14 June 2019
12 June 2019
WISDOM ----- वन्दे मातरम्
बंकिम बाबू साहित्य - संसार में विशेष रूप से ' उपन्यासकार ' की हैसियत से प्रसिद्ध हुए l जिस उपन्यास के कारण उनका नाम देशभक्तों में अमर हो गया , वह है -- ' आनंदमठ ' l इस उपन्यास के माध्यम से उन्होंने नवयुवकों के सामने विदेशी राज्य शक्ति के विरुद्ध खड़े होने का एक आदर्श प्रस्तुत किया l इस उपन्यास में एक मठ के संन्यासियों ने देश की रक्षा के लिए शत्रुओं से लड़ाई की और इन साधुओं का मन्त्र था --- ' वंदेमातरम् ' l
इसमें जगह - जगह वार्तालाप के द्वारा समाज - सेवा की प्रेरणा दी गई है l मठ का एक संन्यासी -- भवानंद , महेंद्रसिंह नाम के बड़े जमीदार को देश सेवा के लिए प्रेरणा देते हुए कहता है --- " महेंद्रसिंह , मेरी धारणा थी कि तुम में कुछ वास्तविक मनुष्यत्व होगा , पर अब देखता हूँ सब जैसे हैं वैसे ही तुम भी हो l देखो , सांप जमीन पर छाती के बल रेंगता है , पर उस पर पैर पड़ जाने से वह भी फन उठाकर काटने को दौड़ता है l क्या तुमको किसी तरह धर्म और देश की दुर्दशा दिखाई नहीं देती , घर में लड़की - बहु की इज्जत का ठिकाना नहीं , धर्म गया , जाति गई , मान गया , अब तो प्राण भी जा रहे हैं l "
एक समय था जब अंग्रेज अधिकारी इस पुस्तक से ऐसे डरते थे जैसे बम के गोले से l उस समय आजादी के दीवाने इस पुस्तक को गुप्त रूप से पढ़ते थे l बंकिम बाबू ने स्वयं उसी समय यह भविष्यवाणी कर दी थी कि " एक दिन ' वन्दे मातरम् ' की ध्वनि से सारा भारत गूंज उठेगा l
इसमें जगह - जगह वार्तालाप के द्वारा समाज - सेवा की प्रेरणा दी गई है l मठ का एक संन्यासी -- भवानंद , महेंद्रसिंह नाम के बड़े जमीदार को देश सेवा के लिए प्रेरणा देते हुए कहता है --- " महेंद्रसिंह , मेरी धारणा थी कि तुम में कुछ वास्तविक मनुष्यत्व होगा , पर अब देखता हूँ सब जैसे हैं वैसे ही तुम भी हो l देखो , सांप जमीन पर छाती के बल रेंगता है , पर उस पर पैर पड़ जाने से वह भी फन उठाकर काटने को दौड़ता है l क्या तुमको किसी तरह धर्म और देश की दुर्दशा दिखाई नहीं देती , घर में लड़की - बहु की इज्जत का ठिकाना नहीं , धर्म गया , जाति गई , मान गया , अब तो प्राण भी जा रहे हैं l "
एक समय था जब अंग्रेज अधिकारी इस पुस्तक से ऐसे डरते थे जैसे बम के गोले से l उस समय आजादी के दीवाने इस पुस्तक को गुप्त रूप से पढ़ते थे l बंकिम बाबू ने स्वयं उसी समय यह भविष्यवाणी कर दी थी कि " एक दिन ' वन्दे मातरम् ' की ध्वनि से सारा भारत गूंज उठेगा l
11 June 2019
WISDOM ---- महात्मा गाँधी के सच्चे भक्त
डॉ. मार्टिन लूथर किंग ( 1929 - 1968) ने अपने जीवन के आरम्भ से ही देखा था कि अमेरिका में गोरे लोग नीग्रो - जनों के साथ कैसा अन्यायपूर्ण और अपमानजनक व्यवहार करते हैं l उनको यह विश्वास हो गया था कि जातिगत - अन्याय और आर्थिक - अन्याय दोनों आपस में मिले - जुले चलते हैं l उन्होंने जब महात्मा गाँधी के सत्याग्रह आन्दोलन के विषय में सुना और कितनी पुस्तकें पढ़कर उसका अच्छी तरह अध्ययन किया , तब उन्होंने समझ लिया कि हम शांतिपूर्ण और द्वेष रहित उपायों से भी दुष्ट प्रकृति के लोगों का प्रतिकार कर सकते हैं l सर्वोदय आन्दोलन के एक कार्यकर्ता श्री सतीशकुमार जब शान्ति-प्रचार के सम्बन्ध में अमेरिका गए थे तो वहां श्री किंग से भी मिले l उनसे प्रश्न किया गया कि ' आपके अहिंसात्मक नीग्रो आन्दोलन पर गांधीजी का प्रभाव कहाँ तक है ? ' तो उन्होंने कहा ---- " एक हद तक गांधीजी मेरी प्रेरणा हैं l उनके सत्याग्रह तरीकों को जब मैंने पढ़ा , तब मुझे लगा , मानो मेरे मन की बात को किसी ने भाषा दे दी हो l नीग्रो - स्वातंत्र्य की प्राप्ति के लिए गांधीजी का तरीका एक कारगर हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है l इसका सक्रिय अनुभव मुझे तब हुआ जब मौंटगुमरी में हमने इस हथियार का द्रढ़ता पूर्वक प्रयोग किया और सफलता पाई l "
श्री किंग ने अपनी 1959 की भारत यात्रा का जिक्र करते हुए कहा ---- " उस धरती पर जाना जहाँ गांधीजी ने जीवन बिताया , एक तीर्थ यात्रा के समान ही था l उन लोगों से मिलना और बात करना जिन्होंने गांधीजी के साथ काम किया , मेरे लिए असाधारण आनंद की बात थी l यदि अहिंसात्मक सिद्धांतों के बल पर एक देश राजनीतिक आजादी प्राप्त कर सकता है तो हम नीग्रो सामाजिक आजादी और नागरिक समानता प्राप्त करने के लिए उन्ही सिद्धांतों पर क्यों न चलें ? इस विचार ने मेरे जीवन को ही बदल डाला l इसलिए मैं अपने ऊपर भारत का महान उपकार मानता हूँ l "
श्री किंग को 1964 का ' शान्ति नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तब उन्होंने कहा --- " सभ्यता और हिंसा परस्पर विरोधी विचार हैं ---- अहिंसा निष्क्रियता का नाम नहीं है , वरन वह एक ऐसी प्रबल नैतिक शक्ति , जो सामाजिक कायापलट कर देती है -------- " l
श्री किंग ने अपनी 1959 की भारत यात्रा का जिक्र करते हुए कहा ---- " उस धरती पर जाना जहाँ गांधीजी ने जीवन बिताया , एक तीर्थ यात्रा के समान ही था l उन लोगों से मिलना और बात करना जिन्होंने गांधीजी के साथ काम किया , मेरे लिए असाधारण आनंद की बात थी l यदि अहिंसात्मक सिद्धांतों के बल पर एक देश राजनीतिक आजादी प्राप्त कर सकता है तो हम नीग्रो सामाजिक आजादी और नागरिक समानता प्राप्त करने के लिए उन्ही सिद्धांतों पर क्यों न चलें ? इस विचार ने मेरे जीवन को ही बदल डाला l इसलिए मैं अपने ऊपर भारत का महान उपकार मानता हूँ l "
श्री किंग को 1964 का ' शान्ति नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तब उन्होंने कहा --- " सभ्यता और हिंसा परस्पर विरोधी विचार हैं ---- अहिंसा निष्क्रियता का नाम नहीं है , वरन वह एक ऐसी प्रबल नैतिक शक्ति , जो सामाजिक कायापलट कर देती है -------- " l
8 June 2019
WISDOM ----- आध्यात्मिकता का झूठा अहंकार
वैदिककालीन सच्चे अध्यात्म और प्राचीन सभ्यता का गलत अहंकार
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने वाड्मय ' मरकर भी अमर हो गए जो ' में पृष्ठ 2.123 पर लिखा है की हमारी प्राचीन सभ्यता श्रेष्ठ थी लेकिन मध्य युग में हमारे यहाँ जो विचारधारा फैली वह यही थी कि हम बड़े धर्मात्मा , ज्ञानी , विद्वान् और सभ्य हैं तथा अन्य देशों में प्राय: मलेच्छ , बर्बर , दैत्य आदि निम्न कोटि के मनुष्य भरे पड़े हैं l तभी से हमारे ऊपर विदेशी आक्रमण होने लगे l यूनानी , शक , हूण, पठान आदि जातियों ने भारत को लूटा , आधीन भी बनाया किन्तु हम सदा यही कहते रहे कि -- " वे सब असभ्य , राक्षस , तामसी , पापी हैं और ज्ञानी , ध्यानी , तपस्वी , त्यागी , पुण्यात्मा तो हम ही हैं l " सुप्रसिद्ध पर्यटक अलबरूनी ने भारतवर्ष की तत्कालीन स्थिति का अध्ययन कर लिखा है ---- " हिन्दू लोग समझते हैं कि उनके जैसा दूसरा देश नहीं , उनके राजाओं जैसा दूसरा राजा नहीं , उनके धर्म जैसा दूसरा धर्म नहीं , उनके शास्त्रों जैसा दूसरा शास्त्र नहीं l यदि तुम खुरासान और ईरान के शास्त्रों , विद्वानों के सम्बन्ध में उनसे बात करोगे तो वे तुमको मूर्ख व मिथ्यावादी समझेंगे l वे यदि दूसरों से मिले - जुलें , प्रवास करें तो उनकी यह प्रवृति नहीं रहेगी , क्योंकि उनके पूर्वज संकुचित नहीं थे l "
आचार्य श्री ने आगे लिखा है ----' इतना ही नहीं जब मुसलमानों और उसके बाद अंग्रेजों ने इस देश पर अधिकार जमा लिया हमको अपने आधीन बनाकर हर तरह से प्रताड़ित , अपमानित और लांछित किया , तब भी हमारी मोह निद्रा भंग नहीं हुई l हम अपने को धर्मात्मा और उनको मलेच्छ कहते रहे l पुराने युग की बात छोड़ दीजिए वर्तमान युग में हमने अपनी आँखों से देखा है कि राजाओं और पंडितों से लेकर सामान्य जन तक अंग्रेजों को ' हुजुर - हुजूर ' कहते हुए अपना गला सुखाते रहते थे और उनकी थोड़ी सी कृपा पाकर ही अपने को धन्य समझते थे लेकिन अपने सभा - समाजों में यही कहते थे कि हम ऋषियों और चक्रवर्ती नरेशों के वंशज हैं , वे म्लेच्छ हैं l लेकिन अंत में उन्ही के क़दमों में बैठकर आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने वालों ने देश का उद्धार किया और वेद तथा शास्त्रों के अभिमानी ' पण्डित ' उस समय भी कापुरुष की तरह दूर रहकर व्यर्थ में ही गाल बजाते रहे l '
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने वाड्मय ' मरकर भी अमर हो गए जो ' में पृष्ठ 2.123 पर लिखा है की हमारी प्राचीन सभ्यता श्रेष्ठ थी लेकिन मध्य युग में हमारे यहाँ जो विचारधारा फैली वह यही थी कि हम बड़े धर्मात्मा , ज्ञानी , विद्वान् और सभ्य हैं तथा अन्य देशों में प्राय: मलेच्छ , बर्बर , दैत्य आदि निम्न कोटि के मनुष्य भरे पड़े हैं l तभी से हमारे ऊपर विदेशी आक्रमण होने लगे l यूनानी , शक , हूण, पठान आदि जातियों ने भारत को लूटा , आधीन भी बनाया किन्तु हम सदा यही कहते रहे कि -- " वे सब असभ्य , राक्षस , तामसी , पापी हैं और ज्ञानी , ध्यानी , तपस्वी , त्यागी , पुण्यात्मा तो हम ही हैं l " सुप्रसिद्ध पर्यटक अलबरूनी ने भारतवर्ष की तत्कालीन स्थिति का अध्ययन कर लिखा है ---- " हिन्दू लोग समझते हैं कि उनके जैसा दूसरा देश नहीं , उनके राजाओं जैसा दूसरा राजा नहीं , उनके धर्म जैसा दूसरा धर्म नहीं , उनके शास्त्रों जैसा दूसरा शास्त्र नहीं l यदि तुम खुरासान और ईरान के शास्त्रों , विद्वानों के सम्बन्ध में उनसे बात करोगे तो वे तुमको मूर्ख व मिथ्यावादी समझेंगे l वे यदि दूसरों से मिले - जुलें , प्रवास करें तो उनकी यह प्रवृति नहीं रहेगी , क्योंकि उनके पूर्वज संकुचित नहीं थे l "
आचार्य श्री ने आगे लिखा है ----' इतना ही नहीं जब मुसलमानों और उसके बाद अंग्रेजों ने इस देश पर अधिकार जमा लिया हमको अपने आधीन बनाकर हर तरह से प्रताड़ित , अपमानित और लांछित किया , तब भी हमारी मोह निद्रा भंग नहीं हुई l हम अपने को धर्मात्मा और उनको मलेच्छ कहते रहे l पुराने युग की बात छोड़ दीजिए वर्तमान युग में हमने अपनी आँखों से देखा है कि राजाओं और पंडितों से लेकर सामान्य जन तक अंग्रेजों को ' हुजुर - हुजूर ' कहते हुए अपना गला सुखाते रहते थे और उनकी थोड़ी सी कृपा पाकर ही अपने को धन्य समझते थे लेकिन अपने सभा - समाजों में यही कहते थे कि हम ऋषियों और चक्रवर्ती नरेशों के वंशज हैं , वे म्लेच्छ हैं l लेकिन अंत में उन्ही के क़दमों में बैठकर आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने वालों ने देश का उद्धार किया और वेद तथा शास्त्रों के अभिमानी ' पण्डित ' उस समय भी कापुरुष की तरह दूर रहकर व्यर्थ में ही गाल बजाते रहे l '
WISDOM ----- समाज में हो रहे अत्याचार पर द्रष्टिपात न कर केवल अपने स्वार्थ की और ही देखते रहना अमानवीय प्रवृति है
यह बात सही है कि मनुष्य के जीवन में स्वार्थ का भी एक स्थान है किन्तु उस स्वार्थ को निकृष्टता ही कहा जायेगा जिसका संपादन अथवा जिसकी पूर्ति देश व समाज को क्षति पहुंचाती है l पं श्रीराम शर्मा आचार्य ने वाड्मय ' मरकर भी जो अमर हो गए ' में लिखा है ---- ' दुनिया में हेय और हीन बनकर ही तो काम नहीं चलता l यह तो मनुष्य की अपनी कमजोरी और सोचने का ढंग है कि अन्यायियों के तलवे चाटने से ही काम चलता है l वैसे इतिहास तथा उदाहरण साक्षी है कि संसार में एक से एक बढ़कर स्वाभिमानी तथा सिद्धांत के धनी व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने जीवन दे दिया पर स्वाभिमान नहीं दिया l ' उनका कहना है कि स्वार्थ और कायरता के कारण लोगों की आत्माएं तेजहीन हो गई हैं l
विवेक पर मोह का आवरण आ गया है l निकृष्टता का अनुकरण करना श्रेयस्कर नहीं होता l यदि अनुकरण ही करना हो तो संसार में श्रेष्ठताओं और श्रेष्ठ व्यक्तियों की कमी नहीं है l '
विवेक पर मोह का आवरण आ गया है l निकृष्टता का अनुकरण करना श्रेयस्कर नहीं होता l यदि अनुकरण ही करना हो तो संसार में श्रेष्ठताओं और श्रेष्ठ व्यक्तियों की कमी नहीं है l '
7 June 2019
WISDOM ------ कायरता मनुष्य का बहुत बड़ा कलंक है l इस संसार में समस्त उत्पीड़न का उत्तरदायित्व कायरों पर है --- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
एक बार फारस में गीदड़ों की संख्या बहुत अधिक हो गई और उससे लोगों को तकलीफ होने लगी l बादशाह नौशेरवां बहुत न्यायशील था , उसने प्रधान गुरु को बुलाकर इसका कारण पूछा l गुरु ने कहा ---- " जब किसी देश में अन्याय होने लगता है तब गीदड़ बढ़ जाते हैं l तुम पता लगाओ कि तुम्हारे राज्य में कहीं अन्याय तो नहीं हो रहा है l " नौशेरवां ने उसी समय इसकी जांच करने के लिए सुयोग्य न्यायधीशों की एक कमेटी नियुक्त की l उससे मालूम हुआ कि प्रांतीय व स्थानीय स्तर पर प्रजा पर अत्याचार व अन्याय हो रहा है l
नौशेरवां ने उन सबको दंड देकर सर्वत्र न्याय की स्थापना की l पारसियों के इतिहास में नौशेरवां एक बहुत प्रसिद्ध और न्यायशील बादशाह था l
नौशेरवां ने उन सबको दंड देकर सर्वत्र न्याय की स्थापना की l पारसियों के इतिहास में नौशेरवां एक बहुत प्रसिद्ध और न्यायशील बादशाह था l
6 June 2019
WISDOM ----- 'स्त्री अबला नहीं है , यदि वह अपनी शक्ति को पहचाने तो पुरुष से भी अधिक सबला है l जब कोई स्त्री किसी काम में जी - जान से लग जाती है तो वह पहाड़ को भी हिला देती है --- महात्मा गाँधी
एक समय था जब सम्राट अकबर के दबदबे से बड़े - बड़े राजा उसके आधीन हो गए थे l एकमात्र चित्तौड़ के महाराणा प्रताप को छोड़कर किसी राजा ने अकबर का सामना करने का साहस नहीं किया l पर उस समय भी नारी होते हुए भी रानी दुर्गावती ने दिल्ली सम्राट की विशाल सेना के सामने खड़े होने का साहस किया और उसे दो बार पराजित कर के पीछे खदेड़ दिया l
गौंडवाना नरेश दलपति शाह से उनका विवाह हुआ था l दो वर्ष बाद ही दलपति शाह का देहान्त हो जाने पर रानी दुर्गावती ने राज्य का कार्यभार संभाला l उनके कुशल प्रबंध से गौंडवाना का वैभव बढ़ता जा रहा था और यश दूर - दूर तक फैल रहा था l
एक स्त्री का इतना आगे बढ़ना और अधिकांश पुरुष शासकों के लिए उदाहरण स्वरुप बन जाना अन्य शासकों को खटकने लगा , अनेक ईर्ष्या करने वाले हो गए l सम्राट अकबर ने भी साम्राज्यवाद की लालसा में गौंडवाना पर आक्रमण करने का निश्चय किया l
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने वाड्मय ' मरकर भी जो अमर हो गए ' में लिखा है ---- ' रानी दुर्गावती पर चढ़ाई करने की उसकी कार्यवाही का समर्थन हम किसी भी प्रकार नहीं कर सकते l रानी दुर्गावती से कभी यह आशंका नहीं हो सकती थी कि वह अकबर से शत्रुता कर उसे किसी प्रकार हानि पहुँचाने का प्रयत्न करेगी l फिर स्त्री पर आक्रमण करना एक प्रकार से कायरता की बात समझी जाती है l कोई कारण न होते हुए भी केवल इस भावना से चढ़ दौड़ना कि हमारी शक्ति और साधनों का वह मुकाबला कर ही न सकेगी तो उसे लूटा क्यों न जाये , उच्चता तथा श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं माना जा सकता l इस प्रकार का आचरण मनुष्य को कभी स्थायी रूप से लाभदायक नही हो सकता आचार्यश्री ने आगे लिखा है --- ' यों तो डाकू दल भी अपनी संगठित शक्ति और अस्त्र - शस्त्रों के बल पर लूटमार करते हैं और अपने को बड़ा बहादुर समझते हैं l पर कभी किसी डाकू का अंत अच्छा हुआ हो , यह आज तक नहीं सुना गया l '
गौंडवाना नरेश दलपति शाह से उनका विवाह हुआ था l दो वर्ष बाद ही दलपति शाह का देहान्त हो जाने पर रानी दुर्गावती ने राज्य का कार्यभार संभाला l उनके कुशल प्रबंध से गौंडवाना का वैभव बढ़ता जा रहा था और यश दूर - दूर तक फैल रहा था l
एक स्त्री का इतना आगे बढ़ना और अधिकांश पुरुष शासकों के लिए उदाहरण स्वरुप बन जाना अन्य शासकों को खटकने लगा , अनेक ईर्ष्या करने वाले हो गए l सम्राट अकबर ने भी साम्राज्यवाद की लालसा में गौंडवाना पर आक्रमण करने का निश्चय किया l
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने वाड्मय ' मरकर भी जो अमर हो गए ' में लिखा है ---- ' रानी दुर्गावती पर चढ़ाई करने की उसकी कार्यवाही का समर्थन हम किसी भी प्रकार नहीं कर सकते l रानी दुर्गावती से कभी यह आशंका नहीं हो सकती थी कि वह अकबर से शत्रुता कर उसे किसी प्रकार हानि पहुँचाने का प्रयत्न करेगी l फिर स्त्री पर आक्रमण करना एक प्रकार से कायरता की बात समझी जाती है l कोई कारण न होते हुए भी केवल इस भावना से चढ़ दौड़ना कि हमारी शक्ति और साधनों का वह मुकाबला कर ही न सकेगी तो उसे लूटा क्यों न जाये , उच्चता तथा श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं माना जा सकता l इस प्रकार का आचरण मनुष्य को कभी स्थायी रूप से लाभदायक नही हो सकता आचार्यश्री ने आगे लिखा है --- ' यों तो डाकू दल भी अपनी संगठित शक्ति और अस्त्र - शस्त्रों के बल पर लूटमार करते हैं और अपने को बड़ा बहादुर समझते हैं l पर कभी किसी डाकू का अंत अच्छा हुआ हो , यह आज तक नहीं सुना गया l '
Subscribe to:
Posts (Atom)