2 June 2020

WISDOM ----- तृष्णा का कोई अंत नहीं है

  तृष्णा  का  अंत  नहीं  है  l   व्यक्ति  वृद्ध  होता  जाता  है  लेकिन  उसकी  कामनाएं  समाप्त  नहीं  होतीं  l  स्थिति  तब  और  विकट   हो  जाती  है  जब    बढ़ती  उम्र  के  साथ  व्यक्ति  अपनी   असीमित  कामनाओं  को  तृप्त  करने  के  लिए   दूसरों  की  खुशियां   छीनता   है  l   पुराणों  में  एक  कथा  है  ---- महाराज  ययाति  बूढ़े  हो  गए   लेकिन  उनकी   कामनाएं   समाप्त  नहीं  हुईं  l   उन्होंने  अपने  पुत्रों  से  उनका  यौवन  माँगा   l   उनके  चार  पुत्रों  ने  तो  मना  कर  दिया   किन्तु   छोटे  पुत्र  ने  पिता  की  इच्छाओं  के  आगे  अपना  जीवन  उत्सर्ग  कर  दिया  l   अपना  यौवन  उन्हें  देकर  उन का  बुढ़ापा  ले  लिया  l   हजारों  वर्षों  तक  भोग  भोगने  के  बाद  भी  उन्हें  शांति  नहीं  मिली   l
  आज  संसार  की  स्थिति  कुछ  ऐसी  ही  है   युवा  लोगों  की  नौकरी  , उनकी  उमंगें   छिन   गईं  l   ययाति  आज  भी  हैं  , एक  नहीं  अनेक  हैं  l   हमारे  पूर्वजों  ने  इसलिए  आश्रम  व्यवस्था  की  थी  l   एक  निश्चित  आयु  के  बाद  वानप्रस्थ आश्रम  की  व्यवस्था  थी  ताकि  नई  पीढ़ी को  आगे  बढ़ने  का ,  परिवार  की  और  युग  की  जिम्मेदारी  निभाने  का  अवसर  मिले  लेकिन  मनुष्य  की  असीमित  इच्छाओं , लालच , तृष्णा  ने   सब  कुछ  ध्वस्त  कर  दिया  l 

1 June 2020

WISDOM ---- हम ईश्वर की संतान हैं , अपना मूल्य समझें

    आज  की  समस्त  समस्याएं  इसलिए  हैं  क्योंकि  हम  अपनी  कृषि , अपनी  चिकित्सा ,  अपनी  कला , अपनी  संस्कृति , अपनी  भाषा   और  अपनी  क्षमता  को   महत्व  न  देकर    पराई  चीजों  को  महत्व  देते  हैं  l   इसलिए  हम  बीच  में  फँसे   हैं ,  न  घर  के  रहे ,  न  घाट   के  l
अभी  भी  वक्त  है  ,  यदि  हम  संभल  जाएँ ,  जागरूक  हो  जाएँ ,  हमारा  स्वाभिमान   जाग    जाये  ,  तो  फिर  हमारा  मुकाबला  कोई  नहीं  कर  सकता  l   यदि  हम  केवल  चिकित्सा  के  बारे  में  बात  करें  ---- तो  हम  कितने  भाग्यवान  हैं  कि   हमारे  पास  अपनी  वैकल्पिक  चिकित्सा  है  l   यद्द्पि  एलोपैथी  का  बोलबाला  है  , लेकिन  यदि  ये  अंग्रेजी  दवाइयाँ   हमें  रिएक्शन  करती  हैं  तो  हम  घरेलू    चिकित्सा , आयुर्वेदिक  , होम्योपैथी , प्राकृतिक , सूर्य चिकित्सा   आदि    हमारे  प्राचीन  साहित्य  में  चिकित्सा   के  विशेषज्ञों  से  चिकित्सा  करा  के  स्वस्थ  हो  सकते  हैं  l
 आज  उन  लोगों  की  और  उन  देशों  की  स्थिति   बहुत   दयनीय  है   जो  पूरी  तरह  एलोपैथी  पर  निर्भर  है  l  यह  पद्धति   भी  अच्छी  है  लेकिन  इसकी  अपनी  सीमायें  हैं  जैसे --- एक  व्यक्ति  को  पेट दर्द  हुआ   तो  एक  गोली  खाई ,  फिर  ब्लड प्रेशर  है , डाइबिटीज है  तो  उसकी  दवाई  खाई ,  फिर  हाथ - पैरों  में  दर्द  है  तो  उसकी  एक  गोली ,  तनाव  है  सिर   दर्द  है  तो  उसकी  एक  गोली  ------ शरीर  चलता - फिरता  मेडिकल स्टोर  बन  जाता  है  l   फिर  विभिन्न  दवाइयों  के  साइड इफेक्ट  l   बीमारियाँ   पीछा  नहीं  छोड़तीं  l
    लेकिन  यदि  हम  अपनी  संस्कृति , अपना  मूल्य  समझेंगे  तो  बीमारी  हमसे   दूर  भागेगी  l
जैसे  --- सुबह  जल्दी  उठे , सूर्य  देवता  के  दर्शन  किये , गायत्री मन्त्र  जपा ,  प्राणायाम  किया   तो  आधी  बीमारी  तो  वैसे  ही  चली  गई  l  और  शेष  का  इलाज  हमारी  रसोई  में  और  प्रकृति  में , आयुर्वेद  में  मिल  जाता  है   जैसे --- पेट  दर्द  है  तो  हींग , अजवाइन  खा  ली ,  गुनगुने  पानी  से  एक  चम्मच  हल्दी  फाँक   ली l , लहसुन  ,   नीम  की  पत्ती , जामुन  की  पत्ती ,  अर्जुन  की  छाल,  आंवला   ----- आदि   का  सेवन या  इनसे  बनी   औषधि   का  सेवन  करने   से  ही  व्यक्ति  स्वस्थ  हो  सकता  है  l   खरचा   भी  कम , बजट  संतुलित    और  कोई  रिएक्शन  भी  नहीं   l     जब  लोगों  पर  दुर्बुद्धि  का  प्रकोप  होता  है   तो  बीमारी  भी 
स्टेट्स   सिंबल   बन  जाती  है  ,  व्यक्ति  उसमें   अंधाधुंध  पैसा  खर्च  कर  के  ,  और  फिर  से  एक  नई  बीमारी  लेकर  भी  गर्व  महसूस  करता  है  l   इसलिए  हम  ईश्वर  से  सद्बुद्धि  के  लिए  प्रार्थना  करें ,  जिससे  हमारे  जीवन  को  सही  दिशा  मिले   l 

31 May 2020

WISDOM ------

 तृतीय  सिख  गुरु   अमरदास जी ने   बासठ  वर्ष  की  उम्र  तक  कोई  गुरु  नहीं  किया  l   उन्हें  जब  यह  ज्ञात  हुआ  कि   गुरु  के  बिना  ज्ञान  नहीं  होता   तो  उन्होंने  गुरु  अंगद  देव जी  से  दीक्षा  ली  l   वे  बड़े  भोर  उठकर   तीन  कोस   दूर  नदी  से   गुरु  के  स्नानार्थ   जल  ले  आते  l   एक  अँधेरी  रात  में  वे  जल  लेकर  लौट  रहे  थे   तो  रास्ते  में  जुलाहे  की  खड्डी   से  उनका  पाँव  टकरा  गया   और  वे  गिर  पड़े  l   जुलाहा  जाग   उठा  और   पत्नी  से  बोलै --- " देख  तो  कौन  गिर  पड़ा  खड्डी   में  ? "
जुलाहिन   ने  कहा ---- " अरे  कौन  होगा  ,  वही  अनाथ  अमरु   जो  आधी  रात  में  गुरु  की  खिदमत  के  लिए  उठ  जाता  है  l "  प्रात:काल   गुरु  अंगद देव जी  ने  यह  वार्ता  सुनी  l  उन्होंने  सिखों  के  दरबार  में   रात  की  यह  घटना  बताई   और  अमरदास जी  को  गले  लगाकर  बोले  ---- " यह  अमरु  अनाथ  नहीं  है , बल्कि  सिखों  का  स्वामी  है  l  सेवा  धर्म  का  पालन  करने  के  कारण  यह  गुरु गद्दी  का  अधिकारी  है  l "
 जिस  स्थान  पर  गुरु  अमरदास  ठोकर  खाकर  गिरे  थे  ,  वहां  आज  भी  विशाल  गुरुद्वारा   उनकी  निष्ठा  का  यश  सुनाता  हुआ  खड़ा  है  l 

29 May 2020

WISDOM ------

  महाभारत  का  युद्ध  निश्चित  हो  गया  था  l   दोनों  पक्ष  अपने - अपने  सहायकों  को    एकत्र   करने  में  लग  गए  थे   l  इसी  क्रम  में  एक  दिन   दुर्योधन  भगवान  श्रीकृष्ण   के  पास  युद्ध  में  सहायता   मांगने  हेतु  पहुंचे  l   श्रीकृष्ण  उस  समय  विश्राम  कर  रहे  थे   l   दुर्योधन  उनकी  शैया  के  सिरहाने  बैठ  गए  l   तभी  अर्जुन  भी  इसी  उद्देश्य  से   श्रीकृष्ण  के  पास  पहुंचे  l  और  उन्हें  सोया  हुआ  देखकर  उनके  चरणों  के  पास  खड़े  हो  गए   l  जागने  पर  श्रीकृष्ण  ने  अपने  सम्मुख   अर्जुन  को  देखा   और  उनके  आने  का  उद्देश्य  पूछा  l   दुर्योधन  तुरंत  बोले  ---- " वासुदेव  !  पहले  मैं  आया  हूँ   l "  तब  भगवान  ने  पीछे  देखकर  दुर्योधन  के  आने  का  कारण  पूछा  l   तब  दुर्योधन  और  अर्जुन  दोनों  ने  अपने  आने  का  उद्देश्य  बताया  l
  इस  पर  श्रीकृष्ण  बोले ---- " मैं  इस  युद्ध  में   दीजिए शस्त्र  नहीं  उठाऊंगा  l   एक  ओर   मैं  शस्त्रविहीन  रहूँगा   और  दूसरी  ओर   मेरी  सेना  रहेगी  l  '   अर्जुन  ने  नि:शस्त्र   श्रीकृष्ण  को  चुना    और  दुर्योधन  ने  सेना  को  चुना   l   दुर्योधन  प्रसन्न  होकर  चले  गए   l   तब  श्रीकृष्ण  ने  अर्जुन  से  पूछा  --- "  तुमने  नि:शस्त्र   मुझे  क्यों  चुना  ,  सेना  क्यों  नहीं  ली  ? "
तब  अर्जुन  बोले  --- " हमारी  जय  हो  या  न  हो  ,  हम  आपको  छोड़कर  नहीं    रह  सकते  l  "
 वासुदेव  ने  हँसकर   पूछा ---- " मुझसे  क्या  कराओगे  ? "  अर्जुन  हँसकर   बोले ---- "  आपको  बनाऊंगा  सारथी  l   मेरे  रथ  की  डोर  हाथ  में  लीजिए   और  मुझे    निश्चिन्त  कर   दीजिए   l "
   जो  अपने  जीवन - रूपी  रथ  की   डोर   भगवान  के  हाथों  में  सौंप  देते  हैं  ,  उन की  लौकिक  तथा  पारमार्थिक  विजय  निश्चित  है  l 

28 May 2020

WISDOM ----- काल बड़ा बलवान

  पुराण  की  एक  कथा  है ----  दैत्यकुल  के  महाराज  बलि   इंद्रासन   पर   प्रतिष्ठित  थे  l   यह  बात  देवताओं  को  सहन  नहीं  हो  रही  थी  l   महाराज  बलि  महान  तपस्वी  थे  , वे  स्वर्ग  के  भोग - विलास ,  राग - रंग  में  मगन  नहीं  थे  ,  उनका  हर  क्षण ,  हर  पल   श्रेष्ठ  कर्मों  में  नियोजित  रहता  था  l  उनका  अपरिमित  बल  था  ,  उनकी  भक्ति  भी  असाधारण  थी  l   वे  तपस्वी  के   साथ   एक  सच्चे  भक्त  भी  थे  l     वामन  बनकर  भगवान   विष्णु   उनके  पास  गए   और  कहा  --- " बलि  ! मुझे  तीन  पग  जमीन   दान  में  दे  दो  l '  गुरु  शुक्राचार्य   ने  उन्हें  भगवान  विष्णु  के  इस  छल  के  प्रति  आगाह  भी  किया  था   लेकिन  बलि  ने  कहा --- हे  गुरुवर  !  स्वयं  भगवान  मेरे  द्वार  पर  याचक  बन  कर  आएं  , तो  मैं  उन्हें  कैसे  मन  कर  सकता  हूँ  l  "
  भगवान  विष्णु  ने  दो  पग  में  धरती - आसमान  नाप  लिए  ,  अब  तीसरा  पग  कहाँ  रखें  ,  बलि  ने  कहा  -- इसे  मेरे  सिर   पर  रखें  l   भगवान  ने  बलि  के  सिर   पर  पाँव  रखकर  उसे  पाताल   भेज  दिया  l  महाराज  बलि  का  समस्त  साम्राज्य  छिन   गया  , अब  वे  साधारण  इनसान   की  भांति  पाताललोक  में  रहने  लगे   l   यह  स्थिति  उनके  परिजनों  को  मंजूर  नहीं  थी   कि   वे  इतनी  साधारण  स्थिति  में  रहें  l  तब  महाराज  बलि  ने  उन्हें  समझाया ---- " काल  की  बड़ी  महिमा  है  l  काल  की  महिमा  से  जो  अवगत  होते  हैं  ,  वे  उसको  प्रणाम  कर  के    उसके  अनुकूल  स्वयं  को  ढाल  लेते  हैं  l   आज  काल  हमारे  साथ  नहीं  खड़ा  ,  अत:  ऐसे  विपरीत  समय  में    कोई  ज्ञान , कोई  तप , कोई  साधन  काम  नहीं  आते  l   काल  की  इस  विपरीत  दशा  में   हमें  शांत  एवं  स्थिर   बने  रहना  चाहिए  l  प्रभु  द्वारा  निर्धारित  स्थान  पर  रहकर  ,  अपनी  भक्ति  के  सहारे   आने  वाले  अनुकूल  समय  की   प्रतीक्षा  के   अलावा   और  कोई  विकल्प  नहीं  है  l   इस  समय  कोई  प्रयास - पुरुषार्थ  काम  नहीं  आता  l   इस  समय  कोई  अपना  भी  साथ  नहीं  देता  है  ,  केवल  भगवान  ही  सुनता  है  और  साथ  देता  है  l '

27 May 2020

WISDOM ------ भय जीवन का महाशत्रु और सबसे बुरी बीमारी है l

  भय  अज्ञान  से  उत्पन्न  होता  है  l   विभिन्न  प्रकार  के  मनोरोग   भय  के  कारण  ही  जन्म  लेते  हैं   और  जीवन  नारकीय  यंत्रणा  से  भर  जाता  है  l   इससे  व्यक्ति  का  मानसिक ,  चारित्रिक  और   आत्मिक  पतन  होता  है   और  व्यक्ति  का  खुशहाल  जीवन   दम    तोड़  देता  है   l 
  वर्तमान  विश्व  में    जिस  एक   वस्तु    का  व्यापार   सबसे  अधिक  हो  रहा  है  ,  वह  एक  प्रकार  का  भय  ही  है l     पश्चिमी  समाज     भय  खरीदने  और  बेचने  वालों  की  मंडी  में  तब्दील  हो   गया     है   l  जो  जितना  भय  पैदा  करता  है  ,  वह  उतना  ही  सफल  सिद्ध  हो  रहा  है   l   जो  फ़िल्में   जितना  भय  उत्पन्न  कर  सकेंगी  वे  उतनी  ही  सफल  हैं  ,  उनका  कारोबार  भी  करोड़ों   डॉलर  में  होता  है  l   वे  कॉमिक्स  जो  बच्चों  में  भय  पैदा  करते  हैं  वे  सर्वाधिक  बिकते  हैं   l   विश्व प्रसिद्ध     चिंतक   नोम   चोमस्की  ने  कहा  था था  कि   भय    व्यापार  की  छठी   इंद्रिय   है  l
  भय    मानवीय    मनो - मस्तिष्क  को  ंप्रभावित  करने  वाला   सबसे  बड़ा  कारण  है  l  व्यक्ति  ही  नहीं   समाज  एवं   राष्ट्र  भी   भयग्रस्त   हो  जाते  हैं  l   आज  सारा  संसार  आतंकवाद  और  जैविक  युद्ध  के  विनाश  से  भयभीत  है   l     कभी  भय  वास्तविक  होता  है   और  कभी  आसुरी  शक्तियां    अपने  विशिष्ट  उद्देश्यों  की  पूर्ति  के  लिए  भय  का  वातावरण   निर्मित  कर  देती  हैं   l
 भय  की  आशंका  समस्त  विपत्तियों  का  कारण  है  ,   भय  दासता  है  , इससे  प्रगति  अवरुद्ध  हो  जाती 
 है  l  भय  का  आधार  ही  स्वयं  पर  अविश्वास  है  l   जब  तक  स्वयं  पर  विश्वास  नहीं  होगा  , विकास  कैसे  संभव  होगा   l   ईश्वर विश्वास  से  ही  सभी  प्रकार  के  भय  से  मुक्ति  संभव  है  l   साहस  और  निर्भयता  ही  सफलता  का  रहस्य  है  l 

WISDOM ------- सुख से जीवन जीने के लिए शांति जरुरी है

  शांति  में  ही  समस्त  सुखों  का  अनुभव  होता  है   l   संत  इमर्सन  ने  लिखा  है ---- " युवावस्था  में  मेरे  अनेक  सपने  थे  l   उन्ही  दिनों  मैंने  एक  सूची   बनाई   थी  कि   जीवन  में  मुझे  क्या - क्या  पाना  है  l   इस  सूची   में  वे   सारी   चीजें  थीं  ,  जिन्हे  पाकर  मैं  धन्य  होना  चाहता   था  l   स्वास्थ्य , सौंदर्य , सुयश , सम्पति ,  सुख ,  इसमें  सभी  कुछ  था  l   इस  सूची   को  लेकर   मैं  बुजुर्ग  संत   थॉरो   के  पास  गया   और  उनसे  कहा  ---- " क्या  मेरी  इस  सूची   में  जीवन  की   सभी  उपलब्धियां   नहीं  आ  जाती  हैं   ? "  उन्होंने  मेरी  बात  को  ध्यान  से  सुना  l   फिर   बोले ---- " मेरे  बेटे  !  तुम्हारी  यह  सूची   बड़ी  सुन्दर  है   l   बहुत  विचार पूर्वक   तुमने  इसे  बनाया  है   l   फिर  भी  तुमने  इसमें   सबसे  महत्वपूर्ण  बात  छोड़  दी  ,  जिसके  बिना  सब  कुछ  व्यर्थ  हो  जाता  है   l  "
 मैंने  पूछा --- " वह  क्या  है  ? "     उत्तर  में   उन  वृद्ध  अनुभवी  संत  ने   मेरी  सम्पूर्ण  सूची   को  बुरी  तरह  काट  दिया   और  उसकी  जगह   उन्होंने  केवल  एक  शब्द  लिखा  --- शांति   l  "
  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  लिखा  है  ---- ' अंतर्मन  में  शांति  प्रगाढ़  हो   तो  दुःखमय   परिस्थितियां  ,  बाहरी  जीवन  के  सारे  आघात  मिलकर  भी    अन्तस्  में   दुःख  को  अंकुरित  नहीं  कर  पाते  l '