प्रत्येक प्राणी का एक स्वभाव होता है , वह नहीं बदलता जैसे बिच्छू का स्वभाव है डंक मारना , वह हर हाल में डंक मारेगा l गिरगिट रंग बदलता है l मनुष्य को भगवान ने बुद्धि दी है , वह चाहे तो संकल्प लेकर , सतत प्रयास कर के अपनी दूषित प्रवृत्तियों को त्याग कर सन्मार्ग पर चल सकता है लेकिन कामना , वासना , तृष्णा , महत्वाकांक्षा , ईर्ष्या , द्वेष , स्वार्थ , लालच आदि उसके भीतर इतनी गहरी जड़ जमाए हुए हैं कि वह स्वयं को इन दुष्प्रवृत्तियों से अलग कर ही नहीं सकता , उसे इन दुष्प्रवृत्तियों की दुर्गन्ध के बीच रहना ही अच्छा लगता है l एक कथा है ----रास्ते में चलते -चलते रात हो जाने से एक मछली वाली ने एक मालिन के घर का आश्रय लिया l मालिन ने उसे पुष्प गृह के बरामदे में ठहराया और यथायोग्य उसकी सेवा की परन्तु मछली वाली को रात में किसी तरह नींद ही नहीं आ रही थी l अंत में वह समझ गई कि पुष्प गृह में रखे हुए नाना प्रकार के खिले हुए फूलों की महक के कारण ही उसे नींद नहीं आ रही है l तब उसने मछलियों की टोकरी में जल छिड़ककर अपने सिराहने रख लिया और फिर सुख से सो गई l अज्ञानी और दूषित संस्कारों में जकड़ा हुआ व्यक्ति इस मछली वाली की भांति है , इस दुर्गन्ध को छोड़कर उसे कुछ अच्छा नहीं लगता l l
12 February 2024
11 February 2024
WISDOM -----
देवता और असुर शुरू से ही इस संसार में हैं l देखने में तो ये दोनों शरीर से मनुष्य ही हैं , केवल उनके गुण -अवगुण के आधार पर उन्हें देव या असुर कहा जा सकता l जो असुर हैं , उनमें गुणों की कोई कमी नहीं होती l बहुत ज्ञानी , तपस्वी ------ अनेक गुणों से संपन्न होते हैं , केवल एक विशेष दुर्गुण ' अहंकार ' उनके सब गुणों पर पानी फेर देता है l इस अहंकार के कारण अनेक दुर्गुण उनमे स्वत: ही खिंचे चले आते हैं l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " गुणवान होना बहुत अच्छी बात है l गुणों से ही संसार में कीर्ति मिलती है , यश फैलता है l सफलता और कुशलता दोनों खिंचे चले आते हैं l लेकिन इन गुणों के साथ यदि अहंकार भी हो तो इन सबका दायरा संसार तक ही सिमट जाता है l अहंकारी व्यक्ति अपने समस्त गुणों, विभूतियों के बावजूद दैवी प्रयोजनों के लिए अनुकूल नहीं रह जाता l " अहंकारी स्वयं को श्रेष्ठ समझता है और अपने अहंकार के पोषण के लिए छल , कपट , षड्यंत्र , कुटिलता , कठोरता ----- आदि का सहारा लेता है l रावण कितना विद्वान् था लेकिन अहंकारी था , अपनी महत्वाकांक्षा के अतिरिक्त वह किसी का सगा नहीं था l बालि से उसकी मित्रता केवल छल और छद्म थी , वह वानरों में फूट डालकर उनकी शक्ति को कम करना चाहता था l इस अहंकार के कारण ही उसने ऋषियों पर अत्याचार किए , सीता -हरण किया l दसों दिशाओं में उसका आतंक था , उसका अहंकार उसे ले डूबा l रावण को युगों से हर वर्ष जलाते हैं , लेकिन यह अहंकार समाप्त नहीं हुआ l आज संसार में जितनी अशांति , युद्ध , अपराध आदि अनेक समस्याएं हैं उनके मूल में किसी न किसी का अहंकार ही है l संसार में जितने भी अहंकारी हैं वे यदि अपने अहंकार को त्याग दें तो संसार में कितनी शांति हो l
10 February 2024
WISDOM ------
1 . दिन का अधिकांश समय एक बच्चा एकांत में बिताता l न खाने में कोई तर्क , न बाहर निकलने की इच्छा l कहीं जाता तो शीघ्र ही अपनी राह लौट आता l पिता को चिंता हुई l एक दिन पूछ ही लिया --- " बेटा ! आजकल काम -धंधा कुछ नहीं करते l कुछ कष्ट रहता है क्या ? " बेटे ने विनीत भाव से उत्तर दिया ---- " पिताजी ! आप ही तो कहते हैं , मनुष्य को शांति का जीवन बिताना चाहिए l " पिता ने हँसकर कहा ---- "बेटे ! चुपचाप पड़े रहने का नाम शांति नहीं है l कैसी भी स्थिति हो धैर्य रखकर , अनिवार्य दुःखों को स्वयं वीरता पूर्वक झेलता हुआ भी उद्विग्न न हो उसे शांति कहते हैं l "
2. राजा भोज ने नगरवासियों को एक सार्वजनिक भोज दिया l लाखों लोग भांति -भांति के पकवानों -मिष्टान्न खाकर तृप्त हुए l अपनी उदारता की चर्चा व प्रशंसा सुनकर राजा का सीना गर्व से फूल गया l शाम को एक लकड़हारा सिर पर लकड़ी का गट्ठर लिए उन्हें नगर के द्वार पर मिला , उन्होंने उससे पूछा ---- " क्या तुम्हे पता नहीं था कि राजा भोज ने आज सार्वजनिक भोज दिया है अन्यथा तुम्हे यह श्रम क्यों करना पड़ता ? " लकड़हारा बोला ---- "नहीं , मुझे पूरी तरह पता था , पर जो परिश्रम की कमाई खा सकता है , उसे राजा भोज के सार्वजनिक भोज से क्या लेना -देना ? परिश्रम की रुखी रोटी का आनंद मुफ्त के पकवानों में कहाँ ? " ' श्रम और पसीने से उपार्जित जीविका से जो आत्मगौरव जुड़ा है , उसका आनंद इन व्यंजनों से अधिक है l
9 February 2024
WISDOM -----
भौतिक प्रगति के साथ नैतिकता और चरित्र की श्रेष्ठता की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया , इसलिए यह विकास अधूरा है l मनुष्य अपनी बुद्धि का उपयोग अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए करने लगा है l जैसे पहले तीर्थ यात्रा का बहुत महत्त्व था , लोगों को तीर्थ स्थान जाकर असीम शांति और ऊर्जा मिलती थी l लेकिन अब तीर्थ भी मनोरंजन के स्थान हो गए हैं l लोगों ने पुरानी मान्यता को दूषित कर दिया l यह मान्यता है कि तीर्थ स्नान से सारे पाप धुल जाते हैं , इसका अर्थ यही था कि ऐसे पवित्र स्थल पर जाने से जीवन में नई चेतना का संचार होता है और बुद्धि सन्मार्ग की ओर प्रेरित होती है l दुर्बुद्धि के कारण लोग इस पवित्र भाव को भूल गए , सोच विकृत हो गई कि ' पाप कमाओ और गंगा में स्नान कर के उनसे छुटकारा पा लो , , ऐसी सोच ने अपराध में और वृद्धि कर दी l आचार्य श्री लिखते हैं ----" यदि इस प्रकार गंगा स्नान से पापों से छुटकारा मिल जाता तो सबसे पहले मछलियाँ और मगरमच्छ स्वर्ग पहुँच जाते जो हर समय गंगाजल में ही रहते हैं l " श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान ने कहा है कि निष्काम कर्म से मनुष्य की बुद्धि निर्मल होती है , जाने -अनजाने जो पाप किए हैं वे कटते हैं l ' नि 'स्वार्थ भाव से सेवा के कार्य करने से घर बैठे ही तीर्थ का पुण्य मिल जाता है l
8 February 2024
WISDOM -----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने ' प्रज्ञा पुराण ' में लघु कथाओं और प्रसंग के माध्यम से हमें जीवन जीने की कला सिखाई है l --- संसार में विभिन्न धर्मों के लोग अपने -अपने धर्म के कर्मकांड , उपासना करते हैं l हर धर्म के अलग तरीके हैं l मनुष्य पूजा -उपासना करने में निश्चित रूप से अपना कुछ समय भी देता है l यह सब भी जरुरी है अपने धर्म और संस्कृति को जीवित रखने के लिए l लेकिन मन चंचल है , केन्द्रित नहीं होता , हर समय कुलांचे भरता रहता है l यही कारण है कि संसार में विभिन्न तरीकों से उस परम सत्ता को पूजने और धर्म के नाम पर विभिन्न कार्य करने के बावजूद भी संसार में शांति नहीं है l आचार्य श्री लिखते हैं --- ' केवल माला घुमाते रहना जप नहीं है l भगवान की सच्ची पूजा कर्तव्यपालन और दुःखियों की सेवा है l यदि कोई व्यक्ति बड़े -बड़े व्रत -उपवास रखता है , पूजा -पाठ करता है , किसी इच्छापूर्ति के लिए यज्ञ -अनुष्ठान करता है , लेकिन गरीबों का शोषण करता है , किसी का हक छीनता है , लोगों का दिल दुखाता है तो उससे भगवान कभी प्रसन्न नहीं हो सकते l -------- एक बार रामलीला खेलने के लिए दो गरीब बच्चों को चुना गया l उन्हें राम -लक्ष्मण बना दिया गया l सबने उनकी आरती उतारी l खूब पैसे इकट्ठे हुए l तीन दिन तक इसी प्रकार कार्यक्रम चलता रहा l उन बच्चों ने सोचा था कि उन्हें भी कुछ रूपये -पैसे मिलेंगे l लेकिन अंतिम दिन प्रसाद बंटा , सबने खूब मौज -मस्ती की , ठर्रा पिया किन्तु उन दोनों बच्चों को जिन्हें राम लक्ष्मण बनाया गया था , किसी ने खाने के लिए भी नहीं पूछा और उन बच्चों से कहा --- " अभी पैसे नहीं मिले हैं , बाद में तुम्हे कपड़े देंगे , अभी जाओ l " वे दोनों बेचारे रोते हुए चले गए l यह सोचने का प्रश्न है क्या ऐसे धार्मिक कार्य से ईश्वर प्रसन्न होंगे ? ' एक प्रसंग है ---- एक बार गुरु नानकदेव जी किसी खां साहब से मिलने गए l वे उस समय नमाज पढ़ रहे थे l गुरूजी को हँसी आ गई l नमाज से उठकर खां साहब ने नानकजी से पूछा ---- " आप क्यों हँस रहे थे , मेरी नमाज देखकर l " नानकदेव जी ने कहा ---- " मैं हँस रहा था इसलिए कि तुम नमाज नहीं पढ़ रहे थे , अरब में घोड़े खरीद रहे थे l " यह सुनकर खां साहब शर्मिंदा हुए क्योंकि वे नमाज पढ़ते समय अरब में घोड़े खरीदने की बात सोच रहे थे l इसलिए पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने पूजा -उपासना के साथ नि:स्वार्थ सेवा के कार्यों को करना अनिवार्य बताया है तभी वह पूजा सार्थक है l उनका कहना है --- 'यदि भक्ति में कटौती कर के सेवा में समय लगाना पड़े तो उसे घाटा नहीं समझना चाहिए l '
7 February 2024
WISDOM ------
युग बदलते हैं , इसके साथ मनुष्य की प्रवृत्ति भी बदलती है , सोचने -विचारने का तरीका भी बदलता जाता है l कलियुग को कलियुग क्यों कहते हैं ? यदि हम इस उदाहरण से देखें तो उत्तर मिल जायेगा ------- त्रेतायुग में ---- सीता का अपहरण रावण कर रहा था l सीताजी की करुण पुकार जब जटायु ने सुनी तो वह उनकी रक्षा के लिए निकल पड़ा l कहाँ रावण जैसा शक्तिशाली राजा और कहाँ वृद्ध , शक्तिहीन गिद्ध जटायु ! किन्तु जटायु अपने को रोक नहीं सका और सीताजी की रक्षा के लिए अपने प्राण दे दिए l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --यदि हनुमान नहीं बन सकते तो गिद्ध और गिलहरी बन जाओ l भगवान राम वन चले गए थे इसलिए अपने पिता दशरथ का अंतिम संस्कार अपने हाथ से नहीं कर सके किन्तु जटायु की दाह -क्रिया अपने हाथ से की , जटायु को वह सम्मान और गति मिली जो दशरथ को भी नहीं मिली l वह जटायु आज भी इतिहास में अमर है l द्वापर युग में ---- द्रोपदी का चीर -हरण हो रहा था और सब वृद्ध धर्म और न्याय के ज्ञाता भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य , कृपाचार्य सब सिर झुकाए बैठे रहे l अपनी ही कुलवधू के साथ होने वाले अन्याय के विरुद्ध कोई एक शब्द भी नहीं बोला l हस्तिनापुर के वृद्ध एक गिद्ध की गरिमा को भी नहीं पहुँच सके l अत्याचार , अन्याय तो हर युग में रहा है लेकिन कलियुग में ईर्ष्या , द्वेष , अहंकार , लालच , छल कपट , षड्यंत्र आदि दुष्प्रवृत्तियाँ मनुष्य पर इतनी हावी हो गईं है कि मनुष्य के ह्रदय की करुणा , संवेदना बिलकुल समाप्त हो गई है l अब किसी की रक्षा करना तो बहुत दूर की बात है , वीडियो बनाना , ब्लैकमेल करना , समाज के सामने शरीफ बनकर अपनी काली -करतूतों को छिपाना ---- आदि ऐसे तथ्य हैं जो इस बात को बताते हैं कि इस युग में चरित्र और नैतिकता का स्तर बहुत गिर गया है l समाज को दिशा देने के लिए जिन अनुभवी लोगों की आवश्यकता है , उनकी इच्छाएं , लालसाएं किसी तरह समाप्त ही नहीं होतीं l सच्चाई को अपमानित किया जाता है और अपराधी समाज में सम्मान पाते हैं l एक वाक्य में यदि कहा जाए तो --- धन , बुद्धि , शक्ति का दुरूपयोग होने के कारण ही यह युग कलियुग है l एक ऐसा युग जिसमें सुख -शांति हो , लोगों में तनाव न हों , अस्पताल बीमारों से भरे न हों , छीना -झपटी न हो ------ यह सब तभी संभव होगा जब धन के स्थान पर व्यक्ति की पहचान उसके गुणों से होगी l कामना , वासना , लालच , महत्वाकांक्षा ही व्यक्ति को जीवन में और जीवन के बाद भी भटकाते हैं और युग को कलियुग बनाते हैं l
6 February 2024
WISDOM ------
लघु कथा ----- एक बार एक घुड़सवार एक बस्ती से होकर जा रहा था l मार्ग में एक चोर का घर पड़ा l उसके बरामदे में एक तोता पिंजरे में बंद था , जो उसे देखकर बोला --- " पकड़ो इसे , इसका सारा माल लूट लो l " थोड़ आगे बढ़ने पर उसने देखा एक झोंपड़ी है , वहां भी एक तोता पिंजरे में बंद है l यह तोता उसे देखकर बोला --- " आओ बन्धु !थक गए होंगे , थोड़ा विश्राम कर लो l " घुड़सवार को बड़ा आश्चर्य हुआ और वह वहीँ बैठ गया l कुछ समय बाद उस झोंपड़ी के अन्दर से साधु निकले और उसकी कुशल -क्षेम पूछने लगे l घुड़सवार ने उन्हें सारा वृतांत कह सुनाया और उनसे दोनों तोते के भिन्न व्यवहार का कारण पूछा l साधु ने कहा --- ' यह साधुओं की वाणी सुनता है , इसलिए भला बोल रहा है और वह तोता चोर -डाकुओं की बातें सुनता है , इसलिए वैसा ही बोलता है l सत्य यही है कि अच्छाई और बुराई संगत से ही उपजती हैं l घुड़सवार को समझ में आ गया कि सत्संग से सज्जन बनते हैं और कुसंग से दुर्जन l