सत्संग से कैसे रूपांतरण होता है , इस सन्दर्भ में कथा है ---- जब महर्षि वाल्मीकि दस्यु रत्नाकर हुआ करते थे l इस अपकर्म को करते हुए जीवन के कितने ही वर्ष बीत गए थे l ईश्वर की कृपा से एक दिन उन्हें देवर्षि नारद मिले l नारद जी ने उनसे पूछा -- ' तुम यह सब क्यों करते हो , क्या तुम्हारे परिवार के स्वजन तुम्हारे इस कर्मफल के भी भागीदार होंगे ? " उन्होंने कहा --- ' अवश्य ' l तब देवर्षि ने कहा --- " ऐसे नहीं , तुम उन लोगों से पूछकर मुझे अपना उत्तर दो l " तब वे देवर्षि को एक पेड़ से बांधकर उत्तर पूछने अपने परिवार के पास गए l सभी लोगों ने एक स्वर से मना करते हुए कहा --- " अपने कर्मफल का भोग तुम्हे स्वयं भोगना पड़ेगा l तुम्हारे कर्म को हम क्यों भोगेंगे l " यह सुनकर उन्हें बहुत निराशा हुई और वे भागकर देवर्षि की शरण में आये l तब देवर्षि ने उन्हें ' राम नाम जपने को कहा l दस्यु कर्म के कारण ' राम ' जपना बहुत कठिन लगा , तब देवर्षि ने कहा --- ' कोई बात नहीं तुम ' मरा - मरा ' जपो l भगवान का यह उल्टा नाम उनका अमोघ मन्त्र बन गया , साधना शुरू हुई l ' मरा - मरा ' कब ' राम - राम ' में बदल गया पता ही नहीं चला l अनेकों बाधाएं आईं , देवर्षि धीरज बंधाते रहे कि तुम प्रभु को पुकारते रहो सब बाधाएं दूर होंगी l समय बीतता गया , अंधकार दूर हुआ , रूपांतरण हुआ और संसार को महर्षि वाल्मीकि मिले l उनके जीवन ने सिखाया कि महापुरुषों का पल भर का सत्संग भी दुर्लभ और अमोघ होता है l
23 October 2021
22 October 2021
WISDOM-------
रामकृष्ण परमहंस परस्पर चर्चा में शिष्यों को बता रहे थे ---- मनुष्यों में कुछ देवता होते हैं , शेष तो नर पिशाच ही होते हैं l नरेंद्र ने पूछा --- भला इन नरपिशाचों और मनुष्य तथा देवताओं की पहचान क्या है ? परमहंस ने कहा ---- वे मनुष्य देवता हैं जो दूसरों को लाभ पहुँचाने के लिए स्वयं हानि उठाने के लिए तैयार हैं l मनुष्य वे हैं जो अपना भी भला करते हैं और दूसरों का भी l नर पिशाच वे हैं जो दूसरों की हानि ही सोचते हैं और करते हैं , भले ही इस प्रयास में उन्हें स्वयं ही हानि सहनी पड़े l "
21 October 2021
WISDOM -----
20 October 2021
WISDOM ------
ऋषियों का कहना है ---- जिस प्रकार हजारों गायों के बीच बछड़ा अपनी माँ को पहचान लेता है , उसी प्रकार मनुष्य के कर्म उसे ढूंढ़ ही लेते हैं l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- ' आप चाहते यह हैं कि आपको अच्छे कर्मों का फल मिले , पर बुरे कर्मों के बारे में इतने लापरवाह क्यों हैं कि हम राम -नाम ले लेंगे , पंचामृत पी लेंगे , गंगा जी में डुबकी मार लेंगे तो इन दिल्लगी - मजाकों मात्र से पाप से छूट जायेंगे l यह मुमकिन नहीं है l जहर खाया है तो आपको मरना होगा l आपने गलतियां की हैं तो उनका फल भुगतना होगा या फिर प्रायश्चित कीजिए , जितनी खाई खोदी है उतनी भरिये l आध्यात्मिक क्षेत्र की सच्चाई आपको समझनी होगी कि कर्मफल एक वास्तविकता है और उसमें भूतकाल के कर्मों का आपका जो डिपॉजिट है , वह ज्यों का त्यों है l वह चिन्ह पूजा से नहीं मिटेगा , उसका भी विधि - विधान है l "
18 October 2021
WISDOM------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- ' क्रोध एक ऐसा विष है , जो मनुष्य के चिंतन और व्यक्तित्व को विषाक्तता में बदल देता है l क्रोध करने पर हित अनहित में , शुभ अशुभ में , शांति अशांति में , हिंसा अहिंसा में , परमार्थ स्वार्थ में , विनम्रता अहंकार में , बदल जाता है l क्रोध एक ऐसे विकार के रूप में है जो कई तरह की बीमारियों को जन्म देता है l चिकित्सकों के अनुसार कैंसर , उच्च रक्त चाप , सिरदर्द और मानसिक रोगों की एक मुख्य वजह क्रोध ही है l क्रोध एक ऐसा मनोविकार है जो बुद्धि , विवेक और भावनाओं सबको नष्ट कर देता है l '
17 October 2021
WISDOM -----
' जो ईश्वर से भय खाता है , उसे दूसरा भय नहीं सताता l ' अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार संकीर्ण स्वार्थ ,.
जो ईश्वर से भय खाता है उसे दूसरा भय नहीं सताता l ' अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार संकीर्ण स्वार्थ , वासना एवं अहंकार से युक्त अनैतिक जीवन भय का प्रमुख कारण है l वैराग्य शतक में भतृहरि ने भय की स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण किया है --' भोग में रोग का भय , ,सत्ता में गिरने का , शत्रुओं का भय , सौंदर्य में बुढ़ापे का भय , शरीर में मृत्यु का भय l इस तरह संसार में सब कुछ भय से युक्त है l जब स्वर्ग के राजा इंद्र तक भयभीत हैं तो इस संसार में उच्च पदों पर बैठे लोग कितने भयभीत होंगे , इसका अंदाजा लगाया जा सकता है l हर व्यक्ति इस भय से निपटने के लिए अपनी मानसिक स्थिति और अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रयास करता है l जितना पाने की लालसा है , उतना ही खोने का भय है l आचार्य श्री लिखते हैं ---' देवराज इंद्र के भय का कारण सिर्फ इतना है कि वे वासना के शिखर पर बैठे हैं , ऐसे में जब भी कोई ऊपर उठने की कोशिश करता है तो वे घबराने लगते हैं और उसे गिराने के लिए अप्सराएं उसके पास भेजते हैं l इससे बेहतर कोई दूसरा उपाय नहीं है l l ' यह भय ही तनाव का कारण है l जितने मजे से एक सामान्य आदमी सोता है , उतने मजे से वह नहीं सो सकता , दार्शनिक लाओत्से ने कहा है --- ' अगर मजे से रहना है तो आखिरी में रहना l जो अंतिम में खड़ा है , उसे कोई धक्का देने नहीं आएगा l अगर प्रथम होने की कोशिश होगी तो फिर अनेकों आ जायेंगे पीछे खींचने के लिए
15 October 2021
WISDOM ------
मनुष्य सारा जीवन क्षण भंगुर लालसाओं की तृप्ति के लिए भागता रहता है , इसके लिए कितने दांव -पेंच भी लगाता है , अंत में समझ आता है सब कुछ खाली है , रिक्त है , पूरा जीवन व्यर्थ हो गया l इसलिए पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " क्षण भंगुर लालसाओं और उनकी तृप्ति को लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता l लक्ष्य को तो सदा शाश्वत और शांतिदायक होना चाहिए l " महान संत गुरजिएफ अपने शिष्यों से कथा कहते थे ------- " आकाश में उड़ने वाली चिड़िया को अपने से थोड़ी दूर पर एक चमकता हुआ श्वेत बादल दिखा l उसने सोचा --- चलो मैं उड़कर उस बादल को छू लूँ l ऐसा सोचते हुए वह चिड़िया उस बादल को अपना लक्ष्य बनाकर अपनी पूरी क्षमता से उड़ चली , लेकिन हवाओं के साथ अठखेलियाँ करता हुआ वह बादल कभी पूर्व में जाता तो कभी पश्चिम में और कभी तो वहीँ रूककर चक्कर खाते हुए चक्रव्यूह रचने लगता , कभी छिपता , कभी प्रकट हो जाता l अपनी बहुत कोशिशों के बाद भी चिड़िया उस तक नहीं पहुँच सकी l प्रयासों के इस दौर में उसने पाया कि जिस बादल के पीछे वह अपने जीवन को दांव पर लगाकर भाग रही थी , वह अचानक हवा के तेज झोंकों से छँट गया l अपने अथक प्रयत्न के परिणाम में उस चिड़िया ने देखा कि अरे ! यहाँ तो कुछ भी नहीं है l इस सच को देखकर उसका विवेक जाग्रत हो गया , चिड़िया को अपनी भूल का एहसास हुआ उसके अंतर्विवेक ने कहा -- यह तो बड़ी भूल हो गई l यदि लक्ष्य बनाना हो तो क्षण भंगुर बादलों को नहीं , बल्कि पर्वत की चोटियों को बनाना चाहिए जो शाश्वत और अनंत हैं l " आचार्य श्री लिखते हैं --- गुरजिएफ की यह बोध कथा हम सभी के जीवन में घटित होती है l हम अपने विवेक को जाग्रत करें l "