24 August 2019

WISDOM ------

  ईरान  का  बादशाह   नौशेखां  एक  दिन  शिकार  खेलते - खेलते  दूर  निकल  गया   l  दोपहर  का  समय  हो  जाने  से  गाँव  में  डेरा  डालकर  भोजन  की  व्यवस्था  की  गई  l  भोजन  बनाने  वालों  को  जब  ज्ञात  हुआ  कि  साथ  लाये   सामान  में  नमक  नहीं  है  तो  वे   निकट  के  घर  से  थोड़ा  सा  नमक  ले  आये  l  बादशाह  ने  उनसे  पूछा  ---- " नमक  के  दाम  दे  आये  ? "  सेवक  बोला --- "  बादशाह  !  थोड़े  से  नमक  का  क्या  दाम  देना   ? "  नौशेखां  तुरंत  बोले ---- " जाओ  !  और  तुरंत  नमक  के  दाम  देकर  आओ  l बदनीयती  की  शुरुआत  ऐसी  ही  छोटी  भूलों  से  होती  है   l  यदि  आज  मैं   छोटी  सी  चीज   बिना  कीमत  दिए  लूँगा  तो  कल  मेरे  कर्मचारी  मूल्यवान  वस्तुएं  भी  मुफ्त  में  लेना  शुरू  कर  देंगे   और  राज्य  में  अराजकता  फ़ैल  जाएगी   l  "    अपने  आचरण  से  सीख  देने  वाले  ही  दूसरों  के  लिए   उदाहरण  बनते  हैं   l

23 August 2019

WISDOM ---- प्रकृति मनुष्य के अहंकार को बरदाश्त नहीं करती

 प्राचीन  काल में   विद्वान, वैज्ञानिक , ऋषि - मनीषी  आदि  अपनी  क्षमता   एवं   प्रतिभा   आदि  का  उपयोग  जन  समुदाय  के  कल्याण  कार्यों  व  समाज  के  उत्थान  में  करते  थे  लेकिन  आज  स्थिति   सर्वथा  विपरीत  हो  गई  है   l  आज की  वैज्ञानिक  एवं  राजनीतिक  प्रतिभा  अपनी  क्षमताओं  का  दुरूपयोग   विनाश  के  साधन  जुटाने  में   करती  है   l  सुविख्यात  मनीषी  कार्ल   मेनीन्जर  का  कहना  है  ---- अपने  अहंकार  की  पूर्ति  के  लिए  जिस  तरह  एक  देश   दूसरे  देश  को  नीचा  दिखाने  के  लिए  परमाणु  हथियारों  का  उपयोग  करता  है  l  उसके  प्रभाव  से  वह  सारा  क्षेत्र  जीवन  विहीन  हो जाता है   और  वातावरण  में   विकिरण  की विषाक्तता  और  स्वास्थ्य  संहारक  विषाणुओं  की  फौज  ही  शेष  रह  जाती  है   l  यह  कार्य  उन  संस्थाओं  या   सरकारों  का  होता  है   जिन्हें  जनता  नियमित  रूप  से   तरह - तरह  के  उपायों  से  कर   चुकती  है  l   
 प्रकृति   मनुष्य  के  इस  अहंकार  को  बर्दाश्त  नहीं  करती   और  मनुष्य के  दुष्कृत्यों  से  विक्षुब्ध  होकर
 ' जैसे  को  तैसा '  का  पाठ   पढ़ाने  को  आतुर   दीखती  है  l बाढ़ , सूखा, चक्रवात , तूफान , भूकंप , ज्वालामुखी  विस्फोट , जंगलों  में  आग , कैंसर , एड्स  जैसी  घातक  बीमारियाँ , हत्या , अपराध , आत्महत्या  की  बढ़ती  प्रवृतियां  --- इन  सबके  पीछे  अप्रत्यक्ष  रूप  से  प्रकृति  की  नाराजगी  ही  है  l  श्रेष्ठ विचार  , 'जियो  और  जीने  दो '  की  भावना  से  ही  समस्याएं  हल  होंगी  l 

22 August 2019

WISDOM -------

  महाराजा  सगर  की  दोनों  रानियों  ने  तप  किया  और  वरदान  मांगने  के  अवसर  पर   एक  ने  हजार  पुत्र  मांगे  और  दूसरी  ने  एक   l  समुचित  भावनात्मक  पोषण  के  अभाव  में   हजारों  पुत्र  झगड़ालू , उपद्रवी  और  अनाचारी  निकले  l   अंततः  अपने  दर्प  एवं  दुर्बुद्धि  के  कारण  महर्षि  कपिल  के  साथ  अन्याय  कर  बैठे   और  मारे  गए   l  दूसरी  रानी  का  जो  एकमात्र  अकेला  पुत्र था  ,  उसने  समुचित  भावनात्मक  पोषण  , मार्गदर्शन  प्राप्त  कर  महर्षि  कपिल  को  भी  प्रसन्न  कर  लिया   तथा  राज्य  का    समुचित  संचालन  भी  किया  एवं  कीर्ति  का  भागीदार  भी  बना  l  नीतिशास्त्र  में  इसीलिए  कहा  भी  गया  है -----
   वरमेको  गुणी  पुत्रो ,  न  च  मूर्खा:  शतान्यपी  l  एकश्चन्द्रस्तमो  हन्ति ,  न  तु  तारा  सहस्त्रशः  l
  अर्थात  सैकड़ों  मूर्ख  बेटों  की  अपेक्षा  एक  ही  गुणी  पुत्र  श्रेष्ठ  है   l  जैसे  अकेला  चाँद  अंधकार  को  दूर  करता  है  ,  हजारों  तारे  नहीं   ल  उसी  प्रकार  एक  गुणी  पुत्र   समाज  में   अंधकार  दूर  करता  व  प्रकाश  फैलाता  है   l

21 August 2019

WISDOM -----

  रूस  के  संत  गुरजिएफ  का  कहना  था  कि  अगर  इस  सारी  धरती  को  धार्मिक   बनाना  हो  तो  केवल  एक  उपाय  है ----   अपने  इस  उपाय के  बारे  में  उनका  कहना  था  कि  वैज्ञानिकों  को  सारी   चिंता  छोड़कर   एक मशीन  खोज  लेनी  चाहिए  , जो  बिलकुल  घड़ी  की  तरह  हो  l  जिसे  हर  आदमी  के  हाथ  पर  बाँध  दिया   जाये  l  जो  हमेशा  बाँधने  वाले  को  बताती  रहे   कि अब  मौत  कितने  करीब  है     उसका   काँटा  निरंतर  घूमता  रहे   l यह   अनुसंधान कठिन  जरुर  है  पर  असंभव  नहीं   "

20 August 2019

WISDOM------

 एक  बार  एक  राज्य  में  एक  राजा ने   धन  संचय  के  उद्देश्य  से  प्रजा  पर बहुत   सारे  कर  लगा  दिए  , जिससे  प्रजा  की  आर्थिक  स्थिति  खराब  हो  गई  l  कुछ  समय  बाद  राज्य  में  सुखा  पड़ा  , लोग  भूखों  मरने  लगे  ,  किन्तु  राजा  का मन  तब  भी  द्रवित  नहीं  हुआ  l  वह  अपने  संचित  धन  में  से  कुछ  भी  खर्च  करना  नहीं  चाहता  था  l उन्ही  दिनों  एक  महात्मा  उस  राज्य  में  पहुंचे  l  प्रजा  की  दुर्दशा  देखकर  वे  राजमहल  में  राजा  से  मिलने  पहुंचे  l  महात्मा  को  देखकर  राजा  बोला --- महात्मन  ! मैं  आपकी  क्या  सेवा  कर  सकता  हूँ  ? " 
 महात्मा  बोले ---- "राजन  ! मेरा  अंतिम  समय  निकट  आ  गया  है  और  मेरी  इच्छा  है  कि  परलोक  जाकर  वैभवपूर्ण  जीवन  व्यतीत  करूँ  l "  राजा  बोला --- " महात्मन  !  आप  इतना  भी  नहीं जानते  कि  परलोक  में  कुछ  भी  नहीं  लेकर  जाया  जा  सकता  है  ? "
 महात्मा  मुस्कराते  हुए  बोले  --- " आप  ठीक  कहते   हैं  राजन  !  वहां  खाली  हाथ  ही  जाना  पड़ता  है  , परन्तु  फिर  आप  क्यों  धन  संचय  कर  रहे  हैं   ?  आप  प्रजापालक  हैं  , प्रजा  भूखों  मर  रही  है  l  यदि  यह  धन  उसके काम  न  आ  सका   तो  इसे  धन  का  क्या  लाभ  ? "
 साधु  की बात  सुनकर  राजा  को  अपनी  भूल का   एहसास  हो  गया  l  उसने   महात्मा  से  क्षमा  मांगी   और  धन - सम्पदा  को  प्रजा  के  कल्याण  में  खर्च  करना  आरम्भ  कर  दिया   l

19 August 2019

WISDOM -----

  एक  बार  विधाता  ने  जय  और  विजय  को  एक  जिम्मेदारी  सौंपी  l  जाओ  !  पता  लगाकर  आओ  कि  धरती  पर  स्वर्ग  का  सच्चा  अधिकारी  कौन  है  l  उनने   सब  ओर  भ्रमण  किया  पर  सभी  को   कामना वश   पूजा - उपासना  में  लिप्त  पाया  l  एक  घनघोर  जंगल  से एक  मार्ग  गुजरता  था   l  वहां  उन्होंने  एक  वृद्ध   को  देखा  जो  दीपक  जलाये  बैठा  था  l  कुछ  जल  के   पात्र    भी  रखे  थे  l  उधर  से  निकलने  वालों  को  वह  रास्ता  भी  दिखाता  और  जल भी  पिलाता  l  सारी  रात  पथिकों को  मार्ग  दिखने  वाले  उस  वृद्ध  से उन्होंने  प्रात:काल  पूछा  --- " आप  प्रात:  की  उपासना  नहीं  करते   ? "  वृद्ध ने  कहा  -- मैं  यह  नहीं  जनता  - " यह  क्या  होती  है  ,  मैं  तो  यह  भी  नहीं   जानता    कि  उपासना  से  स्वर्ग मिलता  है  l मेरी  तो  सारी  रात  राहगीरों  को   राह  दिखाने   में   बीत  जाती है और  दिन  विश्राम  करने  में  l " 
  दोनों  ने  विधाता  के  पास  जाकर सारा  विवरण   सुनाया  , जब  विधाता  इस  वृद्ध  के  विषय  में पढ़ने  लगे  तो  दोनों बोले  --- ' इस  वृद्ध  को  पूजा - उपासना  कुछ  नहीं  मालूम  ,  इसे  छोडिए  l"
विधाता  बोले ---- "  जय - विजय  !  मेरी  द्रष्टि  में  एकमात्र  यही  व्यक्ति  स्वर्ग  का  अधिकारी  है  l  ईश्वर  का  नाम  लेने  की  अपेक्षा  उसकी  व्यवस्था  में  हाथ  बंटाना  अधिक  पुण्य  देता  है  l "  

14 August 2019

WISDOM ----- धर्म - परिवर्तन

  धर्मांतरण  के  राजनीतिक  और  सामाजिक  अर्थ  जो  भी  हों  , भारतीय  परंपरा  मानती  है  कि  आध्यात्मिक  द्रष्टि  से  यह  असंभव  कर्म  है  l  इस विषय  पर  ' गाँधी  वाड्मय ' में  गांधीजी  के  विचार  बिखरे  पड़े  हैं  l   गांधीजी  मानते  थे  कि  धर्म  बदलने  का अर्थ  है  ---- व्यक्ति की  अंतरात्मा  को  बदलना  l  अंतरात्मा  कोई  वस्त्र  या  आभूषण  नहीं  जिसे  बदला    या  पहना  और  उतारा  जा  सके   l  यह  पिछले  जन्मों  के  संस्कारों  का   सम्मुचय  है  l  संस्कार  ही   वह  प्रमुख  कारण  है   जिसके  कारण  धर्म - परिवर्तन  असंभव  और  प्रकृति  विरुद्ध  कर्म  है  l  '
 महात्मा  गाँधी   ने  लिखा  है  कि  माता - पिता  की  भांति  धर्म  भी  व्यक्ति  को  जन्म  के  साथ  ही  मिलता  है  l  माता - पिता  को  जैसे  नहीं  बदला  जा  सकता  ,  उसी  प्रकार  धर्म  भी  नहीं  बदला  जा  सकता  l उन्होंने  कहा   कि  धर्म  परिवर्तन  के  प्रयत्न  सफल   नहीं  होते  और  व्यक्ति  कहीं  का  नहीं  रह  जाता  l  महात्मा  गाँधी  ने  यह  बात  अपने  छोटे  पुत्र  हरिलाल  के  संबंध  में  कही  थी  l  संगति - दोष  के  कारण  हरिलाल  में  कई  बुरी  आदतें  आ   गईं  थीं  , उसके  दुर्व्यसनों  के  कारण  महात्मा  गाँधी  भी  उसे  पसंद  नहीं  करते  थे  l  कुछ  अवसरों  पर  तो  उन्होंने  अपने  इस  बेटे  को  स्वीकार  करने  से  भी  मना  कर  दिया  था  l दुर्व्यसनों  और  कुटेवों  के  कारण  हरिलाल  पर  कर्ज  भी  चढ़  गया  था   l
  धर्म - परिवर्तन  के  काम  में  जुटी  संस्थाओं  ने   हरिलाल  को  इस  शर्त  पर  आर्थिक  सहायता  दी  कि  वह  अपना  धर्म  छोड़कर  दूसरा  धर्म  अपना  लेगा  l  हरिलाल   ने    यह  शर्त  स्वीकार   कर  ली  l  महात्मा  गाँधी  से  उस  अवसर  पर  पत्रकारों  ने  पूछा   कि  अब  आपका  क्या  कहना  है  ,  आपका  पुत्र  धर्म  बदल  रहा  है  l  गांधीजी  ने  कहा  था   कि  जो  लोग  धर्मांतरण  को  सही मान  रहे  हैं  ,  वे  गलत  हैं   l  हरिलाल  यदि  किसी  प्रलोभन  के  कारण  धर्मांतरण  कर  रहा  है  , तो  कल  कुछ  और  संस्थाएं   उसे  वापस  भी  ला  सकती  हैं   l  कुछ  महीनों  बाद  सनातन  धर्म  के  नेताओं  ने   हरिलाल  को  समझा - बुझाकर   वापस  हिन्दू  बना  लिया   l  ' धर्मांतरण '  और  ' परावर्तन '  के  काम  में  लगीं  संस्थाओं  को  महात्मा  गाँधी ने  समानधर्मा  कहा  है  l  उनमें  भी  ' परावर्तन '  करने  वाली  संस्थाओं  को  सराहा  है  क्योंकि  वे  एक  भूल  को  सुधारने  में  लगी  हुई  हैं   l