11 March 2018

WISDOM ----- व्यवहार क्षेत्र में वाक-कौशल का ही प्रभाव नहीं होता वरन प्रभाव तो उत्पन्न करती हैं व्यक्ति के ह्रदय में अपने उद्देश्यों के लिए कसक

   डॉ. राधाकृष्णन  पीड़ित  मानवता  के  प्रति  इतने  दुःखित  थे  कि  उस  भावना  ने  उन्हें  सर्वथा  निर्भीक   और  स्पष्टवादी   बना  दिया  था  l  उनका  एकमात्र  उद्देश्य  था  -- संतप्त  मानवता  को  शान्ति  की  शीतलता  प्रदान  करना  l  इस  उद्देश्य  के  लिए  उनके  ह्रदय  में   निरंतर  एक   टीस - सी  उठा  करती  थी  l  इस  टीस  का  ही  प्रभाव  कहना  चाहिए  कि  जब  डॉ. राधाकृष्णन  रूस  के  राजदूत  के   रूप    में  विदा  हो  रहे   थे  तब  लौह  ह्रदय  स्टालिन  की  आँखें   नम  हो  गईं  l 
  डॉ.  राधाकृष्णन  ने  स्टालिन  के  गालों  पर  हाथ  फेरा   और  उनकी  पीठ  को  थपथपाया  l  स्टालिन  ने  कहा --- "  आप  पहले  व्यक्ति  हैं   जिसने  मुझे  मनुष्य  समझ  कर  व्यवहार  किया  l  आप  हम  सब  को  छोड़कर  जा  रहे  हैं  इसका   मुझे   भारी  दुःख    है  l  

10 March 2018

WISDOM ----- क्रोध से बचें

  क्रोध  एक  ऐसा  विष  है  जो  चिंतन  और  व्यक्तित्व  को  विषाक्तता  में  बदल  देता  है  l  क्रोध  का  पहला  प्रहार  विवेक  पर  और  दूसरा  प्रहार  होश  पर  होता  है  l  इसलिए  कठिन  कार्यों , संकट  के  समय   और  अपमान  होने  पर  धैर्य  धारण  करने  की  सलाह  दी  जाती  है   l  यदि  किसी  व्यक्ति  को  गुस्सा  आता  है  तो  तुरंत  अपनी  प्रतिक्रिया  न  दें  , बल्कि  गुस्सा शांत  हो  जाने  के  बाद   अपनी  भावनाएं  व्यक्त  करें   क्योंकि  आवेश  में  दी  गई  प्रतिक्रिया  से  गुस्सा  और  बढ़  सकता  है  l                           

9 March 2018

WISDOM ------ अपने कर्म , विचार और भावनाओं को परिष्कृत कर , शुभ कर्म कर के ही ईश्वरीय अनुदान का अधिकारी बना जा सकता है

  इस  संसार  में  अनगिनत  व्यक्तियों  ने  ईश्वरीय  सूक्ष्म  शक्तियों  की  सहायता  प्राप्त  की  है   जिनमे  सबसे  जीवंत  उदाहरण  महात्मा  गाँधी  का  है  l 
  महात्मा   गाँधी  का  व्यक्तित्व , उनका  उद्देश्य  और  सबसे  प्रमुख   अपने  देश , अपनी  धरती  के  लिए  कुछ  कर  गुजरने  की   चाहत  के  कारण,  उन्हें  कई  ऐसी  सूक्ष्म  शक्तियों  ने  अनुदान  दिए  कि  देखते  ही  देखते   साधारण  दीखने  वाले  मोहनदास  कर्मचंद  गाँधी   असाधरण  चुम्बकत्व  के  स्वामी  हो  गए   और  ' महात्मा  गाँधी  कहलाये  ,  जिनके  इशारे  मात्र  पर   अनगिनत  लोग   इनके  पीछे  चल  दिए   और  कुछ  भी  कर  गुजरने  के  लिए   तैयार  हो  गए  l 
  दैवीय शक्तियों  के  हाथ  मदद  के  लिए  हमेशा  तैयार  रहते  हैं  ,  लेकिन  ये  भी  सुयोग्य  व्यक्तियों   कि  तलाश  में  रहती  हैं   और  इन्हें  कोई  भी  किसी  भी  प्रकार  से  धोखा  नहीं  दे  सकता    l 

8 March 2018

जिन्होंने भारत में एक युग से आंधी - तूफानों से स्त्री - शिक्षा के बुझे हुए दीप को फिर से जलाया ---- स्वाधीनता के मन्त्र - द्रष्टा -- दादाभाई नौरोजी

     दादाभाई  नौरोजी  के  पिता  का  जिस  समय  देहान्त  हुआ  उस  समय  दादाभाई  की  आयु  मात्र  चार  वर्ष  थी  l  उनके  परिवार  की  आर्थिक  स्थिति  भी  अच्छी  नहीं  थी  l  पारसियों  में  विधवा  विवाह  की  व्यवस्था  है ,  लेकिन  उनकी  माता  माणिकबाई  ने  पुनर्विवाह  करना  उचित  न  समझा  और  आजीवन  विधवा  रहकर  , अपने  परिश्रम  के  बल  पर  अपनी  एकमात्र  संतान  दादाभाई  को  पढ़ा - लिखाकर  योग्य  बनाने  में  ही  अपने  जीवन  की  सार्थकता  समझी  l
  दादाभाई  ने  अपनी  माता  का  चरित्र - चित्रण  करते  हुए  लिखा  है --- " मेरी  माता  पचास  वर्ष  तक  मेरी  सहायिका  और  प्रेरणा - केंद्र  बनी  रहीं  l  अपने  आचरण  में आज   मैं  जिस  प्रकाश  के  दर्शन  कर  रहा  हूँ ,  वह  मेरी  ममतामयी  माता  का  ही  फैलाया  हुआ  है  l  यद्दपि  वे  निरक्षर  थीं   लेकिन  उन्होंने  मेरी  शिक्षा - दीक्षा  के  प्रबंध  के  लिए  अथक  परिश्रम  किया  l   उन्होंने  न  केवल  मुझे  प्रेम  ही  किया  , बल्कि  कड़ाई  के  साथ   मुझ  पर  शासन  रखते  हुए   अनुशासन  की  शिक्षा  भी  दी  l 
  स्त्री - शिक्षा  के  लिए  मैं  जो  कुछ  कर  सका  ,  उसमे  उनका  महान  सहयोग  सम्मिलित  रहा  l  समाज  के  अन्धविश्वास  और  विकृतियों  को  दूर  करने  में  वे  सदा  ही  मेरी  सहायिका  बनी  रहीं  l "
    शताब्दियों  से  पिछड़े  समाज  में  स्त्री - शिक्षा  का  विचार  सर्वथा  नया  था  l  दादाभाई  ने  इस  संबंध  में  अपने  संस्मरण  बताते  हुए  लिखा  है --- "  बहु - बेटियों  को  पढ़ाने  की  बात  सुनकर  लोग  बहुत  क्रुद्ध  होते  ,  कई  बार  मकान  की  सीढ़ियों  से  धक्का  तक  दे  दिया  l  "    लेकिन  उन्होंने  हिम्मत  नहीं  हारी  l  अपने  सहयोगियों  के  साथ  वे  द्वार - द्वार  और  घर - घर  तक  जाते  और  माता - पिताओं  से  प्रार्थना  करते  कि  अपनी  लड़कियों  को  कहीं  भेजने  की  जरुरत  नहीं , अपनी  बैठक , बरामदे अथवा  द्वार  पर  पढ़ाने  की  अनुमति  दें  l  सच्ची  सेवा भावना  में  बड़ी  प्रेरणा  होती  है  ,  धीरे - धीरे  उत्साह  बढ़ा  और  स्त्री  शिक्षा  का  प्रचार  हुआ  l 

7 March 2018

समग्र मानवता की पीड़ा को हरना जिनके जीवन का उद्देश्य था --- बंट्रेंड रसेल

 लार्ड  रसेल  विश्व  को  एक  कुटुम्ब  के  रूप  में  देखना  चाहते  थे  l  मानव - मानव  के  बीच  धर्म , जाति, सम्प्रदाय  और  राष्ट्र  की  जो  ऊँची - ऊँची  दीवारें खड़ी  हैं , उन्हें  तोड़ने  के  लिए  वे  प्रयत्नशील  थे   l  उनका  विश्वास  था  कि  यदि  मनुष्य  सुख - शांति  से  रहना  चाहता  है  तो  उसे  भेद  की  इन  रेखाओं  को  मिटाना  होगा  l  उनके  शांति -प्रयत्नों  का  सब  जगह  स्वागत   किया  गया  और  उन्हें  विभिन्न   पुरस्कारों  से  विभूषित   किया  गया  l 
  चंद्रतल  को  अपने  पैरों  से  रौंदने  वाले  मानव  को   वह  अंत  तक   यही    सन्देश  देते  रहे  कि  भूतल  पर  हाथ  में  हाथ  मिलकर  प्रेम  से   चलने  का  भी   अब  प्रत्येक  व्यक्ति  को  प्रयत्न  करना  ही  चाहिए  l  भेदभाव  की  जो  रेखाएं   जमीन   पर   कहीं  अंकित  दिखाई  नहीं  देतीं ,  उन्हें  वह  व्यक्ति  के  मन  से  भी  मिटाना  चाहते  थे   और  यही  प्रयत्न  वह  अंत  तक  करते  रहे   l 

6 March 2018

WISDOM----- जाग्रत जनता ही प्रजातंत्र को सफल बनती है

 प्रजातंत्र  में  सफल  सरकार  वह  है  जो  भय  और  गरीबी  से  जनता  को  बचा  सके   अन्यथा  लोग  सब्र  खो  बैठेंगे  और  गृहयुद्ध  जैसी  स्थिति   में   तानाशाही  उठ   खड़ी   होती  है  l  प्रजातंत्र  की  सफलता  ऐसी  सशक्त  सरकार  पर  निर्भर  है   जो  जनता  के  हितों  की  रक्षा  कर  सके   l 

5 March 2018

WISDOM ---- मानसिक दासता से आजादी ही सही अर्थों में स्वतंत्रता है l

   राष्ट्रपिता  महात्मा  गाँधी  ने  कहा  था ----- " भारत  की  दासता  राजकीय  नहीं  है   और  न  कभी  थी  l  वह  तो  अपनी  मानसिक  दासता  में   सदियों  से  अपने  को  स्वयं  को  बांधता  चला  आ  रहा  है  l  कुप्रथाओं  में  वह  बुरी  तरह  फँसा  हुआ  है  l  "   इसके  उन्होंने  दो  कारण  बताये ---- पहला  है  छुआछूत  और  दूसरा  है  नारी  अवहेलना  l    ये  दो  इतने  भारी  पातक  हैं  ,  जो  भारतीय  सामाजिक  जीवन  को  खोखला  करते   जा  रहे  हैं  l   इन्हें  हटाये - मिटाए  बिना   स्वाधीनता  विशेष  अर्थ  नहीं  रखती  l 
इस  वैज्ञानिक  युग  में  , इतने  विकास  के  बावजूद  भी   ये  दोनों  समस्याएं   हमारे  समाज  को  खोखला  कर  रही  हैं  l  मनुष्य  अपने  अहंकार  की  पूर्ति  के  लिए   दलितों  पर  और  नारी  पर  अत्याचार  करता  है  l  यह  विषबेल  लोगों  के   संस्कारों  में   समाई  है  l   ये  कुरीतियाँ  मनुष्य  के  स्वभाव  में   जिस  स्थान  पर  जड़  जमाये  बैठी  हैं  ,  वहां  से  इन्हें  हटाना - मिटाना  इतना  आसान  नहीं  है   l
  कुछ  लोगों  के  अहंकार  की  वजह  से  देश  की  जनसँख्या  का  एक  बहुत  बड़ा  भाग   पीड़ित  और  उत्पीड़ित  है   l   ऐसे  अत्याचार  और  अन्याय  को  मिटाना  ही   सच्चा  धर्म  है  l