18 July 2019

WISDOM ----

बाहरी  शक्तियों  की  कुटिल  चालें  तभी  सफल  हो  पाती  हैं  ,  जब  हम  में  आपसी  फूट  होती  है   और  आपसी  फूट  तभी  पनपती  है  ,  जब  हम  परस्पर  एक - दूसरे  को  प्यार  और  अपनापन  देने  में  विफल  रहते  हैं  l 
  1920 - 21  का  समय  था  l  प्रिंस  ऑफ  वेल्स  दिल्ली  आ  रहे  थे  l  ' फूट  डालो  और  राज  करो '   यह  अंग्रेजों  की   नीति  थी  l  इस  अवसर  पर  उन्होंने   हिन्दू  समाज  में   पहले  से  विद्दमान  आपसी  फूट  का  लाभ  उठाने  की  योजना  बनाई    कि  अछूतों  की  भीड़  इकट्ठी  कर  के   इस  समारोह  को  सफल  बनाया  जाये   और  हजारों -- हजार    संख्या  में   अछूत  भाई - बहनों  को  ईसाई  बनाया  जाये  l  इस  अवसर  पर  सरकार  ने  अछूतों  को  दिल्ली  आने  के  लिए  मुफ्त  रेलगाड़ी  की  भी  व्यवस्था  की  थी  l 
  ऐसे  समय  में  स्वामी  परमानन्द  महाराज   जो  संत  होने  के  साथ  सुधारक  भी  थे  l  हिन्दू  समाज  की  कुरीतियों  को  समाप्त  करने  के  उद्देश्य  से  उन्होंने  अपने  आश्रम  में  हरिजन  पाठशाला  भी  खोली  थी  l  उन्होंने  अपने  शिष्य  श्री कृष्णानंद  से कहा  कि   आश्रम  की  हरिजन  पाठशाला  के  बच्चों  को  लेकर  दिल्ली  जाओ   और  वहां  के  समारोह  में  बच्चों  से  यह  भजन  गवाओ l  यह  भजन  था ---- ' धरम  मत  हारो  रे , जीवन  है  दिन  चार  l ---- "   प्रिंस  ऑफ  वेल्स  के  पधारने  पर  जैसे  ही  समारोह  शुरू  हुआ  ,  बच्चों  ने  खंजरी  बजाकर यह  भजन  गाना  प्रारंभ  कर  दिया  l  जब  लोगों  को  यह  बताया  गया  कि  ये  अछूतों  के  बच्चे  हैं   जो  भगवद भक्ति  आश्रम  रेवाड़ी  में  पढ़ते  हैं   तो  लोग  आश्चर्य चकित  रह  गए  कि  अछूतों  के  बच्चे  और  इतने  साफ - सुथरे  l 
 कृष्णानंदजी  इस  अवसर  पर  कुछ  हरिजन  बच्चों  के  अभिभावकों  को  भी  ले  गए  थे  l  उनमे  से  एक  वृद्ध  ने  खड़े  होकर  कहा  कि  जब  साधु - महात्मा  हमारे  बच्चों  को  ऐसे  प्रेम  से  पढ़ाते  हैं  तो  अब  हमें  धर्म  बदलने  की  जरुरत  ही  क्या  है   l  पूरे  आयोजन  स्थल  पर  उस  वृद्ध  की  बात  का  समर्थन  हुआ  कि  जब  हमें  अपने  धर्म  में  प्यार  व  अपनापन  मिल  रहा  है  तो  अब  हमें  धर्म  बदलने  की  जरुरत  नहीं  है  l  इस  प्रकार  अंग्रेजी  सरकार  का  यह  षड्यंत्र   विफल  हो  गया  l 
 यह  घटना  इस  सत्य  को  बताती  है  कि  अपने  धर्म  और  अपने  समाज  में  अपनापन   न   मिले  और  निरंतर  उपेक्षा  व  अपमान  मिले   --तो  ऐसी  स्थिति  धर्म  परिवर्तन  और  अन्य  जाति  में  विवाह  का  एक  बड़ा  कारण  बन  जाती  है  l  

17 July 2019

WISDOM ------

अहंकार  की प्रवृति  ज्ञान  की  प्रगति  में  बाधक  होती  है  l  कोई  व्यक्ति  जब  अपने  को  सबसे  अधिक  विद्वान्  समझने  लगता  है   तो  विद्वान्  में  नम्रता  का और  विनय  का  जो  गुण  है  वह  लुप्त  हो  जाता  है   और  उसका  ज्ञान  एक  सीमाबद्ध  होकर  रह  जाता  है  l 
 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य ने  लिखा  है  ---- " व्यक्ति  के  सद्गुण  यदि  उसे  उत्थान  की  ओर  ले  जाते   हैं  तो  उसके   अन्दर  स्थान  जमाये   अवगुण  भीतर  ही  भीतर  उसकी  जड़  खोखली  करते  रहते  हैं   l  सद्गुण  यदि अच्छाई  का  प्रसार  करते  हैं    तो  अवगुण   वातावरण  को  विषैला  करते  हैं   l "

16 July 2019

WISDOM -----

 समर्थ  गुरु  रामदास  ने  संसार  से  पूर्ण  विरक्त  होते  हुए  भी   राष्ट्र  हित  के बड़े - बड़े  कामों  को  सिद्ध   कराया  l  वे  अपने  एक  कोपीन , खडाऊं  और  माला  के  अतिरिक्त   अपने  लिए  कोई  सामग्री  नहीं  रखते  थे  ,  पर  हिन्दू  जाति   की  रक्षा  के  लिए   उन्होंने  महाराज  शिवाजी  के  राज्य - संस्थापन  कार्य  में  हर  तरह  से  सहयोग  दिया  l 
 यद्दपि  समर्थ  गुरु   स्वयं  हठपूर्वक  गृहस्थ  को  त्याग  कर  वैरागी  बन  गए  थे  ,  पर  उनके  मतानुसार  इस  मार्ग  का  अनुसरण  करने  का  अधिकार  उन्ही  को  है   जो  अपना  जीवन  धर्म  और  समाज  की  सेवा  के  लिए   उत्सर्ग  करने  की  भावना  रखते  हों   l   जो  लोग  सनक  या  मूर्खता  के  आवेश  में  आकर  साधु  बनते  हैं  उनके   लिए  अपने  ग्रन्थ  ' दासबोध '  में  वह  कहते  हैं ---- " पागल  लोग  घर - गृहस्थी  को  त्यागकर  केवल  दुःख  भोगते  हुए  मर  जाते  हैं   और  इहलोक  व  परलोक  दोनों  को  नष्ट  कर  लेते  हैं  l  ऐसे  लोग  आवेश  में  आकर  घर  से  तो  निकल  जाते   हैं  पर  लड़ने  और  झगड़ने  में  ही  उनके  जीवन  का  अंत  हो  जाता  है  l  उनके  पीछे  बहुत  से  लोग  लग  भी  जाते  हैं  ,  उनके  चेले  बन  जाते  हैं  ,  पर  गुरु  और  शिष्य  समान  रूप  से  अज्ञानी  बने  रहते  हैं  l  इसी  प्रकार  जो  किसी  आशा  अथवा  स्वार्थ   की  लालसा  से  घर  छोड़कर  चल  देते  हैं   वे  स्वयं  अनाचारी  बन  जाते  हैं  और   दूसरे   लोगों  में  अनाचार  फैलाते  हैं   l   लेकिन  जो   समाज  की   दशा  को  समझता  है  ,  देश  - काल  और  परिस्थिति  को  समझता  है  ,  उसे  भूमण्डल  में   कहीं  किसी  भी  बात  की  कमी  नहीं   हो  सकती  l  

15 July 2019

WISDOM ---- भ्रष्टाचार -----

  बात  उन  दिनों  की है  जब  चीन  में  सम्राट  ' मंचू '  वंश  का  था  और  चीन  की  प्रजा  अन्याय   को  सहने  व  अंधकार  में  रहने  को  विवश  थी ,  और  डॉ.  सनयातसेन   अपने  देश  और  समाज  के  उद्धार  के  लिए  प्रयत्नशील  थे   l   पं.  श्रीराम  शर्मा  आचार्य  ने  वाड्मय  ' मरकर  भी  अमर  हो  गए  जो  '  में    लिखा ----  चीन  की  हुकूमत  में  छोटे  से  चौकीदार  या  चपरासी  से  लेकर  गवर्नर  तक  यही  चाहते  थे   कि  वर्तमान  अंधेर - खाता  जैसा  है  वैसा  ही  चलता  रहे  , जनता  में  किसी  प्रकार  के  नए  विचारों  का  प्रचार  न  हो  सके  l  वहां  के  अधिकारियों  को  वेतन  बहुत  कम  मिलता  था   और  तमाम  खर्च  ' ऊपरी  आमदनी '  से  ही  चलता  था   l
  इस  संबंध  में   सनयात  सेन  ने   इंग्लैण्ड  में  रहते  हुए  लिखा  था ---  "  शायद  अंग्रेज  लोगों  को  इस  बात  का  पता  नहीं  कि  चीन में  बड़े - बड़े  पदाधिकारियों  का  निश्चित   वेतन   कितना  कम  है  l कैण्टन  प्रान्त  के  वाइसराय  का  वार्षिक  वेतन   60 पौंड  है  l  इससे  आप  समझ  सकते  हैं  कि  अपने  पद  की  योग्यतानुसार  ठाट - बाट  से  रहने  और  दौलत  जमा  करने  के  लिए  वह  कौन  सा  अन्याय  न  करता  होगा  ?    एक  विद्दार्थी  विशेष  योग्यता  के  साथ  पास  होता  है  , वह  सरकारी  नौकरी  की  खोज  करता  है  और  पीकिंग  के  अधिकारियों  को  घूस  देकर  एक  जगह  प्राप्त  करता  है  परन्तु  उसकी  तनख्वाह  से  उसका  गुजारा नहीं  होता  क्योंकि  तनख्वाह के  बराबर  रुपया   तो  उसे  प्रतिवर्ष  अपने  अधिकारियों  को  दे  देना  पड़ता  है  ताकि  वह  अपने  स्थान  पर  बना  रहे  l  परिणाम  यह  होता  है  कि  वह  लूट -खसोट  प्रारम्भ  कर  देता  है  , जब  गवर्नमेंट  उसकी  पीठ  पर  हाथ   रखे  है    , यदि  वह  तब  भी  काफी  रुपया  न  कमाए  ,  तो  उससे  बढ़कर  बेवकूफ  कौन  होगा  ?  वह  खूब  रुपया  कमाता  है   और  अच्छी  तरह  घूंस  देकर  ऊँचे  पद  प्राप्त  करता  चला  जाता  है  l  इस  प्रकार  जो  मनुष्य  खूब  अच्छी  तरह  से  लूट  सकता  है  वही  सबसे  ऊँचा  पद  पाता  है  l  "
  आचार्य श्री  ने  आगे  लिखा  है  --बहुत  से  लोग  यह  प्रश्न   करते  हैं  कि  जब   चीन  में  ऐसा  अंधेर - खाता  था  तो  समझदार  अन्याय  को  मिटाने  का  प्रयास  क्यों  नहीं  कर  सके  ?    इसके  उत्तर  में  इतना  ही  जान  लेना     पर्याप्त  है  कि  ' मंचू ' शासक  चीन  के  निवासियों  को  डरा  कर   उनका  भेद  लेकर  ही  काम  चलाते  थे  l  सरकारी  जासूस  बड़े  शहरों  से  लेकर  छोटे  गाँव  तक , कारखानों  में , होटलों  में  , रेलगाड़ियों  में  ,  निजी  घरों  तक  में  जासूस  फैले  हुए  थे  ------ किसी  भी  व्यक्ति   के  मुंह  से  सरकार  के  विरोध  में  या  क्रांति  के  पक्ष  में  एक  शब्द  भी  निकल  जाये   तो  उसकी  आफत  आ  जाती  थी   l  
सनयात सेन  ने  एक  स्थान  पर  कहा  है --- लोग  अंधकार  में  रखे  जाते  हैं  और  जिन  बातों  को  सरकार  अपने  लाभ  का  समझती  है  ,  केवल  उन्ही  बातों  को  प्रकट  होने  देती  है   l  
अन्याय  और  भ्रष्ट  व्यवस्था  सदैव  एक  गति  से  नहीं  चल  सकते  ,  कोई  न  कोई  प्रतिक्रिया  अवश्य  होती  है   l  

14 July 2019

WISDOM ------

  जब  लोग  पाप - पुण्य  के  वास्तविक  स्वरुप , संयम , शुद्ध  आचरण , परोपकार , सेवा  आदि  सत्कर्मों  को  भूलकर   केवल  किसी  देवता  की  मूर्ति  के  आगे  मस्तक  झुका  देना  और  कुछ  चढ़ावा  चढ़ा  देना  मात्र  को  को  ही  धर्म - पालन  समझने  लगते  हैं  ,  समझदार  व्यक्ति  भी  उससे  उदासीन  हो  जाते  हैं  तब  धर्म  और  जाति  की  अवनति  होती  जाती  है  l 
  स्वामी  दयानन्द  सरस्वती  के  जीवन  का   सर्वोपरि  उद्देश्य  हिन्दू  जाति  में  प्रचलित  हानिकारक  विश्वासों , कुरीतियों   और  रूढ़ियों  को  मिटाकर   उनके  स्थान  पर  समयोचित  लाभकारी  प्रथाओं  का  प्रचार  करना  था  l   धर्म - सुधार  और  समाज - सुधार  के   इस  महान  कार्य  में  उन्हें  समाज  के  बहुत  विरोध  का  सामना  करना  पड़ा  और  स्वामीजी  के  सम्मुख  अनेक   प्रलोभन  भी  आये  ,पर  वे  कभी  अपने  सिद्धांत  से  टस  से  मस  नहीं  हुए  l 
  एक  दिन  एकांत  में   उदयपुर  के  महाराणा  उनसे  मिले  तो  कहने  लगे --- " स्वामीजी  आप  मूर्ति पूजा  का  खंडन  छोड़  दें  ,  तो  उदयपुर  के  एकलिंग  महादेव  की  गद्दी  आपकी  ही  है  l  इतना  भारी  ऐश्वर्य  आपका  हो  जायेगा  और  आप  समस्त  राज्य  के  गुरु  माने  जायेंगे  l " 
स्वामीजी  किंचित  रोष पूर्वक  बोले  --- " राणाजी  !  आप  मुझे  तुच्छ  प्रलोभन  दिखाकर  परमात्मा  से  विमुख  करना  चाहते  हैं  l  आपके  जिस  छोटे  से  राज्य  और  मंदिर  से  मैं  एक  दौड़  लगाकर  बाहर  जा  सकता  हूँ  ,  वह  मुझे  अनंत  ईश्वर  की  आग्या  भंग  करने  के  लिए  विवश  नहीं  कर  सकता  l  परमात्मा  के  परम  प्रेम  के  सामने  इस  मरुभूमि  की   माया - मारीचिका  अति  तुच्छ  है  l  मेरे  धर्म  की  ध्रुव  धारणा  को  धराधाम  और  आकाश  की  कोई  वस्तु  डगमगा  नहीं  सकती  l  " 
  काशी  नरेश  ने  भी  उनसे   भारत  प्रसिद्द  विश्वनाथ  मंदिर  का  अध्यक्ष  बनने  का  प्रस्ताव  किया  था  l  गुजरात  के  एक  वकील  ने  उनसे  कहा  आप  मूर्ति पूजा  का  विरोध  करना  छोड़  दें  हम  आपको  शंकर जी  का  अवतार मानने  लगें  l  अनेक  स्थानों  में  उनसे  वैभवशाली  मंदिरों  का  अध्यक्ष  बन  कर  रहने  का  आग्रह  किया  गया  ,  अनेक  प्रलोभन  उनके  जीवन  में  आये  परन्तु  उन्होंने  सदैव  यही  उत्तर  दिया  कि   मेरा  कार्य  देश  और  जाति  की  सेवा  कर  के  सुधार  करना  है   न  कि  धन - सम्पति  इकट्ठी  कर  के  सांसारिक  भोगों  में  लिप्त  होना   l मैं  परमात्मा  के  दिखाए  श्रेष्ठ मार्ग  से  कभी  विमुख  नहीं  हो  सकता  l  

13 July 2019

WISDOM ----

  समर्थ  गुरु  रामदास  का  ' दासबोध '  समयानुकूल  शिक्षाओं  का   भण्डार  है  l  ' दासबोध  में  वे  कहते  हैं --- समाज  में  रहने  वाले  व्यक्तियों  को   अपना  आचरण  ऐसा  रखना  चाहिए  जिससे  अपनी  उन्नति  और  भलाई  के  साथ  समाज  का  भी  हित  हो  l  उन्होंने  कहा  --- लोकमत  को  जानना  और   उसका  आदर  करना  बहुत  आवश्यक  है  l  जो  मनुष्य  लोकमत  की  उपेक्षा  करता  है  , वह  प्राय:  उद्दंड  और  स्वेच्छाचारी  हो  जाता  है  l  ऐसा  व्यक्ति  कभी   समाज    के  लिए  हितकारी  नहीं  हो  सकता   वरन  वह  किसी  न  किसी  तरह  समाज  की  हानि करने  वाला  ही  होता  है  l 
 समर्थ  गुरु  ने  आदेश  दिया  है  कि   मनुष्य  को  लोकमत  के  विरुद्ध  नहीं  चलना  चाहिए  l   समाज  में   मूढ़तावश   प्रचलित   कुरीतियों  या  हानिकारक  परम्पराओं   को  मिटाने  के  लिए  इस  प्रकार  का  व्यवहार  करना  चाहिए   जिससे  व्यर्थ  का   विरोध - भाव  उत्पन्न  न  हो   l   लोगों  को  समझा - बुझाकर  और  अपना  उदाहरण  दिखाकर  ही   सुधारने  का  प्रयत्न  करना  चाहिए  l  
  श्री  समर्थ  ने  आचार  और   विचार  दोनों  की   ही  शुद्धता  पर  बहुत  जोर  दिया  l  

12 July 2019

WISDOM ----- धर्म का सच्चा स्वरुप

 चैतन्य  महाप्रभु  ने कहा  है --- जो  लोग केवल  धार्मिक  ग्रन्थ  पढ़  लेने   अथवा  थोड़ा  सा  पूजा - पाठ  कर   कर  लेने  को  धर्मात्मा  का  लक्षण  मान  बैठते  हैं   वे  धार्मिक  नहीं  माने  जा  सकते  l  जब  तक  मनुष्य  नैतिक , चारित्रिक  और  व्यावहारिक  द्रष्टि  से  अपना  सुधार  नहीं  करेगा  तब  तक  वह  धर्मात्मा  कहलाने  का  अधिकारी  नहीं  हो  सकता  l   धर्म  का  पालन  करने  वाला  वही  हो  सकता  है  जो   अन्य  मनुष्यों  का   हित  साधन  करे  ,  किसी  को  शारीरिक , मानसिक  पीड़ा  नहीं  पहुंचाए  l  '
 महात्मा  गाँधी     के  धार्मिक  विचार  थे ---- ' मनुष्य  का ,  चाहे  वह  कितना  ही  महान  क्यों  न  हो  ,  कोई  काम  तब  तक  सफल  और  लाभदायक  न  होगा  ,  जब  तक  उसको  कोई  प्रमाणिक  धार्मिक  आधार न  मिले  l  यहाँ  धर्म  से  मेरा  तात्पर्य  उस  धर्म  से  नहीं  , जो  आप  संसार  के  समस्त  धर्म - ग्रंथों  को  पढ़कर  सीखते  हैं  l  जिस  धर्म  से  मेरा  तात्पर्य  है  उसका  सम्बन्ध  ह्रदय  से  है  l  इस  धर्म  भावना  को  चाहे  हम  किसी  बाहरी  सहायता  से  प्राप्त  करें   और  चाहे  आत्मिक  उन्नति  से  जाग्रत  करें  ,  पर  यदि  हम  किसी  काम  को  उचित   रीति  से  करना  चाहें  तो  हमको  यह  धर्म  भाव  अवश्य  जागृत  करना  पड़ेगा   l  "
   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  ने  वाड्मय  ' सांस्कृतिक  चेतना  के  उन्नायक '  में  लिखा  है ---- ' जो  लोग  थोड़ा  बहुत   ऊपरी   क्रिया - कांड  कर  के  ही  अपने  को  धार्मिक  मानने  लग  जाते  हैं  ,  वे  या  तो  दम्भी  होते  हैं  या  मूढ़  l  सत्य  धर्म  का  सम्बन्ध  ह्रदय  से  ही  रहता  है   और  जो  उसे  समझ  लेता  है  ,  वह  फिर  किसी  धर्म  का  विरोध  या  अपमान  नहीं  करता   l  वह  स्वयं   अपने  समाज  के  अनुसार  ही  बाह्य  आचरण  करता  है  और  अपनी  नियमित  प्रणाली  द्वारा   ईश्वर  की  पूजा , उपासना  भी  करता  रहता  है  , पर  उनके  कारण  न  तो  वह  किसी  का  विरोधी  बनता  है   और  न  कोई  ऐसा  कार्य  करता  है  ,  जिससे  अन्य  लोग  उसके  विरोधी  बन  जाये  l   वह  सदैव  इस  बात  को   द्रष्टि  में  रखता  है  ,  कि  जब  सब  लोगों  का   ईश्वर  एक  ही  है  ,  तो  फिर  आपस  में  वैर - विरोध  रखने  की  क्या  आवश्यकता  है   ? '