पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---" आज की परिस्थितियों पर द्रष्टिपात करें तो चारों ओर ईर्ष्या का ही साम्राज्य फैला दिखेगा l समाज में फैले संघर्षों का मूल ईर्ष्या ही होती है l ईर्ष्या का जन्म सामाजिक जीवन की विषमता से होता है l किसी के पास बहुत धन -वैभव है , लेकिन उसे समाज में अधिक प्रतिष्ठा , विशेष सुविधाएँ नहीं हैं तो उसके प्रति ईर्ष्या नहीं होगी l लेकिन दूसरों को मिल रही प्रशंसाओं , -सुविधाओं और सम्मान से अपनी कोई वास्तविक हानि नहीं हो रही है , तब भी उसके प्रति ईर्ष्या भड़क उठती है l ' ईर्ष्या बलवती होने पर व्यक्ति षड्यंत्रकारी हथकंडे अपनाने लगता है l स्वयं के पास धन -वैभव सब है लेकिन दूसरों को आगे बढ़ता हुआ नहीं देख सकता , दूसरों की सफलता से ईर्ष्या होती है l ईर्ष्या के कारण परिवार हो या समाज -- सम्पूर्ण वातावरण जहरीला हो जाता है
24 January 2023
23 January 2023
WISDOM------
वन में खड़े एक वृक्ष के साथ लिपटी एक लता भी धीरे -धीरे वृक्ष के बराबर हो गई l वृक्ष का आश्रय लेकर उसने भी फलना -फूलना आरम्भ कर दिया l बेल को फलते -फूलते देख वृक्ष को अहंकार हो गया कि मैं न होता तो लता का अस्तित्व ही न होता l वह लता को धमकाते हुए बोला --- " ओ बेल ! चुपचाप मेरा कहना माना कर , मैं जो कह रहा हूँ , वह किया कर , नहीं तो धक्के मार कर भगा दूंगा l " पेड़ का प्रलाप जारी था कि दो पथिक वहां से निकले l एक बोला --- " अरे भाई ! जरा देखो तो ! यह वृक्ष कैसा सुन्दर है , इस पर कैसी सुन्दर लता पुष्पित हो रही है l आओ , इसके नीचे थोड़ी देर विश्राम करें l " अपना महत्त्व लता के साथ है , यह जानकार वृक्ष का अभिमान भी नष्ट हो गया l
22 January 2023
WISDOM ----
काँटे ने फूल से कहा -- बंधुवर पुष्प ! लो सवेरा हुआ , माली इधर ही आ रहा है , अपनी सज्जनता , सौम्यता और उपकार की सजा भुगतने के लिए तैयार हो जाओ l यदि मेरी सीख मानते और कठोरता व कुटिलता का आश्रय ग्रहण किए रहते तो आज यह नौबत नहीं आती l फूल कुछ बोला नहीं , वह और भी मोहक हो उठा l माली आया , उसने फूल तोड़ा और डलिया में रखा l काँटा दर्प से हँसा , वृद्ध माली की उँगलियों में चुभा और अहंकार में ऐंठ गया l माली उसे गाली देता हुआ वापस लौट गया l समय बीता l एक दिन मंदिर में चढ़ाये उस फूल की सूखी काया को कोई उस वृक्ष की जड़ों के पास डाल गया l काँटे ने उस फूल को देखा तो हँसा और बोला ---- " कहो तात ! अब तो समझ गए कि परोपकारी होना अपनी दुर्गति कराना है l " फूल की आत्मा बोली ---- " बंधु ! यह तुम्हारा अपना विश्वास है l शरीर में चुभकर दूसरों की आत्मा को कष्ट पहुँचाने के पाप के अतिरिक्त तुम अपयश के भी भागी बने l अंत तो सभी का सुनिश्चित है , किन्तु अपने प्राणों को देवत्व में परिणत करने और संसार को प्रसन्नता प्रदान करने का जो श्रेय मुझे मिला , तुम उससे सदैव के लिए वंचित रह गए l मैं हर द्रष्टि से फायदे में हूँ और तुम घाटे में l "
21 January 2023
WISDOM -----
जोरों की आँधी आई l आँधी के साथ धूल उड़कर आसमान तक जा पहुंची l इस उपलब्धि पर इतराते हुए धूल बोली ---- " भला मेरे समान कोई इस दुनिया में ऊँचा है l जल , थल , नभ के साथ दसों दिशाओं में मैं ही तो व्याप्त हूँ l " बदल ने धूल की गर्वोक्ति सुनी तो फट पड़ा और बदल फटते ही हुई वर्षा के साथ धूल धरती पर जा गिरी l अब धरती ने उससे पूछा ---- " रेणुके ! तुमने अपनी यात्रा से क्या सीखा ? " धूल बोली ---- " माँ ! मैंने सीखा कि उन्नति पा कर कभी किसी को अहंकार नहीं करना चाहिए l अहंकारी का पतन निश्चित ही होता है l "
20 January 2023
WISDOM ----
अमावस्या की रात में दीपक ने देखा कि आकाश में न चाँद है और न तारे l बस , वह अकेला ही संसार को प्रकाश दे रहा है l अपने इस पराक्रम पर उसको अभिमान हो गया और वह समस्त संसार को संबोधित करते हुए बोला --- " मेरी महिमा तो देखो ! मेरी ही कृपा से तुम सब तुच्छ प्राणी अंधकार में कुछ देख पा रहे हो l मुझे प्रणाम करो , मेरी दयालुता का गुणगान करो l " दीपक के इन अहंकार युक्त वचनों को किसी ने महत्त्व न दिया , परन्तु एक जुगनू से न रहा गया और वह बोला ---- " एक रात के अस्तित्व पर इतना अहंकार l तनिक ठहरो , प्रभात होने पर तुम्हारी वास्तविकता पूछूँगा l " अधिकार पाकर किसी को मदांध नहीं हो जाना चाहिए l
19 January 2023
WISDOM ----
कलियुग की सबसे बड़ी विशेषता है --- दुर्बुद्धि ! इस दुर्बुद्धि के कारण लोग समाज में जो भी अच्छे कार्य होते हैं , उनमे बुराई खोजते हैं , देवत्व को मिटाने का प्रयास करते हैं और बुराइयों को अनदेखा करते हैं , भीष्म पितामह की तरह चुप्पी साध लेते हैं इसलिए अब प्रत्यक्ष में महाभारत नहीं होती , अब प्रकृति का क्रोध विभिन्न रूपों में देखने को मिलता है l आज मनुष्य पर लालच , अहंकार , कामना , महत्वाकांक्षा हावी है इस कारण वह दोहरी जिन्दगी जी रहा है l एक रूप में समाज के सामने बहुत शरीफ , सदाचारी है लेकिन एक दूसरा रूप भी है जिसमे वह अपने स्वार्थ के लिए अपराध , भ्रष्टाचार , अश्लीलता , प्रदूषण आदि समाज और संस्कृति को हानि पहुँचाने वाले कार्यों के प्रति मौन रहकर उन्हें बढ़ावा देता है l यही कारण है कि अब मनुष्य का मनुष्य पर से विश्वास कम हो गया है l ----- एक डाकू था वह फकीरों के वेश में डाके डालता था l अपना हिस्सा वह गरीबों में बाँट देता था l हाथ में माला लिए जपता रहता था l एक बार उसके दल ने एक काफिला लूटा l एक व्यापारी के पास बहुत पैसा था l लूट चल रही थी , उसने फकीर को देखा तो सारा धन उसके पास लाकर रख दिया l काफिला लुट जाने के बाद जब वह धन लेने पहुंचा तो देखा कि वहां तो लूट का माल बांटा जा रहा है l सरदार वही था जो दरवेश -फकीर बना हुआ था l उसी के पास व्यापारी का धन था l व्यापारी बोला --- " हमने तो आपको दरवेश समझा था l आप तो कुछ और ही निकले l हमने डाकुओं के सरदार पर नहीं , फकीर पर , खुदा के बन्दे पर विश्वास किया था l अब यह धन आप रखिए , आपसे एक गुजारिश है कि आप दरवेश के वेश में मत लूटिए l नहीं तो लोगों का विश्वास इस वेश पर से उठ जायेगा l वह डाकू तत्काल वास्तव में फकीर बन गया , उसके बाद उसने कभी डाका नहीं डाला l