लघु -कथा --- युवराज भद्र्बाहू अत्यंत सुन्दर थे , उन्हें इस सुन्दरता का अभिमान भी था l एक बार वे मंत्री पुत्र सुकेश के साथ भ्रमण पर निकले l एक स्थान पर शवदाह हो रहा था l राजकुमार ने पूछा --- " यह क्या हो रहा है ? " सुकेश ने कहा --- " यहाँ मृत व्यक्ति का डाह संस्कार हो रहा है l " राजकुमार ने कहा --- " अवश्य ही वह कुरूप होगा l " सुकेश ने कहा --- 'नहीं , मरने पर पोरात्येक व्यक्ति का शरीर सड़ने -गलने लगता है , इसलिए उसे जला देना पड़ता है l ' यह सुनकर भद्रबाहु का सुन्दरता का दर्प चूर -चूर हो गया और वह उदास रहने लगे l राजा और राजगुरु ने उनकी उदासी दूर करने की बहुत कोशिश की किन्तु कोई सफलता हाथ न लगी l राजगुरु युवराज को महा आचार्य के पास ले गए ल महाचार्य ने युवराज से कहा --- " तुम इस शरीर के अंतिम परिणाम की चिंता से व्यथित हो ? आज तुम जिस भवन के स्वामी हो उसके जीर्ण होने पर तुम अन्यत्र निवास करोगे l यही नियम शरीर पर भी लागू होता है l यदि यह शरीर जीर्ण हो जाये तो इसमें रहने वाली आत्मा शरीर त्याग देती है और तब इस शरीर को नष्ट कर दिया जाता है l आत्मा के विकास हेतु यह शरीर उपकरण मात्र है उसके लिए चिंतित न हो l श्रेष्ठ और शुभ कर्मों से जीवन को सार्थक करो l "
26 December 2022
25 December 2022
WISDOM -----
' मृत्यु अटल सत्य है ' लेकिन संसार का प्रत्येक प्राणी चाहे वह पशु -पक्षी हो , कीट -पतंगे हो , जल , थल और नभ में रहने वाला कोई भी प्राणी हो सबको अपने शरीर से बहुत मोह होता है , कोई मरना नहीं चाहता l मनुष्य तो एक बुद्धिमान प्राणी है , वह चाहे कितना भी बीमार हो , गरीब हो , शरीर सूख गया हो लेकिन कोई मरना नहीं चाहता , सब जीना चाहते हैं l संसार में आकर्षण बहुत है और ' मोह ' है अपने से और अपनों से l पुराण की एक कथा है ----- महाराज प्रद्युम्न का रोग बहुत बढ़ गया , उनका अंत निकट आ गया , सभी वैद्य निराश होकर अपने घर लौट गए l राज परिवार बहुत परेशान था , कैसे भी हो राजा को बचाया जाये l प्रधान सचिव ने परामर्श कर आचार्य पुरन्ध्र को बुलवाया l आचार्य ने महाराज का पूर्ण परिक्षण किया और कहा कि अब उनमे जीवन के कोई लक्ष्ण शेष नहीं हैं l लेकिन राज परिवार हठ करने लगा कि आप तो सिद्ध पुरुष हैं , कैसे भी महाराज को बचाइए ! आचार्य ने बहुत समझाया कि आज बच भी गए तो यह जर्जर शरीर कब तक चलेगा , एक दिन तो जाना ही है l फिर यह शरीर छूता तो एक नया शरीर मिलेगा l आचार्य के उपदेश को किसी ने नहीं सुना , समझा ! तब आचार्य ने कहा --- हाँ , एक उपाय है , प्रधान सचिव , आप प्रयत्न करें तो महाराज के प्राण अभी बच सकते हैं l ' उन्होंने कहा --- आगया दें , हम महाराज के लिए सब कुछ करने को तैयार हैं l ' तब आचार्य ने कहा ---- " महाराज को अभी मर जाने दो l थोड़ी देर में ही राजोद्यान में आम का एक वृक्ष है , ये उसमे काष्ठ -कीट के रूप में जन्म लेंगे l आप उसे जा कर मार देना तो महाराज पुन: जीवित हो उठेंगे l " सब लोग बहुत प्रसन्न हुए और आचार्य के गुण गाने लगे l इस बीच महाराज को प्राणांत हो गया l शव को ढककर प्रधान सचिव राजोद्यान पहुंचे l थोड़ी ही देर में आचार्य ने जैसा बताया था वैसा ही एक कष्ट कीड़ा दिखाई दिया , प्रधान सचिव उसे पकड़ने के लिए पेड़ पर चढ़े l लेकिन कीड़ा अपनी जान बचाने के लिए एक डाल से दूसरी पर जाता रहा और फिर इस पेड़ से दुसरे पेड़ पर छलांग लगा ली l प्रधान ने बहुत पीछा किया लेकिन पकड़ न सके , निराश हो गए l आचार्य ने कहा --- कीड़े को अपने शरीर से इतना मोह है कि वह इसे त्यागकर राजा बनना नहीं चाहता l आचार्य ने अपनी दिव्य शक्ति से उसके मन की बात पता की और कहा कि यह कीड़ा अपने शरीर में प्रसन्न है , उसे इससे मोह है , उसे अपने कीट समुदाय में भी सब सुख हैं , भोग विलास सब है , वह इसे त्यागना नहीं चाहता इसलिए जान बचाने के लिए भाग रहा है l आचार्य ने कहा --इसी तरह हम भी एक अच्छे और नए जीवन के लिए भी डरते हैं , शरीर को त्यागना नहीं चाहते है l आचार्य की बात सुनकर सबका मोह टूटा और मृत्यु को अटल मानकर वे दाह -संस्कार की तैयारी में जुट गए l
24 December 2022
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- " हिरन , हाथी , पतंगा , मछली और भौंरा ये अपने -अपने स्वाभाव के कारण पांच विषयों में से केवल एक से आसक्त होने के कारण मृत्यु को प्राप्त होते हैं , तो इन पांच विषयों में जकड़ा हुआ असंयमी पुरुष कैसे बच सकता है l असंयमी की दुर्गति निश्चित है l " श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं ---- " जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है , वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है , वह एक ही इंद्रिय इस आयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है l ' आचार्य श्री , लिखते हैं --- इसका अर्थ यह हुआ कि मनुष्य को बहुत सावधान रहना चाहिए l एक ही इंद्रिय काफी है , जो मनुष्य को पतन की ओर ले जा सकती है l द्वापर युग में एक असुर था , जिसका नाम था शम्बरासुर l शम्बरासुर ने भगवान श्रीकृष्ण के बड़े पुत्र प्रद्युम्न जो कामदेव के अवतार थे , उनका हरण कर लिया था l रति भी उनके यहाँ कैद थी l शंबरासुर पाककला में निपुण स्त्रियों का ही अधिकतर हरण करता था l उसे खाने का बड़ा शौक था l वह चाहता था कि उसकी पाकशाला में बढ़िया स्वादिष्ट खाना बने और उसे खिलाया जाये l वह किसी स्त्री की खूबसूरती को नहीं देखता था और न ही उन्हें हाथ लगाता था l उस स्त्री का पाक कला में पारंगत होना जरुरी था l प्रद्युम्न ने उसे मारकर अगणित स्त्रियों को मुक्त किया l मात्र एक इंद्रिय ही उस असुर के पतन का कारण बनी --- सुस्वादु आहार का सेवन , दिन -रात उसी का चिन्तन l प्रत्येक मनुष्य को स्वयं अपना ही परीक्षण करना चाहिए l आचार्य जी लिखते हैं ---' अपनी दुष्प्रवृतियों को नियंत्रित कर लेना ही साधना है l '
22 December 2022
WISDOM ----
जब संसार में धर्म एक व्यवसाय बन जाता है तब सामान्य जन -जीवन दुःख , तनाव , चिंता , बीमारी , महामारी जैसी समस्याओं से चारों ओर से घिर जाता है l धर्म के नाम पर लड़ाई -झगडे करते रहने से बुद्धि कुंद हो जाती है l जीवन के और भी बहुत से पहलू हैं जिनमे थोड़ा -बहुत सुधार कर के स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है l पढना - लिखना , डिग्री होना एक अलग बात है , लेकिन विवेक होना बड़ी बात है और विवेकहीन व्यक्ति भेड़चाल चलता है l धर्म के संबंध में एक दुःखद बात यह भी है कि धर्म केवल पाखंड बन गया है l धर्म का असली मर्म नैतिकता , मानवीयता , सत्य , ईमानदारी , प्रेम , करुणा आदि सद्गुणों को लोग भूल गए हैं इसीलिए संसार में युद्ध , आतंक , लूट , हत्या , आत्महत्या , विवाद आदि बढ़ गए हैं l ------ कांचीपुरम में किसी ने विनोबा जी से कहा कि यहाँ एक ऐसा समुदाय है , जो ईश्वर को नहीं मानता l वे कहने लगे --- " इसमें कौन सी नई बात है ! ऐसे आदमी सारे देश में हैं , सारी दुनिया में हैं l हमें इसकी कोई परवाह नहीं करनी चाहिए , क्योंकि वे लोग भगवान को भले ही नहीं माने, भगवान तो उनको मानता है l बच्चा माँ को भूल जाये तो कोई बात नहीं l माँ बच्चे को भूल जाये , तो बड़ी बात है l आगे वे कहते हैं कि --- " जो यह कहते हैं कि हम भगवान को नहीं मानते , वे यह तो कहते हैं कि हम सज्जनता को मानते हैं , मानवता को मानते हैं l हमारे लिए तो इतना ही बहुत है l मानवता को मानना और ईश्वर को मानना हमारी द्रष्टि में एक ही बात है l जो भगवान को मानते हैं , देखना चाहिए कि वे मानवता , करुणा , दया , सेवा में कितना विश्वास रखते हैं l मूल्यांकन इसी आधार पर होना चाहिए l विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली कि अब मनुष्य स्वयं को ही भगवान समझने लगा है , चाहे जिस आकार -प्रकार की सब्जी , फल उगा ले , चिकित्सा के आधुनिक तरीकों से सबको स्वस्थ कर दे लेकिन ऐसा समझना मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है l भोजन सामग्री , मिटटी सब रासायनिक पदार्थों से प्रदूषित हो गई l अब किसी की सामान्य मृत्यु हो , यह तो सुनने में नहीं आता l जो भी मरता है वह किसी न किसी बीमारी या हादसे से ही मृत्यु को प्राप्त होता है l यह चिन्तन का विषय है कि यह कैसी उपलब्धि है ?
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21 December 2022
WISDOM ----
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य के शिष्य कृष्ण बोधाश्रम 120 वर्ष जीवित रहे l एक बार वे प्रवास पर थे l उस इलाके में लगातार चार साल पानी नहीं गिरा था l कुएं , तालाबों का पानी सूख गया था l सभी आए और कहा --- महाराज जी ! उपाय बताएं l " वे बोले --- पुण्य होंगे तो भगवान प्रसन्न होंगे l " लोगों ने पूछा --- 'क्या पुण्य करें ? तो वे बोले ---" सामने तालाब है , उसमें थोडा ही पानी है इस कारण मछलियाँ मर रही हैं l " लोग बोले --- " हमारे लिए पानी नहीं हैं है , मछलियों को पानी कहाँ से दे. l " महाराज ने कहा --- " कहीं से भी लाओ और तालाब में डालो l सभी ने तालाब में पानी डालना शुरू किया l तीसरे दिन बादल आए और महीने भर तक मूसलाधार पानी बरसा l
20 December 2022
WISDOM ----
एक बादशाह अपने गुलाम के साथ नाव में यात्रा कर रहा था l गुलाम ने कभी नौका में सफ़र नहीं किया था , इसलिए उसे कुछ अटपटा लग रहा था वह उन्मत्त बन्दर की भांति नाव में उछल -कूद मचा रहा था l इससे सभी लोग परेशान हो रहे थे l मल्लाह ने उसे कई बार समझाया कि इस तरह नाव डूब सकती है लेकिन उसकी समझ में कुछ न आया नाव में एक दार्शनिक भी था , उसने बादशाह से कहा --" जहाँपनाह , आप इजाजत दें तो मैं इस गुलाम को भीगी बिल्ली बना सकता हूँ l " बादशाह ने तत्काल अनुमति दे दी l दार्शनिक ने दो यात्रियों का सहारा लिया और उस गुलाम को नाव से उठाकर नदी में फेंक दिया l गुलाम को तैरना नहीं आता था , जब डूबने लगा तो उसने नाव के खूंटे को कसकर पकड़ लिया l कुछ देर बाद दार्शनिक ने उसे खींचकर नाव में चढ़ा लिया l वह गुलाम अब कोने में जाकर ऐसे चुपचाप बैठ गया मानो भीगी बिल्ली हो l नाव के यात्रियों और बादशाह को भी गुलाम के इस संयमित व्यवहार पर आश्चर्य हुआ l बादशाह ने दार्शनिक से पूछा --- 'यह पहले उन्मत्त बन्दर की भांति हरकतें कर रहा था , अब इतना सयाना बनकर कैसे बैठा है l दार्शनिक ने जवाब दिया --- " स्वयं आपत्ति और दुःख का स्वाद चखे बिना किसी को पराये दुःख और विपत्ति का एहसास नहीं होता l इस गुलाम को जब मैंने पानी में फेंक दिया और इसके मुंह में पानी भरने लगा तब इसे पता चला कि नाव डूब गई तो सब यात्रियों की क्या हालत होगी l
WISDOM
दूध ने पानी से कहा --- बन्धु, किसी मित्र के बिना मेरा ह्रदय सूना है l आओ मैं तुम्हे ह्रदय से लगा लेना चाहता हूँ l पानी ने कहा --- भाई , तुम्हारी बात तो मुझे पसंद है , पर यकीन नहीं होता कि अग्नि परीक्षा के समय भी तुम मुझसे अलग न होगे l दूध ने वचन दिया --ऐसा ही होगा और दोनों में मित्रता हो गई , ऐसी कि उनके पृथक स्वरुप को पहचानना कठिन हो गया l अग्नि हर रोज परीक्षा लेती है और पानी को जलाती है , पर दूध है कि वह हर बार मित्र की रक्षा के लिए अपने आप को जला देता है l दूध और पानी जैसा मेल ही मनुष्य के पारिवारिक और सामाजिक जीवन को सफल बनाता है l