8 November 2022

WISDOM -----

    एक  नवयुवक  एक  सिद्ध  महात्मा  के  आश्रम  में  आया  करता  था  l  महात्मा  उसकी  सेवा  से  प्रसन्न  होकर  बोले  ---- " बेटा  ! आत्म कल्याण  ही  मनुष्य  जीवन  का  सच्चा  लक्ष्य  है  और  इसे  ही  पूरा  करना  चाहिए  l "  यह  सुनकर   युवक  ने  कहा --- " महाराज  !  वैराग्य  धारण  करने  पर   मेरे  माता -पिता  कैसे  जीवित  रहेंगे  ?  मेरी  युवा  पत्नी  मुझसे  अत्यंत  प्रेम  करती  है  l  वह  मेरे  वियोग  में  मर  जाएगी  l "  महात्मा  बोले ---- "  कोई  नहीं  मरेगा  बेटा  !  यह  सब  दिखावटी  प्रेम  है  l  तू  नहीं  मानता  तो  परीक्षा  ले  ले  l  "  युवक  राजी  हो  गया  तो  महात्मा जी  ने  उसे  देर  तक  सांस  रोकना  सिखाया  l  युवक  ने  घर  जाकर  वही  किया  l  घर वाले  उसे  मरा  समझकर  हो -हल्ला  करने  लगे , रोने  लगे  l  पड़ोस  के  बहुत  से  लोग  इकट्ठे  हो  गए  , तभी  महात्मा जी  वहा  पहुंचे   और  बोले  --- " हम  इस  लड़के  को  जीवित  कर  देंगे  ,  पर  तुम  लोगों  को  कुछ  त्याग  करना  पड़ेगा  l " घर -परिवार  के  लोग  बोले  --- " हम  तैयार  हैं  ,  आप  इसे  जीवित  कर  दें  l "  महात्मा  बोले --- "  एक  कटोरा  दूध  लाओ  l "  दूध  आने  पर   महात्मा जी  ने  उसमें  एक  चुटकी  भस्म  डाली  ,  एक  मन्त्र  पढ़ा   और  बोले --- " जो  कोई  इस  दूध  को  पी  लेगा  वह  मर  जायेगा   और  यह  युवक  जीवित  हो  जायेगा  l "  अब  समस्या  यह  हुई  कि   दूध  कौन  पिएगा  l  माता -पिता  बोले  कहीं  वह  जीवित  न  हुआ  तो   एक  और   जान   व्यर्थ  में  जाएगी  l   पत्नी  बोली --- " इस  बार  जीवित  हो  जाएंगे  तो  क्या  ,  कभी  तो  मरेंगे  l "  अब  महात्मा  बोले  ---- " अच्छा  , मैं  ही  इस  दूध  को  पी  लेता  हूँ  l "  सभी  लोग  प्रसन्न  होकर  बोले  ---" महाराज  ! आप  धन्य  हैं  l  साधु -संतों  का  जीवन  परोपकार  के  लिए  है  l "  महात्मा  ने  दूध  पी  लिया  और  युवक  को  बोले --- " उठ  बेटा  !  ज्ञान  हो  गया  कि  कौन  तेरे  लिए  प्राण  देता  है  l  "  युवक  उठ  बैठा  ,  उसे  महात्मा जी  की  एक -एक  बात  अब  समझ  में  आ  गई  कि  इस  संसार  में  कोई  किसी  का  नहीं  है  ,  सब  स्वार्थ  के  रिश्ते -नाते  हैं   !  इसलिए  संसार  में  रहकर  केवल  अपना   कर्तव्य पालन  करो  l  किसी  से  कोई  मोह , कोई  उम्मीद  नहीं  रखो  l  सांसारिक  रिश्तों  के  प्रति  अपना  कर्तव्य  करते  हुए  अपना  एक  रिश्ता  भगवान  से  रखो  ,  केवल  मात्र  ईश्वर  ही  हैं  जो  हर  पल  और  हर  परिस्थिति  में  हमारा  साथ  देते  हैं  l  

7 November 2022

WISDOM ----

   महाभारत  के  विभिन्न  प्रसंग  पाप  कर्म  और  उनके  परिणाम  को  बताए  हैं  l  यही  नहीं  अत्याचारी  और  अन्यायी  का  समर्थन  करने  वाले  चाहे  भीष्म  पितामह  और  कर्ण  ही  क्यों  न  हो  ,  उनके  अंत  को  भी  बताते  हैं  l  एक  प्रसंग  है  अश्वत्थामा  का  ,  यदि  उसके  द्वारा  किए  गए   महान  पाप  का  परिणाम  कोई  समझे  तो  शायद  युद्ध , आतंक  जैसी  घटनाएँ  समाप्त  हो  जाएँ  l  ---महाभारत  का  अंत  हुआ  ,  पांडव  पक्ष  के  सभी  लोग  निश्चिन्त  होकर  शिविर  में  सो  रहे  थे  ,  तब  अश्वत्थामा  ने  वहां  भयानक  आतंक  मचाया  ,  अनेक  वीरों  को  सोते  में  कुचलकर  मार  डाला  और  शिविर  में  आग  लगा  दी  जिसमे  द्रोपदी  के  पांच   पुत्र  जो  बहुत  छोटे  थे  उनका  भी  अंत  हो  गया  l  इससे  भी  उसका  जी  नहीं  भरा  तो  उसने  एक  तिनके  को  अभिमंत्रित  कर  के   अभिमन्यु  की  पत्नी  उत्तर  के  गर्भ  की  ओर   फेंका  जिससे  पांडवों  के  वंश   का  समूल  नाश  हो  जाये  l  तब  भगवान  कृष्ण  ने   उस  गर्भस्थ  शिशु  की  रक्षा  की  l  अश्वत्थामा  जंगल  में  भाग  गया  ,  भीम  ने  उसे   ढूंढ़कर  भगवान  कृष्ण  के  सामने  प्रस्तुत  किया   l  तब  भगवान  ने  कहा  --- इसे  मृत्यु  दंड  नहीं  दो  l   इसके  माथे  पर  जो  मणि  है  उसे  निकाल  दो  l  भीम  ने  वह  मणि  निकाल  दी  जिससे  उसके  मस्तक  पर  घाव  हो  गया   और  वह  रिसने  लगा  l  भगवान  ने  कहा   --यह  इस  घाव   को  लिए  युगों  तक  भटकता  रहेगा  l  पूर्वज  कहा  करते  थे   कि  अचानक  यदि  पास  से   यदि  कोई  भयानक  बदबूदार  कोई  निकल  गया  तो  समझो  वह  अश्वत्थामा  था   l   आज  युद्ध  में   भयानक  बम  आदि  से  कितने  निर्दोष  प्राणी  , छोटे -छोटे  बच्चे , महिलाएं , गर्भस्थ  शिशु   आदि  मारे  जाते  हैं  l  यदि  उक्त  प्रसंग  की  गहराई  को  समझें   तो  संभवतः  जीवन  की  राह  बदल  जाए  l  

WISDOM----

    कहते  हैं  ' जब  जागो  तब  सवेरा  l ' ---यह  ' जागना ' भी  ईश्वर  की  कृपा  से  ही  संभव  है  l  ---- सम्राट  विक्रमादित्य  के  शासन काल  में   महान  इंद्रजालिक , महान  तांत्रिक  वेताल  भट्ट  थे  l  उनका  समूचा  जीवन   शमशानों  में , तांत्रिक  साधनों  में  बीता  l   कूटनीतिक  चक्रव्यूह  हो  या  सेना  की  व्यूह  रचना  , प्रत्येक  समस्या  का  समाधान  वे  चुटकी  बजाते  ही  कर  देते  थे  l  बड़े से -बड़े  सम्राट  उनके  आगे  सिर  झुकाते  थे  l   लेकिन  अब  कई  दिनों  से  उनके  मन  में  एक  विचार  उठ  रहा  था  कि --'ये  षड्यंत्र , ये  कुचक्र  किसके  लिए  किए , जीवन  भर  जिन  पापों  का  भार  उठाए  घुमा  ,  उससे  क्या  शरीर  अमर  हो  गया  ?  मनुष्य  से  बढ़कर  काल  है  ,  कोई  कितना  भी  ऐंठे  , अकड़  दिखाए   पर  काल  को  जीतना  असंभव  है  l  मृत्यु  से  कोई  बच  नहीं  पाया  है  l  जो  अपने  ही  गोरख धंधे  में  लगा  रहा   वह  अंततः  पछताया  और  हाथ   मलता   हुआ  ही  गया  l '   उनके  विवेक  चक्षु  खुल  गए  , उन्होंने  राजसी  परिधान  उतार  फेंके   और  साधारण  वेशभूषा  में   प्रात: काल   भगवान  महाकाल  को  प्रणाम  कर  निकल  पड़े  l  कुछ  ही  कदम  चले  कि  महाकवि  कालिदास कालिदास  आते  हुए  मिले  l  महाकवि  ने  उनसे  पूछा  ---- ' ये  क्या  वेश  धारण  कर  लिया  और  अब  कहाँ  चले   ? किसका  ज्योतिष  बिगड़ा  ? '  तब  वेताल  भट्ट  ने  कहा  ----' अब  अंतिम  और  निर्णायक  युद्ध   अपने   आप   से  ही  होगा  ,  अब  स्वयं  को   जीतना  है  ,  एक  युद्ध  जो  हमारे  भीतर  है  उस  पर  विजय  प्राप्त  करनी  है  l '  कालिदास  ने  कहा ---- " किन्तु  आर्य  !  आपके  बिना  अवन्तिका ( उज्जैन  )  का  क्या  होगा  ? " बेताल  भट्ट  ने  कहा --- " यह  सब  मोह  है  ! मनुष्य  अहंकार वश   ऐसा   सोचता  है   और  भावी  पीढ़ी  की  प्रगति  में  बाधक  बनता  है  `l   यह  कहकर  वेताल  आगे  बढ़  गए  और  वानप्रस्थ  लेकर  समाज  सेवा  हेतु  समर्पित  हो  गए  l 

6 November 2022

WISDOM ----

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  --- 'एक   विभूतिहीन   व्यक्ति  यदि  समाज  का  बहुत  बड़ा  हित  सम्पादित  नहीं  कर  सकता  है   तो  उससे  समाज  को  बहुत  बड़ी  हानि  होने  की  संभावना  भी  नहीं  है  l  पर  जो  विभूतिवान  हैं   वह  यदि  स्वार्थी , संकीर्ण  या  पथ भ्रमित  हुआ   तो  समाज  को  अकल्पित  हानि  पहुंचा  सकता  है  l  '    आचार्य श्री  के  इस  कथन  की  सत्यता  को  आज  समाज  के  विभिन्न  क्षेत्रों  में  देखा -समझा  जा  सकता  है  l  एक से  बढ़कर  एक   विद्वान्  और  विभूतिवान  हैं    लेकिन  धन  का  लालच  कलियुग   के  रूप  में  सिर  पर  सवार  है   कि  उनके  कार्यों  से  समाज  को  हानि  हो  रही  है  जैसे  फ़िल्में  ऐसी  है  जो  अपराध  के  नए -नए  तरीके  सिखाती  हैं , अश्लीलता  की  सीमा  पार  है  जिससे  समाज  का  नैतिक  पतन  हैं ,  विज्ञानं  ने  इतने  घातक  अस्त्र  बना  दिए  हैं  कि  सारा  संसार  बारूद  के  ढेर  पर  खड़ा  है  , चिकित्सा  सामग्री  हो , कृषि , खाद्य  पदार्थ  हों   उनमें  ऐसा  क्या  घोल  दिया  है  कि  कब  कौन  खड़े -खड़े  ही  मर  जाए  --- --यह  सब  बुद्धि  का  दुरूपयोग  है  l   आचार्य श्री  लिखते  हैं ---- ' जिनके  ऊपर  समाज  को  दिशा  और   प्रेरणा  देने  का  उत्तरदायित्व  है  ,  उनके  छोटे  से  छोटे  आचरण  भी   शुद्धतम  होने  चाहिए  l   ज्ञानी  के  उत्तरदायित्वों  की  तुलना   अज्ञानी  के  उत्तरदायित्वों  से  नहीं  की  जा  सकती  l '  एक  कथा  है ---- जय  और  विजय  भगवान  विष्णु  के  द्वारपाल  थे  l  उन्हें  अपने  पद  का  अभिमान  हो  गया  l  एक  दिन  उसी  अहंकार  में   उन्होंने  सनक न, सनंदन , सनातन  और  सनत्कुमार   जैसे  ऋषियों  का  अपमान  कर  दिया   l  परिणामस्वरूप  उन्हें  असुर  होने  का  शाप  मिला   और  तीन  कल्पों  में  हिरण्यक्ष  , हिरण्यकश्यप ,  रावण -कुम्भकरण   और  शिशुपाल , दुर्योधन  के  रूप  में  जन्म  लेना  पड़ा  l       आचार्य श्री  लिखते  हैं  ---पद जितना  बड़ा  होता  है  , दायित्व  उतने  ही  गंभीर  होते  हैं  l  ऐसा  ही  अपमान  किसी  साधारण  द्वारपाल  ने  किया  होता  तो  इतने  परिमाण  में  दंड  न  चुकाना  पड़ता  l  सामर्थ्य  का  गरिमापूर्ण   एवं  न्यायसंगत  निर्वाह  ही  श्रेष्ठ  मार्ग  है  l  "  

5 November 2022

WISDOM ----

    आज  के  युग  में  भी  संसार  के  अधिकांश  देशों  में  तंत्र  जैसी  शक्तियों  का  प्रयोग  किया  जाता  है  l  चाहे  प्रकट  रूप  में  इसे  मान्यता  न  दी  जाए   और  कहा  जाए  हम  किसी  ऐसे  तंत्र  आदि  को  नहीं  मानते  लेकिन  ये  भी  सत्य  है   कि  अपने  पद -प्रतिष्ठा , वैभव,   महत्वाकांक्षा   और  दमित  आकांक्षाओं  की  पूर्ति  के  लिए   लोग  तांत्रिक  आदि  का  सहारा  लेते  हैं  l  लेकिन  प्रश्न  ये  है  कि  ' तंत्र  बड़ा  या  भक्ति  ? '   तंत्र  जैसी  नकारात्मक  क्रियाओं  से  सुरक्षा  का  केवल  एक  ही  उपाय  है -- ' भक्ति '--- ईश्वरीय  व्यवस्था  में  अटूट  विश्वास   और  उसके  अनुरूप  आचरण  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---' तंत्र  चाहे  कितना  ही  बड़ा  क्यों  न  हो  ,  वह  भक्ति  और  भक्त  से  सदैव  कमजोर  होता  है  l   भक्त  की  रक्षा  स्वयं  भगवान  करते  हैं  l  पुराण  की  एक  कथा  है  ---------  भक्त  अम्बरीश   एक  विशाल  साम्राज्य  के  अधीश्वर  थे  लेकिन  उनका  मन  सदैव  ईश्वर  की  आराधना  में  लगा  रहता  था   l  उन्होंने  अपने  जीवन  को  भगवान  श्रीकृष्ण  के  चरण कमलों  में  समर्पित  कर  दिया  था  l  भोग  को   योग    में  परिवर्तित  कर  दिया  था  l  उनकी  अनन्य  भक्ति  से  प्रसन्न  होकर  भगवान   ने  अपने  सुदर्शन चक्र  को  उनकी   रक्षा  में  नियुक्त  कर  दिया  था  l  सुदर्शन  प्रभु  की  अनुमति  से  गुप्त  रूप  से   राजद्वार  पर  प्रहरी  बन  कर  पहरा  देने  लगे  l    एक  बार  राजा  अम्बरीश  ने  रानी  के  साथ  एक  वर्ष  तक  एकादशी  के  व्रत  का  अनुष्ठान  किया  l  वर्ष  भर  विधि -विधान  से  पूजा  हुई  l  अंतिम  एकादशी  के  दूसरे  दिन  विधान  के  अनुरूप   दान , पुण्य , ब्राह्मण भोज  आदि  हुआ  l  इन  सब  प्रक्रियाओं  के  बाद  राजा  पारायण  के  लिए  बैठे  ही  थे  कि  ऋषि  दुर्वासा   अपने  शिष्यों  के  साथ   आ  गए  l  राजा  ने   उनका  सेवा -सत्कार  किया   और  भोजन  ग्रहण  करने  का  निवेदन  किया  l  ऋषि  दुर्वासा  ने  इसे  स्वीकार  किया  और  कहा  कि  वे  यमुना  से  स्नान  आदि  का  आते  हैं  l  दुर्वासा  जी  को  देर  हो  रही  थी  और  द्वादशी  में  केवल  एक  पल  शेष  था  अत: ब्राह्मणों  ने  कहा  कि  आप  श्री भगवान  का  चरणोदक  ग्रहण  कर  लें  अन्यथा  आपका  व्रत  अपूर्ण  रह  जायेगा  l  राजा  ने  चरणोदक  लेकर  पारायण  किया  l  ऋषि  दुर्वासा  को  जब  यह  पता  चला  कि  राजा  ने  पारायण  कर  लिया  तो  इसे  उन्होंने  अपना  अपमान  समझा , बहुत  क्रोधित  हुए   और  अपने  मस्तक  से  जटा   उखाड़कर   जोर  से  धरती  पर  दे  मारा  l  जिससे   कृत्या   नामक  राक्षसी   प्रकट  हो  गई  और   तलवार  हाथ  में  लेकर  राजा  को  मारने  दौड़ी   l  ' कृत्या ' एक  अभिचार  कर्म  है  l  तांत्रिक  क्रिया  है  l    सुदर्शन  तो  पहरे  पर  बैठे  थे  उन्होंने  तुरंत  कृत्या  को  भस्म  कर  दिया  और  अब  ऋषि  दुर्वासा   की  ओर  लपके   l  दुर्वासा  ऋषि  अपनी  जान  बचाने  के  लिए  दसों  दिशाओं  और  चौदह  भुवनों  में  भटके  , कहीं  सुरक्षा  नहीं  मिली  , सुदर्शन  ने  उनका  पीछा  नहीं  छोड़ा  l  अंत  में  वे  दौड़ते - भागते   विष्णु  भगवान  के  पास  पहुंचे   l  भगवान  ने  भी  उनको  सुरक्षा  देने  से  इनकार  कर  दिया  और  कहा  की  यदि  वे  सुरक्षा  चाहते  हैं  तो  महाराज  अम्बरीश  की  शरण  में  जाएँ  l  अंत  में  ऋषि  दुर्वासा  को  राजा  अम्बरीश  की  शरण  में  जाना  पड़ा   जिन्हें  मारने  के  लिए    उन्होंने  महा भयानक  तंत्र  किया  था  l   भक्ति  के  सामने  तंत्र  पराजित  हुआ  l  

4 November 2022

WISDOM -----

   भगवान  श्रीकृष्ण  ने  अपनी  लीलाओं  के  माध्यम  से  संसार  को  बहुत  कुछ  सिखाने  की  कोशिश  की  लेकिन  कलियुग  में  मनुष्य  पर  दुर्बुद्धि  हावी  होती  है   इसलिए  वह  उन  शिक्षाओं  का  इस्तेमाल  अपने  स्वार्थ   तथान अच्छाई  को  मिटाने  के  लिए  करने  लगता  है  l  महाभारत  का  प्रसंग  है  कि    दुर्योधन  ने  चतुराई  से  युद्ध  में  पांडवों  के  मामा  शल्य   को  अपनी  तरफ  मिला  लिया  l  शल्य  वचनबद्ध  थे  अत:  दुर्योधन  का  साथ  देना  पड़ा    तब  श्रीकृष्ण  ने  उनसे  कहा  -- यह  युद्ध  अधर्म  और  अन्याय  के  अंत  के  लिए  है   और  आप  न  चाहते  हुए  भी  दुर्योधन  के  पक्ष  में  हैं  l  अत: इस  अपराध बोध  से  मुक्त  होने  के  लिए   जब  आप  कर्ण  के  सारथी  बने  तो  हर  पल  कर्ण  का  मनोबल  कम  करने  वाली  बातें  करना  l  कर्ण  बहुत  वीर  है  , उसको  हराना  नामुमकिन  है   लेकिन  वह  अधर्म  के   पक्ष    में  है  इसलिए  उसका  अंत  निश्चित  है   l  मनोबल   गिर  जाने  से  अर्जुन    का    उसको  हराना  संभव  हो  जायेगा  l  और   इस   तरह  महावीर  , महादानी  कर्ण   का  युद्ध  में  अंत  हुआ  l   भगवान  कृष्ण  ने  इस  उक्ति  का  प्रयोग  अधर्म  और  अन्याय  का  अंत  करने  के  लिए  किया   लेकिन  आज  के  इस  युग  में  असुरता  , देवत्व  को  मिटाने  के  लिए  इस  उक्ति  का  प्रयोग  करती  है  l  आज  व्यक्ति  अपनी  तरक्की  के  लिए  , स्वयं  को  उंचाई  पर   बनाये  रखने  के  लिए   स्वयं  कोई  प्रयास  नहीं  करता  ,  वह  आलोचना , निंदा   ओर  अपने  प्रतिद्वंदी   के  लिए  अफवाह  फैलाकर , उसको  हर  तरह  से  नीचा  दिखाकर  उसका  मनोबल  कम  करने  के  लिए  प्रयासरत  रहते  हैं  ताकि  वह  जिन्दगी  की  दौड़  में  पिछड़  जाये  l   इस  प्रसंग  से  हमें  यही  शिक्षा  मिलती  है   कि  अपनी  निंदा  सुनकर  कभी  भी  निराश  न  हों , स्वयं  की  तरक्की  का  प्रयास  पूरे  आत्मविश्वास  से  करें  l  

3 November 2022

WISDOM ----

  भौतिक  प्रगति  के  साथ  यदि  मानवीय  मूल्यों  का  ज्ञान  न  हो  तो  वह  प्रगति  मानवता  का  हित  नहीं  करती  l   हमारे  प्राचीन  ग्रंथों  में  उल्लेख  है  कि   ब्रह्मास्त्र , नारायण अस्त्र , पाशुपत अस्त्र  आदि  ऐसे  अनेक  अस्त्र  मन्त्र  की  शक्ति  से  संचालित  थे  उनका  प्रयोग  केवल   अन्याय  और  अधर्म  के  नाश  के  लिए  ही  किया  जाता  था  , इन्हें   संधान  करने  के  बाद  यदि  आवश्यक  हो  तो  लौटाया   भी  जा  सकता  था  l  लेकिन  आज  विज्ञान  अकेला  है  , उसके  साथ  अध्यात्म  नहीं  है  l   एक  से   बढ़कर  एक  घातक  बम  आदि  हैं  जिनका  मानवीय  मूल्यों  से  कोई  लेना  देना  नहीं  है ,  उनके  इस्तेमाल  से  महिलाएं , बच्चे , निर्दोष  प्राणी  सब  मरते  हैं  l  अध्यात्म रहित   शक्ति   चाहे  वह   अस्त्र -शस्त्र  निर्माण  में  हो , चिकित्सा  या  किसी  भी  क्षेत्र  में  हो  , उसमें  स्वार्थ  प्रबल  होता  है  इसलिए  वह  मानवता  का  अहित  करती  है  l   एक  कथा  है ----एक  बार  चार  मित्र  यात्रा  पर  निकले  l  उनमें  तीन  बुद्धिहीन  वैज्ञानिक  थे   और  एक  बुद्धिमान  था  l  मार्ग  में  उन्हें  एक  मरे  हुए  शेर  का  अस्थि पंजर  मिला  l  बुद्धिहीन  वैज्ञानिकों  ने  सोचा  क्यों  न  हम  इस  पर  अपनी  विद्या   की  परीक्षा  कर  लें  l  तुरंत  एक  ने  उसका  अस्थि  संचय  किया  ,  दूसरे  ने  उसमें   चर्म मांस , रुधिर  संचारित  किया   l  तीसरा  उसमें  प्राण  डालने  ही  वाला  था  कि  बुद्धिमान  ने  कहा  कि  --अरे , अरे  यह  आप  क्या  कर  रहे  हैं  ?  आप  सिंह  को  जीवित  कर  रहे  हैं  l  वह  जीवित  होते  ही  हमें  खा  जायेगा  l  पहले  अपनी  रक्षा  का  उपाय  तो  कर  लो  l '  लेकिन  किसी  ने  उसकी  बात  नहीं  मानिल  अत:  वह  अकेला  ही  पेड़  पर  चढ़  गया  l   तीसरे  बुद्धिहीन  वैज्ञानिक  ने  जैसे  ही  उसमें  प्राण  डाले  ,  शेर  जीवित  होकर  उन  तीनों  को  खा  गया  l   आज  संसार  की  यही  स्थिति  है   l  मनुष्य  स्वयं  के  और  समूची  मानवता  के  विनाश  में  ही  जुटा  है  ,  चेतना  को  परिष्कृत  करने  का  कहीं  कोई  विकल्प  नहीं  है  l