पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " यदि योगी के ह्रदय में अहिंसा प्रतिष्ठित हो जाये तो उसके सान्निध्य में प्राणी अपने प्राकृतिक वैर का त्याग कर देते हैं किन्तु मनुष्य में वैर उसकी मानसिक विकृतियों से उपजा है l इसलिए ईसा मसीह , सुकरात और महात्मा गाँधी जैसे महान पुरुष जिनका किसी से कोई वैर नहीं था , प्रकृति और प्राणियों द्वारा नहीं , बल्कि विकृत मनुष्यों द्वारा मारे गए l ' ईर्ष्या , द्वेष ऐसी मानसिक विकृति है कि जब यह बहुत गहन हो जाती है तो मनुष्य , ईश्वर और अवतार को भी पहचान नहीं पाता और उनसे भी ईर्ष्या करने लगता है , उन्हें हानि पहुँचाने की कोशिश करता है --------- भगवान बुद्ध का एक चचेरा भाई था --देवदत्त l वह भगवान बुद्ध से गहरी ईर्ष्या करता था l उसकी हमेशा यह कोशिश रहती थी कि कब उसे मौका मिले और कब वह तथागत की हत्या कर दे l कहा जाता है कि जब बुद्ध पहाड़ी के निकट वृक्ष के नीचे ध्यान कर रहे थे तो देवदत्त ने उन पर एक बड़ी सी चट्टान लुढ़का दी l पूरी संभावना थी कि बुद्ध कुचल जाते , लेकिन आश्चर्य ! न जाने कैसे चट्टान ने अपनी राह बदल दी और तथागत साफ बच गए l किसी ने पूछा --- " भगवन ! यह आश्चर्य कैसे घटित हुआ ? " तब उत्तर में बुद्ध ने कहा --- " एक चट्टान ज्यादा संवेदनशील है देवदत्त से , चट्टान ने अपना मार्ग बदल लिया l " असुरता , देवत्व को मिटाना चाहती है लेकिन अंत में जीत देवत्व की ही होती है l
9 January 2022
WISDOM -----
गुरु गोविंदसिंह ने अपने ज्ञान , अपने अनुभव से संसार को अनेक शिक्षाएं दीं l उनके जीवन का एक प्रसंग है ----- गुरु गोविंदसिंह उन दिनों गोदावरी के तट पर नगीना नाम का एक घाट बनवा रहे थे l दिनभर उन काम में व्यस्त रहकर वे सायंकाल प्रार्थना कराते और लोगों को संगठन तथा बलिदान का उपदेश दिया करते थे l उन दिनों उनके पास अनेक शिष्य भी रहते थे , उनमे एक शत्रु भी छिपा हुआ था , उसका नाम था - अताउल्ला खां l उसका पिता पैदे खां एक युद्ध में गुरु जी के हाथ से मारा गया था l उसके अनाथ पुत्र को गुरु जी ने आश्रम में रखकर पाल लिया था किन्तु उनकी यही दया और शत्रु के पुत्र के साथ की गई मानवता उनके अंत का कारण बन गई l अताउल्ला खां हर समय इस घात में रहता था कि कब गुरु जी को अकेले असावधान पाए और मार डाले l एक दिन उसने पलंग पर सोते हुए गुरु जी की काँख में छुरा भौंक दिया l गुरु जी तत्काल सजग होकर उठ बैठे और वही कटार निकालकर भागते हुए विश्वास घाती को फेंककर मारी l वह कटार उसकी पीठ में धँस गई l अताउल्ला खां वहीँ गिरकर ढेर हो गया l गुरु के घाव पर टाँके लगा दिए गए l सांयकाल उन्होंने प्रार्थना सभा में लोगों को बतलाया कि मेरी इस घटना से शिक्षा लेकर हर सज्जन व्यक्ति को यह नियम बना लेना चाहिए कि यदि शत्रु पक्ष को , निराश्रय की स्थिति में सहायता भी करनी हो तो भी उसे अपने पास निकट नहीं रखना चाहिए और उससे सदा सावधान रहना चाहिए क्योंकि कभी - कभी असावधान परोपकार भी अनर्थ का कारण बन जाता है l
8 January 2022
WISDOM ----
एक जिज्ञासु संत कबीर के पास पहुंचा , बोला -- दो बातें सामने हैं --- संन्यासी बनूँ या गृहस्थ l कबीर ने कहा --- जो भी बनो आदर्श बनो l इसे समझाने के लिए उन्होंने दो घटनाएं प्रस्तुत कीं l ---- अपनी पत्नी को बुलाया l दोपहर का प्रकाश तो था , पर उन्होंने दीपक जला लाने के लिए कहा ताकि वे अच्छी तरह कपड़ा बुन सकें l पत्नी दीपक जला लायी और बिना कुछ बहस किए रखकर चली गई l कबीर ने कहा --- गृहस्थ बनना हो तो परस्पर ऐसे विश्वासी बनना कि दूसरे की इच्छा ही अपनी इच्छा बने l दूसरा उदाहरण संत का देना था l वे जिज्ञासु को लेकर एक टीले पर गए , जहाँ वयोवृद्ध महात्मा रहते थे l वे कबीर को जानते न थे l नमाज के उपरांत उनसे पूछा --- आपकी आयु कितनी है ? महात्मा बोले --- अस्सी बरस l इधर - उधर की बातों के बाद कबीर ने कहा --- बाबाजी , आयु क्यों नहीं बताते ? संत ने शांति से कहा --- बेटे , अभी तो बताया था , अस्सी बरस l तुम भूल गए हो l ' टीले से आधी चढ़ाई उतर लेने पर कबीर ने संत को जोर से पुकारा और नीचे आने के लिए कहा l संत हाँफते -हाँफते चले आये और कारण पूछा l तो फिर कबीर ने वही प्रश्न किया --- आपकी आयु कितनी है ? संत को तनिक भी क्रोध नहीं आया l वे उसे पूछने वाले की विस्मृति मात्र समझे फिर कहा --- अस्सी बरस , और हँसते हुए वापस लौट गए l कबीर ने कहा ---- संत बनना हो तो ऐसा बनना जिसे क्रोध ही न आये l
7 January 2022
WISDOM ------
विश्व के सर्वोच्च वैज्ञानिक आइंस्टीन को प्रयोगशाला से संन्यास लेकर एक छोटे से विद्यालय में देखकर जापानी वैज्ञानिकों के प्रतिनिधि मंडल ने जानना चाहा कि यह उनकी प्रतिभा का दुरूपयोग तो नहीं ? तब आइन्स्टीन ने प्रतिभा की यथार्थता को समझाते हुए कहा ----- " प्रतिभावान वह नहीं जिसने कोई बड़ा पद हथिया लिया हो , जिसकी शारीरिक और बौद्धिक क्षमताएं बढ़ी - चढ़ी हों l इसके साथ एक शर्त यह भी जुड़ी है कि उसकी दिशा क्या है l दिशा विहीनता की स्थिति में व्यक्ति क्षमतावान तो हो सकता है , किन्तु प्रतिभावान नहीं l अंतर उतना ही है जितना वेग और गति में , एक दिशाहीन है दूसरा दिशायुक्त है l उन्होंने भौतिक विज्ञान की भाषा में समझाया l सामर्थ्य दोनों में है , क्रियाशील भी दोनों हैं पर एक को अपने गंतव्य का कोई पता - ठिकाना नहीं , और दूसरा प्रतिपल गंतव्य की और बढ़ रहा है l प्रतिभा वह क्षमता है जिसकी दिशा सृजन की ओर हो l जिसके हर बढ़ते कदम का स्वागत मानवीय मुस्कान करे l सुख - सुविधा के साधन हमारी प्रथम आवश्यकता नहीं हैं , हमारी प्राथमिकता है इस बात की जानकारी कि जीवन कैसे जिया जाये , समूची जिंदगी अनेकों सद्गुणों की सुरभि बिखेरने वाला गुलदस्ता बनें l "
WISDOM ------
प्रकृति हमें अपने तरीके से जीवन जीने की कला सिखाती है l एक व्यक्ति ने सुन रखा था कि आम के फल में बहुत मिठास होती है , उसने सोचा क्यों न घर में ही आम का पेड़ लगाया जाये l कहीं से एक पौधा ले आया , उसकी बहुत हिफाजत की , खाद - पानी दिया , अपने जीवन का बहुमूल्य समय उसकी देख- रेख में ही गुजार दिया , पेड़ बड़ा हो गया लेकिन उसमे फल नहीं आये , उसमें तो कांटे ही कांटे थे , विशेषज्ञ को दिखाया तो पता चला कि वह तो बबूल का पेड़ है l यही स्थिति संसार में है l आज जो संसार में षड्यंत्र करते , अपराध , अत्याचार और अन्याय करते हैं उनके जीवन को गहराई से समझने की जरुरत है , जो बीज , जिससे यह वृक्ष बना वह वास्तव में क्या था ? अधिकांश लोग अपने चेहरे पर एक मुखौटा लगाए हैं , जैसे वे दीखते हैं , वास्तव में वे वैसे हैं नहीं l और जैसे वो वास्तव में हैं , वे लक्षण संस्कार रूप में आगे आने वाली पीढ़ियों में आ जाते हैं l पढ़ाई - लिखाई से व्यक्ति सभ्य तो बन जाता है लेकिन जिस पल संस्कार प्रबल हो जाते हैं तब असली रूप सामने आ जाता है l यह सत्य महाभारत में भी उजागर हुआ है l ऋषि का श्राप मिलने की वजह से महाराज पाण्डु पितामह भीष्म के संरक्षण में धृतराष्ट्र को सिंहासन सौंपकर वन चले गए l धृतराष्ट्र की आँखें नहीं थीं तो क्या हुआ , उनका लालच , उनकी कामनाएं समाप्त नहीं हुईं थीं , उन्हें सिंहासन की आदत बन गई थी , यही लालच दुर्योधन में था , वह अपने पिता के साथ मिलकर सुई की नोक बराबर भूमि भी पांडवों को देना नहीं चाहता था l कौरव , पांडवों को गुरु द्रोणाचार्य ने एक जैसी शिक्षा दी , पांडव सत्य ,नीति और धर्म के पथ पर चले लेकिन दुर्योधन पितामह भीष्म , कृपाचार्य , महात्मा विदुर , गांधारी जैसी पतिव्रता माँ के संरक्षण में रहकर भी कौरव वंश के समूल नाश का कारण बना l
6 January 2022
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है -----' अधिकार के लिए आतुर और कर्तव्य से बचने वालों को घाटा भी पड़ता है और अपयश भी मिलता है l ' एक कहानी है ----चार चोर एक गाय चुराकर लाये l बंटवारा इस प्रकार हुआ कि चारों बारी - बारी से एक एक दिन उसे अपने घर रखें l चतुरता में चारों एक दूसरे से बढ़े चढ़े थे , जिस दिन जिसकी बारी होती तो गाय का दूध तो निकालते , पर घास यह सोचकर नहीं खिलाते कि पिछले दिन वाले ने इसका पेट भरा ही होगा और अगले दिन वाला भी खिलायेगा ही l एक दिन मैं न खिलाऊँ तो क्या हर्ज है l यह क्रम कई दिन चला l भूखी गाय का दूध भी सूखता गया और अंत में उसके प्राण ही निकल गए l --- अधिकार के साथ कर्तव्यपालन भी जरुरी है l
WISDOM ----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'कर्मफल का सिद्धांत बड़ा ही अकाट्य और शाश्वत है , कर्मों के फल से कोई नहीं बच सकता l ' कबीर दास जी कहते हैं --- 'करै बुराई सुख चहै , कैसे पावै कोय l रोपे पेड़ बबूल का , आम कहाँ से होय l ' पाप और पुण्य दो बीज हैं l जो बोयेंगे , वही काटेंगे l पुराण में एक कथा है ----- एक बार देवर्षि नारद भगवान विष्णु से मिलने वैकुण्ठ पहुंचे l उन्होंने भगवान को नमन - वंदन करते हुए कहा --- " भगवान ! आजकल धरती पर तो कर्मफल विधान के विपरीत परिणाम देखने को मिल रहे हैं l सब देखकर मुझे बड़ी हैरानी है l पापी को सुख मिल रहा है और पुण्यात्मा कष्ट में हैं l " भगवान ने कहा ---- " नारद जी ! आपने ऐसा क्या देख लिया , मुझे विस्तार से बताएं l " नारद जी ने कहा --- " भगवन ! जब मैं धरती पर भ्रमण कर रहा था , जंगल के रास्ते में बहुत कीचड़ था तभी मैंने देखा एक गाय कीचड़ में गहरे धँस चुकी थी और बाहर नहीं निकल पा रही थी l तभी वहां से एक चोर निकला , गाय को बाहर निकालने की बात तो दूर वह गाय के शरीर पर पैर रखकर आगे निकल गया जिससे गाय कीचड़ में और भी धँस गई l जैसे ही वह चोर आगे बढ़ा , उसे एक वृक्ष के नीचे सोने की मोहरों से भरी थैली मिली, जिसे पाकर वह बहुत खुश हुआ l फिर मैंने देखा कि उसी मार्ग से एक साधु पुरुष जा रहे थे l जैसे ही उन्होंने उस गाय को देखा , तुरंत कीचड़ में उतर गए और बहुत मेहनत कर गाय को बाहर निकाल लिया l इसके बाद जैसे ही वे बाहर निकले कि वहां रखे एक पत्थर से उनका पैर टकरा गया और वे गिर गए जिससे उनके सिर में गहरी चोट लगी खून बहने लगा l " नारद जी आगे बोले ---- " भगवान ! ऐसा अनर्थ आखिर क्यों हुआ ? चोर को सोने की मोहरें मिली और गाय की मदद करने वाले को सिर में चोट लगी ? " भगवान विष्णु ने कहा --- " नारद ! पूर्व में किए गए एक शुभ कर्म के कारण चोर को सोने की मोहरें मिली , उससे ज्यादा उसे और कुछ नहीं मिल सकता था , लेकिन उस साधु पुरुष की तो आज जंगल में ही उसके पूर्व प्रारब्ध के कारण मौत लिखी थी , जो गाय की सेवा करने के कारण टल गई l " इस कथा से हमें यही प्रेरणा मिलती है कि हमारे द्वारा किए गए शुभ कर्म कभी निष्फल नहीं होते हैं , हमें उनका पारितोषिक किसी न किसी रूप में अवश्य मिलता है l इसलिए हम हमेशा पुण्य कर्म करें l निस्स्वार्थ भाव से किए गए पुण्य कर्म अकाल मृत्यु से हमारी रक्षा करते हैं , तनाव से मुक्ति और शांति प्रदान करते हैं l