़ा कर लिया और फिर छोटे बनकर उसके मुँह में प्रवेश कर बाहर निकल गए l इस आचरण से उन्होंने यह बताया कि वे चाहते तो सुरसा से युद्ध कर के उसे पराजित कर सकते थे किन्तु ऐसा कर के उनका समय व ऊर्जा बर्बाद होती l उनका लक्ष्य सुरसा को पराजित करना नहीं था , उनका लक्ष्य था सीता माता की खोज करना l इसके साथ ही उन्होंने अपने आचरण से यह भी बताया कि लघुरूप अर्थात नम्रता , सदैव विजय दिलाती है l
20 October 2018
19 October 2018
WISDOM ----- राम काजु किन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ---- रामचरितमानस
श्री हनुमानजी बहुमुखी व्यक्तित्व के स्वामी हैं l श्रीरामचरितमानस में वही एक ऐसे पात्र हैं जो हमें रास्ता दिखाते हैं , ऐसी चतुराई सिखाते हैं जो हमें श्रीराम से मिला दे l उन्होंने कहा कि राम का नाम लेने के साथ ' भगवान राम ' का काम भी करो l उन्होंने जो कहा वह अपने आचरण से कर के भी दिखाया l उन्होंने केवल राक्षसों का ही अंत नहीं किया अपितु उन्हें संरक्षण देने वालों को भी मजा चखाया l
जब समुद्र को पार कर के श्री हनुमानजी लंका पहुंचे , तो लंका द्वार पर लंका की रक्षा करने वाली लंकिनी नामक राक्षसी मिली l उस समय हनुमानजी अति लघुरूप में थे , फिर भी उसने हनुमानजी को पहचान लिया और बलपूर्वक उन्हें रोकने का प्रयास किया , तब उन्होंने लंकिनी को मुक्का मारा और उसे घायल कर दिया l
लंकिनी लंका की रक्षक थी किन्तु वह रावण जैसे अत्याचारी , जिसने परस्त्री पर कुद्रष्टि डाली, उनका हरण किया , वह उसकी सेवा में थी l जो रक्षक एक गलत व्यवस्था की रक्षा करे , उस पर प्रहार करना चाहिए l शौर्य का यह अनुपम उदाहरण श्री हनुमानजी ने यहाँ प्रस्तुत किया l
उन्होंने भगवान राम का कार्य किया , सीताजी का पता लगाया , उन्हें भगवान का सन्देश दिया l श्रीराम का कार्य कर के ही उन्होंने भगवान को प्रसन्न किया l
आज के समय में समूचे संसार को श्री हनुमानजी के व्यक्तित्व से शिक्षा लेने की जरुरत है l सभी धर्मों के लोग अपने - अपने भगवान के लिए भव्य भवन बनाकर , कुछ देर कर्मकांड कर उन्हें कमरे में बंद कर देते हैं और फिर पाप , भ्रष्टाचार , अनाचार , अत्याचार आदि अनैतिक कार्यों में संलग्न हो जाते हैं , सोचते हैं कि अब भगवन उन्हें नहीं देख रहे हैं l हम सबके ह्रदय के तार ईश्वर से जुड़े है , वे केवल हमें नहीं , हमारे मन में क्या चल रहा है उसे भी जानते हैं l
पाप , अत्याचार , राक्षसी प्रवृतियों के कारण ही प्रकृति नाराज हो गई हैं l हम सब अपने भीतर श्री हनुमानजी का बल जगाएं , पापी का दंड तो ' काल ' निर्धारित करता है l हम कम से कम अत्याचारी , अन्यायी का और उन्हें संरक्षण देने वालों का बहिष्कार तो करें , जिससे समाज में यह सन्देश जाएगा कि ऐसे लोगों द्वारा किये जाने वाले कार्य अनैतिक और अमानवीय हैं और
धीरे - धीरे लोग सद्गुणों का महत्व समझेंगे l
जब समुद्र को पार कर के श्री हनुमानजी लंका पहुंचे , तो लंका द्वार पर लंका की रक्षा करने वाली लंकिनी नामक राक्षसी मिली l उस समय हनुमानजी अति लघुरूप में थे , फिर भी उसने हनुमानजी को पहचान लिया और बलपूर्वक उन्हें रोकने का प्रयास किया , तब उन्होंने लंकिनी को मुक्का मारा और उसे घायल कर दिया l
लंकिनी लंका की रक्षक थी किन्तु वह रावण जैसे अत्याचारी , जिसने परस्त्री पर कुद्रष्टि डाली, उनका हरण किया , वह उसकी सेवा में थी l जो रक्षक एक गलत व्यवस्था की रक्षा करे , उस पर प्रहार करना चाहिए l शौर्य का यह अनुपम उदाहरण श्री हनुमानजी ने यहाँ प्रस्तुत किया l
उन्होंने भगवान राम का कार्य किया , सीताजी का पता लगाया , उन्हें भगवान का सन्देश दिया l श्रीराम का कार्य कर के ही उन्होंने भगवान को प्रसन्न किया l
आज के समय में समूचे संसार को श्री हनुमानजी के व्यक्तित्व से शिक्षा लेने की जरुरत है l सभी धर्मों के लोग अपने - अपने भगवान के लिए भव्य भवन बनाकर , कुछ देर कर्मकांड कर उन्हें कमरे में बंद कर देते हैं और फिर पाप , भ्रष्टाचार , अनाचार , अत्याचार आदि अनैतिक कार्यों में संलग्न हो जाते हैं , सोचते हैं कि अब भगवन उन्हें नहीं देख रहे हैं l हम सबके ह्रदय के तार ईश्वर से जुड़े है , वे केवल हमें नहीं , हमारे मन में क्या चल रहा है उसे भी जानते हैं l
पाप , अत्याचार , राक्षसी प्रवृतियों के कारण ही प्रकृति नाराज हो गई हैं l हम सब अपने भीतर श्री हनुमानजी का बल जगाएं , पापी का दंड तो ' काल ' निर्धारित करता है l हम कम से कम अत्याचारी , अन्यायी का और उन्हें संरक्षण देने वालों का बहिष्कार तो करें , जिससे समाज में यह सन्देश जाएगा कि ऐसे लोगों द्वारा किये जाने वाले कार्य अनैतिक और अमानवीय हैं और
धीरे - धीरे लोग सद्गुणों का महत्व समझेंगे l
18 October 2018
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:
माँ आदिशक्ति की कठोरता का कोई भी रूप क्यों न हो , श्रद्धाभाव से ' माँ ' कहकर पुकारने से उनकी ममता छलक उठती है और उनके कोप की रौद्रता करुणा में परिवर्तित हो जाती है l इस सत्य को बताने वाली एक पुराण कथा है ----- असुरराज विकटदंत का बेटा सुबल भगवती का अनन्य भक्त था , उसके पिता को यह बात सुहाती न थी l उसने अपने ही पुत्र को मारने के कई षडयंत्र किये परन्तु माँ की कृपा से वे सब विफल हो गए l तब वह असुरराज स्वयं महाखड्ग से सुबल को मारने को उठ खड़ा हुआ l अपने भक्त पर ऐसा अत्याचार माँ सहन न कर सकीं और और परम कोपवती महाकाली के रूप में वहां प्रकट हो गईं l देखते - ही - देखते उन्होंने असुरराज को समाप्त कर दिया l किन्तु उनका कोप शान्त न हुआ l उनके क्रोध से त्रिलोकी कम्पित होने लगी l
सब देवी - देवता और महादेव स्वयं आ गए किन्तु किसी विधि से उनका कोप शांत न हुआ l तब महादेव ने कहा कि सुबल पर अत्याचार के कारण वे कुपित हुईं हैं , अत: सुबल ही उन्हें शांत कर सकता है l देवों की बात सुनकर सुबल प्रसन्न भाव से महाकाली की और बढ़ा और ' माँ ' कहकर उनके चरणों से लिपट गया l उसे अपने पास आया देख महाकाली ने उसे गोद में उठा लिया और उसे प्यार करते हुए कहा --- पुत्र ! मुझे आने में देर लग गई l ' माता की ममता पाकर सुबल निहाल हो गया l उसने कहा --- हे माँ ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो शान्त हो जाएँ और सम्पूर्ण जगत पर कृपा करें l ' सुबल के प्रेमपूर्ण वचनों को सुनकर महाकाली का कोप शान्त हुआ और वे वापस अपने सौम्य स्वरुप में लौट आईं l
सब देवी - देवता और महादेव स्वयं आ गए किन्तु किसी विधि से उनका कोप शांत न हुआ l तब महादेव ने कहा कि सुबल पर अत्याचार के कारण वे कुपित हुईं हैं , अत: सुबल ही उन्हें शांत कर सकता है l देवों की बात सुनकर सुबल प्रसन्न भाव से महाकाली की और बढ़ा और ' माँ ' कहकर उनके चरणों से लिपट गया l उसे अपने पास आया देख महाकाली ने उसे गोद में उठा लिया और उसे प्यार करते हुए कहा --- पुत्र ! मुझे आने में देर लग गई l ' माता की ममता पाकर सुबल निहाल हो गया l उसने कहा --- हे माँ ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो शान्त हो जाएँ और सम्पूर्ण जगत पर कृपा करें l ' सुबल के प्रेमपूर्ण वचनों को सुनकर महाकाली का कोप शान्त हुआ और वे वापस अपने सौम्य स्वरुप में लौट आईं l
17 October 2018
WISDOM ----- खुशहाली के लिए जीवन में संवेदना और सद्गुणों को महत्त्व दिया जाना चाहिए
परिवार में , समाज में खुशहाली बढ़ाने के लिए शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक तीनो स्तर पर स्वास्थ्य को महत्व दिया जाना चाहिए l
जब कोई बहुत ज्यादा गरीब होता है तब उसकी आमदनी बढ़ने से उसकी खुशहाली बढ़ने लगती है l लेकिन बुनियादी जरूरतें पूरी होने के बाद यह जरुरी नहीं रह जाता कि आमदनी बढ़ने के साथ खुशहाली भी बढ़ती रहे , तब आय के साथ अन्य दूसरे कारण भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं l
हम सब एक माला के मोती है ---- प्रकृति, पर्यावरण , मनुष्य , पशु - पक्षी आदि सबके प्रति संवेदनशील रहकर ही जीवन में खुशहाली आ सकती है l इसके साथ यह भी जरुरी है कि विषमता , ऊँच - नीच , नफरत , हिंसा , भेदभाव आदि नकारात्मक भावनाएं समाज से दूर हों l जीवन में सद्गुण जितने बढ़ेंगे खुशहाली उतनी ही बढ़ेगी l
जब कोई बहुत ज्यादा गरीब होता है तब उसकी आमदनी बढ़ने से उसकी खुशहाली बढ़ने लगती है l लेकिन बुनियादी जरूरतें पूरी होने के बाद यह जरुरी नहीं रह जाता कि आमदनी बढ़ने के साथ खुशहाली भी बढ़ती रहे , तब आय के साथ अन्य दूसरे कारण भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं l
हम सब एक माला के मोती है ---- प्रकृति, पर्यावरण , मनुष्य , पशु - पक्षी आदि सबके प्रति संवेदनशील रहकर ही जीवन में खुशहाली आ सकती है l इसके साथ यह भी जरुरी है कि विषमता , ऊँच - नीच , नफरत , हिंसा , भेदभाव आदि नकारात्मक भावनाएं समाज से दूर हों l जीवन में सद्गुण जितने बढ़ेंगे खुशहाली उतनी ही बढ़ेगी l
16 October 2018
WISDOM ----- भक्ति से , ईश्वर की शरण में जाने से जीवन रूपांतरित होता है
' दुर्गा सप्तशती ' में कथानक के रूप में इस बात का उल्लेख है कि काम वासना को नष्ट नहीं किया जा सकता परन्तु इसका रूपांतरण संभव है और भक्ति ही वासना का दिव्य रूपांतरण है l ----- माँ दुर्गा सभी दैत्यों को मार गिराती हैं , परन्तु महिषासुर ही एक ऐसा दैत्य है जो मरता नहीं है , माता के चरणों में शरणागति को प्राप्त करता है l यहाँ महिषासुर काम वासना का प्रतीक है , जो मरा नहीं बल्कि माँ के चरणों में , माँ की शरण में जाकर भक्ति के रूप में रूपांतरित हो जाता है l
14 October 2018
WISDOM -----------------
एक कुष्ठी भिक्षा मांग रहा था l उधर से जो कोई निकलता , कुष्ठी अपना हाथ फैलाकर कहता , जो दे उसका भी भला , और जो न दे उसका भी भला l एक युवक ने सिक्का उसके हाथ पर डालते हुए कहा --- " क्यों भाई ! तुम्हारा पूरा शरीर गला जा रहा है l हाथ और पैर की उँगलियाँ तक ऐसी नहीं रहीं कि कुछ कार्य कर सको l फिर इस कष्ट में जीवन जीने से क्या लाभ ? यह तो जीवित अवस्था में लाश ढोने जैसी स्थिति है l
कुष्ठी ने कहा ------ मित्र ! तुम बात तो ठीक कहते हो l पर मुझे ऐसा लगता है कि ईश्वर इसलिए जीवित रखे हुए है कि लोग कम से कम मुझे देखकर समझ सकें कि----- इस संसार में कभी भी तू मेरे जैसा हो सकता है l अत: इस संसार में काया की सुन्दरता का घमंड करने से कोई लाभ नहीं है l
कुष्ठी ने कहा ------ मित्र ! तुम बात तो ठीक कहते हो l पर मुझे ऐसा लगता है कि ईश्वर इसलिए जीवित रखे हुए है कि लोग कम से कम मुझे देखकर समझ सकें कि----- इस संसार में कभी भी तू मेरे जैसा हो सकता है l अत: इस संसार में काया की सुन्दरता का घमंड करने से कोई लाभ नहीं है l
13 October 2018
WISDOM ---------------------
प्राचीन काल में जब राजतन्त्र था , तब राजा वेश बदलकर राज्य में भ्रमण करते और सही स्थिति को समझकर अपनी प्रजा के कष्टों को दूर करने का प्रयास करते थे l ऐसे में कभी राजा को सामान्य जनों से महत्वपूर्ण शिक्षा भी मिल जाती थी l इस सम्बन्ध में एक कथा है -----
एक बार राजा जनमेजय वेश बदलकर भ्रमण करते हुए एक गाँव से गुजरे l वहां उन्होंने देखा कि कुछ किशोर खेल रहे हैं l उनमे से एक शासक बना है और अन्य सभासद l शासक बना किशोर जिसका नाम है ' कुलेश ' सभासदों को संबोधित करते हुए कह रहा है ---- " सभासदों ! जिस राज्य के कर्मचारीगण वैभव - विलास में डूबे रहते हैं , उसका राजा कितना ही नेक और प्रजावत्सल क्यों न हो , उस राज्य की प्रजा कभी सुखी नहीं रहती l मैं चाहता हूँ , जो भूल जनमेजय के राज्याधिकारी कर रहे हैं , वह आप लोग न करें , ताकि मेरी प्रजा असंतुष्ट न हो l आप सबको वैभव - विलास का जीवन छोड़कर त्यागपूर्वक जीवन जीना चाहिए l जो ऐसा नहीं कर सकता , वह अभी शासन सेवा से अलग हो जाये l "
राजा जनमेजय उस किशोर के गंभीर चिंतन से बहुत प्रभावित हुए और उसे महामंत्री का पद प्रदान किया l उसके महामंत्रित्व काल में अन्य मंत्रियों , सामंतों एवं राज्य - कर्मचारियों के लिए आचार - संहिता बनाई गई , अतिरिक्त आय के स्रोत बंद कर दिए गए , इससे बचा हुआ धन प्रजा की भलाई में लगने लगा , कर्मचारी व जनता सभी के लिए परिश्रम अनिवार्य कर दिया गया l समस्त प्रजा में खुशहाली छा गई l
एक बार राजा जनमेजय वेश बदलकर भ्रमण करते हुए एक गाँव से गुजरे l वहां उन्होंने देखा कि कुछ किशोर खेल रहे हैं l उनमे से एक शासक बना है और अन्य सभासद l शासक बना किशोर जिसका नाम है ' कुलेश ' सभासदों को संबोधित करते हुए कह रहा है ---- " सभासदों ! जिस राज्य के कर्मचारीगण वैभव - विलास में डूबे रहते हैं , उसका राजा कितना ही नेक और प्रजावत्सल क्यों न हो , उस राज्य की प्रजा कभी सुखी नहीं रहती l मैं चाहता हूँ , जो भूल जनमेजय के राज्याधिकारी कर रहे हैं , वह आप लोग न करें , ताकि मेरी प्रजा असंतुष्ट न हो l आप सबको वैभव - विलास का जीवन छोड़कर त्यागपूर्वक जीवन जीना चाहिए l जो ऐसा नहीं कर सकता , वह अभी शासन सेवा से अलग हो जाये l "
राजा जनमेजय उस किशोर के गंभीर चिंतन से बहुत प्रभावित हुए और उसे महामंत्री का पद प्रदान किया l उसके महामंत्रित्व काल में अन्य मंत्रियों , सामंतों एवं राज्य - कर्मचारियों के लिए आचार - संहिता बनाई गई , अतिरिक्त आय के स्रोत बंद कर दिए गए , इससे बचा हुआ धन प्रजा की भलाई में लगने लगा , कर्मचारी व जनता सभी के लिए परिश्रम अनिवार्य कर दिया गया l समस्त प्रजा में खुशहाली छा गई l
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