8 November 2025

WISDOM ------

 ऋषियों का  वचन  है  --- 'सत्य  बोलो , प्रिय  बोलो  l  लेकिन  ऐसा  सत्य  कभी  न  बोलो  जिससे  किसी का  अहित  होता  है  l  क्योंकि  जिस  सत्य  को  बोलने  से   दूसरों  का  अहित होता  है ,  उस सत्य  का  पुण्य  फल  प्राप्त  नहीं  होता   l  एक  कथा  है  ----प्राचीन  काल  में  एक  सत्यनिष्ठ  ब्राह्मण  रहा  करते  थे  l  एक बार  वे  नदी  के  किनारे  बैठकर  तपस्या  कर  रहे  थे  l  उसी  समय  कुछ  व्यक्ति  भागते  हुए  आए  उन्होंने  उस  ब्राह्मण  से  कहा   कि  डाकू   हमें  लूटने  के  लिए  हमारा पीछा  कर रहे  हैं  ,  हम  यहाँ  झाड़ियों  के  पीछे  छुप  रहे  हैं  l  यदि  कोई  हमारे  बारे  में  पूछे  तो  बताना  नहीं  l  कुछ  समय  बाद   डाकू  वहां  आए  और  ब्राह्मण  से उन  व्यक्तियों   के  विषय  में  पूछा  l  अपने  सत्य  बोलने  की  प्रतिज्ञा   को  ध्यान  में  रखते  हुए   ब्राह्मण  ने  डाकुओं  को   उन  व्यक्तियों  की  ओर  भेज  दिया  l  डाकुओं  ने  उन  व्यक्तियों  को  लूटकर  उनकी    वहीं  हत्या  कर  दी   l   कुछ  समय  बाद  ब्राह्मण  की  भी  मृत्यु  हो  गई   और  वे  यमलोक  पहुंचे   l   यमराज  ने  उन्हें  देखकर  कहा ------ " महाराज  आपने  एक  धर्मपरायण  व्यक्ति  का जीवन  जिया  l  आपके  पूरे  जीवन का  पुण्य  तो  बहुत  है  ,  लेकिन   एक   अप्रिय   सत्य  बोलने  के  कारण  आप     पाप  के  भागीदार  बने  l  इस  कारण  आपको  नरक  में  निर्धारित   समय  व्यतीत  करना  होगा  l                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              

4 November 2025

WISDOM -------

 संत  एकनाथ  जिस  रास्ते  स्नान  को  जाया  करते  थे  , एक  उद्दंड  व्यक्ति  का  घर  उधर  ही  था  l  वह  छत  पर  खड़ा  ताकता  रहता  , जैसे  ही  संत  एकनाथ  उधर  से  गुजरते  , वह  व्यक्ति  ऊपर  से  कूड़ा  पटककर  उन्हें  गन्दा  कर  देता  l  उन्हें  दुबारा  नहाने  के  लिए  विवश  करने  में   उसे  बहुत  मजा  आता  था  l  बहुत  दिन  ऐसे  ही  बीत  गए  l  संत  बहुत  सहनशील  थे  ,  उन्होंने  कभी  क्रोध  नहीं  किया  l  इसके  बाद  अचानक  परिवर्तन  आया  , कूड़ा  गिरना  बंद  हो  गया  l  संत को  चिंता  हुई  l  उन्होंने  इधर -उधर  पूछताछ  की   तो  मालूम  हुआ  कि  वह  व्यक्ति  बीमार  पड़ा  है  l  संत  ने  कहा  ---- 'मित्र  !  तुम  मेरा  रोज  ध्यान  रखते  थे  l  तुम्हारे  प्रयास  से  मुझे   दिन  में कई  बार  नहाने  का  मौका  मिला  l  अब  मेरी  बारी  है  कि  इस  कठिन  समय  में  मैं  तुम्हारा  ध्यान  रखूं  l  '  जब  तक  वह  व्यक्ति  बीमार  रहा  ,  संत   उसकी  सहायता  करते  और  आवश्यक  साधन  जुटाते  l  जब  वह  व्यक्ति  बीमारी  से  उठा   तो  उसका  स्वभाव बिलकुल  बदल  गया  l  

1 November 2025

WISDOM -------

 

  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  -----' ईर्ष्या  एक  प्रकार  की  मनोविकृति  है  l  इससे  भौतिक  क्षेत्र  में  विफलता   और  आध्यात्मिक  क्षेत्र  में  अवगति  प्राप्त  होती  है  l  जो  इस  मानसिक  बीमारी  से  ग्रस्त  हो  गया  , समझा  जाना  चाहिए  कि   उसने   अपनी  प्रगति  के  सारे  द्वार  बंद  कर  लिए  l  "    जिसके  पास  सभी  भौतिक  सुख -सुविधाएँ  है  ,  वह  भी  अपने  जीवन  से  संतुष्ट  नहीं  है  l  उसे  दूसरे  को  सुखी  देखकर  ईर्ष्या  होती  है   l  जो  बहुत  ईर्ष्यालु  हैं  , उनकी  बुद्धि  काम  करना  बंद  कर  देती  है   l  उन्हें  अपनी  आगे  की  तरक्की  का  कोई  रास्ता  नहीं  दीखता   इसलिए  वे  अपनी  सारी  ऊर्जा  दूसरों  की  जिंदगी  में  झाँकने  में  लगा  देते  हैं   l  कोई  खुश  है  तो  क्यों  खुश  है  ?  कोई  हँस  रहा  है  तो  क्यों  ?   वे   हर  संभव  तरीके  से  दूसरे  को  कष्ट  देने  का  हर  संभव  प्रयास करते  हैं  l  ऐसा  करने  से  ही  उनको  सुकून  मिलता  है  l  ईर्ष्या  का  एक  दुःखद   पहलू  भी  है  l  व्यक्ति  जिससे  ईर्ष्या  करता  है  ,  उसे  नीचा  गिराने  के  हर  संभव  प्रयास  भी  करता  है   लेकिन  उसका  प्रतिद्वंदी  उस  पर  कोई  ध्यान  ही  न  दे   और  अपनी  प्रगति  के  पथ  पर  आगे  बढ़ता  जाए   तो   ईर्ष्यालु  व्यक्ति  का  अहंकार  चोटिल  होता  है  ,  घाव  की  भांति  रिसने  लगता  है  l   उसके  सारे  प्रयास  असफल  हो  गए  l  आचार्य जी  ने  हमें  जीवन  जीने  की  कला  सिखाई  है  कि  संसार  से  मिलने  वाले  मान -अपमान , प्रशंसा -निंदा  की  परवाह   न  करो  , उस  पर  कोई  प्रतिक्रिया  न  दो  ,  अपने  पथ  पर  आगे  बढ़ो  l 

29 October 2025

WISDOM ------

  इस  संसार  में  तंत्र -मन्त्र , ब्लैक मैजिक , भूत =प्रेत , पिशाच आदि  को  सिद्ध  कर  उनका  अपने  स्वार्थ  के  लिए  इस्तेमाल  करना , मनुष्य  आदि  प्राणियों  की  ऊर्जा  का  नकारात्मक  प्रयोग   अर्थात  एक  शब्द  में  कहें  तो  मायावी  विद्याओं  का  प्रयोग   अति  प्राचीन  काल  से  हो  रहा  है  l  रावण  मायावी  विद्याओं    का  जानकार  था , वेश  बदल   लेता  था  l  महाभारत  में  घटोत्कच   ने  अपनी  मायावी  विद्या  से  कौरव  सेना  में  हाहाकार  मचा  दिया  , तब  कर्ण  को  देवराज  इंद्र  द्वारा  प्रदत्त  शक्ति  से  उसका  वध  करना  पड़ा  l  घटोत्कच  भीम  का  पुत्र  था   और  रावण  के  बराबर  ज्ञानी  तो  इस  संसार  में  दूसरा  नहीं  है  लेकिन    तंत्र  आदि  नकारात्मक  शक्तियों  के  प्रयोग  से  प्रकृति  को  कष्ट  होता  है ,  प्रकृति  का   कुपोषण  होता  है   इसलिए ईश्वर  इनका  अंत  कर  देते  हैं  l  इस  विद्या  का  सकारात्मक  प्रयोग  भी संभव  है   लेकिन  इस  कलियुग  में  कायरता  बढ़  जाने  के कारण  अब  लोग  अपने  स्वार्थ  और  महत्वाकांक्षा  की  पूर्ति  के  लिए   और  ईर्ष्यावश  दूसरों  को  कष्ट  पहुँचाने  के  लिए   ऐसी  नकारात्मक  शक्तियों  का  प्रयोग  बड़े  पैमाने  पर  करते  हैं  l  ऐसे  कार्यों  का  कोई  सबूत  नहीं  होता  ,  इसलिए  कानून  भी  इसे   मान्यता  नहीं  देता  l  इसका  सबसे  बड़ा  फायदा  यह  होता  है  कि   बड़े -बड़े  , समर्थ  लोगों  की  कायरता  पर  परदा  पड़ा  रहता  है  लेकिन ईश्वर से  बड़ा  कोई  नहीं  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ----- "  तंत्र  चाहे  कितना  ही  बड़ा  क्यों  न  हो  ,  वह  भक्ति  और  भक्त  से  सदैव  कमजोर  होता  है  l  भक्त की  रक्षा  स्वयं  भगवान  करते  हैं   और  तंत्र  भगवान  से  श्रेष्ठ  कभी  नहीं  हो  सकता  l  आचार्य श्री  कहते  हैं  ----' तांत्रिक  अपनी  ही  विद्या  के  अपराधी  होते  हैं  ,  यही  वजह  है  कि  अधिकतर  तांत्रिकों  का  अंत  बड़ा  भयानक  होता  है  l  "    तांत्रिकों  को  अपनी  विद्या  का  बड़ा  अहंकार  होता  है  ,   वे  किसी भक्त  पर  इसका  प्रयोग  कर  ईश्वर  से  भी  प्रत्यक्ष  लड़ाई  मोल  ले  लेते हैं  l  इस  संबंध  में  आचार्य श्री  का  कहना  है  कि   तंत्र  का  प्रयोग  भक्त  पर  लगता  तो  है  , परन्तु  वह  विधान  के  अनुरूप  ही  l  "   इसे  हम  सरल  शब्दों  में  ऐसे  भी  कह  सकते  हैं  कि  तंत्र  मन्त्र  आदि  नकारात्मक  शक्तियों  के  भी  देवी  -देवता  होते  हैं  ,  जिन्होंने  बड़ी  तपस्या  कर  उन्हें  सिद्ध  किया  है  ,  उन्हें  उस  तांत्रिक  का  भी  मान  रखना  पड़ता  है  , इसलिए  भक्त  को  विधान  के  अनुरूप थोडा -बहुत  कष्ट  हो  ही  जाता  है  l  लेकिन  ईश्वर  उन्हें  कभी  क्षमा  नहीं  करते  , जन्म -जन्मांतर  तक  उन्हें  इसका  परिणाम  भोगना  पड़ता  है  l  इस  संदर्भ  में  एक  घटना  है  ------जगद्गुरु  शंकराचार्य  पर  एक  कापालिक  ने  भीषण  तंत्र  का  प्रयोग  किया  l  इसके  प्रभाव  से   उनको  भगंदर  हो  गया   और अंत  में  उन्हें  अपनी  देह  को  त्यागना  पड़ा  l  कापालिक  के  इस  पापकर्म  से  उसकी  आराध्या  एवं  इष्ट  भगवती  उससे  अति  क्रुद्ध  हुईं   और  कहा  कि  तूने  शिव  के  अंशावतार   मेरे  ही  पुत्र  पर   अत्याचार  किया  है  l  इसके  प्रायश्चित  के  लिए  तुझे   अपनी  भैरवी  की  बलि  देनी  पड़ेगी  l '  कापालिक  अपनी  भैरवी  से  अति  प्रेम  करता  था  ,  परन्तु  उसे  उसको  मारना  पड़ा  l   उसको  मारने  के  बाद  वह  विक्षिप्त  हो  गया   और  अपना  ही  गला  काट  दिया  l  इस  प्रकार  उस  तांत्रिक  का  अंत  बड़ा  भयानक  हुआ  l     प्रकृति  में  क्षमा  का  प्रावधान  नहीं  है   l  ईश्वर  ऐसे  पापियों  को  भी  अनेकों  बार  संकेत  भी  देते   हैं  कि  इस  पाप  के  रास्ते  को  छोड़  दो  , सन्मार्ग  पर  चलो  l  परन्तु  अपने  अहंकार  के  आगे  वे  विवश  होते  हैं  ,  जिसने   उनका  जितना  भी  साथ  दिया  है   उसे ईश्वर  के  तराजू  में  तोलकर  उतना  परिणाम  भुगतना  ही  पड़ता  है  l  

25 October 2025

WISDOM ------

  समर्थ  रामदासजी  सतारा  जा  रहे  थे  l  मार्ग  में  उनका  शिष्य  भोजन  लेने  पास  के  गाँव  में  गया  l  गाँव  से  भोजन   लाने   में  देर  हो  सकती  थी  इसलिए  वह  खेत  से  चार  भुट्टे  तोड़  लाया   और  उनको   भूनकर   स्वामीजी  को  दे  दिया  l   धुंआ  उठता  देख  खेत  का  मालिक  भागा -भागा  आया   और  समर्थ  स्वामी  के  हाथ  में  भुट्टे  देखकर  उन्हें  डंडे  से  मारने  लगा  l  शिष्य  कुछ  बोलता  तो उसे   चुपकर     स्वामी रामदासजी  ने  मार  खा  ली  l   दूसरे  दिन  वे  सतारा  पहुंचे  ,  उनकी  पीठ  पर  डंडे  के  निशान  थे  l   छत्रपति  शिवाजी  महाराज  तक   विवरण  पहुंचा  ,  उन्होंने  सेनानायक  से  पता  लगवा  लिया  कि  कहाँ  की  घटना  है   और  किसके  द्वारा  यह  अपराध  हुआ  है  l  शिवाजी  महाराज   स्वामीजी  को  प्रणाम  करने  आए   तो  खेत  का  मालिक  भी   वहां  लाया  गया  l  छत्रपति  शिवाजी  महाराज  ने  पूरे  राज्य  की  ओर  से  क्षमा  क्षमा  मांगते  हुए  पूछा  --- "  गुरुवर  !  क्या  दंड  दूँ  ? '  वह  किसान  समर्थ  के  चरणों  में  गिर  गया  l  समर्थ  रामदासजी  बोले  ----"  इसने  हमारे  धैर्य  और  सहन शक्ति  की  परीक्षा  ली   है  l  इसने  अपना  कर्तव्य  निभाया  है  l  इसे  दंड  न  देकर  चार  भुट्टे  की  हरजाना   नगद  राशि  के  रूप  में  दिया  जाए   तथा  एक  कीमती  वस्त्र  देकर  सम्मानित  करना  चाहिए  l  "   न्याय  का  यह  विलक्षण  रूप  देखकर   छत्रपति   गुरु  के  चरणों  में  गिर  गए  ,  धन्य  हैं  गुरुवर  आप  l  

14 October 2025

WISDOM ------

   यदि  मनुष्य  की  चेतना  परिष्कृत  नहीं  हुई   तो  इस  वैज्ञानिक  प्रगति  का  कोई  अर्थ  नहीं  है  l  ऐसी  प्रगति  केवल  तबाही  ही  ला  सकती  है  l  मनुष्य  अभी  भी  जाति , धर्म , ऊँच -नीच  की  बेड़ियों  में  उलझा  है  l  इस  भेदभाव  ने  लोगों  के  मन  में  इतना  जहर  भर  दिया  है  कि  वे  अपने  जीवन  का  उदेश्य  ही  भूल  गए  हैं  l  उन्हें  यह  सब  सोचने  की  फुर्सत  ही  नहीं  है  कि  वे  इस  धरती  पर  क्यों  आए  हैं  l  मन  में  यदि  जहर  भरा  है  तो  वह  जीवन  के  प्रत्येक  क्षेत्र   के  लिए  घातक  है  l  मनुष्य  यदि  सच्चे  अर्थों  में  ईश्वर  को  माने   और  ईश्वर  ने  धरती  पर  जन्म  लेकर  अपने  आचरण  से  मनुष्यों  को  जो  शिक्षा  दी  ,   वैसा  ही  मनुष्य  आचरण  करे   तभी  संसार  में  सुख -शांति  आ  सकती  है  l    भगवान  श्रीराम  ने  शबरी  के  झूठे  बेर  खाए   l  वनवास  में  उनके  सर्वप्रथम  सहायक  निषादराजगुह  थे  l  उनकी   गणना    नीची  जाति  के  शूद्रों  में  की  जाती  थी   लेकिन  भगवान  श्रीराम  ने  उन्हें  अपना  मित्र  बनाया   l   भगवान  श्रीराम  ने  तो  बन्दर , भालू , पशु -पक्षी , गिलहरी  और  सम्पूर्ण  प्रकृति  से  प्रेम  किया  l  प्रत्येक  मनुष्य  खाली  हाथ  आया  है  और  खाली  हाथ  ही  जाना  है  l  फिर  इस  बीच  के  समय  में  इतना  लड़ाई   झगड़े , भेदभाव    से  क्या  हासिल  हुआ   ?  ,  कोई  सिंहासन  मिला  क्या  ?  केवल  अपनी  ऊर्जा  और  अनमोल  जिन्दगी  गँवा  दी  l  लोग  जब  जागरूक  होंगे   तभी  संसार  में  सुख -शांति  होगी  l 

12 October 2025

WISDOM ------

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ----- "  मनुष्य  को  भगवान  ने  बहुत  कुछ  दिया   है  l  बुद्धि  तो  इतनी  दी  है  कि  वह  संसार  के  सम्पूर्ण  प्राणियों  का  शिरोमणि  हो  गया  l   बुद्धि  पाकर  भी  मनुष्य  एक  गलती  सदैव  दोहराता  रहता  है   और  वह  यह  है  कि  उसे  जिस  पथ  पर  चलने  का  अभ्यास  हो  गया  है  ,  वह  उसी  पर  चलते  रहना  चाहता  है  l  रास्ते  न  बदलने  से  जीवन  के  अनेक   पहलू   उपेक्षित  पड़े  रहते  हैं  l  "  आचार्य श्री  कहते हैं  ---- " धनी  धन  का  मोह  छोड़कर   दो  मिनट  त्याग  और  निर्धनता  का  जीवन  बिताने  के  लिए  तैयार  नहीं  ,  नेता  भीड़  पसंद  करता  है    वह  दो  क्षण   भी  एकांत  चिन्तन  के  लिए  नहीं  देता  l  डॉक्टर  व्यवसाय  करता  है   , ऐसा  नहीं  कि  कभी  पैसे  को  माध्यम  न  बनाए  और  सेवा  का  सुख  भी  देखे   l  व्यापारी  बेईमानी  करते  हैं  ,  कोई  ऐसा  प्रयोग  नहीं  करते  कि  देखें  ईमानदारी  से  भी  क्या  मनुष्य    संपन्न  और  सुखी  हो  सकता  है   l  जीवन  में  विपरीत  और  कष्टकर  परिस्थितियों  से  गुजरने  का  अभ्यास  मनुष्य  जीवन  में  बना  रहा  होता   तो  अध्यात्म  और  भौतिकता  में  संतुलन  बना  रहता  l "  -------  जार्ज  बर्नार्डशा   को  अपने  जीवन  में  नव -पथ  पर चलने  की  आदत  थी  l  उनका  जन्म  एक  व्यापारी  के  घर  में  हुआ   लेकिन  उन्होंने  साहित्यिक  जगत  में  उच्च  सम्मान  पाया  l  पाश्चात्य  जीवन  में   भी  उन्होंने   अपने  आपको  शराब , सुंदरी   और  मांसाहार  से  बचाकर  रखा  l  उन्होंने  यह  सिद्ध  कर  दिखाया  कि  मनुष्य  बुरी  से  बुरी   स्थिति  में  भी   अपने  आपको  शुद्ध   और  निष्कलुष  बनाए  रख  सकता  है  ,  शर्त  यह  है  कि  वह  अपने  सिद्धांत  के  प्रति   पूर्ण  निष्ठावान  हो  l