28 November 2023

WISDOM ------ लघु कथा ---'कुछ तो कर , यों ही मत मर '

   एक  राजा  के  अनेक  शत्रु  हो  गए  l  एक  रात  शत्रुओं  ने  पहरेदारों  को  अपनी  ओर  मिला  लिया   और  महल  में  जाकर  राजा  को  दवा  सुंघाकर   बेहोश  कर  दिया  l  उसके  बाद   उन्होंने  राजा  के  हाथ -पाँव  बांधकर   एक  पहाड़  की  गुफा  में  ले  जाकर  बंद  कर  दिया  l  राजा  को  जब  होश  आया   तो  अपनी  दशा  देखकर   घबरा  उठा  l  उस  अँधेरी  गुफा  में  उसे  कुछ  करते -धरते  न  बना  l  तभी  उसे  अपनी  माता  का  बताया  हुआ  मन्त्र  याद  आ  गया  --- " कुछ  कर , कुछ  कर  l " राजा  की  निराशा  दूर  हुई   और  उसने  पूरी  शक्ति  लगाकर   हाथ -पैर  की  डोरी  तोड़  डाली  l  तभी   अँधेरे  में  उसका  पैर  सांप  पर  पड़  गया   जिसने  उसे  काट  लिया  l  राजा  फिर  घबराया   किन्तु  फिर  तत्काल   ही  उसे  वही  मन्त्र   ' कुछ  कर , कुछ  कर  '  याद  आ  गया  l  उसने  तत्काल  कमर  से  कटार   निकालकर   सांप  के  काटे  स्थान  को  चीर  दिया  l  खून  की  धार  बहने  से  वह  फिर  घबरा  गया  लेकिन  फिर  उसे  माँ  का  मन्त्र  याद  आ  गया --' कुछ  कर , कुछ  कर '  उसने  प्रेरणा  पाकर  अपने  वस्त्र  को  फाड़  कर    घाव  पर  पट्टी  बाँध  ली  l  अब  उसे  उस  गुफा  से  बाहर  निकलने  की  चिंता  सताने  लगी   और  भूख  प्यास  भी  लगी  थी  l  पुन:  माँ  के  मन्त्र  को  याद  कर  वह  उस  अँधेरे  में  आगे  बढ़ता  रहा   और  गुफा  के  द्वार  पर  आ  गया   और  उसके  मुख  पर  लगे  पत्थर  को  धक्का  देने  लगा  l  बहुत  बार  प्रयास  करने  पर   आखिर  वह  पत्थर  लुढ़क  गया   और  राजा  गुफा  से  बाहर निकलकर   अपने  महल  में  वापस  आ  गया  l   इस  कथा  से  हमें  यही  शिक्षा  मिलती  है   कि  कभी  हार  नहीं  मानो ,  बार -बार  गिरते  हो , तो  बार - बार  नए  हौसले  के  साथ  उठो  ,  हिम्मत  नहीं  हारो  l  जीवन  इतना  सरल  नहीं  है ,  इसमें  बड़े -बड़े  तूफान  आते  हैं  ,  उनका  डटकर  सामना  करो   और  जिन्दगी  की  इस  जंग  को  जीत  लो  l  

26 November 2023

WISDOM ------

   लघु कथा ----  विनाश  का  कारण  सांसारिक  आकर्षण  '------ कालिंदी  के  महापंडित  कौत्स   स्नान  कर   प्रात:  वंदना  कर  रहे  थे  l  एक  घड़ियाल  उन्हें  काफी  दूर  से  ताक  रहा  था  ,  किन्तु  कौत्स  ऐसी  ऊँची  शिला  पर  बैठे  थे  कि  घड़ियाल  वहां  तक  पहुँच  नहीं  सकता  था  l  उसने  युक्ति  से  काम  लिया   और  यमुना  की  तलहटी  से   रत्नों  का  ढेर  उठाकर   ऊपर  की  ओर  उछाला  l    अपने  चारों  ओर  मणि -मुक्तक  देखकर  महर्षि  कौत्स  का   लोभ  जाग  उठा   l  उसने   कौत्स  से  कहा --- " आचार्य  !  मैं  त्रिवेणी  का  रास्ता  नहीं   जानता  ,   यदि  आप  मेरी  पीठ  पर  बैठकर  मुझे  त्रिवेणी   का  रास्ता  बता  दें   तो  मैं  इन  तुच्छ  मोतियों  से  बढ़कर  पांच   मुक्ताहार  दे  सकता  हूँ  l  कौत्स  के  हर्ष  का  ठिकाना  न  रहा  l  घड़ियाल  ने  उन्हें  पीठ  पर  बैठाया   l  अभी  वह  बीच  धार  में  पहुंचा  ही  था  कि  उसे  हंसी  आ  गई  l  घड़ियाल  को  हँसते  देख  कौत्स  ने  पूछा --- "  वत्स  ! असमय  आपकी  हँसी  का  क्या  कारण  है  ? "   घड़ियाल  ने  कहा --- " आचार्य  ! आप  जीवन  भर  दूसरों  को  उपदेश  देते  रहे  कि  विनाश  सांसारिक  आकर्षण  के  रूप  में  आता  है  l  मनुष्य  जब  एक  बार  वासनाओं  के  शिकंजे  में  आ  जाता  है   तब  ये  वासनाएं  मनुष्य  को  वहां  ले  जाती  हैं  , जहाँ  सिवाय  विनाश  के   कुछ  नहीं  होता  l  दूसरों  को  उपदेश  देने  के  बावजूद   तुम   यह  तथ्य  न  समझ  सके   और  आज  एक  लालच  ने   तुम्हे  सर्वनाश  के  पास  पहुंचा  दिया  l   यह  कहकर   उसने  कौत्स  को  उछाला  और  एक  ही  क्षण  में  निगल  लिया  l    उपदेश  देना  बहुत  सरल  होता  है  , लेकिन  उसे  आचरण  में   उतारना    बहुत  कठिन   l  

25 November 2023

WISDOM -----

     एक  बार  एक  राजा  ने  मंत्री  से  पूछा ---- "क्या  गृहस्थ  रहकर  ईश्वर  को  प्राप्त  किया  जा  सकता  है  ? " मंत्री  राजा  को  एक  वन  में  ले  गए   और  बोले ---- " महाराज  ! इस  वन  में  एक   प्रसिद्ध    महात्मा  रहते  हैं  l  उनसे  मिलने  के  लिए   कीड़ों -मकोड़ों  से  पांव  बचाकर   चलना  पड़ता  है  l  एक  भी  कीड़े  की  मृत्यु  हो  जाए   तो  वे  शाप  दे  देते  हैं  l "  राजा  ध्यान  पूर्वक  चलते  हुए  महात्मा जी  के  पास  पहुंचे   और  अपना  प्रश्न  पूछा  l   महात्मा जी  ने  प्रत्युत्तर  में  प्रश्न   किया ---- "मेरे  पास  आते  हुए   मार्ग  में  क्या -क्या  देखा  ? "  राजा  बोले ---- " भगवन  !  मैं  तो  आपके  शाप  के  डर  से   कीड़े =मकोड़ों  को  देखता हुआ  आया  हूँ  l  रास्ते  के  किसी  द्रश्य  की  ओर  मेरी  द्रष्टि   ही  नहीं  गई  l "  महात्मा  जी  हँसते  हुए  बोले  ---- " राजन  !  जिस  प्रकार  मेरे  शाप  के  डर  से   तुम  मार्ग  में  बचते  -बचते  आए  हो  ,  उसी  प्रकार  भगवान  के  दंड  के  डर  से   दुष्कर्मों  से  बचते  हुए  चलना  चाहिए  l  इस  प्रकार  सावधानी  से  चलते  हुए   गृहस्थ  रहते  हुए  भी   ईश्वर  को  प्राप्त  किया  जा  सकता  है  l "

23 November 2023

WISDOM ----

   यह  संसार  एक  रंगमंच  है  यहाँ  हम  सभी  अपनी -अपनी  भूमिका  निभाने  आते  हैं  l   ईश्वर  ने  धरती  पर  जन्म  लेकर  हमें  सिखाया  कि   काम  कोई  भी  छोटा -बड़ा  नहीं  होता  ,  हमें  जो  भी  कार्य  मिला  है  ,  जो  भूमिका  हमें  मिली  है   उसे  अहंकार रहित  होकर  समर्पण  भाव  से  निभाएं  l  महाभारत  का  प्रसंग  है  ----  भगवान  श्रीकृष्ण  तो  सर्वशक्तिमान  थे   लेकिन  उन्होंने  स्वयं   महाभारत  युद्ध  में  सारथी  की  भूमिका  चयन  की  थी   और  इस  भूमिका  को  बखूबी  निभाया  l   एक  सारथी  की  तरह  वे   सर्वप्रथम    अर्जुन  को   ससम्मान  रथ  में  चढ़ाते  और  उसके  बाद  स्वयं  आरूढ़  होते    और  अर्जुन  के  आदेश  की  प्रतीक्षा  करते  l  फिर  संध्या  के  समय  जब  युद्ध  बंद  हो  जाता   तब  वे  पहले    उतरकर  फिर  अर्जुन  को  बड़ी  आवभगत  के  साथ  उतारते  l     भगवान  श्रीकृष्ण  अपने  इस  अभिनय   को     सम्पूर्ण  समर्पण  के  साथ   निभा  रहे  थे   l   युद्ध  का  अंतिम  दिन  ,  युद्ध  समाप्त  हुआ  ,  अब  भगवान  कृष्ण  सदा  की  तरह   अर्जुन  से  पहले  नहीं  उतरे   और  अर्जुन  को  संबोधित  करते  हुए  बोले  --"पार्थ  !  आज  तुम  रथ  से   पहले  उतर  जाओ   l  तुम  उतर  जाओगे  तब  मैं  उतरता  हूँ  l  अर्जुन  को   आश्चर्य  हुआ  लेकिन  कहना  मान  कर  वे  पहले  उतर  गए  l  अर्जुन  के  उतरने  के  बाद  भगवान  कृष्ण  धीरे  से  उतरे  और  अर्जुन  के  कंधे  पर  हाथ  रखकर  उन्हें  रथ  से  दूर  ले  गए  , उसके  बाद  एक  भयानक  विस्फोट  के  साथ  रथ  जलकर  ख़ाक  हो  गया  l  अर्जुन  ने  आश्चर्य  से  पूछा  --- " हे  कान्हा  !  आपके  उतरते  ही  पल  भर  में  यह  रथ  भस्मीभूत  हो  गया  , ये  क्या  रहस्य  है   ? "  भगवान  ने  कहा ---- "  हे   पार्थ  !  यह  रथ  तो  पितामह  भीष्म  के  दिव्यास्त्रों   के  प्रहार  से  मृत्यु  का   वरण   कर  चुका  था  , इस  दिव्य  रथ  की  आयु  समाप्त  हो  चुकी  थी  लेकिन   आयु  समाप्ति  के  बाद  भी  इसकी  उपयोगिता  वांछित  थी  इसलिए  यह  मेरे  संकल्प  बल  से  चल  रहा  था  l   भगवान  का  संकल्प  अटूट   और  अटल  होता  है  l  यह  संकल्प  सम्पूर्ण  स्रष्टि  में  जहाँ  भी  लग  जाता  है  वहीँ  अपना  प्रभाव   दिखाता  है   और  संकल्प  के  पूर्ण  होते  ही  यह  शक्ति  पुन:  भगवान  के  पास  चली  जाती  है , उसके  बाद  जो  हुआ  वो  तुमने  देखा  l  अर्जुन  ने  अपने  जीवन  की  बागडोर  भगवान  के  हाथ  में  सौंप  दी  थी  , भगवान  ने  उसे  हर  मुसीबत  से  बचाया  l  यदि  हम  भी  अर्जुन  की  तरह  अपना  कर्तव्यपालन  करते  हुए   अपने  जीवन  की  बागडोर  भगवान  के  हाथ  में  सौंप  दे , स्वयं  को  ईश्वर  के  चरणों  में  समर्पित  करें    तो  जीवन  से  भय  समाप्त  हो  जाये   और  सुख -शांति  से  तनाव रहित  जिन्दगी  जी  सकें  l   

22 November 2023

WISDOM ----

   लघु कथा ----  एक  लड़के  ने   एक  बहुत  धनी  आदमी  को  देखकर  धनवान  बनने  का  निश्चय  किया  l  कई  दिन  तक  वह  कमाई  में  लगा  रहा   और  कुछ  पैसा  कमा  भी  लिया  l  इसी  बीच  उसकी  भेंट  एक  विद्वान्  से  हुई   l  अब  उसने  विद्वान  बनने  का  निश्चय  किया   और  दूसरे  दिन  से   ही  कमाई  धमाई  छोड़कर   पढ़ने  में  लग  गया  l  अभी  अक्षर  अभ्यास   ही  सीख  पाया  था  कि  उसकी  भेंट  एक  संगीतज्ञ  से  हुई  l  उसे  संगीत  में  अधिक  आकर्षण  दिखाई  दिया  , इसलिए  उसने  उस  दिन  से  पढ़ाई  बंद  कर  दी  और  संगीत  सीखना  शुरू  किया  l  काफी  उम्र  बीत  गई  l  न  वह  धनी  हो  सका  न  विद्वान   l  न  संगीत  सीख  पाया   और  न  नेता  बन  सका   l  तब  उसे  बड़ा  दुःख  हुआ  l  एक  दिन  उसकी  एक  महात्मा  से  भेंट  हुई  l  उसने  अपने  दुःख  का  कारण  पूछा  , तब  महात्मा  जी  बोले ---- " बेटा  !  यह   दुनिया  बड़ी  चिकनी  है  ,  जहाँ  जाओगे  कोई -न  कोई  आकर्षण  दिखाई  देगा  l  एक  निश्चय  कर  लो  फिर    पूरे  श्रम  और  लगन  के  साथ   उस लक्ष्य  को  प्राप्त  करने  का  प्रयत्न  करो  , तो  तुम्हारी  उन्नति  अवश्य  हो  जाएगी  l  बार -बार  रूचि  बदलते  रहने  से   कोई  भी  उन्नति  नहीं  कर  सकोगे  l  युवक  समझ  गया   और  अपना  एक  उदेश्य   निश्चित  कर  उसी  का  अभ्यास  करने  लगा  l 

18 November 2023

WISDOM -----

   श्रीमद् भगवद्गीता  में  भगवान  कहते  हैं ---  परमात्मा  विभाग रहित   होने  के  साथ  स्वयं  में  तथा  औरों  में  उपस्थित  है  l  वही  सबका  भरण -पोषण  करने  वाला   और  उत्पन्न  करने  वाला  है  l  सभी  वही  है  ,  वही  बनाता  है , वही  मिटाता  है  , वही  संभालता  है  l  --इस  सत्य  को  स्वीकार  कर  लेने  से  हमारी  सभी  चिंताएं अपने  आप  ही  समाप्त  हो  जाएँगी  l   जीवन  जहाँ  भी  जिस  भी  रूप  में  उपस्थित  है  ,  उसका  भरण -पोषण  करने  वाला  ईश्वर  ही  है  l   गीता  में  कहा  गया  है  ------ सभी  जीवों  के  लिए   परमात्मा    उनके  कर्मानुसार  परिस्थितियां , घटनाक्रम  और  संसाधन   जुटाता  रहता  है  ,  फिर  भले  ही  इस  प्रक्रिया  में   माध्यम  कोई  भी  क्यों  न   उपस्थित  हो   l  जो  इस  सत्य  की  अनुभूति  कर  लेता  है   वह   अनेक  दायित्वों  का  निर्वाह  करते  हुए   अहंकार  से  मुक्त  रहता  है   l    लेकिन  जो  इस  अनुभूति  से  वंचित  रहता  है  ,  वह  स्वयं  को   अनेकों  का  भरण -पोषण  करने  वाला   समझकर   मन -ही-मन  अपनी  अहंता  को  पोषित करता  रहता  है  l                   एक  प्रसंग  है ----  छत्रपति  शिवाजी  महाराज   उन  दिनों  एक  किला  बनवा  रहे  थे  l  उस  किले  के  निर्माण  में  हजारों  मजदूर   व  कारीगर  काम  कर  रहे  थे  l  इस  द्रश्य  को  देखकर  शिवाजी  महाराज  के  मन  में  आया   कि  देखो   मेरे  कारण  कितने  लोगों  का  पालन -पोषण  हो  रहा  है  l  यदि  मैं  न  होता  तो  कितने  लोग   भूखे  मर  जाते  l  जब  शिवाजी  ऐसा  सोच  रहे  थे  उसी  समय  उनके  गुरु  समर्थ  रामदास जी   वहां  भ्रमण  करते  हुए  आ  गए  l  उन्होंने  शिवाजी  से  कहा  कि   वे  वहां  रखे  हुए  एक  बड़े  पत्थर  को  तुडवा  दें  l  गुरु  की  आज्ञा    का  पालन  करते  हुए  शिवाजी  ने  तत्काल  ही   मजदूरों  से  उस  पत्थर  को  तुडवा  दिया  l   उस  बड़े  पत्थर  के  टूटने  पर   सभी  ने  चकित  होकर  देखा  कि   उसके  भीतर  से  कई  मेढ़क   उछालते  हुए  बाहर  आ  गए  l  वे  पत्थर  के  भीतर  भरे  पानी  में  मजे  से  रह  रहे  थे  l  उन्हें  इस  द्रश्य  को  दिखाते  हुए  समर्थ  रामदास जी  ने  कहा  ---- "  शिवा  !  तू  सचमुच  बहुत  महान  है  l  तूने  अनेक  जीवों  के  भरण -पोषण  की  व्यवस्था  बना  रखी  है  l  देख  !  ये  मेढ़क  भी   तेरी  कृपा  से  इस  पत्थर  के  भीतर  सुरक्षित   एवं  सकुशल  थे  l "  अपने  गुरु  के  इस  वचन  से  शिवाजी  महाराज  को  अपनी  भूल  का  एहसास  हो  गया   l  इस  घटना  ने  उन्हें  यह  सिखा  दिया  कि  वे  केवल  माध्यम  हैं  ,  इससे  अधिक  कुछ  भी  नहीं  हैं  l  सब  जीवों  का  भरण -पोषण  करने  वाला  केवल  परमात्मा  ही  है  l  























16 November 2023

WISDOM -----

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी   लिखते  हैं  ----- " पथ  तय  करता  है  कि  जीवन  की  मंजिल  कहाँ  है  l  मंजिल  का  अनुमान  एवं  आकलन   राह  को  देखकर  किया  जा  सकता  है  l  अनीति  एवं  गलत  राह  से   कभी  भी   श्रेष्ठ  मंजिल  की  प्राप्ति  संभव  नहीं  है  l   इस  राह  पर  चलने  के  लिए   कितने  ही  क्यों  न  प्रेरित  करें  ,  परन्तु  अंत  इसका  अत्यंत  भयावह  होता  है  l  "    कौरवों   की  समृद्धि  और  ऐश्वर्य  की  कहानी   पांडवों  के  अधिकार  को  कुचलकर  लिखी  गई  थी   और  उसका  अंत  उससे  कई  गुना   दर्दनाक  था  l  पुत्र  मोह  से  ग्रस्त  धृतराष्ट्र   के  सौ  पुत्रों  में  से   एक  भी  जीवित  नहीं   बचा  l  प्रारम्भ  में  वैभव  के  मद  में  चूर  कौरव  अंत  में  एक  कफ़न  के  लिए  तरस  गए   l  जिनकी  नियत  में  खोट  होता  है  उनका  अंत  कभी  भी  अच्छा  नहीं  होता   l                                   इसके  विपरीत  सन्मार्ग  सदा  श्रेष्ठ  लक्ष्य  की  ओर  पहुंचाता  है   l  सच्चाई  की  राह  पर  अडिग  रहकर   साहस , धैर्य  और  विवेक पूर्वक    अपनी  मंजिल  को  उपलब्ध  किया  है  l    इस  उपलब्धि  का  आनंद  ही  कुछ  और  है  , यहाँ  आत्मा  तृप्त  होती  है    लेकिन  अनीति  और  गलत  राह  पर  चलकर   जो  सफलता  प्राप्त  की  जाती  है  ,  उससे  आत्मा  कभी  तृप्त  नहीं  होती  ,  अंतर्मन  खोखला  ही  रहता  है   क्योंकि  मनुष्य  का  मन  एक  दर्पण  है   जो  उसके  भले -बुरे  कर्मों  को  निरंतर  उसे    दिखाता  है  l  संसार  से  मनुष्य  छिप  सकता  है  , भाग  सकता  है     लेकिन  अपने  मन  से  भाग  नहीं  सकता  l  ऐश्वर्य  और  वैभव  के  भंडार  के  बीच  भी   आँखों  से  नींद  उड़   जाती  है   l