एक राजा के अनेक शत्रु हो गए l एक रात शत्रुओं ने पहरेदारों को अपनी ओर मिला लिया और महल में जाकर राजा को दवा सुंघाकर बेहोश कर दिया l उसके बाद उन्होंने राजा के हाथ -पाँव बांधकर एक पहाड़ की गुफा में ले जाकर बंद कर दिया l राजा को जब होश आया तो अपनी दशा देखकर घबरा उठा l उस अँधेरी गुफा में उसे कुछ करते -धरते न बना l तभी उसे अपनी माता का बताया हुआ मन्त्र याद आ गया --- " कुछ कर , कुछ कर l " राजा की निराशा दूर हुई और उसने पूरी शक्ति लगाकर हाथ -पैर की डोरी तोड़ डाली l तभी अँधेरे में उसका पैर सांप पर पड़ गया जिसने उसे काट लिया l राजा फिर घबराया किन्तु फिर तत्काल ही उसे वही मन्त्र ' कुछ कर , कुछ कर ' याद आ गया l उसने तत्काल कमर से कटार निकालकर सांप के काटे स्थान को चीर दिया l खून की धार बहने से वह फिर घबरा गया लेकिन फिर उसे माँ का मन्त्र याद आ गया --' कुछ कर , कुछ कर ' उसने प्रेरणा पाकर अपने वस्त्र को फाड़ कर घाव पर पट्टी बाँध ली l अब उसे उस गुफा से बाहर निकलने की चिंता सताने लगी और भूख प्यास भी लगी थी l पुन: माँ के मन्त्र को याद कर वह उस अँधेरे में आगे बढ़ता रहा और गुफा के द्वार पर आ गया और उसके मुख पर लगे पत्थर को धक्का देने लगा l बहुत बार प्रयास करने पर आखिर वह पत्थर लुढ़क गया और राजा गुफा से बाहर निकलकर अपने महल में वापस आ गया l इस कथा से हमें यही शिक्षा मिलती है कि कभी हार नहीं मानो , बार -बार गिरते हो , तो बार - बार नए हौसले के साथ उठो , हिम्मत नहीं हारो l जीवन इतना सरल नहीं है , इसमें बड़े -बड़े तूफान आते हैं , उनका डटकर सामना करो और जिन्दगी की इस जंग को जीत लो l
28 November 2023
26 November 2023
WISDOM ------
लघु कथा ---- विनाश का कारण सांसारिक आकर्षण '------ कालिंदी के महापंडित कौत्स स्नान कर प्रात: वंदना कर रहे थे l एक घड़ियाल उन्हें काफी दूर से ताक रहा था , किन्तु कौत्स ऐसी ऊँची शिला पर बैठे थे कि घड़ियाल वहां तक पहुँच नहीं सकता था l उसने युक्ति से काम लिया और यमुना की तलहटी से रत्नों का ढेर उठाकर ऊपर की ओर उछाला l अपने चारों ओर मणि -मुक्तक देखकर महर्षि कौत्स का लोभ जाग उठा l उसने कौत्स से कहा --- " आचार्य ! मैं त्रिवेणी का रास्ता नहीं जानता , यदि आप मेरी पीठ पर बैठकर मुझे त्रिवेणी का रास्ता बता दें तो मैं इन तुच्छ मोतियों से बढ़कर पांच मुक्ताहार दे सकता हूँ l कौत्स के हर्ष का ठिकाना न रहा l घड़ियाल ने उन्हें पीठ पर बैठाया l अभी वह बीच धार में पहुंचा ही था कि उसे हंसी आ गई l घड़ियाल को हँसते देख कौत्स ने पूछा --- " वत्स ! असमय आपकी हँसी का क्या कारण है ? " घड़ियाल ने कहा --- " आचार्य ! आप जीवन भर दूसरों को उपदेश देते रहे कि विनाश सांसारिक आकर्षण के रूप में आता है l मनुष्य जब एक बार वासनाओं के शिकंजे में आ जाता है तब ये वासनाएं मनुष्य को वहां ले जाती हैं , जहाँ सिवाय विनाश के कुछ नहीं होता l दूसरों को उपदेश देने के बावजूद तुम यह तथ्य न समझ सके और आज एक लालच ने तुम्हे सर्वनाश के पास पहुंचा दिया l यह कहकर उसने कौत्स को उछाला और एक ही क्षण में निगल लिया l उपदेश देना बहुत सरल होता है , लेकिन उसे आचरण में उतारना बहुत कठिन l
25 November 2023
WISDOM -----
एक बार एक राजा ने मंत्री से पूछा ---- "क्या गृहस्थ रहकर ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है ? " मंत्री राजा को एक वन में ले गए और बोले ---- " महाराज ! इस वन में एक प्रसिद्ध महात्मा रहते हैं l उनसे मिलने के लिए कीड़ों -मकोड़ों से पांव बचाकर चलना पड़ता है l एक भी कीड़े की मृत्यु हो जाए तो वे शाप दे देते हैं l " राजा ध्यान पूर्वक चलते हुए महात्मा जी के पास पहुंचे और अपना प्रश्न पूछा l महात्मा जी ने प्रत्युत्तर में प्रश्न किया ---- "मेरे पास आते हुए मार्ग में क्या -क्या देखा ? " राजा बोले ---- " भगवन ! मैं तो आपके शाप के डर से कीड़े =मकोड़ों को देखता हुआ आया हूँ l रास्ते के किसी द्रश्य की ओर मेरी द्रष्टि ही नहीं गई l " महात्मा जी हँसते हुए बोले ---- " राजन ! जिस प्रकार मेरे शाप के डर से तुम मार्ग में बचते -बचते आए हो , उसी प्रकार भगवान के दंड के डर से दुष्कर्मों से बचते हुए चलना चाहिए l इस प्रकार सावधानी से चलते हुए गृहस्थ रहते हुए भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है l "
23 November 2023
WISDOM ----
यह संसार एक रंगमंच है यहाँ हम सभी अपनी -अपनी भूमिका निभाने आते हैं l ईश्वर ने धरती पर जन्म लेकर हमें सिखाया कि काम कोई भी छोटा -बड़ा नहीं होता , हमें जो भी कार्य मिला है , जो भूमिका हमें मिली है उसे अहंकार रहित होकर समर्पण भाव से निभाएं l महाभारत का प्रसंग है ---- भगवान श्रीकृष्ण तो सर्वशक्तिमान थे लेकिन उन्होंने स्वयं महाभारत युद्ध में सारथी की भूमिका चयन की थी और इस भूमिका को बखूबी निभाया l एक सारथी की तरह वे सर्वप्रथम अर्जुन को ससम्मान रथ में चढ़ाते और उसके बाद स्वयं आरूढ़ होते और अर्जुन के आदेश की प्रतीक्षा करते l फिर संध्या के समय जब युद्ध बंद हो जाता तब वे पहले उतरकर फिर अर्जुन को बड़ी आवभगत के साथ उतारते l भगवान श्रीकृष्ण अपने इस अभिनय को सम्पूर्ण समर्पण के साथ निभा रहे थे l युद्ध का अंतिम दिन , युद्ध समाप्त हुआ , अब भगवान कृष्ण सदा की तरह अर्जुन से पहले नहीं उतरे और अर्जुन को संबोधित करते हुए बोले --"पार्थ ! आज तुम रथ से पहले उतर जाओ l तुम उतर जाओगे तब मैं उतरता हूँ l अर्जुन को आश्चर्य हुआ लेकिन कहना मान कर वे पहले उतर गए l अर्जुन के उतरने के बाद भगवान कृष्ण धीरे से उतरे और अर्जुन के कंधे पर हाथ रखकर उन्हें रथ से दूर ले गए , उसके बाद एक भयानक विस्फोट के साथ रथ जलकर ख़ाक हो गया l अर्जुन ने आश्चर्य से पूछा --- " हे कान्हा ! आपके उतरते ही पल भर में यह रथ भस्मीभूत हो गया , ये क्या रहस्य है ? " भगवान ने कहा ---- " हे पार्थ ! यह रथ तो पितामह भीष्म के दिव्यास्त्रों के प्रहार से मृत्यु का वरण कर चुका था , इस दिव्य रथ की आयु समाप्त हो चुकी थी लेकिन आयु समाप्ति के बाद भी इसकी उपयोगिता वांछित थी इसलिए यह मेरे संकल्प बल से चल रहा था l भगवान का संकल्प अटूट और अटल होता है l यह संकल्प सम्पूर्ण स्रष्टि में जहाँ भी लग जाता है वहीँ अपना प्रभाव दिखाता है और संकल्प के पूर्ण होते ही यह शक्ति पुन: भगवान के पास चली जाती है , उसके बाद जो हुआ वो तुमने देखा l अर्जुन ने अपने जीवन की बागडोर भगवान के हाथ में सौंप दी थी , भगवान ने उसे हर मुसीबत से बचाया l यदि हम भी अर्जुन की तरह अपना कर्तव्यपालन करते हुए अपने जीवन की बागडोर भगवान के हाथ में सौंप दे , स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित करें तो जीवन से भय समाप्त हो जाये और सुख -शांति से तनाव रहित जिन्दगी जी सकें l
22 November 2023
WISDOM ----
लघु कथा ---- एक लड़के ने एक बहुत धनी आदमी को देखकर धनवान बनने का निश्चय किया l कई दिन तक वह कमाई में लगा रहा और कुछ पैसा कमा भी लिया l इसी बीच उसकी भेंट एक विद्वान् से हुई l अब उसने विद्वान बनने का निश्चय किया और दूसरे दिन से ही कमाई धमाई छोड़कर पढ़ने में लग गया l अभी अक्षर अभ्यास ही सीख पाया था कि उसकी भेंट एक संगीतज्ञ से हुई l उसे संगीत में अधिक आकर्षण दिखाई दिया , इसलिए उसने उस दिन से पढ़ाई बंद कर दी और संगीत सीखना शुरू किया l काफी उम्र बीत गई l न वह धनी हो सका न विद्वान l न संगीत सीख पाया और न नेता बन सका l तब उसे बड़ा दुःख हुआ l एक दिन उसकी एक महात्मा से भेंट हुई l उसने अपने दुःख का कारण पूछा , तब महात्मा जी बोले ---- " बेटा ! यह दुनिया बड़ी चिकनी है , जहाँ जाओगे कोई -न कोई आकर्षण दिखाई देगा l एक निश्चय कर लो फिर पूरे श्रम और लगन के साथ उस लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करो , तो तुम्हारी उन्नति अवश्य हो जाएगी l बार -बार रूचि बदलते रहने से कोई भी उन्नति नहीं कर सकोगे l युवक समझ गया और अपना एक उदेश्य निश्चित कर उसी का अभ्यास करने लगा l
18 November 2023
WISDOM -----
श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --- परमात्मा विभाग रहित होने के साथ स्वयं में तथा औरों में उपस्थित है l वही सबका भरण -पोषण करने वाला और उत्पन्न करने वाला है l सभी वही है , वही बनाता है , वही मिटाता है , वही संभालता है l --इस सत्य को स्वीकार कर लेने से हमारी सभी चिंताएं अपने आप ही समाप्त हो जाएँगी l जीवन जहाँ भी जिस भी रूप में उपस्थित है , उसका भरण -पोषण करने वाला ईश्वर ही है l गीता में कहा गया है ------ सभी जीवों के लिए परमात्मा उनके कर्मानुसार परिस्थितियां , घटनाक्रम और संसाधन जुटाता रहता है , फिर भले ही इस प्रक्रिया में माध्यम कोई भी क्यों न उपस्थित हो l जो इस सत्य की अनुभूति कर लेता है वह अनेक दायित्वों का निर्वाह करते हुए अहंकार से मुक्त रहता है l लेकिन जो इस अनुभूति से वंचित रहता है , वह स्वयं को अनेकों का भरण -पोषण करने वाला समझकर मन -ही-मन अपनी अहंता को पोषित करता रहता है l एक प्रसंग है ---- छत्रपति शिवाजी महाराज उन दिनों एक किला बनवा रहे थे l उस किले के निर्माण में हजारों मजदूर व कारीगर काम कर रहे थे l इस द्रश्य को देखकर शिवाजी महाराज के मन में आया कि देखो मेरे कारण कितने लोगों का पालन -पोषण हो रहा है l यदि मैं न होता तो कितने लोग भूखे मर जाते l जब शिवाजी ऐसा सोच रहे थे उसी समय उनके गुरु समर्थ रामदास जी वहां भ्रमण करते हुए आ गए l उन्होंने शिवाजी से कहा कि वे वहां रखे हुए एक बड़े पत्थर को तुडवा दें l गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए शिवाजी ने तत्काल ही मजदूरों से उस पत्थर को तुडवा दिया l उस बड़े पत्थर के टूटने पर सभी ने चकित होकर देखा कि उसके भीतर से कई मेढ़क उछालते हुए बाहर आ गए l वे पत्थर के भीतर भरे पानी में मजे से रह रहे थे l उन्हें इस द्रश्य को दिखाते हुए समर्थ रामदास जी ने कहा ---- " शिवा ! तू सचमुच बहुत महान है l तूने अनेक जीवों के भरण -पोषण की व्यवस्था बना रखी है l देख ! ये मेढ़क भी तेरी कृपा से इस पत्थर के भीतर सुरक्षित एवं सकुशल थे l " अपने गुरु के इस वचन से शिवाजी महाराज को अपनी भूल का एहसास हो गया l इस घटना ने उन्हें यह सिखा दिया कि वे केवल माध्यम हैं , इससे अधिक कुछ भी नहीं हैं l सब जीवों का भरण -पोषण करने वाला केवल परमात्मा ही है l
16 November 2023
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " पथ तय करता है कि जीवन की मंजिल कहाँ है l मंजिल का अनुमान एवं आकलन राह को देखकर किया जा सकता है l अनीति एवं गलत राह से कभी भी श्रेष्ठ मंजिल की प्राप्ति संभव नहीं है l इस राह पर चलने के लिए कितने ही क्यों न प्रेरित करें , परन्तु अंत इसका अत्यंत भयावह होता है l " कौरवों की समृद्धि और ऐश्वर्य की कहानी पांडवों के अधिकार को कुचलकर लिखी गई थी और उसका अंत उससे कई गुना दर्दनाक था l पुत्र मोह से ग्रस्त धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में से एक भी जीवित नहीं बचा l प्रारम्भ में वैभव के मद में चूर कौरव अंत में एक कफ़न के लिए तरस गए l जिनकी नियत में खोट होता है उनका अंत कभी भी अच्छा नहीं होता l इसके विपरीत सन्मार्ग सदा श्रेष्ठ लक्ष्य की ओर पहुंचाता है l सच्चाई की राह पर अडिग रहकर साहस , धैर्य और विवेक पूर्वक अपनी मंजिल को उपलब्ध किया है l इस उपलब्धि का आनंद ही कुछ और है , यहाँ आत्मा तृप्त होती है लेकिन अनीति और गलत राह पर चलकर जो सफलता प्राप्त की जाती है , उससे आत्मा कभी तृप्त नहीं होती , अंतर्मन खोखला ही रहता है क्योंकि मनुष्य का मन एक दर्पण है जो उसके भले -बुरे कर्मों को निरंतर उसे दिखाता है l संसार से मनुष्य छिप सकता है , भाग सकता है लेकिन अपने मन से भाग नहीं सकता l ऐश्वर्य और वैभव के भंडार के बीच भी आँखों से नींद उड़ जाती है l