श्रीराम और रावण में बुनियादी अंतर केवल अहंकार को लेकर था l भगवान श्रीराम अहंकार शून्य थे , जबकि रावण के अहंकार की कोई सीमा नहीं थी l अहंकार का मतलब है -- ' मैं ' को प्राथमिकता देना और यही ' मैं ' रावण के व्यक्तित्व का आधार था l रावण ने यमलोक पर आक्रमण किया l कालदंड भी कब्जे में कर लिया l भयवश यम भी अद्रश्य हो गए l नवग्रह भी उसके कब्जे में आ गए , तप व पुण्य का बल उसका साथ दे रहा था लेकिन कोई कितना ही बलशाली क्यों न हो , अहंकार कितना ही बड़ा क्यों न हो , काल उसे मिटा देता है l पानी का बुलबुला कितना ही बड़ा हो, फूट जाता है l अहंकारी संवेदनहीन होता है l संसार में जहाँ भी अत्याचार , अन्याय , हिंसा , शोषण , उत्पीड़न है उसके लिए कोई न कोई अहंकारी ही उत्तरदायी है l अहंकारी न तो स्वयं चैन से जीता है और न ही दूसरों को चैन से जीने देता है l
13 April 2023
12 April 2023
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'आसक्ति ही सब दुःखों की जननी है , यहाँ तक कि वही पुन: जन्म लेने को बाध्य करती है l यह आसक्ति ही मनुष्य को तरह -तरह से दुःख देती है और बंधनों से बाँधती है l इसलिए मनुष्य को चाहिए कि कुल , वंश , पद तो क्या इस शरीर से भी आसक्ति न करे l मृत्यु के बाद भी इस शरीर से मोह नहीं छूटता l अनासक्त रहकर कर्तव्यपालन करे l " एक कथा है ------- एक सेठ जी थे l बहुत धर्मात्मा थे लेकिन उन्हें अपनी संपदा से और पुत्र से बहुत मोह था l संतों का उनके यहाँ सत्संग होता था l संतों ने उन्हें समझाया कि अति का मोह अच्छा नहीं होता लेकिन सेठजी विवश थे l उन्हें मालूम था कि इस मोह के कारण और कुछ दुष्कर्मों के परिणामस्वरुप उन्हें अगले जन्म में बन्दर का रूप धारण करना पड़ेगा l उन्होंने अपने प्रिय पुत्र से कहा --- " देखो , मृत्यु के बाद मैं बन्दर के रूप में जन्म लूँगा और जंगल में एक बरगद के पेड़ पर बैठा रहूँगा l तुम मुझे गोली से मार देना तो मेरी मुक्ति हो जाएगी l " पिता की मृत्यु के बाद पुत्र एक पंडित को लेकर जंगल पहुंचा तो देखा कि एक एक बंदरिया अपने बच्चे को सीने से चिपकाए बैठी हुई है l उसने बंदूक चलाई तो बंदरिया तो डर के कारण बेहोश हो गई और बच्चा कूदकर ऊँची डाल पर चढ़ गया l बहुत प्रयत्न करने के बाद भी वह उसे पा नहीं सका l साथ में जो पंडित जी थे उन्होंने कहा --- " इस सेठ को अब इस बन्दर शरीर से मोह हो गया है , चलो अब वापस चलो , अब वह मरना ही नहीं चाहता l शरीर चाहे बन्दर का हो या कीड़े का , कोई मरना नहीं चाहता l ये मोह है , जो मरकर भी नहीं छूटता l "
10 April 2023
WISDOM ----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----" इस समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इस समय सभी वर्णों ने अपनी -अपनी गरिमा को भुला दिया है l इस समय केवल एक ही वर्ण रह गया है वह है ---व्यापारी l केवल एक ही बात सबके दिमाग में आती है कि पैसा कैसे कमाया जा सकता है ? डॉक्टर , इंजीनियर , कलाकार , शिक्षक , जन-प्रतिनिधि आदि सब अपना कर्तव्य भूलकर केवल धन के पीछे लगे हैं l आजकल सारा व्यवहार पैसे से ही चल रहा है l " ऐसी विचारधारा का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि व्यक्ति हो या राष्ट्र सब कर्ज में लद गए हैं और इस कर्ज ने , उधारी ने सबका सुख -चैन छीन लिया है l इसका कारण यही है कि व्यक्ति अध्यात्म से दूर है और भौतिक सुख -सुविधाओं के पीछे भाग रहा है और तृष्णा का कोई अंत नहीं है इसलिए समस्याओं का और तनाव का भी अंत नहीं है l आज व्यक्ति धार्मिक होने का ढोंग तो बहुत करता है लेकिन ईश्वर के बताए मार्ग पर नहीं चलता l श्री हनुमान जी का चरित्र हमें हमें प्रेरणा देता है ------ श्री हनुमान जी के संबंध में भगवान राम ने कहा था कि समाज के सभी वर्णों ---ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र चारों का रूप हनुमान जी में दिखाई देता है अर्थात हनुमान जी सभी के हैं l श्री हनुमान जी ने प्रभु श्रीराम से स्वयं यह जानना चाहा कि ' आपने मुझे ब्राह्मण भी कहा , क्षत्रिय भी कहा लेकिन वैश्य क्यों कहा ? आपको मुझमें ऐसे क्या वणिक गुण दिखाई पड़े ? " तब श्रीराम जी ने उनसे कहा --- " प्रिय हनुमान ! वैश्य दूसरों पर कर्जा चढ़ा देता है , तुमने मेरी इतनी सेवा कर दी है कि इसे चुकाना मेरे लिए आसान बात नहीं l " इसका अभिप्राय यही है कि अपनी असीमित इच्छाओं के कारण किसी व्यक्ति या राष्ट्र के ऋणी होकर , उनके आगे सिर झुका कर चलने से तो बेहतर है कि अपनी आवश्यकताओं को सीमित करे और सत्कर्म करे , सन्मार्ग पर चले ताकि दैवी शक्तियां भी हमें अनुदान देने को विवश हो जाएँ जैसे हनुमान जी ने निष्काम सेवा से भगवान को भी ऋणी बना दिया l
9 April 2023
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " किसी को ईश्वर संपदा , विभूति अथवा सामर्थ्य देता है तो निश्चित रूप से उसके साथ कोई न कोई सद्प्रयोजन जुड़ा होता है l हमें यह देखना चाहिए कि उसका लाभ गलत व्यक्ति तो नहीं उठा रहे हैं l नहीं तो ये अच्छाइयाँ व्यर्थ चली जाएँगी l " श्री हनुमान जी के चरित्र से हमें यही सीख मिलती है कि सद्प्रयोजनों के लिए , अत्याचार व अन्याय के अंत के लिए जब अपनी शक्ति और विभूतियों का सदुपयोग किया जाता है , तब असंभव भी संभव हो जाता है l श्री हनुमान जी भगवान श्रीराम के प्रिय भक्त और उनके सबसे बड़े सेवक हैं l भगवान के कार्य को पूरा करना ही उनका लक्ष्य था l अत्याचारी , अन्यायी कितना भी शक्ति संपन्न क्यों न हो , उन्होंने उसका साथ नहीं दिया , उन्होंने बाली को छोड़कर सुग्रीव का साथ दिया l जब समुद्र को पार कर श्री हनुमान जी लंका पहुंचे , तो लंका के द्वार पर लंका की रक्षा करने वाली लंकिनी नामक राक्षसी मिली , उसने उन्हें रोकने का प्रयास किया l श्री हनुमान जी ने देखा कि यह लंकिनी अत्याचारी और अन्यायी रावण की सेवा में है , जिसने छल से माता सीता का हरण किया है , एक गलत व्यवस्था की रक्षा कर रही है इसलिए उस पर प्रहार करना चाहिए , तब उन्होंने मुक्का मारकर लंकिनी को घायल कर दिया l
8 April 2023
WISDOM -----
विज्ञान के चमत्कारों ने इस युग को वैज्ञानिक युग का दर्जा दे दिया लेकिन इससे भी अधिक उन्नत दशा में हम महाभारत काल में थे l यह जरुरी है कि हम अपने प्राचीन ज्ञान -विज्ञान को बार -बार याद करें l अतीत का गौरव किसी भी देश के नागरिकों के स्वाभिमान को जगाने और उसे मजबूत बनाने में सहायक होता है l आज वैज्ञानिक जिस ब्लैक होल की बात करते हैं , हमारे महान ऋषि उससे पहले से ही परिचित थे l ------- महाभारत के वन पर्व के अंतर्गत तीर्थयात्रा पर्व के एक सौ बत्तीसवें अध्याय में कहोड़ मुनि और अष्टावक्र की कथा आती है l शास्त्रार्थ में पराजित मुनि कहोड़ को जल समाधि दे दी गई थी l बाद में मुनि के पुत्र अष्टावक्र ने अपने पिता के अपराधी पण्डित वन्दी को पराजित कर उसे भी समुद्र में डुबोने की सजा दी , तो वरुण पुत्र वन्दी ने क्षमायाचना सहित कहा कि पण्डितों को जान से मारने का मेरा तनिक भी इरादा नहीं है l वस्तुतः मेरे पिता वरुण के राज्य में विशाल यज्ञ हो रहा है l यहाँ से विद्वान् पण्डितों को चुन -चुनकर मैं वहीँ भेज रहा था l शास्त्रार्थ में में हराकर जल में डुबोना तो एक निमित्त मात्र था l अब यज्ञ समाप्ति पर है और सभी ब्राह्मण लौटने वाले हैं l कुछ समय पश्चात् सभी ऋषिगण सामने से आते दिखाई पड़े , इनमे ऋषि कहोड़ भी थे l यह समुद्र में ब्लैक होल ही था , जिसमे से ऋषियों को वरुण लोक भेजा गया l उस समय के ऋषि कोई रहस्यमय विद्या अवश्य जानते थे , जिसकी मदद से वे पृथ्वी लोक पर वापस आ गए l उस समय हमारा ज्ञान -विज्ञानं चरम उत्कर्ष पर था l युगों की गुलामी , आपसी फूट , जाति और धर्म के नाम पर मतभेद , विदेशी आक्रमण में उलझकर लोग इस वैभव को भूल गए l इस वैभव को पुन: प्राप्त करने के लिए परस्पर एकता और स्वाभिमान जरुरी है l
7 April 2023
WISDOM -----
सुकरात महान दार्शनिक थे , उन्होंने अपने आचरण द्वारा ही शिष्यों को ज्ञान दिया l उन्होंने अपना स्वयं के उदाहरण से शिष्यों को समझाया कि ज्योतिष का आकृति विज्ञानं हमारे चेहरे की आकृति को देखकर जो दुर्गुण बताता है , उन दुर्गुणों पर विवेक के जागरण से विजय संभव है , सद्बुद्धि के जागरण से गुण , कर्म और स्वभाव में आमूलचूल परिवर्तन कर उन दुर्गुणों पर अंकुश रखा जा सकता है l -------- एक बार सुकरात अपने शिष्यों के साथ गंभीर विषयों पर चर्चा कर रहे थे , उस समय एक ज्योतिषी आया और उसने कहा मैं किसी के चेहरे की आकृति देखकर उस व्यक्ति के स्वाभाव और चरित्र के बारे में बता सकता हूँ l आप मुझे एक अवसर प्रदान करो l " सुकरात स्वयं कहते थे कि वे बदसूरत हैं , उन्होंने अपने शिष्यों से कहा --- " तुम सभी इस ज्योतिषी से मेरी आकृति का सत्य सुन लो l " कुछ गंभीर होकर वे कहने लगे --" अपनी आकृति का रहस्य बाद में मैं तुम्हे बताऊंगा l " सुकरात ने ज्योतिषी को अनुमति दी कि वह उनकी चेहरे की आकृति का परीक्षण करे l ज्योतिषी कहने लगा ---- " इनके नथुनों की बनावट बता रही है कि इस व्यक्ति में क्रोध की भावना प्रबल है l इसके माथे और सिर की आकृति के कारण यह निश्चित रूप से लालची होगा l " अपने गुरु के बारे में अपमानजनक टिप्पणी सुनकर शिष्य बहुत नाराज होने लगे l सुकरात ने शिष्यों को रोककर अपनी बात आगे बढ़ाने को कहा l ज्योतिषी कहने लगा --- "इसकी ठोड़ी की रचना कहती है कि यह सनकी है l इसके होठों और दांत की बनावट के अनुसार यह व्यक्ति सदैव देशद्रोह करने के लिए प्रेरित रहता है l " सुकरात ने ज्योतिष विद्या के आधार पर स्वयं के संबंध में लगाये गए तथ्यों को बड़े ध्यानपूर्वक सुना और अंत में ज्योतिषी की प्रशंसा कर उसे इनाम देकर विदा किया l सुकरात के ज्योतिषी के प्रति इस व्यवहार को देखकर व्शिश्य भौंचक्के रह गए l शिष्यों की उलझन को सुलझाते हुए सुकरात ने कहा ---- " यथार्थ को छिपाना ठीक नहीं l ज्योतिषी ने मेरे मेरे संबंध में जो कुछ बताया , वे सभी दुर्गुण मुझमे हैं l यही मेरी स्थूल आकृति का सत्य है , किन्तु उस ज्योतिषी से एक भूल अवश्य हुई , वह है कि उसने मेरी आत्मिक ज्ञान की शक्ति पर जरा भी गौर नहीं किया l उस ज्ञान की मदद से मैं अपने सद् विवेक को जाग्रत कर अपने समस्त दुर्गुणों पर अंकुश लगाए रखता हूँ l " सद्बुद्धि ही सब कार्यों में प्रकाशित है l सद्बुद्धि की जरुरत हर युग में है l गायत्री मन्त्र के माध्यम से हम ईश्वर से सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना कर सद्बुद्धि और सद विवेक को जाग्रत कर सुख -चैन का जीवन जी सकते हैं l
6 April 2023
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- "एक -एक कदम चलकर ही हम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं l साथ ही लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जितना महत्व प्रयास व श्रम का है , उतना ही महत्त्व विश्राम का भी है l विश्राम करने से हमें मार्ग की थकान से राहत मिलती है और आगे बढ़ने के लिए ऊर्जा भी मिलती है l अति उत्साह और लालच का परिणाम नुकसान दायक हो सकता है l इसलिए मंजिल तक पहुँचने के लिए उत्साह तो बनाये रखना चाहिए , लेकिन अति उत्साह में अपना नियंत्रण नहीं खोना चाहिए l "------------ पंचतंत्र की एक कहानी है ---- एक जंगल में दो पक्षी रहते थे l उस जंगल के एक छोर पर एक वृक्ष था , जिसमें वर्ष में एक बार स्वादिष्ट फल लगते थे l जब फलों का मौसम आया तो उन दोनों पक्षियों ने वहां जाने की योजना बनाई l l पहले पक्षी ने दूसरे से कहा --- " वह वृक्ष यहाँ से बहुत दूर है इसलिए मैं तो वहां आराम से पहुँच जाऊँगा l अभी फलों का मौसम दो माह रहेगा l " दूसरा पक्षी अति उत्साहित था , कहने लगा ---" नहीं मित्र ! मुझसे तो रहा नहीं जा रहा है l उन स्वादिष्ट फलों के बारे में सोचकर ही मेरे मुँह में पानी आ रहा है l इसलिए मैं तो एक ही उड़ान में वहां पहुंचकर मीठे फल खा लेना चाहता हूँ l " दूसरे दिन दोनों पक्षी अपने घोंसले से निकलकर उस वृक्ष की ओर उड़ चले l कुछ दूर जाने पर पहले पक्षी को जब थकान होने लगी तो वह एक पेड़ की टहनी पर ठहर गया लेकिन दूसरा पक्षी थकान के बावजूद भी रुका नहीं , अति उत्साह में उड़ता गया l अब उसे दूर से ही फलों का वृक्ष दिखाई देने लगा , मीठे फलों की सुगंध भी आ रही थी l वह बुरी तरह थक भी चुका था , उसके पंख लड़खड़ाये और वह आसमान से जमीन पर आ गिरा l उसके पंख बिखर गए और वह उन फलों तक कभी नहीं पहुँच सका l लेकिन पहला पहला पक्षी जो धैर्य के साथ कुछ देर विश्राम कर उड़ रहा था , वह फलों तक आराम से पहुँच गया और उसने जी भरकर स्वादिष्ट फल खाए l आचार्य जी कहते हैं जैसे एक -एक सीढ़ी चढ़कर ही हम मंजिल तक पहुँचते हैं , अति शीघ्रता में कभी -कभी पाँव फिसलने और गिरने का डर रहता है , सावधानी जरुरी है l