9 December 2019

WISDOM ------

 असुरों  ने  अपने  बुद्धि  कौशल  से  देवताओं  को  इक्कीस  बार   पराजित  किया   और  प्रत्येक  बार  इन्द्रासन  पर  प्रतिष्ठित  हुए  ,  किन्तु  हर  बार  वे   दीर्घकाल  तक  देवलोक  के  स्वामी  न  बने  रह  सके   और  अंतत :  स्वर्ग  छोड़ने  को  विवश  हुए  l   देवर्षि  नारद  ने  प्रजापति  ब्रह्मा  से  पूछा --- " तात  !  विजयी  होने  पर  भी  असुर  इन्द्रासन  पर  अपना  अधिकार  क्यों  न  रख  सके   ?  "
  ब्रह्मा जी  ने  उत्तर  दिया --- " पुत्र  !  छल  और  छद्म  से   ऐश्वर्य  तो  प्राप्त  किया  जा  सकता  है  ,  परन्तु  उसका  उपभोग   विवेकवान  एवं   संयमी  पुरुष   ही  कर  पाते   हैं  l   संयम  की  उपेक्षा  करने  वाले    असुर  जीतने  पर  भी   इन्द्रासन  पर   एकाधिकार   कैसे  कर  सकते  थे   l 

8 December 2019

WISDOM -----

 इस  दुनिया  में  अधिकतर  क्लेश - कलह   व  झगड़ों  का  कारण   व्यक्ति  की  वाणी  है   l     कठोर  वचन   उस  पत्थर  की  तरह  कठोर  होते  हैं   जो  अपने  प्रहार  से   उनके  अंतर्मन  में  ऐसे   घाव   अवश्य  छोड़  जाते  हैं   ,  जिन्हे  भर  पाना  संभव  नहीं  होता  l
  द्रोपदी  सहज  परिहास  में  भूल  गई  कि   दुर्योधन  को   '  अंधों  के  अंधे --- '  सम्बोधन  से   अपमान  का  अनुभव  हो  सकता  है  l   दुर्योधन    द्वेष वश    नारी  के  शील  का  महत्व   भूल  गया    ,  अपनी  ही  कुलवधू  को  अपमानित  करने  लगा  l
ऋषियों  का  कहना  है  कि   हम  अपनी  वाणी  पर  संयम  रखें ,  गलती  होने  पर  क्षमा - याचना  करें  l   दुनिया  में  ऐसे  कई  लोग  हैं  जिनका  अपनी  वाणी  पर  बिलकुल  भी   संयम  नहीं  है  l   उनके  मन  में  जो  भी  आता  है  बोल  देते  हैं   l   वाणी  की  अभिव्यक्ति  होने  के  साथ - साथ  व्यवहार  का   ध्यान  रखना  भी  बहुत  जरुरी   होता  है   l   यदि  वाणी  के  कहे  अनुसार   हम  कार्य  नहीं  करते   और  उसके  अनुरूप  उचित  व्यवहार  नहीं  करते    तो  मनुष्य  की  प्रमाणिकता  पर   प्रश्न  चिन्ह  लग  जाता  है   l   इसलिए  हमारे  समाज  में  वचन , प्रतिज्ञा  व  संकल्प  का  बहुत  महत्व   है   l 

6 December 2019

WISDOM ------

    पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  का  कहना  है ---- ' आज  समाज  में  छाई   अनास्था   स्वयं  को  नास्तिक  कहने  वालों  की  वजह  से  नहीं  है   अपितु  उन  आस्तिकों  की  वजह  से  है   जो   बाहर  वैसा  ही  आडम्बर  रचते  हैं  ,  पर  उनके  जीवन  में   वह  कहीं  भी   लेशमात्र  भी  नजर  नहीं  आता   l  आस्तिकता  और  नैतिकता  दोनों  एक  दूसरे  से  घनिष्टता पूर्वक  सम्बंधित  हैं   l   उपासना गृहों   की  संख्या  व  उनमे  जाने  वालों  की  तादाद  बढ़ते  चले  जाने  के  बावजूद   नास्तिकता  तेजी  से  बढ़  रही  है  l   कर्मकाण्ड   के  आडम्बरों  में  उलझा  व्यक्ति  निजी  जीवन  में  अनैतिक   आचरण  करता  देखा  जाता  है  l "
 आचार्य श्री   का  कहना  है ---- ' व्यक्ति  बहिरंग  जीवन  में   धार्मिक   आचरण  करे ,  न  करे    किन्तु  उसके  मानस   का   परिष्कार  तो  होना  ही  चाहिए  l   उसे  यह  समझाना   जरुरी  है   कि   बिना  भावनात्मक    कायाकल्प  के   सारे  बाह्योपचार   निरर्थक  हैं  l  "
   शिवाजी    समर्थ  गुरु  रामदास  के  प्रिय  शिष्य  थे   l   जब  शिवाजी   ने  उनसे  गुरु  दक्षिणा  का  आदेश  देने  के  लिए  निवेदन  किया  तो  समर्थ  गुरु  रामदास  ने  कहा --- '  शिवाजी   !  तू  बल  की  उपासना  कर  ,  बुद्धि  को  पूज , संकल्पवान  बन   और  चरित्र  की  दृढ़ता  को  अपने  जीवन  में  उतार ,  यही  तेरी  ईश्वर  भक्ति  है  l   भारतवर्ष  में  बढ़  रहे  पाप , हिंसा ,  अनैतिकता   और  अनाचार   के  कुचक्र  से  लोहा  लेने   और  भगवान   की  सृष्टि  को  सुन्दर  बनाने  के  लिए  इसके  अतिरिक्त   कोई  उपाय  नहीं  है  l  "
  उन्होंने  ध्वजा  को   शिवाजी   को  थमाते   हुए  कहा  था  --- शिवा  !  इस  ध्वज  को  झुकने  न  देना  l  "
    और  छत्रपति  शिवाजी   ने     उनकी  हर  कदम  पर  उनकी  आज्ञा  का  पालन  किया  l
    जब  उनके  सहयोगी  सोनदेव  ने  कल्याण  के  किले  पर  अधिकार  कर  लिया   और  किलेदार  मुल्ला  अहमद  की    अपूर्व  सुन्दर   पुत्रवधु   गौहर  बानू  को  शिवाजी   के  सामने  दरबार  में  प्रस्तुत  किया   l   तो  शिवाजी  ने  क्रोध  से  गर्जना  करते  हुए  कहा --- "  अपनी  महान  संस्कृति  के  पवित्र  सूत्रों  को  कैसे  भूल  गए  तुम  ?     तुम  अपराधी  हो  नायक  l  "  फिर  वे  सिंहासन  से  उठकर   गौहर  बानू  के  सामने  पहुंचे  और  घुटने  मोड़कर  बैठते  हुए  हाथ  जोड़कर    कहा ---- " माँ  !  अपने  सरदार  द्वारा  किये  गए    अपराध  के  लिए   मैं  आपके  सामने  क्षमा प्रार्थी  हूँ  l    देवि  !   हमारी  देव  संस्कृति  की  पुण्य  शपथ    नारी  माँ  है   l   उसके  अक्षुण्ण   सम्मान   को  विस्मृत  करना   इस  महान  संस्कृति   की  संतति  के  लिए  आत्मघात  है    मैं  आपके  सम्मुख  बार - बार  क्षमा प्रार्थी  हूँ  l "    फिर  उन्होंने  पेशवा   से कहा --- इन्हे  सम्मान  और  सुरक्षा  के  साथ  बीजापुर  भेजने  का  प्रबंध  किया  जाये   l 
आज्ञा    देकर  भी  वे   संतुष्ट  नहीं  हुए  और  स्वयं    बाहर  खड़ी  शानदार  बग्घी   तक  उसे  छोड़ने  आये  l   बग्घी  के  साथ  पांच   सौ    मराठों   की  टुकड़ी    सुरक्षा  के  लिए  जा  रही  थी  l    शिवजी  ने  सभी  नागरिकों , सभासदों  से  कहा -- " देख  रहे  हो  किले  के   कंगूरे  पर  फहरा  रही  ध्वजा   को l     श्री  श्री समर्थ  ने  कहा  था    इस  ध्वज   को  झुकने  न  देना  l   सभी  ने  आँख  उठाकर  देखा ,  ध्वज   ऐसे  फहरा  रहा  था    जैसे    ऊपर  जाकर  सहस्रदल  कमल  खिल  गया  हो  l 

5 December 2019

WISDOM -----

  मनुष्य  के  विकास  की  सबसे  बड़ी  बाधा  उसका  अहंकार  है  l   अहंकारी  व्यक्ति  के  सामने  सब  कुछ  छोटा  होता  है  l ऐसा  व्यक्ति  अपने  प्रत्येक  कार्य  का  श्रेय  तो   स्वयं  लेता  है  ,  साथ  ही  दूसरों  के  कार्यों  का  भी  श्रेय  लेना  चाहता  है  ,  उसका  लाभ  वह  अकेले  उठाना  चाहता  है   l   दूसरे  को  हस्तक्षेप    करते  या  लाभ  उठाते  देख  वह  जल - भुन   उठता  है   और  प्रतिकार  के  लिए  तैयार  हो  जाता  है  l  उसका  यह  अहंकार  जब  पराकाष्ठा  तक  पहुँच  जाता  है    तब  सब  लोग  उसका  साथ  छोड़  देते  हैं   और  अन्तत :  उसे  हार  माननी  पड़ती  है   l   रावण , कंस , हिटलर , मुसोलिनी  सभी  को  उनका  अहंकार  खा  गया  l 

4 December 2019

  रामकृष्ण  परमहंस  कहते  हैं --- ' ईश्वर  दो  बार  हँसते  हैं  l  एक  बार  उस  समय  हँसते  हैं   जब  दो  भाई  जमीन    बांटते  हैं  और  रस्सी  से  नापकर  कहते  हैं  --- 'इस  ओर   की  जमीन    मेरी  है   और  उस  ओर   की  तुम्हारी  l "  ईश्वर  यह  सोचकर  हँसते  हैं  कि   संसार  है  तो  मेरा   और  ये  लोग   थोड़ी  सी  मिटटी  लेकर   इस  ओर   की  मेरी ,  और  उस  ओर   की  तुम्हारी   कर  रहे  हैं  l
फिर  ईश्वर  एक  बार  और  हँसते  हैं   l   बच्चे  की  बीमारी  बढ़ी  हुई  है  ,  उसकी  माँ  रो  रही  है   l वैद्द्य  आकर  कहता  है  --- " डरने  की  क्या  बात  है  , माँ  , मैं  अच्छा  कर  दूंगा  l  "  वैद्द्य  नहीं  जानता   कि   यदि  ईश्वर   मारना  चाहे   तो  किस  की  शक्ति  है  ,  जो  अच्छा  कर  सके 

WISDOM ------ सिनेमा अब जहर न उगले , लोक मंगल की जिम्मेदारी समझे ---- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

   आचार्य श्री  का  कहना  है --- ' फिल्मों  में  पहला  स्थान  लेखक  का , दूसरा  निर्देशक ,  तीसरा  गीतकार  और  संगीतकार ,  तब  चौथा  स्थान  कलाकार  का  है  l   यदि  लेखक  और  निर्देशक  तय  कर  लें  कि   फिल्म  से  समाज  को  सार्थक  देना  है   और  धनवान  उनकी  प्रतिभा  पर  विश्वास  करें   तो  सिनेमा  
जन क्रांति  कर  सकता  है   l  "
    आचार्य जी   ने  एक  बार  अपने  युग  की  दो  फिल्मों  की   चर्चा  की  थी  l   इनमें  पहली  फिल्म  थी
 ' महात्मा  विदुर '  जिस  पर  अंग्रेजों  ने  पाबन्दी  लगा  दी  थी  l   और  दूसरी  फिल्म  थी --- ' त्याग  भूमि '  जिसका  नायक  ब्राह्मण  होते  हुए  भी   हरिजनों  की  बस्ती   में  रहता  है  और  सादा  जीवन  व  उच्च  विचार  के  आदर्श  को  अपनाता  है  l   उन्होंने  बताया  कि   इन  फिल्मों  ने  अपने  समय   में  लोगों   को    बहुत  प्रभावित  किया  था  l
   विद्वानों  का  कहना  है --- ' सिनेमा  की  संवेदना  लोगों  के  दिलों  को  छूती  है  ,  उनकी  भावनाओं  को   इच्छित  दिशा  में  सहज  ही  मोड़  देती  है   l  सर्वेक्षण  में  पाया  यही  गया  है  कि   जिस  समय  लोग  सिनेमा  देखते  हैं  ,  उस  समय  उनकी  तर्क क्षमता ,  विश्लेषण  करने  वाली  पैनी  बुद्धि    सुप्त  सी  हो  जाती  है  l  बस  खुले  रहते  हैं  दिल  के  द्वार  ,  सिनेमा  के   प्रत्येक  दृश्य   में  होने  वाली  भावनाओं  की   कशमकश   के  साथ  वे  जीने  लगते  हैं  l   सिनेमा  देखे  जाने  के  बाद  भी  यह  स्थिति   देर  तक  बनी  रहती  है  l "
  फिल्म  निर्माण  खर्चीला  होता  है   इसलिए  फिल्म  निर्माता   लोगों  की  भावनाओं  का  शोषण  कर  अपनी  जेब  भरते  हैं   l   हमारे  धर्म  ग्रंथों  में  लिखा  है  -- समाज  को  पतन  की  राह  पर  धकेलने  से  बड़ा  कोई  पाप  नहीं  l   प्रकृति  में  क्षमा  का  प्रावधान  नहीं  होता  l 
 आचार्य  श्री  ने  लिखा  है ---  सामाजिक  परिवर्तन  में  सिनेमा  की  बड़ी  भूमिका  है   l   यह  सामाजिक  विचार   को  परिष्कृत    करने  एवं   भावनाओं  को  संवेदनशील  बनाने  का  कार्य  कर  सकता  है  l '

3 December 2019

WISDOM ----- संवेदना ही हमारी संस्कृति है

      भारतीय  संस्कृति  सनातन  और  शाश्वत  है   और  इस  संस्कृति  का  संबंध   संवेदना  से  है   l  भारत   पर  हजारों  वर्षों  से  बर्बर  एवं   भीषण  आक्रमण  होते  रहे  हैं  ,  तमाम  बर्बर  जातियों  ने  भारतीय  संस्कृति  को   मिटाकर  अपने  में  मिलाने  का  अथक  प्रयास  किया  l   अपना  देश  - हजारों  वर्षों  से  एक  के  बाद  एक  विदेशी  सत्ताओं  की  गुलामी  में  भी  रहा   परन्तु  इन  सब  के  बावजूद  भारतीय  संस्कृति   न  केवल  अक्षुण्ण  रही  ,  वरन  नित - निरंतर    प्रगति  के  नए  सोपानों  को  प्राप्त  करती  रही  l
  लेकिन  अब  इस  संस्कृति  के   मूल  तत्व  ' संवेदना '  को  ही  मिटाने   के   प्रयास  किये  जा  रहे  हैं  l  नशा ,  मांसाहार ,  अश्लील  साहित्य ,  आपराधिक  और  अश्लील  फ़िल्में --- ये  सब   हृदय  की  संवेदना  को  सोखकर   व्यक्ति  को  मनुष्य  से  पिशाच  बना  देते  हैं   l   गुलामी  के  काल  को ,  विदेशी   आक्रमणकारियों  को  वर्तमान  में  दोष  देना  व्यर्थ  है  ,  आज  नारी  जाति   पर  अत्याचार  देश  के  ही  लोग  कर  रहे  हैं  l  अत्याचार  और  अन्याय   होते  देख  मौन  रहना  ,  मूक  सहमति  है   l
  नारी  जाति   पर  ये   अमानुषिक  अत्याचार   इस  काल  में  संस्कृति  को  कलंकित  करने  वाली  अमानुषिक  घटनाएं  हैं   l   समाज  के  जिम्मेदार  नागरिकों  का  यह  कर्तव्य  है   कि   अपनी  कमजोरियों  से  ऊपर  उठकर  भारतीय  संस्कृति  को  अक्षुण्ण  रखें   l