18 June 2013

TO TOUCH TO THE HEART

'संत रज्जब हर क्षण प्रभु की याद में खोये रहते थे | वह मिलने के लिये आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने तमाम अवगुण त्याग कर सादा सरल जीवन बिताने की बात कहते | उनका कहना था कि सच्चा इनसान ,फिर भले ही वह किसी मजहब का हो ,उसे शराब या अन्य किसी नशीले पदार्थ से दूर रहना चाहिये | उनकी बातों का असर इतना जादुई था कि अनेक लोग उन्हें सुनकर सन्मार्ग अपना चुके थे |
     पता नहीं क्यों उन्ही के गाँव में रहते हुए मुहम्मद जुबैर नाम का युवा कुसंग में पड़कर अपराधी बन चुका था | जुआ खेलना ,शराब पीना और शराब पीने के बाद नेक लोगों को परेशान करना ,उसके प्रिय कार्य थे | एक दिन जुबैर ज्यादा पीने के कारण नाली में गिर पड़ा था | तभी उधर से संत रज्जब निकले | उन्होंने उसे उठाया और उसका मुँह धोया ,फिर वहां खड़े लोगों से बोले -"जिस मुँह से ईश्वर का पवित्र नाम लेना चाहिये ,उससे शराब पीकर गालियाँ बकते फिरना गुनाह है |
      जुबैर को जब कुछ देर बाद होश आया तो लोगों ने उसे बताया कि संत रज्जब खुद अपने हाथ से उसका मुँह धोकर गये हैं तथा उन्होंने मुँह से अल्लाह का नाम लेने के बजाय अनाप -शनाप खाने -पीने एवं बोलने को गुनाह बताया है |
     यह सुनकर जुबैर सोच में पड़ गया और उसने कहा -"मेरे जिस मुँह को संत ने अपने हाथों से धोया है उससे अब कभी गुनाह न होंगे | "संत के स्पर्श का यह चमत्कार देखकर लोग चकित थे | 

17 June 2013

ISHVAR

'असंभव का संभव होना ही ईश्वर की उपस्थिति का प्रमाण है | '
गैलीलियो ने स्रष्टि विज्ञान पर एक पुस्तक की रचना की | इस पुस्तक को लेकर वह संत नील्स के पास गये | संत ईश्वर भक्त थे | उन्होंने दो -तीन दिन में पूरी पुस्तक पढ़ डाली ,परन्तु उसमे कहीं भी ईश्वर का उल्लेख नहीं था | स्रष्टि विज्ञान पर स्रष्टा का कोई उल्लेख नहीं ,बात विचित्र थी ,| विज्ञान को शायद ईश्वर की उपेक्षा में ही तुष्टि का अनुभव होता है |
कुछ दिनों बाद गैलीलियो पुन:संत नील्स के पास गये तो उन्होंने कहा" और तो सब ठीक है ,व्यवस्थित है ,तर्कबद्ध है ,परंतु थोड़ी खाली जगह कहीं मालूम पड़ती | इसमें स्रष्टि के स्रष्टा -ईश्वर का कहीं भी उल्लेख नहीं है |यहां तक कि इनकार करने के लिये भी नहीं | अरे !यही कह देते कि ईश्वर नहीं है | तुम्हे ऐसा नहीं लगता कि ईश्वर के बिना ,उसकी स्रष्टि थोड़ी अधूरी मालूम पड़ती है | "
गैलीलियो ने कुछ कहा नहीं ,पर सोच में पड़ गये | संत नील्स कहे जा रहे थे --"ईश्वर की उपेक्षा एवं विस्मरण से ,जीवन में एवं स्रष्टि में जो खालीपन की अनुभूति होती है वहीं पीड़ा का जन्म होता है | जीवन से  एवं स्रष्टि से यदि पीड़ा को हटाना है तो ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करना पड़ेगा |  

16 June 2013

स्वामी विवेकानंद कश्मीर के क्षीर भवानी मंदिर गये | देखा मंदिर टूटा हुआ था | मन ही मन निश्चय किया कि इतना सुंदर मंदिर ,इतना पुराना भव्य शिल्प ,मैं इस मंदिर को बनवाऊंगा | कहा जाता है कि भगवती साक्षात प्रकट हुईं और बोलीं -"मैंने त्रिभुवन का निर्माण किया है ,तू मेरे लिये क्या बनायेगा !भगवान के लिये कुछ बनाना है ,तो घर -घर में ईश्वरीय प्रेरणा फैला | सब घरों को आदर्श ,स्वर्ग जैसा अनुपम बना | "
स्वामी जी माँ का आदेश शिरोधार्य  किया एवं वही कार्य जीवन भर किया | विवेकानन्द ने कहा था -"न मुझे भक्ति की परवाह है न मुक्ति की | मैं ऐसा वासंती जीवन जीना चाहता हूँ जिससे हर ओर प्रसन्नता और खुशहाली का वातावरण बने | 

RITUALS

'फूल को किसी भी नाम से पुकारने पर उसकी सुगंध में अंतर नहीं पड़ता | भगवान को किसी भी नाम से पुकारो इससे फर्क क्या पड़ता है | '
                                        "आप माला के दाने बाहर की ओर फेरते हैं और हम अंदर की ओर | बताइये इन दोनों में से कौन सा तरीका श्रेष्ठ है ?"पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह जी ने सिख साम्राज्य के विदेश मंत्री फकीर अजीजुद्दीन से पूछा | फकीर ने बड़ी बुद्धिमत्तापूर्वक इस प्रश्न का उत्तर इन शब्दों में दिया --
"महाराज !मुसलमान माला के दाने बाहर की ओर फेरकर दोष निकालने का प्रयास करते हैं ,जबकि हिंदु अंदर की ओर फेरकर गुण ग्रहण करने का यत्न करते हैं | "उनके उत्तर से प्रसन्न होकर महाराज ने उनकी प्रशंसा भरे दरबार में की |



15 June 2013

ART IS TRUTH, AND TRUTH IS RELIGION

महात्मा भगवान दीन की सभा में यदि कभी लोग ताली बजा देते तो वे बड़े उदास हो जाते | सोचते कहीं कोई असत्य बात मुँह से निकल गई ?एक बार वे 'सत्य 'पर ही बोल रहे थे | लोगों ने तालियाँ बजाई | वे थोड़ी देर रुके ,चारों ओर देखा पुन:बोलने लगे | थोड़ी देर बाद लोगों ने फिर तालियाँ बजाई | वे फिर रुके और बोले -"मेरे द्वारा सत्य के विषय में कही जा रही बातों से आप सब सहमत होकर ही ताली बजा रहें ?भीड़ एक स्वर में चिल्लाई --हाँ | उन्होंने दूसरा प्रश्न किया -"तब वे लोग हाथ ऊपर उठायें जो सत्य आचरण भी करते हैं | "अब सब लोग एक दूसरे का मुँह देखने लगे | महात्मा बोले -"ताली बजाने से पूर्व यह बात सोचनी चाहिये थी कि सत्य बोलना और सुनना ही पर्याप्त नहीं है ,आचरण में भी उतारा जाना चाहिये | "


AMAZEMENT

युगों पहले यक्ष ने युधिष्ठिर से यह सवाल पूछा था कि -'सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?'धर्म का मर्म जानने वाले युधिष्ठिर ने इस सवाल के उत्तर में यक्ष से कहा था -"हजारों लोगों को रोज मरते हुए देखकर भी अपनी मौत से अनजान बने रहना ,खुद को मौत से मुक्त मान लेना ,जीते रहने की लालसा में अनेको दुष्कर्म करते रहना ही सबसे बड़ा आश्चर्य है | "
अनेकों शव यात्राएँ रोज निकलती हैं ,ढेरों लोग इनमे शामिल भी होते हैं | इसके बावजूद भी वे अपनी शव यात्रा की कल्पना नहीं कर पाते | काश !अपनी मौत के कदमों की आहट सुनी जा सके तो निश्चित ही जीवन द्रष्टि संसार से हटकर सत्य पर केन्द्रित हो सकती है |

          दार्शनिक च्वान्गत्से को रात्रि के समय कब्रिस्तान से होकर गुजरते समय पैर में ठोकर लगी ,टटोल कर देखा तो किसी मुर्दे की खोपड़ी थी | उठाकर उनने उसे झोली में रख लिया और सदा साथ रखने लगे | शिष्य ने उनसे पूछा -यह इतना गंदा और कुरूप है ,इसे आप साथ क्यों रखते हो ?च्वान्गत्से ने उत्तर दिया -"यह मेरे दिमाग का तनाव दूर करने की अच्छी दवा है | जब अहंकार का आवेश चढ़ता है ,लालच सताता है ,तो इस खोपड़ी को गौर से देखता हूँ | कल परसों अपनी भी ऐसी ही दुर्गति होगी तो अहंकार और लालच किसका किया जाये ?"

13 June 2013

MORAL WISDOM

अपने विचारों पर पैनी नजर रखिये क्योंकि वे कुछ ही दिनों में शब्द बनकर मुखर होने लगेंगे |
अपने शब्दों पर और भी तीखी नजर रखिये क्योंकि वे धीरे -धीरे कर्म बन कर प्रकट होते हैं |
अपने कर्मों का परीक्षण करते रहिये क्योंकि वे फिर आदत बन कर ही रहेंगे |
अपनी आदतों को भुलावे में मत डालिये क्योंकि वे चरित्र बने बिना नहीं रह सकतीं |
अपने चरित्र पर द्रष्टि रखें क्योंकि वही आपके भविष्य का जन्म दाता है |