17 August 2020

WISDOM -----

   स्वामी  विवेकानंद  कहा  करते  थे --- जिसके  मन  में  साहस  तथा  हृदय  में  प्रीति   है ,  वही  मेरा  साथी  बने  l  साहस  के  साथ  यदि  संवेदना  न  हो  तो  युवक  विनाश  की  ओर  बढ़ने  लगते  हैं  ,  जबकि  साहस  के  साथ  संवेदना  हो   तो  मानवता  की  सेवा  की  जा  सकती  है  l  "

16 August 2020

WISDOM ----

     संत  तुकाराम   ने  सेवा  धर्म  को  भी  ईश्वर  भक्ति माना  l   उन्होंने  सबसे  पहले  पूर्वजों  द्वारा  स्थापित   बिट्ठल  मंदिर  का   जीर्णोद्धार  कराया  l   तुकाराम  के  पास  धन  तो  था  नहीं  ,  उन्होंने  श्रमदान  के  द्वारा  इस  कार्य  को  पूर्ण  किया   और  इसी  को  भगवान   की  कायिक  सेवा  मान  लिया  l   इसके  लिए  तुकाराम  ने  स्वयं  पहाड़  से  पत्थर  लाकर  एकत्र   किए ,  मिटटी  भिगोकर  गारा  तैयार  किया   और  फिर  उसकी  दीवार  बनाई  l   यह  सब  कार्य  उन्होंने  अपना  पसीना  बहाकर   किया  l   अपने  इस  उदाहरण  से  उन्होंने  यह  सन्देश  दिया  कि   केवल  कीर्तन  और  नाम  जप   ही  भगवान  की  भक्ति  के  चिन्ह  नहीं  हैं  ,  वरन  किसी  प्रकार  की   प्रत्यक्ष  सेवा   भगवद् भक्ति   का  ही  दूसरा  रूप  है  l 

15 August 2020

WISDOM -----

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  का  कहना  है ----'  पाप , पतन , अनीति  का  मार्ग   शीघ्र  सफलता  का  स्वप्न  जरूर   दिखाता  है  ,  परन्तु     पहुंचता  कहीं  भी  नहीं   है  l  हमारी  चाहतें  अति शीघ्र  पूरी  हो  जाएँ  ,  इस  लालच  में  लोग   धर्म  और  सदाचार  का  पथ  छोड़कर    अपूर्ण  महत्वाकांक्षाओं  की  पूर्ति  के  लिए  निकल  पड़ते  हैं  ,  परन्तु  वो  पथ  मात्र  कीचड़  भरे  दलदल   में  पहुँचाने  के  अतिरिक्त   कुछ  नहीं  करता  l   धर्म   का पथ  समय  साध्य  हो   या  कर्तव्यों  से  परिपूर्ण  --- यह  जीवन  का  राजमार्ग  है  l   उस  पर  चलते  हुए   जीवन  के  उद्देश्य  को  प्राप्त  करना  ही  श्रेयस्कर  है  l   '  आचार्य श्री  लिखते  हैं ---- ' जीवन  में  सुख  आये  या  दुःख  ,  इस  राजमार्ग   को छोड़ने   की भूल   हमें  कभी  नहीं  करनी  चाहिए  ,  क्योंकि  अंतत:   गंतव्य  तक  पहुँचाने  का  कार्य  मात्र  राजपथ  ही  करता  है    l                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                            

WISDOM ----- ' ईश्वर बंद नहीं है मठ में , वह तो व्याप रहा घट - घट में '----- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

   स्वामी  विवेकानंद  के  जीवन   की घटना  है ---  बात   1899  की  है  , जब  स्वामी  विवेकानंद   राजस्थान   में  माउंट  आबू  में   नक्की  झील  के  किनारे  एक  गुफा  में  ठहरे  थे  l  एक  मुसलमान   वकील  के  आग्रह  पर   वे  उसके  घर  पर  रहने   को  चले  गए  l   कुछ  समय  बाद  उस  वकील  ने   महाराजा  खेतड़ी  के   व्यक्तिगत  सचिव   मुंशी  जगमोहन  लाल  को  स्वामी जी  से  मिलने   के  लिए    आमंत्रित  किया  l   जब  मुंशी  जी  ने    स्वामी जी  से    उनके  एक  मुसलमान   के  घर  ठहरने  के  औचित्य  पर  प्रश्न  किया  ,  क्योंकि  वहां  रहने  पर   मुसलमान   द्वारा   उनके  भोजन  का  स्पर्श  होना  स्वाभाविक  था  ,   तब  स्वामी जी  ने  कहा ---- " महाशय  ! आप  क्या  कहते  हैं  ?  मैं  एक     अछूत  के  साथ  भी  भोजन  कर  सकता  हूँ   l   मैं  सर्वत्र  ब्रह्म  के  दर्शन  करता  हूँ  ,  क्षुद्रतम    जीव   में  भी    मैं  ब्रह्म   को   देखता हूँ   और  फिर   सभी  उपासनाओं   का  सार   भी  तो  यही  है   कि   हम  पावन , पुनीत ,  पवित्र , निर्मल ,  निश्छल  , निष्कपट   और  निर्दोष  बनें  l  "    वास्तव   में  एक  ब्रह्मनिष्ठ  व्यक्ति  की  दृष्टि  में   जाति , पंथ ,  मजहब  की  सारी    दीवारें ढह  जाती  हैं   हैं  और   सर्वत्र   उसे ब्रह्म  का  ही  अस्तित्व  दीख  पड़ता  है   l      जब  स्वामी  विवेकानंद  , नरेंद्र  रूप  में  पहली  बार   दक्षिणेश्वर  काली  मंदिर  में   श्री रामकृष्ण परमहंस   से  मिलने  आये  थे  ,  तब   उनके बारे  में   परमहंस जी  ने  कहा  था  ---- " नरेंद्र  ने  पश्चिमी  द्वार  से  कमरे  में  प्रवेश  किया   l   न  तो  वेशभूषा  या  शरीर  की   ओर   उसका  ध्यान  था   और  न  ही  संसार  के  प्रति  आकर्षण ---- कलकत्ते  के  भौतिकवादी  वातावरण  में    इस प्रकार   आध्यात्मिक  चेतना  संपन्न  व्यक्ति  के  आगमन  से   मैं  चकित  रह  गया  l  "   स्वामीजी   की  कविता  की  पंक्ति  है ---- ' बहु  रूपों  में  खड़े  तुम्हारे  आगे  ,  और  कहाँ  हैं  ईश  ?----- 

14 August 2020

WISDOM ------- हम जागरूक हों , यह विश्व बाजार है , इसकी पहुँच हमारी भावनाओं तक है l

   एक  पुरानी   कथा  है --- डाकू  खड़ग  सिंह   और   भोले  संत  बाबा  भारती   की   l    साधु  स्वभाव   के  बाबा  भारती   के  पास  एक  अच्छी   नसल   का  बेशकीमती  घोड़ा  था  l   जिसे   उनसे  छीनने  के  लिए    डाकू  खड़ग  सिंह  ने   हर  जतन   किए , छल - बल  की  युक्ति   और  कुटिलता  ,  सभी  का  सहारा  लिया  ,  परन्तु  सचेत - सावधान   बाबा  भारती  ने  उसकी  हर  चाल  को   नकामयाब  कर  दिया   l   फिर  अंत  में  उसने  बाबा  की  भावनाओं  को    छलने  के  लिए  व्यूह  रचा   l   एक  दिन  शाम  को   जब  बाबा  भारती   अपने  घोड़े  की  पीठ  पर  बैठे   सैर  पर  जा  रहे  थे  ,  उन्होंने  एक  लंगड़े  की  दर्द  भरी  पुकार  सुनी  ---- " अरे  ! मुझसे  चला  नहीं  जाता ,  मुझ  लंगड़े  की   मदद  करो  बाबा  ! "  बाबा  भारती   इस दर्द  भरी  पुकार  पर   अपने  को  रोक  न  सके   और  उन्होंने  घोड़े  पर  खड़ग  सिंह  को  बैठा  दिया  l   कथा  कहती  है  कि   डाकू  खड़ग   सिंह  अपनी  सफलता  पर  हँसा   और  बोला --- ' तुमने  आसानी  से  मुझे  यह  घोड़ा  नहीं  दिया  ,  मैंने  तुम्हारी  भावनाओं   को छल कर  इस  घोड़े  पर  अपना  कब्ज़ा  कर  लिया  l "

  तब  बाबा  भारती  ने  दरद   भरे  स्वर  में  कहा ---- "  अपनी  यह  चालबाजी  किसी  को  मत  कहना   खड़ग  सिंह    अन्यथा  कोई  किसी  लंगड़े  की  मदद   नहीं  करेगा  l  "       लेकिन   लगता  है  डाकू  खड़ग   सिंह  ने  अपनी  सफलता  की  कथा    सबको  विशेष  रूप  से  कॉरपोरेट  जगत  को  सुना  दी  l   उस  ज़माने  में  एक  से  एक अमीर  थे , राजे - महाराजा  थे  , डाकू   खड़ग   सिंह  ने  उनका  किसी  का  घोड़ा  नहीं  छीना  l  सीधे  - सरल ,  भावुक  बाबा  भारती  के  साथ  ही  छल  किया  l    यही  स्थिति  आज  है    सीधी - सरल  ,  रोजी - रोटी  की  चिंता  में  डूबी  हुई  जनता   की  भावनाओं  को  छलकर ,  कभी  भय  दिखाकर ,  कभी  सपने  दिखाकर   कुछ   मुट्ठी भर  लोग   अमीर  व  शक्तिशाली  हो  जाते  हैं  -----

13 August 2020

WISDOM ----- सद्बुद्धि ही संसार के समस्त कार्यों में प्रकाशित है

  सद्बुद्धि   से  अभिप्राय  है  --- दूरदर्शी  विवेकशीलता   l   बुद्धि   तो सभी  मनुष्यों  के  पास  होती  है  ,  पर  यदि  मनुष्य  सद्बुद्धि  संपन्न  हो   तो  वह  अपना  निज  का  कल्याण  करने  के  साथ - साथ   समाज  को  भी  अपनी  विभूतियों  से  लाभान्वित  करता  है  l  भगवान  श्रीकृष्ण  ने   श्रीमद्भगवद्गीता  में    इस  सद्बुद्धि  को  ही   बुद्धिमानों  की  विभूति  और  अपना  स्वरुप  बताया  है   l   गायत्री  उपासना   का सर्वोपरि  लाभ  सद्बुद्धि  के  जाग्रत  होने  के  रूप  में  ही  साधक  को  मिलता  है  l  गायत्री  उपासना  का  प्रत्यक्ष  उपहार  --- सद्बुद्धि  है  l   सद्बुद्धि  जाग्रत  होने  पर  व्यक्ति  श्रेष्ठ   का चयन   करता है   l 

कहते  हैं    जिस  प्रकार  ग्वाला  लाठी  लेकर  पशुओं  की   रक्षा  करता  है  ,  उस  तरह  देवता  किसी  की  रक्षा  नहीं  करते   l   वे  जिसकी  रक्षा  करना  चाहते  हैं  ,  उसकी  बुद्धि  को  सन्मार्ग  पर  नियोजित  कर  देते  हैं   l  जब  व्यक्ति  सद्बुद्धि  से , विवेक  से  कार्य  करता  है  तो  उसका  परिणाम  भी  शुभ  होता  है  l   इसीलिए   चाणक्य  ने  भी  भगवान  से  प्रार्थना  की  कि   भले  ही  मेरा  सब  कुछ  चला  जाये  पर   सद्बुद्धि   बनी     रहे   l 

11 August 2020

WISDOM -----

   " दुःख  में  सुमिरन  सब  करें ,  सुख  में  करे  न  कोय   l  जो  सुख  में  सुमिरन  करे , दुःख  काहे   को  होय  l  "   श्रीमद्भगवद्गीता  में  भगवान   कहते  हैं  --- शुभ  और  अशुभ  दोनों  ही  प्रकार  के  कर्मों  का  फल  मनुष्य  के  लिए   बाधक  है  l '  --------- इस  तथ्य  को  समझाते   हुए  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं   -----  शुभ  कर्मों  का  फल  भोगते - भोगते   कर्तापन  का  अभिमान  हो  जाता  है  l  भाग्य  अच्छा  होता  है  तो  मिटटी  भी  सोना  बन  जाती  है   और  फिर  अहं   और  ऐश्वर्य   सिर   पर  चढ़कर  बोलने  लगता  है  ,  जहाँ  खड़ा   हो जाता  है  वहां  जय - जयकार  होने  लगती  है  l  राजनीति , समाजतन्त्र , धर्मतंत्र   में  कई  ऐसे  व्यक्ति  देखे  जाते  हैं  , जिनके  शुभ  फलों  का  उदय  होते  ही   वे  छलांग  लगाने  लगते  हैं  , रातोंरात  चर्चित  हो  जाते  हैं  ,  पर  यह  सब  स्थायी  नहीं  है  l    अशुभ  फल  जब  पैदा  होते  हैं   तो  हर  जगह  विपदा  ही  विपदा  नजर  आती  है  , अपमान  , षड्यंत्रों  की  श्रंखला  आ  जाती  है    l   हमें  अशुभ  के  क्षणों  में  शुभ  की    तैयारी    करते  रहना  चाहिए   और  शुभ  के  क्षणों  में ,  सुख  के  समय   अशुभ  के  लिए  भी  तैयार  रहना  चाहिए  l  हम  सुख  के  क्षणों  को   योगमय  बना  लें  l   सबको  साझीदार  बनाकर  पुण्य  बांटे   l   सुख  में  कभी  भगवान   को  न  भूलें   l   सुख  आये  तो  उसे  सहज  रूप   स्वीकार  कर  लें  , बौराएँ  नहीं    और  दुःख  आए   तो  उसे  तितिक्षा  मानकर  झेल  लें  l   परमात्मा  सबकी  परीक्षा   दुःखों   के  माध्यम  से  लेता  है   l