श्री हनुमान जी विद्वान् , गुणी व बहुत चतुर थे l आज के कठिन समय में श्री हनुमान जी का चरित्र हमें जीवन जीने की कला सिखाता है l जब हनुमान जी माँ सीता की खोज में लंका जा रहे थे l समुद्र पार कर रहे थे l मैनाक पर्वत ने उनसे कुछ देर विश्राम करने को कहा l हनुमान जी ने उसको अस्वीकार नहीं किया , केवल स्पर्श किया l स्वर्ण पर्वत मैनाक सुख - समृद्धि का प्रतीक है l हनुमान जी ने सुख - समृद्धि को ठुकराया नहीं , लेकिन उनका ध्यान अपने लक्ष्य पर , अपने उद्देश्य पर था इसलिए वे उसका स्पर्श कर आगे बढ़ गए l इसका अर्थ यही है कि कितना भी सुख - वैभव हमारे पास आ जाये , हमें उसका विवेकपूर्ण ढंग से उपयोग करना चाहिए , उसमे लिप्त होकर अपने उद्देश्य से भटकना नहीं चाहिए l श्री हनुमान जी ने अपने आचरण से यह बताया कि हमें अपना ध्यान लक्ष्य पर केंद्रित रखना चाहिए l अनेक लोग ईर्ष्या - द्वेष के कारण अपनी पूरी ऊर्जा दूसरों की निंदा करने और उनसे लड़ने , उनके विरुद्ध षड्यंत्र करने में बर्बाद कर देते हैं l हनुमान जी को अपने मार्ग में सिंहिका नाम की राक्षसी मिलती है , जिसे उन्होने मार डाला क्योंकि वह ईर्ष्या का प्रतीक थी , वह उड़ते हुए लोगों की परछाई पकड़ कर खा जाती थी l
23 January 2021
WISDOM -------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " शक्ति और सामर्थ्य का प्रयोग अहंकार और दंभ प्रदर्शन के लिए नहीं होना चाहिए , बल्कि इसका नियोजन मानवता के कल्याण और विकास के लिए करना चाहिए l सामर्थ्य के संग जब अहंकार जुड़ता है , तो विनाश होता है और जब सामर्थ्य के संग संवेदना जुड़ती है , तो विकास होता है l " आचार्य श्री आगे लिखते हैं ---- " सामर्थ्य और शक्ति का प्रयोग तो समान व्यक्ति के विरुद्ध होना चाहिए , और वह भी मूल्यों की रक्षा के लिए l " महाभारत में जब अर्जुन ने देखा कि उसे अपने ही भाइयों , पितामह , गुरु आदि से युद्ध करना होगा तो वह विषादग्रस्त हो गया , उसने अपना गांडीव नीचे रख दिया तब भगवान कृष्ण ने उसे गीता का उपदेश दिया , भगवान ने कहा ---- वे लोग अधर्म और अन्याय के पक्ष में हैं , अत्याचारी हैं l यदि अत्याचार और अन्याय को हम नहीं मिटायेंगे तो वे हमें मिटा देंगे l इस संसार में सुख - शांति के लिए असुरता को मिटाना अनिवार्य है , इसलिए तुम शस्त्र उठाओ और युद्ध करो l
21 January 2021
WISDOM ----- अहंकार विष है, जीवन का
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- सम्मान , प्रसिद्धि , यश , बड़ा आदमी होने का स्वांग , ये सब अहंकार के ही रूप हैं l सारी दुनिया इस ' मैं ' के कारण ही तो पागल है l यह ' मैं ' एक काला नाग है , महाविषधर सर्प है l इस महविषैले सर्प ने जिसे डस लिया , समझो उसकी खैर नहीं l अहं का विष ही सारी पीड़ा का कारण है l ------ जितना बड़ा अहंकार , उतनी बड़ी पीड़ा l अहंकार घाव है , जरा सा हवा का झोंका भी दरद दे जाता है l " स्वामी रामकृष्ण परमहंस कहते हैं ---- " जब तक अहंकार रहता है , तब तक ज्ञान नहीं होता और न मुक्ति होती है l इस संसार में बार - बार आना पड़ता है l बछड़ा ' हम्बा - हम्बा ' ( मैं , मैं ) करता है , इसलिए उसे इतना कष्ट भोगना पड़ता है l कसाई काटते हैं l चमड़े से जूते बनते हैं और जंगी ढोल मढ़े जाते हैं l वह ढोल भी न जाने कितना पीटा जाता है l तकलीफ की भी हद हो जाती है l अंत में आँतों से तांत बनाई जाती है l उस तांत से जब धुनिए का धुनहा बनता है और उसके हाथ में धुनकते समय जब तांत तूँ - तूँ करती है , तब कहीं निस्तार होता है l तब वह ' हम्बा - हम्बा ' ( हम - हम ) नहीं बोलती , तूँ - तूँ बोलती है , अर्थात हे ईश्वर , तुम ही कर्ता हो , मैं अकर्ता l तुम यंत्री हो , मैं यंत्र l तुम्ही सब कुछ हो l
WISDOM ------
ग्रीक का राजा प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात से मिलने पहुंचा l उसने उनसे प्रश्न किया --- " कृपया ये बताएं कि संसार में इतनी असमानता है , हर जगह विसंगतियाँ हैं , इनका निस्तारण कैसे हो सकता है ? " सुकरात ने उत्तर दिया ---- " राजन ! दुनिया भर की असमानता हटाने की आवश्यकता ही क्या है ? यदि हम संसार के सारे पर्वत समतल कर दें तो पर्वतों पर रहने वाले प्राणी कहाँ रहेंगे और यदि संसार के सारे समुद्र और खाइयां पाट दी जाएँ तो मछलियाँ कहाँ रहेंगी ? समुद्र और जल में रहने वाले अन्य प्राणी कहाँ रहेंगे ? इसलिए यह सोचने के बजाय कि संसार की सारी असमानता हटा दी जाए , तुम अपने मन से इस भेदभाव को हटाने का प्रयत्न करो , तो तुम्हे सारी विसंगतियों में भी समरसता दिखाई पड़ने लगेगी l " सुखी जीवन का यही मार्ग है l
20 January 2021
WISDOM ----- अपने को मूल्यवान समझो
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- ' जिसने अपने को जितना मूल्यवान समझा संसार से उसका उतना ही मूल्य प्राप्त हुआ l ' टिटियन नामक एक प्रसिद्ध चित्रकार था l अनेक व्यक्ति उसके चित्रों को देखने और खरीदने आते थे l एक दिन एक धनिक कलाप्रेमी आया l उसने देर तक एक चित्र को देखकर पूछा ---- " मैं इस चित्र को अपने लिए चुनता हूँ l इसका मूल्य क्या है ? ' चित्रकार ने शांत स्वर में उत्तर दिया ---- " पचास गिन्नियां l " वह धनी व्यक्ति बोला ---- " एक छोटे से चित्र का इतना अधिक मूल्य ! आपको इस चित्र को बनाने में कठिनता l से एक सप्ताह लगा होगा l कागज , रंग आदि का खर्चा तो नहीं के बराबर है l फिर इसका दाम पचास गिन्नियां कैसे ? आप शायद भूल करते हैं l " टिटियन ने उत्तर दिया --- " महाशय , आप भूलते हैं l पूरे तीन साल निरंतर परिश्रम करने के बाद मैं इस योग्य बना हूँ कि ऐसे चित्र को चार दिन में ही बना सकता हूँ l इसके पीछे मेरा वर्षों का अनुभव , साधना और योग्यता छिपी है l " धनी व्यक्ति उसके उत्तर से संतुष्ट हुआ और उसने इतने बड़े मूल्य पर चित्र को खरीद लिया l यदि चित्रकार अपनी कला का मूल्य कम लगाता , तो निश्चित ही अपनी कला का मूल्य कम मिलता l अपने को मूल्यवान समझें
WISDOM ------ अहंकार और क्रोध से किसी का भला नहीं होता
पुराण में एक प्रसंग है ---- प्रचेता एक ऋषि के पुत्र थे l किन्तु उनका स्वभाव बड़ा क्रोधी था l उन्होंने क्रोध को एक व्यसन बना लिया था और जब - तब उससे हानि उठाते रहते थे l ज्ञानी और साधक होते हुए भी वे अपनी इस दुर्बलता को दूर नहीं कर पा रहे थे l एक बार वे एक वीथिका से गुजर रहे थे l उसी समय दूसरी ओर से कल्याणपाद नाम का एक व्यक्ति आ गया l दोनों एक - दूसरे के सामने आ गए l पथ बहुत सँकरा था l एक के राह छोड़े बिना , दूसरा जा नहीं सकता था , लेकिन कोई भी रास्ता छोड़ने को तैयार नहीं हुआ और हठपूर्वक आमने - सामने खड़े रहे l थोड़ी देर खड़े रहने पर दोनों ने हटना , न हटना प्रतिष्ठा - अप्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया l अजीब स्थिति पैदा हो गई l ऋषि कहते हैं --- यहाँ पर समस्या का हल यही था कि जो व्यक्ति अपने को दूसरे से श्रेष्ठ और सभ्य समझता है वह हटकर रास्ता दे देता और यही उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण होता l निश्चित था कि प्रचेता , कल्याणपाद से श्रेष्ठ थे l कल्याणपाद उनकी तुलना में कम था l इसलिए प्रचेता को उसे रास्ता दे देना चाहिए , किन्तु क्रोधी स्वभाव के कारण उन्होंने वैसा नहीं किया , बल्कि उसी की तरह अड़ गए l कुछ देर दोनों खड़े रहे , परस्पर विवाद हुआ , फिर प्रचेता को क्रोध हो आया l उन्होंने उसे श्राप दे दिया कि राक्षस हो जाये l उनके तप के प्रभाव से कल्याणपाद राक्षस बन गया और प्रचेता को ही खा गया l क्रोध व अहंकार के कारण प्रचेता के तप का प्रभाव कम हो गया था इस कारण वे अपनी रक्षा न कर सके l
19 January 2021
WISDOM ------
' जो जागरूक नहीं हैं , अज्ञानी हैं , वे स्वयं का ही अहित कराते हैं l ' स्वामी विवेकानंद ने अपने शिष्य को एक कथा सुनाई ------- एक तत्व ज्ञानी अपनी पत्नी से कह रहे थे --- ' संध्या आने वाली है , काम समेट लो l एक सिंह कुटी के पीछे यह सुन रहा था , उसने समझा संध्या कोई बड़ी शक्ति है , जिससे डरकर यह निर्भय रहने वाले ज्ञानी भी अपना सामान समेटने को विवश हुए l सिंह चिंता में डूब गया और उसे संध्या का डर सताने लगा l पास के घाट का धोबी दिन छिपने पर अपने कपड़े समेट कर गधे पर लाने की तैयारी करने लगा l देखा तो गधा गायब l उसे ढूंढ़ने में देर हो गई l रात घिर आई और पानी बरसने लगा l धोबी को एक झाड़ी में खड़खड़ाहट सुनाई दी , उसने समझा गधा है l तो लाठी से पीटने लगा --- धूर्त यहाँ छिपकर बैठा है l सिंह की पीठ पर लाठियां पड़ीं तो उसने समझा यही संध्या है , सो डर से थर - थर काँपने लगा l धोबी उसे घसीट लाया और कपड़े लाद कर चल दिया l रास्ते में एक दूसरा सिंह मिला , उसने अपने साथी की दुर्गति देखी तो पूछा --- यह क्या हुआ ? तुम इस तरह लदे क्यों फिर रहे हो ? सिंह ने कहा ---- संध्या के चंगुल में फँस गए हैं l वह बुरी तरह पीटती है और इतना वजन लादती है l वास्तव में सिंह को कष्ट देने वाली संध्या नहीं , उसकी भ्रान्ति थी l वह भयभीत हो गया , उसने धोबी को कोई बड़ा देव - दानव समझ लिया और उसके प्रहार का विरोध नहीं किया , भय के कारण सामना ही नहीं किया , तो दुर्गति हुई l मनुष्य जागरूक हो , निर्भय हो , अपने वास्तविक स्वरुप को समझे , स्वाभिमान से रहे l