जरथुस्त्र जब जन्मे तो हँसते हुए पैदा हुए l अन्य बच्चों की तरह रोये नहीं सभी आश्चर्य चकित थे l जब जरथुस्त्र बड़े हुए तो लोगों ने जन्म के समय हँसने का कारण पूछा और रहस्य जानना चाहां l वे बोले --- हम जन्म के समय ही नहीं हँसे , हर परिवर्तन हँस कर ही झेला जाता है l " जरथुस्त्र अंतिम समय भी हँसे तो लोगों को समझ में नहीं आया कि अब क्यों हँसे l उनसे पूछा तो वे बोले --- " लोगों को रोते देखकर हंसी आ गई कि कितने नादान हैं ये , हम मकान बदल रहे हैं ! तो इन्हें क्यों परेशानी हो रही है l " वे हमें जीवन जीने का मन्त्र सिखा गए कि परिवर्तन को मुस्करा कर , ख़ुशी से स्वीकार करो l
30 May 2023
29 May 2023
WISDOM -----
श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी विभूतियों का विवरण देते हैं l श्रीकृष्ण मृत्यु के अधिपति ' यम ' को अपना स्वरुप कहते हैं और इन्हें शासन करने वालों में श्रेष्ठतम मानते हैं l भगवान श्रीकृष्ण अन्तर्यामी थे , किसी भी शासन प्रणाली का भूत , वर्तमान , भविष्य उनसे छिपा नहीं था , उनकी दिव्य द्रष्टि सबके गुण -दोष देख रही थी l त्रेतायुग में लंका का राजा रावण था , उसका शासन का यह तरीका था कि वह ऋषि -मुनियों पर बहुत अत्याचार करता था , उनके यज्ञ , हवन पूजन को नष्ट कर देता , उनका जीवन मुश्किल कर दिया था l शनि , राहू ,केतु सबको उसने बंदी बना लिया था l रावण बहुत बड़ा तपस्वी था , शिवजी को उसने प्रसन्न तो किया , इसके फलस्वरूप उसे सोने की लंका मिली , लेकिन भगवान की कृपा नहीं मिली l वह अत्याचारी , अहंकारी था , उसके अहंकार की अति थी -सीता -हरण l इस कारण एक लाख पूत , सवा लाख नाती समेत समाप्त हो गया l द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण द्वारकाधीश थे l वहां धन -वैभव बहुत था , लोग भोग - विलास में डूब गए l अति का नशा करने के कारण और गांधारी के शाप के कारण वे सब आपस में ही लड़ मरे और द्वारका समुद्र में डूब गई l भगवान कहते हैं ---सब जन्म मुझी से पाते हैं , फिर लौट मुझ में आते हैं l उन्हें तो कलियुग का और आने वाले हजारों , लाखों वर्षों का ज्ञान था l उन्हें पता था कि काम , क्रोध , लोभ , मोह , तृष्णा , महत्वाकांक्षा में लिप्त संसार में कभी स्वर्ण युग होगा , कभी अत्याचार , अन्याय भी होगा इसलिए उन्होंने पृथ्वी के किसी भी शासन को अच्छा नहीं बताया l भगवान ने गीता में मृत्यु के देवता यम के शासन को सर्वश्रेष्ठ बताया है l यम के शासन में कोई खोट नहीं , कोई शिथिलता नहीं l यह सबके लिए समान है l यम के शासन में अमीर , गरीब , छोटे -बढ़े , ऊँच -नीच , शहरी -ग्रामीण , राजा -प्रजा , सुन्दर -कुरूप , धर्म , जाति किसी भी आधार पर कोई भेदभाव नहीं है l जब जिसकी आ गई उसे जाना पड़ता है , फिर संसार की कोई ताकत उसे एक पल के लिए भी नहीं रोक सकती l यम के शासन में कानून सबके लिए समान है , कोई भेदभाव नहीं l वहां कोई चापलूसी , विशेष सुविधा नहीं चलती इसलिए भगवान ने यमदेव को अपना स्वरुप बताया है l
28 May 2023
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- " ईर्ष्या मानवीय स्वभाव की विकृति है l ईर्ष्यात्मक जीवन की यात्रा अधूरी सी होती है , जिसमे जो मिलता है , उसकी कद्र नहीं होती और जो नहीं मिल पाता उसका विलाप चलता रहता है l इसलिए जरुरी यह है कि दूसरों की ओर न देखकर अपनी ओर देखा जाये , क्योंकि हर इनसान अपने आप में औरों से भिन्न है , विशेष है , उसकी जगह कोई नहीं ले सकता और न ही उसकी पूर्ति कोई कर सकता है l " आचार्य श्री आगे लिखते हैं --- " ईर्ष्या तभी हमारे मन में प्रवेश करती है , जब हमारी तुलनात्मक द्रष्टि होती है और हम उसमें खरे नहीं उतरते l इसलिए यदि तुलना ही करनी है तो अपने ही प्रयासों में करनी चाहिए कि हम पहले से बेहतर हैं या नहीं , तभी ईर्ष्या रूपी विष बीज को पनपने से रोका जा सकता है और इसका समूल नाश किया जा सकता है l " अमेरिका के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ . लेपार्ड ने लिखा है ---- " किसी की सफलता से ईर्ष्या करना अपने आपको संकुचित कर के सोचना है क्योंकि एक व्यक्ति कभी भी किसी दूसरे की सफलता पर डाका नहीं डाल सकता और न ही किसी अन्य तरीके से उसे छीन सकता है l सफलता यदि सच में प्राप्त करनी है तो उसके लिए ईर्ष्या की नहीं अथक प्रयास की जरुरत है l ' ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी भी अपने जीवन से संतुष्ट नहीं होता l वह अपने जीवन की बहुमूल्य ऊर्जा को दूसरों को नीचा दिखाने के प्रयासों में ही गँवा देता है l ईर्ष्या एक आग है जिसमें ईर्ष्यालु व्यक्ति निरंतर जलता रहता है l इसलिए आचार्य श्री लिखते हैं ---- ' जीवन जीना एक कला है l यदि ईर्ष्या के बिना हमने जीवन जीना सीख लिया तो हमारी जिन्दगी बहुत आसान और आशा से परिपूर्ण हो जाएगी l
27 May 2023
WISDOM ----
' हिरन , हाथी , पतंगा , मछली और भौंरा ये अपने -अपने स्वभाव के कारण विषयों में से केवल एक में आसक्त होने के कारण मृत्यु को प्राप्त होते हैं , तो इन पांच विषयों में जकड़ा हुआ असंयमी मनुष्य कैसे बच सकता है l असंयमी की दुर्गति निश्चित है l " -------- रावण का मरा हुआ शरीर पड़ा था l उसमे सौ स्थानों पर छिद्र थे l सभी से लहू बह रहा था l लक्ष्मण जी ने भगवान राम से पूछा --- आपने तो एक ही बाण मारा था , फिर इतने छिद्र कैसे हुए ? भगवान ने कहा --- मेरे बाण से तो केवल एक ही छिद्र हुआ l पर इसके कुकर्म घाव बनकर अपने आप फूट रहे हैं और अपना रक्त स्वयं बहा रहे हैं
26 May 2023
WISDOM -----
लघु कथा --- एक राजा बहुत सज्जन , दयालु और उदार थे l उनके दरबार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था l बात फैलने लगी l उदारता का लाभ उठाने के लिए चालाकों और चापलूसों की भीड़ जुटने लगी l उनके चतुर मंत्री ने बात को समझा और एक दिन घोषणा करा दी कि महाराज बीमार हैं , उन्हें पांच व्यक्तियों का रक्त चाहिए , तभी उनके प्राणों की रक्षा की जा सकती है l पूरा एक सप्ताह बीत गया लेकिन कोई भी शुभ चिन्तक , , याचक , चापलूस आगे नहीं आया l राजा को बड़ी चिंता होने लगी l चतुर मंत्री ने राजा को संसार की रीति -नीति बताते हुए कहा --- महाराज , आप व्यथित न हों l आप तो एक छोटे राज्य के राजा हैं , लोगों ने आपको ठग लिया तो कौन सी बड़ी बात है l परमात्मा के दरबार में तो यह नित्य ही होता है , उसके भक्त कोरे कर्मकांड कर के , मात्र चिन्ह पूजा कर के उसे दिन -रात ठगते हैं किन्तु कष्ट सहने , त्याग करने , साधना करने कोई विरला ही आगे आता है l
25 May 2023
WISDOM ----
अनमोल मोती ---- 1 . ' मेढ़क दौड़ता है , उसके पीछे सर्प दौड़ता है , सर्प के पीछे मयूर , मयूर के पीछे सिंह और सिंह के पीछे शिकारी दौड़ रहा है l इस प्रकार अपने -अपने भोजन और विहार की सामग्रियों के पीछे सभी व्याकुल हो रहे हैं , पर पीछे चोटी पकड़े काल खड़ा है , उसे कोई नहीं देखता l "
2 . एक बार अग्निवेश ने आचार्य चरक से पूछा --- " संसार में जो अगणित रोग पाए जाते हैं , उनका कारण क्या है ? " आचार्य ने उत्तर दिया -----" व्यक्ति के पास जिस स्तर के पाप जमा हो जाते हैं , उसी के अनुरूप शारीरिक और मानसिक व्याधियां उत्पन्न होती हैं l व्यक्तिगत व्याधियां ही नहीं , प्रकृति के सामूहिक दंड भी मनुष्य के सामूहिक पतन का दुष्परिणाम होते हैं l " कर्मफल के सिद्धांत पर समस्त संसार का व्यापार चल रहा है l सम्पूर्ण स्रष्टि इस मर्यादा से बंधी हुई है l जो समझदार हैं , वे इस शाश्वत सत्य को समझते हैं और कर्मों के फल को सहर्ष स्वीकार करते हैं l
24 May 2023
WISDOM ----
कबीरदास जी कहते हैं ---- कबीर चन्दन पर जला , तीतर बैठा माहिं l हम तो दाझत पंख बिन l तुम दाझत हो काहि l कबीर कमाई आपनी , कबहुं न निष्फल जाय l सात सिंधु आड़ा पड़े , मिले अगाड़ी आय l अर्थात जलते हुए चंदन के पेड़ पर एक तीतर आकर बैठ गया और वह भी जलने लगा l पेड़ कहता है , हम तो इसलिए जल रहे हैं , क्योंकि हमारे पास पंख नहीं हैं , हम उड़ नहीं सकते l लेकिन तीतर तुम तो पंख वाले हो , फिर तुम क्यों जलते हो ? तीतर उत्तर देता है कि अपना किया हुआ कर्म बेकार नहीं जाता l सात समुद्र की आड़ में रहे तो भी आगे आकर मिलता है l --- पुराण की एक कथा है जो यह बताती है कि सत्कर्मों के फलस्वरूप व्यक्ति इंद्रासन भी प्राप्त कर सकता है लेकिन सफलता की ऊँचाइयों पर पहुंचकर यदि वह अपनी शक्ति का दुरूपयोग करता है , लोगों को अपमानित , उत्पीड़ित करता है तो वहां से नीचे गिरने में देर नहीं लगती l ----- नहुष को पुण्य फल के बदले इंद्रासन प्राप्त हुआ l ऐश्वर्य और सत्ता का मद जिन्हें न आवे , ऐसे विरले होते हैं l नहुष पर भी सत्ता का नशा चढ़ गया , उनकी द्रष्टि रूपवती इन्द्राणी पर पड़ी और उन्होंने इन्द्राणी को अंत:पुर में आने का प्रस्ताव भेजा l इन्द्राणी बहुत दुःखी हुई , उन्होंने देवगुरु ब्रहस्पति से इस मुसीबत से बचने का उपाय पूछा l उनकी सलाह के अनुसार इन्द्राणी ने नहुष के पास सन्देश भेजा कि यदि नहुष सप्त ऋषियों को पालकी में जुतवाए और उस पालकी में बैठकर मेरे पास आए तो मैं प्रस्ताव स्वीकार कर लूंगी l आतुर नहुष ने ऋषि पकड़ बुलाए , उन्हें पालकी में जोत दिया और उस पर चढ़ बैठा l नहुष इन्द्राणी के पास पहुँचने को बहुत आतुर था इसलिए ऋषियों को बार -बार हड़का रहा था ---' जल्दी चलो , जल्दी चलो l ' दुर्बल काया के ऋषि इतना भार दूर तक ढोने और जल्दी चलने में समर्थ नहीं थे l लेकिन नहुष उन्हें बार -बार जल्दी चलने को कह रहा था l अपमान और उत्पीड़न से क्षुब्ध हो एक ऋषि ने उसे शाप दे डाला --- '" दुष्ट ! तू स्वर्ग से पतित होकर पुन: धरती पर जा गिर l " शाप सार्थक हुआ और नहुष स्वर्ग से पतित हो कर मृत्युलोक में दीन -हीन की तरह विचरण करने लगे l