10 July 2025

WISDOM ------

   सिकंदरिया का  राजा  टालेमी  , यूक्लिड  से   ज्यामिति  सीख  रहा  था  ,  किन्तु  यह  कठिन  विद्या  उसके  पल्ले  ही  नहीं  पड़  रही  थी  l  एक  दिन  टालेमी  अपना  धैर्य  खो  बैठा  l  उसने  अपने  गुरु  से  पूछा  ---- "  क्या  ज्यामिति  सीखने  का  कोई  सरल  मार्ग  नहीं  है  ? "    यूक्लिड  ने  गंभीरता  से  कहा  --- "  राजन  !  आपके  राज्य  में   जनसाधारण  और  अभिजात  वर्ग  के  लिए   पृथक    मार्ग  हो  सकते  हैं  ,  किन्तु  ज्ञान  का  मार्ग  सबके  लिए   एक  सा  ही  है  l  इसमें  अभिजात  वर्ग  के  लिए   कोई  राजमार्ग  नहीं  है  l "   यह  बात  टालेमी  को  समझ  में  आ  गई  l  फिर  इसके  बाद  टालेमी   ज्यामिति  सीखने  के  लिए  कठोर  परिश्रम  करने  लगा  l  

9 July 2025

WISDOM ---

 कहते  हैं  यदि  भगवान  नाराज  हो  जाएँ  तो  गुरु  बचाने  वाले  हैं  ,  लेकिन  यदि  गुरु  नाराज  हो  जाएँ   तो  उसे   कोई  नहीं  बचा  सकता  l  गुरु  पूर्णिमा  को  ' व्यास  पूर्णिमा '  भी  कहा  जाता  है  l  महर्षि  वसिष्ठ  के  पौत्र  ,  महर्षि  पराशर  के  पुत्र   ' वेदव्यास '  जन्म  के  कुछ  समय  बाद  ही   अपनी  माँ  से  आज्ञा  लेकर  तपस्या  करने  चले  गए  थे  l  वेदों  को  विस्तार  प्रदान  करने  के  कारण   ही  इनका  नाम  'वेदव्यास ' पड़ा  l  ' गुरु पूर्णिमा  '  का  पर्व  गुरु  के  प्रति  समर्पित  है  l  '  सच्चे  गुरु  के  लिए  सैकड़ों  जन्म  समर्पित  किए  जा  सकते  हैं  l  सच्चा  गुरु  वहां  पहुंचा  देता  है  ,  जहाँ  शिष्य  अपने  पुरुषार्थ  से   कभी  नहीं  पहुँच  सकता  l "    गुरु  के  द्वारा  कहे  गए  वाक्य  मूलमंत्र  हैं   , वे  हमें  जीवन  जीना  सिखाते  हैं  l  l    बाहरी  शत्रुओं  से  तो  एक  बार  हम  अपनी  शक्ति  और  सामर्थ्य  से  लड़कर  विजयी  हो  भी  सकते  हैं   लेकिन  अपने  भीतरी  शत्रुओं  ---काम , क्रोध , लोभ  और  अहंकार  पर    विजय   तो  केवल  और  केवलमात्र  गुरु  कृपा  से  ही  संभव  है l  अपनी  पूजा -साधना  से   हम  अपने  मानसिक  विकारों  को  पराजित  नहीं  कर  सकते   l  अहंकार  और  कामवासना  जैसे   दुष्ट   शत्रुओं  पर  विजय  प्राप्त  करना   तो  असंभव  है   लेकिन  सच्चे  गुरु  असंभव  को  संभव  कर  देते  हैं  l  वे  एक   बार  नहीं  अनेकों  बार  अपने  शिष्य  को  गहरी  खाई  में  गिरने  से  बचाते  हैं  ,  उसे  जीवन  जीना  सिखाते  हैं  ,  उसकी  चेतना  का  विस्तार  करते  हैं  l  गुरु  की  कृपा  प्राप्त  करने  के  लिए  शिष्य  को  भी  सच्चा  शिष्य  बनना  होगा  l  गुरु  ने  अपने  प्रवचनों  और  साहित्य  के  द्वारा  जो  विचार  हमें  दिए  ,  जो  मार्ग  दिखाया  ,  उसका   अनुसरण   करें  l 

6 July 2025

WISDOM ------

ईश्वर  ने  इस  स्रष्टि  का  निर्माण  किया  , इसमें  उन्हें  यह  धरती  सबसे  अधिक  प्रिय  है  l  इस  पृथ्वी  का  प्रत्येक  कण  उपयोगी  है  l   एक  बार  ब्रह्माजी  ने  महर्षि  जीवक  को   आदेश  दिया  कि   पृथ्वी  पर   जो  भी  पत्ता -पौधा  , वृक्ष -वनस्पति   व्यर्थ  दिखाई  दे  ,  उन्हें  यहाँ  ले  आओ  l   लगातार  12  वर्षों  तक   पृथ्वी  पर  घूमने  के  बाद   महर्षि  लौटे   और  ब्रह्मा जी  के  समक्ष  नत -मस्तक  होकर  बोले  , प्रभो  !  मैं  इन  12  वर्षों  में   पूरी  पृथ्वी  पर  भटका  हूँ  l  प्रत्येक  पौधे  के  गुण -दोष  को  परखा  है  l  पर  पृथ्वी  पर   एक  भी  ऐसी   वनस्पति  नहीं  मिली   जो  किसी  न  किसी   व्याधि  के  उन्मूलन  में   सहायक  न  हो   l   "  पृथ्वी  पर  विद्यमान  प्रत्येक   तिनके  का , जीव -जंतु , कीट -पतंगे  , वृक्ष , वनस्पति , नदी ,  पर्वत, समुद्र   सबका  महत्त्व  है  l     जब  मनुष्य  अपने  श्रेष्ठ  कर्म  से    धरती  रूपी  इस  बगिया  को  सुन्दर  बनाने  का  प्रयास  करता  है   तो  ईश्वर  को  प्रसन्नता  होती  है   और  लोगों   के    जीवन  सुख -शांति   व  आनंद  रहता  है  l  मनुष्य  की  सबसे  बड़ी  भूल  यह  हो  गई  कि  उसने  ईश्वर  के  सन्देश  को  समझा  नहीं   और  इस  पृथ्वी  को  केवल  भौतिक  द्रष्टि  से  सुन्दर  बनाने  का  प्रयास  किया  l  मनुष्य  शरीर  में  रहकर  पशुवत  व्यवहार  करने  लगा  , अपनी  चेतना  को   उच्च  स्तर  पर  ले  जाने  का  कोई  प्रयास  नहीं  किया  l   अपनी  बुद्धि  का  दुरूपयोग  कर   उसने  सम्पूर्ण  प्रकृति  को  प्रदूषित  कर  दिया  l  यही  कारण  है  कि  अब  संसार  में  आपदाएं -विपदाएं  बहुत  अधिक  हैं  l  प्रकृति  इसी  ढंग  से  अपना  क्रोध  प्रकट  करती  है  l  जब  मनुष्य  स्वयं  को  भगवान  समझने  लगता  है  तब  ईश्वर  इसी  तरीके  से  मनुष्य  को  समझाते  हैं  l  कोरा  विज्ञान    केवल  नाश  कर  सकता  है  , अपने  द्वारा  किए  गए  विकास  को  अपने  ही  हाथों  नष्ट  कर  सकता  है  l  इसलिए  विज्ञानं  को  अध्यात्म  के  साथ  जोड़ो  l  मनुष्य  शरीर केवल  एक  मशीन  नहीं  है  , इसमें  भावनाएं  भी  हैं  , भावनाओं  के  बिना  यह  जीवन   अधूरा  है  , और  अध्यात्म  हमें   श्रेष्ठ  भावनाओं  और  श्रेष्ठ  विचारों  से  जोड़कर  इनसान   बनाता  है  l   पृथ्वी    का  सौन्दर्य  उस  पर  रहने  वाले  मनुष्यों  से  नहीं  है  ,  मनुष्य  नामक  प्राणी  में  कितनी  इंसानियत  है , मानवता  है   यही   उसका  सौन्दर्य  है  l  अपनी  श्रेष्ठ  संतानों  पर  ही  माँ  को  गर्व  होता  है  l  

5 July 2025

WISDOM ------

  श्री माँ ( श्री अरविन्द  आश्रम ) पांडिचेरी  लौट  रही  थीं  l l  तूफ़ान  के  कारण  जहाज  में  हिचकोले  लगने  लगे  l  अंत:द्रष्टि  संपन्न  श्री माँ  ने  देखा   कि  संभवतः  कोई  भी  न  बचे  , ऐसा  भयंकर  तूफान  है  l  उन्होंने  सुप्रसिद्ध  तंत्र  विशेषज्ञ  ' तेओं '  से  दीक्षा  ली  थी  l  वे  केबिन  में  चली  गईं   और  स्वयं  को  बंद  कर  लिया  l  सूक्ष्म  शरीर  से  वे  समुद्र  में  चली  गईं  l  उन्होंने  देखा  , कुछ  सूक्ष्म  शरीरधारी  आत्माएं   समुद्र  के  पानी  को   तीव्र  वेग  से  उछाल  रही  हैं  l  उनसे  उन्होंने  वार्तालाप  किया  l  वे  बोलीं  ---- "  हम  तो  खेल  रहे  हैं  l  आपका  जहाज  ही  बीच  में  आ  गया  l "  श्री माँ  ने  कहा --- " आप  थोड़ी  देर  विराम  कर  लें  l  हम  इस  बीच  जहाज  निकाल  लेंगे  l "   श्री  माँ  यह  विनती  कर  के  केबिन  से  बाहर  आ  गईं  l अचानक  तूफान   थम  गया  l  उन्होंने  कहा --- " तुरंत  जहाज  निकाल  लो  l  फिर  तूफान  आ  सकता  है  l "  स्पीड  बढ़ाकर  जहाज  निकाला  गया  l  देखा  गया  पीछे  फिर  तूफान  आरम्भ  हो  चुका  था  l  ' श्वेत कमल '  ग्रन्थ  में  इस  घटना  का  उल्लेख  है  l  

4 July 2025

WISDOM -----

   इस  युग  की  सबसे  बड़ी  त्रासदी  यह  है  कि  मनुष्य  के  भीतर  ज्ञान  तो  बढ़ता  जा  रहा  है  लेकिन  वह  विवेकशून्य  होता  जा  रहा  है  l  उसे  स्वयं  नहीं  मालूम  कि  वह  आखिर  चाहता  क्या  है  ?   भीषण  युद्ध  हो  रहे , दंगे  हो  रहे  , बेकसूर  लोग  मारे  जा  रहे  हैं  l  बेकसूर  महिला , बच्चों  को  मारने  और  पर्यावरण  को  प्रदूषित  करने  का  कोई  ठोस  कारण  नजर  नहीं  आता  l  दुर्बुद्धि  का  सबसे  बड़ा  प्रमाण  तो  यह  है  कि  जब  कहीं  वश  न  चले  तो  धार्मिक  स्थलों  को , प्राचीन  मूर्तियों  को  ही  तोड़  डालो  l  यदि  इस  संबंध  में  गहराई  से  विचार  करें  तो  एक  बात  स्पष्ट  है  कि  मनुष्य  कितना  भी  आधुनिक  हो  जाए  वह    ईश्वर  से  डरता  तो  है   लेकिन   ईश्वर  की  प्रतीक  मूर्तियों  को  तोड़कर  वह  स्वयं  को  नास्तिक   होने  का  दिखावा  करता  है  l  प्रत्येक  मनुष्य  के  भीतर  एक  आत्मा  है  , जो  पवित्र  है  l  व्यक्ति  जो  भी  कुकर्म  करता  है  ,  उसकी  आत्मा  उसे  बार -बार  बताती  है  कि  तुम  ये  गलत  कर  रहे  हो   लेकिन  वह  अपनी  आत्मा  की  आवाज  को  अनसुना  कर  देता  है   और  एक  बड़े  अपराधी  की  तरह   अपने  कुकर्मों  के   सबूत    मिटाना  चाहता  है  l  उसे  लगता  है  कि   धार्मिक  स्थल  और  उनमें  छिपा  बैठा  ईश्वर  उसे  देख  रहा  है  ,  कहीं  उसे  दंड  न  दे  दे  , इसलिए  इस  सबूत  को  मिटा  डालो  l  ऐसे  लोग  वास्तव  में  बड़े  भोले  हैं  , उन्हें  नहीं  मालूम  ईश्वर  तो  प्रकृति  के  कण -कण  में  है  , वे  हजार  आँखों  से  हमें  देख  रहे  हैं  l  एक  आस्तिक  व्यक्ति  तो  अपने  धार्मिक  स्थल  पर   अपने  तरीके  से  पूजा -पाठ  कर  लौट  आता  है  , वहां  ईश्वर  हैं  या  नहीं  , यह  सोचने  की  उसे  फुर्सत  नहीं  है  क्योंकि  दैनिक  जीवन की  अनेक  समस्याएं  हैं   लेकिन  जो   ईश्वर  के  प्रतीक  चिन्हों  को  तोड़ते  हैं  , वे  अवश्य  ही  किसी  न  किसी  जन्म  में  ईश्वर  के  बड़े  भक्त  रहे  होंगे  , वे  इन  प्रतीकों  में  ईश्वर  का  अस्तित्व  देखते  हैं  , उनकी  निगाहों  से  डरते  हैं   इसलिए  उन्हें  मिटाकर  चैन  की  साँस  लेते  हैं  l  बड़े -बड़े  भक्तों  से  भी  कभी  कोई  गलती  हो  जाती  है , वे  अपनी  राह  भटक  जाते  हैं  l  उन्हें  अपना    पूर्व  जन्म  याद  नहीं  आता   इसलिए  पाप  के  मार्ग  पर  चलते  जाते  हैं  l  यदि  उनके  जीवन  को  सही  दिशा  मिल  जाये  , वे  स्वयं  को  पहचान  जाएँ  तो  संसार  में  बिना  वजह  के  युद्ध , दंगे  सब  समाप्त  हो  जाएँ  l  बड़ी  मुश्किल  से  जो  मानव  जन्म  मिला  ,  उसे  सुकून  के  साथ  जी  सकें  l  

2 July 2025

WISDOM ------

प्रकृत्ति  के  कण -कण  में  भगवान  हैं   लेकिन  मनुष्य  पर  दुर्बुद्धि  का  ऐसा  प्रकोप  है  कि  वह  स्वयं  को  भगवान  समझने  लगा  है   और  अपनी  शक्ति  व  वैभव  का  दुरूपयोग  कर  मानवता  को  ही  समाप्त  करने  पर  उतारू  है  l  ऐसे  ' महामानवों '  को  समझना  चाहिए  क्या  वे  नदी , समुद्र , पहाड़ , आकाश  , मिटटी  और  सम्पूर्ण  प्रकृत्ति  का  सृजन  कर  सकते  हैं  ?   ध्वंस  बहुत  सरल  है   l  हमारे  धर्म  में  पेड़ -पौधे , नदी , पर्वत  , आकाश  सभी  को  देवी -देवता  के  रूप  में  पूजने  का  विधान  है  l  हम  उन्हें  सम्मान  देते  हैं , नष्ट  नहीं  करते  क्योंकि  हम  सब  एक  माला  के  मोती  है  , प्रत्येक  मोती  का  अपना  महत्त्व  है  l  --------पुराणों  में   गोवर्धन  पर्वत  के  संबंध  में  कथा  आती  है   कि  वह  कभी  सुमेरु  पर्वत  का  शिखर  हुआ  करता  था  l  जब  श्री  हनुमान  जी  सेतुबंधन  के  समय  उसे  ला  रहे  थे   तो  उनके  ब्रजभूमि  तक  पहुँचते -पहुँचते   घोषणा  हो  गई  कि  सेतुबंधन  का  कार्य  पूरा  हो  गया  है  l  अब  पर्वत  लाने  की  आवश्यकता  नहीं  है  l  यह   घोषणा   सुनकर  हनुमान जी  ने   गोवर्धन  पर्वत  को  वहीँ  रख  देना  चाहा  , जहाँ  से  वे  उसे  उठाकर  ला  रहे  थे  l  ऐसे  में  गोवर्धन  पर्वत  ने   श्री  हनुमान जी  से  कहा  ---- "  तुम  मुझे  घर  से , परिवार  से , कुटुंब  से  अलग  कर  के   भगवान  की  सेवा  के  लिए   ले  जा  रहे  थे  ,  सो  तू  ठीक  था  ,  लेकिन  अब  मुझे  भगवान  की  सेवा  में  लगाए  बिना   मार्ग  में  यों  ही  छोड़  देना  ,  यह  किसी  भी  द्रष्टि  से  उचित  नहीं  है  l  हमारे  लिए  उचित  व्यवस्था  बनाए  बिना  छोड़कर  मत  जाओ  l "  हनुमान जी  असमंजस  में  पड़े  तो  उन्होंने  भगवान  राम  से  पूछा  --- "  क्या  किया  जाए  ? "   भगवान  राम  ने  उत्तर  दिया  ---- "  गोवर्धन  को  ब्रज  में  स्थापित  कर  दो  l  अभी  तो  मेरा  राम  अवतार  है  ,  जब  मैं  कृष्ण  अवतार  में  आऊंगा   तब  गोवर्धन  को  अपना  लीलाकेंद्र  बनाऊंगा  l  अभी  तो  उसे  यहाँ  सेतु  पर  रख  दिया  जाए   तो  मैं  सेतु  पार  करते  समय  उस  के  ऊपर  पाँव  रखकर  निकल  जाऊंगा  l  लौटते  समय  संभव  है  कि  सेतु  का  प्रयोग  न  करना  पड़े  l  इसलिए  ब्रज  में  गोवर्धन  के  स्थापित  हो  जाने  पर   कृष्ण  अवतार  में  मैं   उस  पर  गाय  चराने  के  लिए  नंगे  पाँव  विचरण  करूँगा  ,  उसके  झरनों  के  जल  में  स्नान  करूँगा  ,  उसकी  मिटटी  को  अपने  शरीर  में  लगाऊंगा  ,  उसके  फूलों  से  अपना  श्रंगार  करूँगा   और  अपना  सम्पूर्ण  किशोर काल  वहीँ  गुजारूँगा  l "    भगवान  की  इस  घोषणा  से  संतुष्ट  होकर    गोवर्धन  ब्रजभूमि  में  स्थापित  हो  गए  l  

16 June 2025

WISDOM ------

 आज  संसार  में  जितनी  भी  आपदाएं -विपदाएं  हैं  ,  उनके  मूल  में  कारण   ' आर्थिक '  है  l  धन  जीवन  के  लिए  बहुत  जरुरी  है    लेकिन  धन  को  ही  सब  कुछ  मान  लेने  के  कारण   आज  मानव  जीवन  का  प्रत्येक  क्षेत्र  व्यापार  बन  गया  है   और  व्यापारी  केवल  अपना  लाभ  देखता  है  l  जो  जितना  अमीर  है  , उसका  लालच  उतना  ही  बड़ा  है  l  गरीब  तो  सूखी  रोटी  खाकर  चैन  से  सोता  है  लेकिन  अमीर  और  अमीर ----और  अमीर  ----  बनने  के  लिए   कोई  कोर -कसर  बाकी  नहीं  रखते  l  उनकी  इस  अंधी  दौड़  के  कारण  ही   सम्पूर्ण  मानव  जाति  पर  खतरा  है  l  धन  की  अति  लालसा  ने  ईमानदारी  के  गुण  को  ही  समाप्त  कर  दिया  है  l  मनुष्य  न  घर  में  सुरक्षित  है  , न  बाहर  l  ईश्वर  कभी  किसी  का  बुरा  नहीं  चाहते   l  मानव  जीवन  पर  आज  जो  भी  विपत्तियाँ  हैं  , वे  सब  मानव निर्मित  है  l  रावण , कंस , भस्मासुर , हिरण्यकश्यप   के  पास   धन -संपदा  , सुख -वैभव  की  कोई  कमी  नहीं  थी   लेकिन  इनकी   गन्दी  मानसिकता  के  कारण  प्रजा  परेशान  थी  l  ये  असुर  भी  स्वयं  को  भगवान  समझते  थे   लेकिन  मृत्यु  भेदभाव  नहीं  करती  l  l