विधाता ने इस स्रष्टि में अनेक प्राणियों की रचना की l इन सब में मानव सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि मनुष्य के पास बुद्धि है , उसके पास अपनी चेतना को परिष्कृत करने के पर्याप्त अवसर हैं लेकिन अन्य प्राणियों को यह सुविधा नहीं है l मनुष्य शरीर में हम विभिन्न रिश्तों में बंधे हैं l ये सब रिश्ते हमारे विभिन्न जन्मों में किए गए कर्म हैं जिनका हिसाब हमें चुकाना पड़ता है l यदि हमारे पूर्व के कर्म अच्छे हैं तो उन रिश्तों से हमें सुख मिलेगा l जब विभिन्न सांसारिक रिश्तों को लेकर जीवन में दुःख मिलता है l अपमान , तिरस्कार , धोखा , षड्यंत्र , धन , संपदा और हक़ छीन लेना जैसे दुःख जब इन रिश्तों में मिलते हैं , तब हमें इस कष्टपूर्ण समय का सकारात्मक ढंग से सामना करना चाहिए l इन दुःखों के लिए हम ईश्वर को दोष देते हैं कि हमारे जीवन में ही ऐसा क्यों हुआ ? यदि ईश्वर को दोष देने के बजाय हम इस सत्य को समझें कि यह हमारे पूर्व जन्मों में किए गए विभिन्न कर्मों का हिसाब होगा , जो इस जन्म में हमें इन विभिन्न तरीकों से चुकाना पड़ रहा है तो हमारे मन को शांति मिलेगी l सुख का समय तो बड़ी आसानी से बीत जाता है लेकिन जब दुःख आता है तो सामान्य मनुष्य यही कहता है कि यदि ईश्वर हैं तो वे आकर संसार के कष्ट क्यों नहीं दूर कर देते l यह संसार कर्मफल के आधीन है l ईश्वर सर्वगुण संपन्न और श्रेष्ठता का सम्मुचय हैं , यदि हमारी पीठ पर पाप कर्मों की गठरी लदी है तो ईश्वर कैसे आयेंगे ? ईश्वर को पाने के लिए हमें अपने मन और आत्मा को परिष्कृत करना होगा l यदि हम अपनी चेतना को परिष्कृत करने का संकल्प लेते हैं और उस दिशा में आगे बढ़ने का निरंतर प्रयास करते हैं तो समय -समय पर इस मार्ग पर आने वाली कठिनाइयों से हमारी रक्षा करने के लिए ईश्वर अवश्य आते हैं l ईश्वर की सत्ता को केवल अनुभव किया जा सकता है l
25 March 2025
24 March 2025
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नारद जी ईश्वर के परम भक्त हैं l तीनों लोकों में वे भ्रमण करते हैं l इसी क्रम वे जब वे धरती पर भ्रमण कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि पापी तो बहुत सुख से जीवन व्यतीत कर रहे हैं और जो सज्जन हैं , पुण्यात्मा हैं , वे बड़ा कष्ट पा रहे हैं l उन्होंने भगवान विष्णु जी से कहा कि भगवान ! धरती पर तो अंधेरगर्दी चल रही है , पाप का साम्राज्य बढ़ता ही जा रहा है l ईश्वर भी क्या उत्तर दें ? यह तो कलियुग का प्रभाव है l द्वापर युग का अंत होने वाला था , तभी से कलियुग ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया था l युधिष्ठिर सत्यवादी थे , पांचों पांडव धर्म की राह पर चलते थे , स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उनके साथ थे फिर भी सारा जीवन उन्हें कष्ट उठाना पड़ा , वन में भटकना पड़ा , राजा विराट के यहाँ वेश बदलकर नौकर बनकर रहना पड़ा l दूसरी ओर दुर्योधन अत्याचारी , अन्यायी था l सारा जीवन पांडवों के विरुद्ध षड्यंत्र करता रहा , फिर भी हस्तिनापुर का युवराज था , सारा जीवन राजसुख भोगता रहा l युद्ध भूमि में मारा गया तो मरकर भी स्वर्ग गया l पांडवों ने जीवन भर कष्ट भोगा l महाभारत के महायुद्ध के बाद राज्य भी मिला तो वह लाशों पर राज्य था , असंख्य विधवाओं और अनाथों के आँसू थे l धृतराष्ट्र और गांधारी के पुत्र शोक से दुःखी चेहरे का सामना करना मुश्किल था l पांडवों ने मात्र 36 वर्ष ही राज्य किया फिर वे अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को राजगद्दी सौंपकर हिमालय पर चले गए l यह सब ईश्वर का विधान है , इसका सही उत्तर किसी के पास नहीं है l कलियुग में भी भगवान पापियों और अत्याचारियों का अंत करने , उन्हें सबक सिखाने किसी न किसी रूप में अवश्य आते हैं लेकिन भगवान बहुत देर से आते हैं l एक बार महर्षि अरविन्द ने भी कहा था --भगवान को सबसे अंत में आने की आदत है l जब व्यक्ति का धैर्य चुक जाये , संघर्ष करते -करते हिम्मत टूट जाये , तब भगवान आते हैं l किसी कवि ने बहुत अच्छा लिखा है ---- " बड़ी देर भई , बड़ी देर भई , कब लोगे खबर मोरे राम l चलते -चलते मेरे पग हारे , आई जीवन की शाम l कब लोगे खबर मोरे राम ? " कलियुग में पाप का साम्राज्य बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यही है कि ईश्वर के न्याय का इंतजार करते -करते व्यक्ति का धैर्य समाप्त हो जाता है l ईश्वर मनुष्य के धैर्य की ही परीक्षा लेते हैं l इसलिए हमारे ऋषियों ने , आचार्य ने ईश्वर को पाने के लिए भक्ति मार्ग का सरल रास्ता बताया है l ईश्वर स्वयं अपने भक्तों की रक्षा करते हैं , भक्त के जीवन में कठिनाइयाँ तो बहुत आती हैं लेकिन ईश्वर स्वयं आकर उन्हें उन कठिनाइयों से उबार लेते हैं l सत्य के मार्ग पर कठिनाइयाँ तो बहुत हैं , लेकिन ईश्वर हमारे साथ है , वे हमारी नैया पार लगा देंगे , यह अनुभूति मन को असीम शांति प्रदान करती है , जो अनमोल है l
22 March 2025
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देवता और असुरों में तो आदिकाल से ही संघर्ष चला आ रहा है l देवता विजयी होते हैं लेकिन कलियुग का यह दुर्भाग्य है कि इसमें असुरता पराजित नहीं होती , असुरता बढ़ती ही जाती है l असुरता को पराजित करने के लिए आध्यात्मिक बल की और सत्कर्मों की पूंजी की आवश्यकता होती है l इसी के आधार पर दैवी शक्तियां मदद करती हैं l हिरण्यकश्यप से डरकर सबने उसे भगवान मान लिया लेकिन उसी के पुत्र प्रह्लाद ने उसे भगवान नहीं माना l प्रह्लाद के पास भक्ति का बल था l वर्तमान समय में धन -वैभव के आधार पर मनुष्य की परख है l इसलिए हर व्यक्ति धन कमाने और धन के बल पर समाज में अपनी साख बनाने का हर संभव प्रयास करता है l मात्र धन कमाना है , उसमें नैतिकता मायने नहीं रखती इसलिए धन कमाने और विलासिता से उसका उपभोग करने के कारण व्यक्ति से अपने जीवन में अनेक गलतियाँ हो जाती हैं , जिन्हें वह समाज से छुपाना चाहता है l यही वजह है कि व्यक्ति में यह कहने का कि " गलत का समर्थन नहीं करूँगा " का साहस नहीं होता l अपराधी और शक्तिशाली के समर्थन में अनेकों खड़े हो जाते हैं l जब स्वयं में कमियां हों तो उसका विरोध कौन करे l इसलिए असुरता दिन दूनी रात चौगुनी ' गति से बढ़ती जाती है l आसुरी कर्म करते रहने से व्यक्ति की आत्मा मर जाती है , उनका मन रूपी दर्पण इतना मैला हो जाता है कि उन्हें उसे देखने की जरुरत ही नहीं होती l उन्हें समय -समय पर प्रकृति की मार भी पड़ती है लेकिन ऐसे लोगों को पाप कर्म करने की लत पड़ जाती है , उन्हें इसी में आनंद आता है l इसी का नाम संसार है l
21 March 2025
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20 March 2025
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इस संसार में अँधेरे और उजाले का निरंतर संघर्ष है l अंधकार की शक्तियां निरंतर सामूहिक रूप से उजाले को रोकने का भरसक प्रयास करती हैं l ये प्रयास हर युग में हुए हैं , बस ! उनका तरीका अलग -अलग है l रावण अपने राक्षसों को आदेश देता था कि जाओ , कहीं भी यज्ञ , हवन आदि पुण्य कार्य हो रहे हों तो उन्हें नष्ट करो , उनमें विध्न , बाधाएं उपस्थित करो , ऋषि -मुनियों को मार डालो , कोई संकोच नहीं l हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान कहता था , जो उसे न पूजे , उसे फिर अपनी जिन्दगी जीने का कोई हक नहीं l महाभारत काल में अत्याचार , अन्याय और षड्यंत्रों की विस्तृत श्रंखला के रूप में अंधकार की शक्तियां प्रबल रहीं l महारानी द्रोपदी को अपमानजनक शब्दों का सामना करना पड़ा l कलियुग आते -आते लोगों की मानसिकता विकृत होने लगी l वीरता का स्थान कायरता ने ले लिया l जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं , उनमें निहित दुर्गुण इतने प्रबल हो गए कि उन दुर्गुणों के भार ने असुरों के मनोबल को बिलकुल समाप्त कर दिया , उन्हें कायर बना दिया इसलिए अब ऐसे असुर उजाले को मिटाने के लिए अनेक कायराना तरीके अपनाते हैं l चाहे भगवान बुद्ध हों , स्वामी विवेकानंद हों या अध्यात्म पथ को कोई भी पथिक हो , उसके चरित्र पर प्रहार करते हैं ताकि उसका मनोबल टूट जाए , वह अपने पथ से भटक जाए l उनके जीवन में आँधी -तूफ़ान लाने का भरपूर प्रयास करते हैं लेकिन अंत में जीत सत्य की होती है l ऐसे कायर असुरों के प्रहार से अपने आत्म बल को मजबूत बनाए रखने का एक ही तरीका है कि ईश्वर के विधान पर अटूट आस्था और विश्वास हो , वार चाहे कितना ही गहरा हो अपने मन को न गिरने दें l दुनिया क्या कहती है , इस पर ध्यान न दें l उस परम सत्ता की निगाह में श्रेष्ठ बनने का प्रयास करें l
19 March 2025
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आतंकवाद एक दूषित मानसिकता है l आतंकवादी केवल वे नहीं हैं जो दूसरे देशों से आकर मासूम , निर्दोष और निरीह लोगों को मारकर अपनी कायरता का प्रमाण देते हैं l आतंकवादी एक राक्षस के समान होते हैं , इनके ह्रदय में संवेदना नहीं होती l इनका दिल पत्थर की तरह होता है जिसमें क्रूरता होती है l ये निर्दयी और क्रूर होते हैं मानवता इनमें नहीं होती l ऐसे दुर्गुणों से युक्त व्यक्ति परिवार , समाज राष्ट्र और संसार में हैं जो अक्सर मुखौटा लगाकर , कभी प्रत्यक्ष रूप से , कभी तंत्र आदि नकारात्मक शक्तियों की मदद से और कभी षड्यंत्र रचकर , धोखा देकर अपनी निर्दयता और क्रूरता का परिचय देते हैं l ऐसे आतंकवादियों से स्वयं की सुरक्षा बड़ा कठिन है l कहीं तो जन्म से ही आतंकी बनने की ट्रेंनिंग दी जाती है लेकिन अनेक ऐसे उदाहरण हैं जहाँ व्यक्ति के पूर्व जन्मों के संस्कार के जाग्रत हो जाने के कारण उसमें निर्दयता , क्रूरता , अहंकार जैसे दुर्गुण आ जाते हैं और इन्हीं के पोषण के लिए वो जघन्य कार्य करता है l त्रेतायुग और द्वापरयुग में जब पाप का प्रतिशत इतना अधिक नहीं था तब अत्याचार , अन्याय अधिकांशत: प्रत्यक्ष था लेकिन कलियुग में कायरता बढ़ जाने के कारण पीठ में छुरा भौंकने के उदाहरण बहुत अधिक हैं l आतंकवादी मानसिकता का महाभारत का प्रसंग है ----- गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा बहुत वीर था l उसे भी शस्त्र -शास्त्र का अच्छा ज्ञान था लेकिन बुद्धि भ्रष्ट हो गई , उसने शिविर में रात्रि में प्रवेश कर सोए हुए द्रोपदी के पांच पुत्रों को मार डाला l इससे भी उसको शांति न मिली तो अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भस्थ पुत्र को मारने के लिए किया l इस अमानवीय कृत्य से सभी चीत्कार उठे l द्रोपदी ने भीम से कहा कि तुम्हारा इतना बल किस काम का , जो निर्दयी अश्वत्थामा को दण्डित न कर सके l जब भीम अश्वत्थामा के पास जाने लगे तो भगवान श्रीकृष्ण ने भीम को रोका और कहा कि इस समय अश्वत्थामा राक्षस बन चुका है , अपनी सभी मर्यादा और नीतियों को भूलकर दानव बन गया है l उसकी मन:स्थिति में दया नहीं , क्रूरता है , वह भीम को भी मार सकता है l ---यही मानसिकता आतंकवादियों की होती है l निर्दयता , क्रूरता , चालाकी जैसे दुर्गुणों से युक्त व्यक्ति अब समाज में ही घुल-मिलकर रहते हैं l इनका सच तो वही समझ पाता है जिसका उनसे पाला पड़ता है l
14 March 2025
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जीवन में आने वाली कठिनाइयों को चुनौती मानकर सकारात्मक तरीके से उनका मुकाबला किया जाए तो जीवन में सफलता अवश्य मिलती है l हमारे महाकाव्य हमें इस बात की शिक्षा देते हैं कि अंधकार कितना ही घना क्यों न हो , सूर्योदय अवश्य होता है l इसी विश्वास को अपने ह्रदय में रखकर निरंतर अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने का प्रयत्न किया जाए तो सफलता अवश्य मिलती है l महाभारत में पांडवों की माता कुंती का चरित्र अनूठा है l उनकी महानता की कहीं कोई तुलना नहीं है l धृतराष्ट्र के भाई पांडु से उनका विवाह हुआ था l महाराज पांडु को शिकार का शौक था , एक दिन उन्होंने जंगल में अपने तीर से हिरन को मारा , वह एक ऋषि थे जो हिरन के वेश में थे और उस समय अपनी पत्नी के साथ थे l मरते हुए ऋषि ने पांडु को श्राप दिया कि ----अपनी पत्नी के साथ जब तुम इसी तरह प्रेम में होगे तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी l ' इस श्राप के कारण महाराज पांडु अपनी दोनों पत्नियों कुंती और माद्री के साथ ब्रह्मचारी का जीवन व्यतीत करने लगे l महारानी कुंती ने अपने जीवन में सादगी को अपना लिया , उन्होंने अपना व्यवहार संतुलित रखा ताकि महाराज के जीवन पर कोई आंच न आए l होनी को कौन टाल सकता है l एक दिन जब वह अपनी दूसरी पत्नी माद्री के साथ एकांत के पल में थे तब ऋषि के श्राप का असर हुआ और उनकी तत्काल मृत्यु हो गई l माद्री ने स्वयं को उनकी मृत्यु का कारण मानकर उसी समय अपने प्राण त्याग दिए l युवावस्था में ही पति की मृत्यु हो जाने से पांचों पुत्रों के पालन -पोषण की जिम्मेदारी कुंती पर आ गई l पिता का साया सिर पर से हटते ही दुर्योधन आदि कौरवों के अत्याचार और षड्यंत्र शुरू हो गए l कुंती ने कभी हिम्मत नहीं हारी , अनेक कष्टों को सहते हुए उन्होंने अपने बच्चों की सही परवरिश की l यह कुंती का ही त्याग और बलिदान था जिसने पांचों पांडवों को शस्त्र और शास्त्र में निपुण , धर्म , सत्य और नीति की राह पर चलने वाला बना दिया l दूसरी ओर धृतराष्ट्र की पत्नी पतिव्रता थीं , लेकिन उन्होंने अपनी आँख पर पट्टी बाँध ली ताकि अपने पति की तरह वे भी दुनिया को न देख सकें l इसका परिणाम यह हुआ कि वे अपने बच्चों की गतिविधियों पर भी नजर नहीं रख सकीं और सब साधन होते हुए भी उनके जीवन को सही दिशा न दे सकीं परिणाम स्वरुप कौरव अधर्म और अन्याय की राह पर चलने लगे और कौरव वंश का सर्वनाश हुआ l