सिकंदरिया का राजा टालेमी , यूक्लिड से ज्यामिति सीख रहा था , किन्तु यह कठिन विद्या उसके पल्ले ही नहीं पड़ रही थी l एक दिन टालेमी अपना धैर्य खो बैठा l उसने अपने गुरु से पूछा ---- " क्या ज्यामिति सीखने का कोई सरल मार्ग नहीं है ? " यूक्लिड ने गंभीरता से कहा --- " राजन ! आपके राज्य में जनसाधारण और अभिजात वर्ग के लिए पृथक मार्ग हो सकते हैं , किन्तु ज्ञान का मार्ग सबके लिए एक सा ही है l इसमें अभिजात वर्ग के लिए कोई राजमार्ग नहीं है l " यह बात टालेमी को समझ में आ गई l फिर इसके बाद टालेमी ज्यामिति सीखने के लिए कठोर परिश्रम करने लगा l
10 July 2025
9 July 2025
WISDOM ---
कहते हैं यदि भगवान नाराज हो जाएँ तो गुरु बचाने वाले हैं , लेकिन यदि गुरु नाराज हो जाएँ तो उसे कोई नहीं बचा सकता l गुरु पूर्णिमा को ' व्यास पूर्णिमा ' भी कहा जाता है l महर्षि वसिष्ठ के पौत्र , महर्षि पराशर के पुत्र ' वेदव्यास ' जन्म के कुछ समय बाद ही अपनी माँ से आज्ञा लेकर तपस्या करने चले गए थे l वेदों को विस्तार प्रदान करने के कारण ही इनका नाम 'वेदव्यास ' पड़ा l ' गुरु पूर्णिमा ' का पर्व गुरु के प्रति समर्पित है l ' सच्चे गुरु के लिए सैकड़ों जन्म समर्पित किए जा सकते हैं l सच्चा गुरु वहां पहुंचा देता है , जहाँ शिष्य अपने पुरुषार्थ से कभी नहीं पहुँच सकता l " गुरु के द्वारा कहे गए वाक्य मूलमंत्र हैं , वे हमें जीवन जीना सिखाते हैं l l बाहरी शत्रुओं से तो एक बार हम अपनी शक्ति और सामर्थ्य से लड़कर विजयी हो भी सकते हैं लेकिन अपने भीतरी शत्रुओं ---काम , क्रोध , लोभ और अहंकार पर विजय तो केवल और केवलमात्र गुरु कृपा से ही संभव है l अपनी पूजा -साधना से हम अपने मानसिक विकारों को पराजित नहीं कर सकते l अहंकार और कामवासना जैसे दुष्ट शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना तो असंभव है लेकिन सच्चे गुरु असंभव को संभव कर देते हैं l वे एक बार नहीं अनेकों बार अपने शिष्य को गहरी खाई में गिरने से बचाते हैं , उसे जीवन जीना सिखाते हैं , उसकी चेतना का विस्तार करते हैं l गुरु की कृपा प्राप्त करने के लिए शिष्य को भी सच्चा शिष्य बनना होगा l गुरु ने अपने प्रवचनों और साहित्य के द्वारा जो विचार हमें दिए , जो मार्ग दिखाया , उसका अनुसरण करें l
6 July 2025
WISDOM ------
5 July 2025
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श्री माँ ( श्री अरविन्द आश्रम ) पांडिचेरी लौट रही थीं l l तूफ़ान के कारण जहाज में हिचकोले लगने लगे l अंत:द्रष्टि संपन्न श्री माँ ने देखा कि संभवतः कोई भी न बचे , ऐसा भयंकर तूफान है l उन्होंने सुप्रसिद्ध तंत्र विशेषज्ञ ' तेओं ' से दीक्षा ली थी l वे केबिन में चली गईं और स्वयं को बंद कर लिया l सूक्ष्म शरीर से वे समुद्र में चली गईं l उन्होंने देखा , कुछ सूक्ष्म शरीरधारी आत्माएं समुद्र के पानी को तीव्र वेग से उछाल रही हैं l उनसे उन्होंने वार्तालाप किया l वे बोलीं ---- " हम तो खेल रहे हैं l आपका जहाज ही बीच में आ गया l " श्री माँ ने कहा --- " आप थोड़ी देर विराम कर लें l हम इस बीच जहाज निकाल लेंगे l " श्री माँ यह विनती कर के केबिन से बाहर आ गईं l अचानक तूफान थम गया l उन्होंने कहा --- " तुरंत जहाज निकाल लो l फिर तूफान आ सकता है l " स्पीड बढ़ाकर जहाज निकाला गया l देखा गया पीछे फिर तूफान आरम्भ हो चुका था l ' श्वेत कमल ' ग्रन्थ में इस घटना का उल्लेख है l
4 July 2025
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इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि मनुष्य के भीतर ज्ञान तो बढ़ता जा रहा है लेकिन वह विवेकशून्य होता जा रहा है l उसे स्वयं नहीं मालूम कि वह आखिर चाहता क्या है ? भीषण युद्ध हो रहे , दंगे हो रहे , बेकसूर लोग मारे जा रहे हैं l बेकसूर महिला , बच्चों को मारने और पर्यावरण को प्रदूषित करने का कोई ठोस कारण नजर नहीं आता l दुर्बुद्धि का सबसे बड़ा प्रमाण तो यह है कि जब कहीं वश न चले तो धार्मिक स्थलों को , प्राचीन मूर्तियों को ही तोड़ डालो l यदि इस संबंध में गहराई से विचार करें तो एक बात स्पष्ट है कि मनुष्य कितना भी आधुनिक हो जाए वह ईश्वर से डरता तो है लेकिन ईश्वर की प्रतीक मूर्तियों को तोड़कर वह स्वयं को नास्तिक होने का दिखावा करता है l प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक आत्मा है , जो पवित्र है l व्यक्ति जो भी कुकर्म करता है , उसकी आत्मा उसे बार -बार बताती है कि तुम ये गलत कर रहे हो लेकिन वह अपनी आत्मा की आवाज को अनसुना कर देता है और एक बड़े अपराधी की तरह अपने कुकर्मों के सबूत मिटाना चाहता है l उसे लगता है कि धार्मिक स्थल और उनमें छिपा बैठा ईश्वर उसे देख रहा है , कहीं उसे दंड न दे दे , इसलिए इस सबूत को मिटा डालो l ऐसे लोग वास्तव में बड़े भोले हैं , उन्हें नहीं मालूम ईश्वर तो प्रकृति के कण -कण में है , वे हजार आँखों से हमें देख रहे हैं l एक आस्तिक व्यक्ति तो अपने धार्मिक स्थल पर अपने तरीके से पूजा -पाठ कर लौट आता है , वहां ईश्वर हैं या नहीं , यह सोचने की उसे फुर्सत नहीं है क्योंकि दैनिक जीवन की अनेक समस्याएं हैं लेकिन जो ईश्वर के प्रतीक चिन्हों को तोड़ते हैं , वे अवश्य ही किसी न किसी जन्म में ईश्वर के बड़े भक्त रहे होंगे , वे इन प्रतीकों में ईश्वर का अस्तित्व देखते हैं , उनकी निगाहों से डरते हैं इसलिए उन्हें मिटाकर चैन की साँस लेते हैं l बड़े -बड़े भक्तों से भी कभी कोई गलती हो जाती है , वे अपनी राह भटक जाते हैं l उन्हें अपना पूर्व जन्म याद नहीं आता इसलिए पाप के मार्ग पर चलते जाते हैं l यदि उनके जीवन को सही दिशा मिल जाये , वे स्वयं को पहचान जाएँ तो संसार में बिना वजह के युद्ध , दंगे सब समाप्त हो जाएँ l बड़ी मुश्किल से जो मानव जन्म मिला , उसे सुकून के साथ जी सकें l
2 July 2025
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16 June 2025
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आज संसार में जितनी भी आपदाएं -विपदाएं हैं , उनके मूल में कारण ' आर्थिक ' है l धन जीवन के लिए बहुत जरुरी है लेकिन धन को ही सब कुछ मान लेने के कारण आज मानव जीवन का प्रत्येक क्षेत्र व्यापार बन गया है और व्यापारी केवल अपना लाभ देखता है l जो जितना अमीर है , उसका लालच उतना ही बड़ा है l गरीब तो सूखी रोटी खाकर चैन से सोता है लेकिन अमीर और अमीर ----और अमीर ---- बनने के लिए कोई कोर -कसर बाकी नहीं रखते l उनकी इस अंधी दौड़ के कारण ही सम्पूर्ण मानव जाति पर खतरा है l धन की अति लालसा ने ईमानदारी के गुण को ही समाप्त कर दिया है l मनुष्य न घर में सुरक्षित है , न बाहर l ईश्वर कभी किसी का बुरा नहीं चाहते l मानव जीवन पर आज जो भी विपत्तियाँ हैं , वे सब मानव निर्मित है l रावण , कंस , भस्मासुर , हिरण्यकश्यप के पास धन -संपदा , सुख -वैभव की कोई कमी नहीं थी लेकिन इनकी गन्दी मानसिकता के कारण प्रजा परेशान थी l ये असुर भी स्वयं को भगवान समझते थे लेकिन मृत्यु भेदभाव नहीं करती l l