16 February 2020

WISDOM -----

   जिज्ञासु   ने  पीर  फकीर   से  पूछा  कि   ईमानवाला  और  अल्लाह  का  प्यारा  बनने   का  मार्ग  बताने  की  कृपा  करें  l   फकीर   ने  उसे  कब्रिस्तान  भेजा   और  कहा   सभी  कब्रों  के  मुर्दों  को  गालियाँ   देकर  आओ  l   उसने  वैसा  ही  किया  l  दूसरे  दिन  फिर  उससे  वहीँ  जाने  को  कहा   और  आदेश  दिया   कब्रों  पर  फिर  जाये   और  मुर्दों  को  उनकी  भरपूर  प्रशंसा  सुनाये  l   जिज्ञासु  ने  वैसा  ही  किया  और  वापस  लौट  आया  l   फकीर  ने  पूछा  कि   इस  निंदा  और  प्रशंसा  से  उन  कब्रों  पर  कोई  फर्क  पड़ा  क्या  ?  जिज्ञासु  ने  उत्तर  दिया --- ' नहीं '  l   तब  फकीर   ने  समझाया  कि  --   " बन्दे  !  लोगों  की  निंदा  , प्रशंसा  ही   मनुष्य  को  विचलित  करती   रहती   है  और  अल्लाह  से  दूरी   बढ़ाती  है  l   यदि  कोई   निंदा   प्रशंसा  की  परवाह  किए   बिना   मात्र  अपने  कर्तव्यों  को  देखे   और  एक  निष्ठा   भाव  से  कल्याण  मार्ग  पर  चले   तो  उसे  लक्ष्य  तक  पहुँचने  का  राजमार्ग  मिल  जायेगा   l 

15 February 2020

WISDOM -----

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  लिखा  है --- "  प्रतिभा  ईश्वर  प्रदत्त  एक  ऐसा   उपहार  है   जो  हर  व्यक्ति  को  ,  उसने  बिना  किसी  भेदभाव  के  बांटा  है  l   अब  यह  उस  व्यक्ति  पर  निर्भर  है  कि  वह  उस  क्षमता  का  विकास  किस  प्रकार  कर  लेता  है  l  '
आचार्य श्री  लिखते  हैं --- ' प्रतिभाशाली  होने  का  अर्थ  है ---- विनम्र , साहसी  एवं   संकल्पवान  बनना  l   इसके  अभाव  में  मनुष्य   महानता  के  उच्च  सोपानों  को  प्राप्त  नहीं  कर  सकता  l '
   संसार  में  जितने  भी  प्रतिभाशाली  महापुरुष  हुए   हैं , अत्यंत  निर्धनता  की  स्थिति   में  भी  वे   पीड़ा  और  पतन  निवारण   के  अपने  कार्य  से  च्युत  नहीं  हुए  l  यद्द्पि  धन  का  लालच , पद  का  प्रलोभन   एवं   उच्च  वर्ग  के  दबाव  उन  पर  कम   नहीं  थे  ,  फिर  भी  वे  जीवन  भर  उसका  साहस पूर्वक  सामना  करते  रहे   और  प्रेम , सम्मान  और  चरित्र  से  प्रेरित  होकर  कार्य  करते  रहे  l
  अंग्रेज  शासक  चार्ल्स  द्वितीय  के  सांसदों  में   मार्वल  एक  ऐसा  प्रतिभाशाली  सदस्य  था   जिससे  निरंकुश  शासक  को  अपनी  सत्ता  छिन   जाने  का  सतत   भय  बना  रहता  था  l   जनता  उसके  विरुद्ध  थी  और  उसका  नेतृत्व   मार्वल  के  हाथों  में  सुरक्षित  था  l  राजा  ने  सभी  प्रमुख  व्यक्तियों  को  कामिनी - कांचन   का  प्रलोभन  देकर  अपने  पक्ष  में  कर  लिया   फिर  भी  मार्वल  को  वह  अपनी  मुट्ठी  में  न  ले  सका  l   चार्ल्स  के  लाखों  प्रयत्न  भी  उसे   उसके  कर्तव्य पथ  से  विचलित  न  कर  सके  l   उसका  कोषाध्यक्ष  डेनवी   जब  एक  लाख  पौंड  लेकर  सांसद   के  पास  पहुंचा   तो  उसने  यह  कहते  हुए  वापस  कर  दिया  --- " मैं  यहाँ  उन  लोगों  की  सेवा  करने  आया  हूँ  जिन्होंने  मुझे  चुन  कर  भेजा  है  l   अपनी  स्वार्थ पूर्ति  के  लिए   राजा  किसी  और  मंत्री  को  चुन  ले  ,  मैं  उनमे  से  नहीं  हूँ  l  "   मार्वल  की  सादगी  और  चरित्र  निष्ठा   आज  भी  लोगों  के  लिए  प्रेरणा  का  स्रोत  बनी   हुई  है  l   उसकी  समाधि   पर  अंकित   ये  शब्द  आज  भी  कितने  सार्थक  हैं ----- " अच्छे  लोग  उससे  प्यार  करते  थे  ,  बुरे  लोग  उससे  डरते  थे  ,  कुछ  लोग  उसका  अनुकरण  करते  थे   परन्तु  उसकी  बराबरी  करने  वाला  कोई  न  था  l "

14 February 2020

WISDOM ---- लोकसेवा की ताकत

  पुराण  की  एक  कथा  है ----  भगवान   श्रीराम  के  पूर्वजों  में  से  एक  थे -- राजा  चक्कवेण  l   वे  बड़े  प्रतापी  राजा  थे   और  उनकी  प्रजा  भी  बड़ी  सुखी - समृद्ध  थी  ,  परन्तु  वे  स्वयं  एक  झोंपड़ी  में  रहते  थे  l   राज - काज  से  जो  समय  मिलता   उसमे  वे   अपने  जीविकोपार्जन  के  लिए  खेती  कर  लेते  l   उनकी  धर्मपत्नी  भी   बड़ी  सादगी  से  रहतीं  l   जब  कभी  किसी  काम  से  बाहर  जातीं ,  तो  नगर  की  धनाढ्य  स्त्रियां  उन्हें  टोकतीं  कि   आप  हमारी  महारानी  हैं,  परन्तु  आपके  शरीर  पर  कोई  आभूषण  नहीं  है  l   महाराज  अपनी  मर्यादा  में  ऐसा  नहीं  करते  हैं   तो  आप  हमें  आदेश  दें  , तो  हम  आपके  लिए  आभूषण  बनवा  दें  l   नगर  की  स्त्रियों  के  बार - बार  कहने  से  प्रभावित  होकर  महारानी  ने   आभूषणों  की  बात  महाराज  चक्कवेण   से  कह  दी  l
  महाराज  यह  सुनकर  चिंता  में  पड़   गए  ,  उन्होंने  कहा  महारानी  आभूषणों  के  लायक   तो  हमारी  स्थिति  नहीं  है  ,  फिर  भी  तुमने  जीवन  में  पहली  बार   मुझसे  कुछ  माँगा  है  ,  तो  कुछ  तो  करना  ही  होगा  l   उसके  बाद   महाराज  ने  अपने  प्रधानमंत्री  को  बुलाया   और  कहा --- " हम  अपने  सुख  के  लिए  राज्य  की  जनता  से  अधिक  कर  वसूल  नहीं  सकते  l   तुम  ऐसा  करो  कि लंका  के  राजा  रावण  से  कर  वसूल  करो l   उसने  स्वर्ण  की  बहुत  जमाखोरी  की  है  ,  इसलिए  उसी  से  तुम  स्वर्ण   ले  आओ  l  "  मंत्री  राजा  की  बात  मानकर  लंका  गया  l    वहां जाकर  उसने   रावण  से  कहा --- " हमारे  महाराज  चक्कवेण   ने  तुमसे  कर  लेने  के  लिए  भेजा  है  l   दम्भी  रावण  यह  सुनकर  बहुत  हँसा   और  बोलै   तुम्हारे  भिखारी  राजा   की  यह  मजाल  कि   रावण  से  कर  वसूल  करने  की  सोचे  l "
  रावण  की  यह  बात  सुनकर  प्रधानमंत्री  ने  कहा --- " रावण  तुम  अभी  हमारे  महाराज  के  प्रभाव  से  अपरिचित  हो   इसलिए  तुम्हे  कुछ  नमूना  दिखा  ही  देते  हैं  l   ऐसा  कहते  हुए  उसने  कहा --- "  यदि  हमारे  महाराज  चक्कवेण   सच्चे  लोकसेवी  और  तपस्वी  हैं   तो  लंका  का  उत्तरी  और  दक्षिणी  हिस्सा  ध्वस्त  हो  जाये  l "  प्रधानमंत्री  के  ऐसा  कहते  ही  सोने  की  लंका  ढहने  लगी  l   न  कोई  सेना  और  न  कोई  मन्त्र शक्ति  ,  सिर्फ  सच्ची  लोकसेवा  के  साथ   तप  और  त्याग  का  ऐसा  प्रभाव  l   रावण  इसे  देखकर  चमत्कृत  भी  हुआ  और  प्रभावित  भी   l    उसने बहुत  सारा  स्वर्ण  प्रधानमंत्री  को  देकर  विदा  कर  दिया  l    प्रधानमंत्री  ने  वापस  घर  पहुंचकर  यह  घटना  अपने  महाराज व  महारानी  को  सुना  दी  l
     प्रधानमंत्री  द्वारा  यह  घटना  सुनने  के  बाद   महाराज  चक्कवेण   ने  महारानी  से  कहा --- ' महारानी  !  सच  आपके  सामने  है  l   अब  आप  चाहें  तो  आभूषण  पहन  लें , लेकिन  आपके  आभूषण  पहनते  ही   मेरी  सच्ची  लोकसेवा  और  तपस्या  का  यह  प्रभाव  नष्ट  हो  जायेगा  l  "  यह  विचित्र , किन्तु  सत्य  सुनकर  महारानी  को  यथार्थ  समझ  में  आ  गया ,  उन्होंने  आभूषण  पहनने  से  स्पष्ट  इनकार   कर  दिया  l  इस  पर  महाराज  ने  कहा ---- " महारानी ,  तप - त्याग , सादगी , सदाचार  ही  लोकसेवी  की  सच्ची  सम्पति  है  l  "  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  का  कहना  था --- " लोकसेवा  की  सफलता  इस  बात  पर  निर्भर  करती  है  कि   उसके  लोकसेवी   आम  जनता  की  जिंदगी  से  कितना  जुड़े  हैं  l   गरीब  जनता  से  दूर  ऐशोआराम  में  रहने  पर   उनकी  आँखों  पर  पट्टी  चढ़  जाती  है    और  वे  जनता   की  दुःख , तकलीफों  को  देखना  बंद  कर  देते  हैं   l   फिर  धीरे - धीरे  लोकसेवा  व्यवसाय  बन  जाती  है    और  लोकतंत्र  भ्रष्टतंत्र  बन  जाता  है  l  "     

13 February 2020

WISDOM ----- बुराइयों से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास जरुरी है

     पं. श्रीराम  शर्मा   आचार्य जी  ने  लिखा  है ---- '  बुराइयों  के  प्रति  व्यूह  रचना   संगठित  प्रतिकार   आज  की  सामयिक  आवश्यकता  है   l  धार्मिक  क्रियाओं  के  नाम  पर   मूढ़ मान्यताएं  और  परम्पराओं  के  नाम  पर   कुरीतियां  तभी  तक  हैं  ,  जब  तक  हम  उन्हें  गले  का  हार  समझकर  लिपटाएँ   हैं   l   जिस  क्षण  से  असलियत  पहचानी  ,  उन्हें  विषदंश   करने  वाला    सांप  समझकर   उतार  फेंकने   के  लिए  सामूहिक  प्रयास  शुरू  करने  चाहिए   l   ऐसा  प्रयास  करते  ही  समूचा  समाज  स्वस्थ  होता  दिखाई  पड़ेगा   l     पर  इस  युगांतकारी  कार्य  के  लिए  शक्ति  का  स्रोत    संगठन , साहस ,  सावधानी  और  मनोबल  में  है   l   ये  महती  शक्तियां  हैं   जिसके  आधार  पर   नवयुग  का  सृजन  बन  पड़ेगा   l  '
  आचार्य श्री  लिखते  हैं ---- ' बुराइयाँ   भी  अच्छाइयों  के  आधार  पर  खड़ी  होती  हैं   और  इन्ही  से  अपना  पोषण  प्राप्त  करती  हैं   l   बुरे  व्यक्ति -- डाकू , अनैतिक  कार्य  करने  वालों   में  भी  कुछ  विशेषताएं  हैं   जो  उनकी  शक्ति  का  स्रोत  हैं --- संगठन , साहस , सावधानी  और  मनोबल --- इन   चार   विशेषताओं  के  कारण  ही   दुष्टता  तेजी  से  पनपती  है  l '
  अच्छाई  और  बुराई  में   यही  अंतर  है   कि   बुराई  मजबूती  से  संगठित  है , सावधान  है  और  उनमे  साहस  है   लेकिन  अच्छाई  संगठित  नहीं  है   इसलिए   उनका  मुकाबला  नहीं  कर  पाती  l   यदि  अच्छाई  भी  इन  विशेषताओं  को  अपने  भीतर  विकसित  कर  ले   तो  बुराई  के  साम्राज्य  को  ध्वस्त  कर  दे  l

12 February 2020

WISDOM-----

    पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  लिखा  है ----  ' वास्तविकता  बहुत  देर  तक  छिपाए   नहीं  रखी   जा  सकती  l  व्यक्तित्व  में  इतने  अधिक  छिद्र  होते  हैं  कि   उनमे  से   हो कर   गंध   दूसरों  तक  पहुँच  ही  जाती  है   l   इसलिए  कमजोरियों  पर , गंदगी  पर  आवरण  न  डालकर   उसके  निष्कासन  के , स्वच्छता  के  प्रयासों  में  निरत  रहना  चाहिए  l '

11 February 2020

WISDOM ------

   पुराण  की  एक  कथा  है   जो  हमें  यह  समझाती   है  कि   सज्जनों  का , सत्पुरुषों  का  तिरस्कार  मत  करो , उन्हें  मत  सताओ ,  क्योंकि  सज्जनों  को  सताकर   कोई  भी  नष्ट  हो  सकता  है ------
  ' नहुष  को  अपने  पुण्य  फल  के  बदले  इंद्रासन   प्राप्त  हुआ  l   वे  स्वर्ग  में  राज  करने  लगे  l   ऐश्वर्य  और  सत्ता   का  मद   जिन्हे  न  आवे  ,  ऐसे  कोई  विरले  ही  होते  हैं  l   नहुष  भी  सत्ता  के  मद  से  प्रभावित  हुए  बिना  न  रह  सके  l    उनकी  दृष्टि  रूपवती  इन्द्राणी  पर  पड़ी  l   वे  उसे  अपने  अंत:पुर  में  लाने  की  विचारणा  करने  लगे   l   प्रस्ताव  उनने  इन्द्राणी  के  पास  भेजा   l   इन्द्राणी  बहुत  दुःखी   हुईं   लेकिन  उन्होंने  विवेक  और  बुद्धि  से  काम  लिया  और  चतुरता  बरती  l    उन्होंने  नहुष  के  पास  संदेश   भिजवाया   कि  वे  सप्त ऋषियों  को  पालकी  में  जोतें  और  उस  पर  चढ़कर  मेरे  पास  आवें  ,  तो  प्रस्ताव  स्वीकार  कर  लूंगी   l 
  आतुर  नहुष  ने   अविलम्ब  वैसी  व्यवस्था  की ,   ऋषि  पकड़  बुलाए ,  उन्हें  पालकी  में  जोता  और  उस  पर  चढ़  कर  बैठ  गए  l  उन्हें  इन्द्राणी  के  पास  पहुँचने  की  जल्दी  थी , सत्ता  का  नशा  था  और  कामांध  भी  थे  ,  ऋषियों  से  कहने  लगे --' जल्दी - चलो '  ' जल्दी  चलो '  l
  दुर्बलकाय  ऋषि   दूर  तक  इतना  भार  ढो  कर  तेज  चलने  में  समर्थ   न  हो  सके  l   अपमान  और  उत्पीड़न   से  क्षुब्ध  होकर  उन्होंने  पालकी  पटक  दी   और  एक  ने  कुपित  होकर  शाप   दे  ही  डाला --- " दुष्ट  !  तू  स्वर्ग  से  पतित  होकर   पुन:  धरती  पर  जा  गिर  l  "  शाप  सार्थक  हुआ  ,  नहुष  स्वर्ग  से  पतित  होकर  मृत्युलोक  में   दीन - हीन   की  तरह  विचरण  करने  लगे  l
  इंद्र   पुन:  इंद्रासन   पर  बैठे   l   उन्होंने  नहुष  के  पतन  की  सारी   कथा  ध्यानपूर्वक  सुनी   और  इन्द्राणी  से  पूछा --- " भद्रे  !  तुमने  ऋषियों  को  पालकी  में  जोतने   का  प्रस्ताव  किस  आशय  से  किया  था  ? "
शची  मुस्कराने  लगीं   और  बोलीं --- "  नाथ ,  आप  जानते  नहीं  ,  सत्पुरुषों  को  सताने  और  उनका  तिरस्कार  करने  से  बढ़कर  ,  सर्वनाश  का   कोई  दूसरा  कार्य  नहीं  l   नहुष  को  उसकी  दुष्टता  समेत   शीघ्र  ही  नष्ट  करने  वाला   सबसे  बड़ा  उपाय  मुझे  यही  सूझा ,  और  वह  सफल  भी  हुआ  l "  देवसभा  में  सभी  ने  शची  से  सहमति  प्रकट   कर  दी  l  सज्जनों  को  सताकर   कोई  भी  नष्ट  हो  सकता  है ,  फिर  नहुष  ही  इसका  अपवाद  कैसे  रहता   ?  

9 February 2020

WISDOM ----- ईर्ष्या के विष से दूर रहें

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  का  कहना  है  कि  ----- ' ईर्ष्या  इनसान   से  हैवान  की  ओर -- पतन  की  राह  पर  धकेल  देती  है   l   यह  इंसानियत  की  विशेषता  नहीं   वरन  नर पिशाच  - नर  कीटक  का  मूल्यहीन    मानदंड  है  l '
  मानव  मन  के  मर्मज्ञ  मानते  हैं  कि   ईर्ष्या  का  प्रार्दुभाव  एक  समान   स्तर  पर  होता  है   l   एक  ही  कक्षा  में  पढ़ने  वाले  छात्रों  के  बीच  ,   एक  ही  विषय  लेने  वालों  के  बीच   ईर्ष्या     होती  है  l   इसी  प्रकार   कार्यालय  में  काम  करने  वाले   एक  समान   पद  वालों  के  बीच  ईर्ष्या  पैदा  होती  है   l   ऑफीसर   की  क्लर्क  के  साथ  या  क्लर्क  की  चपरासी  के  साथ  ईर्ष्या  नहीं  होती  l 
  आचार्य श्री  लिखते  हैं ---  हम  जिससे  ईर्ष्या  करते  हैं  ,  उसके  जैसा  बनना  चाहते  हैं  l   ऐसा  न  बन  पाने  की  अतृप्ति  हमें  ईर्ष्यालु  बना  देती  है  l  हम  उस  व्यक्ति  की  विशिष्टता  को  सम्मान  नहीं  दे  पाते  जो   हमारे  अंदर  नहीं  है   l   जिससे  हम  ईर्ष्या  करते  हैं   उसकी  निंदा  करने  से  भी  नहीं   चूकते   और  साथ  में  यह  भी  चाहते  हैं   कि   लोग  उसकी  घोर  उपेक्षा  करें  ,  उसे  प्रताड़ित  करें   l   और  जब  कभी  ऐसा  होता  है  ,  तो  हमें  एक  अजीब  सी  ख़ुशी  मिलती   है  l   
          बिना  वजह   सिर्फ  ईर्ष्या  के  कारण  किसी  की  उपेक्षा  करना  , उसे  प्रताड़ित   करना  ऐसा  दुर्गुण  है  जो  ईर्ष्यालु  व्यक्ति  को  हैवान  बना  देता  है   l   ईर्ष्यालु  व्यक्ति  को  तो  हम  नहीं  सुधार  सकते ,  न  ही  समझा  सकते    l  लेकिन  उसकी  इस  मन: स्थिति  को  समझ  कर   स्वयं  को  इतना  मजबूत  बना  सकते  हैं   कि   उसके  द्वारा  हमें  प्रताड़ित  करने  वाली  हरकतों  को  उसकी  मानसिक  बीमारी  समझकर   इग्नोर  कर  सकें ,  उसका  अपने  व्यक्तित्व  पर  कोई  असर  न  होने  दें   l    दुष्ट  व्यक्तियों  से  न  दोस्ती  अच्छी  न  दुश्मनी  l   ऐसे  व्यक्तियों  से  दूर  रहने  में  भलाई  है