16 July 2025

WISDOM -------

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- ' अहंकार  जब  व्यक्ति  के  सिर  पर  चढ़ता  है  तो  उसे  एहसास  कराता  है  कि कोई  उसका  कुछ  भी  नहीं  बिगाड़  सकता  , क्योंकि  वह  सबसे  श्रेष्ठ  है  , वह  शक्तिमान  है  , दुनिया  उसी  के  इशारों  पर  चल  रही  है  , उसके  बिना  कुछ  भी  नहीं  हो  सकता  l  लेकिन  ऐसा  संभव  नहीं  है  , इसलिए  एक  न  एक  दिन  वह  पराजित  होता  है   और  उसकी  पराजय  उसे  यह  एहसास  कराती  है   अहंकार  का  नाश  होना  ही  एकमात्र  सच्चाई  है  l '  आचार्य श्री  कहते  हैं ---" हमारे  व्यक्तित्व  की  सार्थकता   सद्भावनाओं , सद्विचारों   और  सत्कर्मों  से  है  , अहंकार  के  अनुचित  पोषण  में  नहीं  l  पूरे  जीवन  केवल  अहंकार   को  पोषित  करने   के  लिए  जिया  जाए   तब  भी  उसकी  संतुष्टि   संभव  नहीं  है  l '------ एक  सत्य घटना  है ---  दक्षिण  में  मोरोजी  पंत  नामक  एक  बहुत  बड़े  विद्वान  थे  l  उनको  अपनी  विद्या  का  बहुत  अभिमान  था  l  वे  अपने  समान  किसी  को  भी  विद्वान  नहीं  मानते  थे  और  सबको  नीचा  दिखाते  रहते  थे  l  एक  दिन  की  बात  है   वे  दोपहर  के  समय  अपने  घर  से   स्नान  करने  के  लिए   नदी  पर  जा  रहे  थे  l  मार्ग  में  एक  पेड़  पर  दो  ब्रह्मराक्षस   बैठे  हुए  थे  l  वे  आपस  में  बातचीत  कर  रहे  थे  l   एक  ब्रह्मराक्षस  बोला  --- "  हम  दोनों  इस  पेड़  की  दो  डालियों  पर  बैठे  हैं  , पर  यह  तीसरी  डाली  खाली  है  ,  इस  पर  बैठने  के  लिए  कौन  आएगा  ? "   तो  दूसरा  ब्रह्मराक्षस  बोला  ----- "  यह  जो  नीचे  से  जा  रहा  है  न  ,  यहाँ  आकर  बैठेगा  , क्योंकि  इसको  अपनी  विद्वता  का  बहुत  अभिमान  है  l "  उन  दोनों  के  संवाद  को  मोरोजी  पंत  ने  सुना   तो  वे  वहीँ  रुक  गए   और  विचार  करने  लगे  कि  हे  भगवन  !  विद्या  के  अभिमान  के  कारण  मुझे  प्रेतयोनि  में  जाना  पड़ेगा , ब्रह्मराक्षस  बनना  पड़ेगा  l  वे  अपनी  होने  वाली  दुर्गति  से  घबरा  गए   और  मन  ही  मन  संत  ज्ञानेश्वर   के  प्रति  शरणागत  होकर  बोले   --- " मैं  आपकी  शरण  में  हूँ , आपके  सिवाय  मुझे  बचाने  वाला  कोई  नहीं  है  l "  ऐसा  सोचते  हुए  वे   वहीँ  से  आलंदी  चले  गए   और  जीवन पर्यंत  वहीँ  रहे  l  आलंदी  वह  स्थान  है  जहाँ  संत  ज्ञानेश्वर  ने  जीवित  समाधि  ली  थी  l  संत  की  शरण  में  जाने  से  उनका  अभिमान  चला  गया   और  वे  भी  संत  बन  गए  l                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       

13 July 2025

WISDOM ------

   दुनिया  में  जितने  भी  महापुरुष  हुए  हैं   , वे  परोपकारी  और  समस्त  मानवता  के  लिए  संवेदनशील  होते  हैं  l   महानता  की  राह  पर  चलने  वाले  व्यक्ति  अन्याय  और  शोषण  के  विरुद्ध  लड़ते  हैं  l उन्हें  दूसरों  का  दुःख -दरद  अपना  प्रतीत  होता  है   और  वे  उसे  दूर  करने  का  यथासंभव  प्रयास  भी  करते  हैं  l  चीन  के  सम्राट  महान दार्शनिक  कन्फ्यूशियस  की  महानता  से  परिचित  थे  l  एक  दिन  वे  कन्फ्यूशियस  से  बोले  ---- "  तुम  मुझे  उस  व्यक्ति  के  पास  ले  चलो  , जो  महान  हो  l "  इस  प्रश्न  को  पूछने  के  पीछे  सम्राट  का  भाव  था  कि   कन्फ्यूशियस  स्वयं  को  या  सम्राट  को   महान  की  श्रेणी  में  रखेंगे   लेकिन  कन्फ्यूशियस  उन्हें  एक  वृद्ध   व्यक्ति  के  पास  ले  गए  जो  बहुत  कमजोर  भी  था   लेकिन  कुआं  खोद  रहा  था  l  कन्फ्यूशियस  बोले  --- "  सम्राट  !   मुझसे  अधिक  महान  यह  वृद्ध  है  l  यह  शरीर  से  दुर्बल  है  लेकिन  परोपकार  के  भाव  से  कुआं  खोद  रहा  है  l  परोपकार  में  ही  इसका  तन  और  मन  आनंदित  होता  है  l  इससे  अधिक  महान  और  कौन  हो  सकता  है  l  "        

11 July 2025

WISDOM -----

समाज  में  अशांति  का  एक  बहुत  बड़ा  कारण  समाज  में    व्याप्त  कुरीतियाँ  और  अन्धविश्वास  हैं  l  लोग  कितना  भी  पढ़ -लिख  जाएँ  , स्वयं  को  आधुनिक   होने  का  दावा  करें   लेकिन  यह  दावा  सिर्फ   उनके  स्वयं  उनके  लिए  ही  होता  है  , वे  चाहे  जो  करें   लेकिन  जहाँ  परिवार  के   अन्य    सदस्यों  और  समाज  की  बात  आती  है   , ऐसे  लोग  परम्पराओं , कुरीतियों  और  अंधविश्वासों  से  अलग  नहीं  हो  पाते  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  -- हमारी  वृत्ति  हंस  जैसी  हो ,   जो  श्रेष्ठ  है  उसे  स्वीकार  करो  l  यह  भी  दुर्बुद्धि  का  ही  प्रकोप  है  कि  मनुष्य  अपनी  अधिकांश  ऊर्जा  जाति -पांति , छुआछूत , ऊँच -नीच ,  धार्मिक  भेदभाव    जैसे  मुद्दों  पर  अपने  अहंकार  को  पोषित  करने  में  व्यर्थ  गँवा  देता  है  l   यदि  मनुष्य  को  सद्बुद्धि  आ  जाए   और  वह  अपनी  ऊर्जा  का  सही  उपयोग  करना  सीख  जाए   तो  वह  स्वयं  का  जीवन  भी  सफल  कर  सकता  है   और  धरती  माँ  को  भी  अपने  सिर  पर  होने  वाले  खून -खराबे  से  राहत  मिल  जाएगी  l    आज  संसार   को   महर्षि  दयानंद  सरस्वती  के  विचारों  और  उनके  जैसे  व्यक्तित्व  की  जरुरत  है  l  वे  हर  प्रकार  के  आडम्बर  और  कुरीतियों  के  विरुद्ध  थे  l  महर्षि  दयानंद  मानते  थे  कि  हमारा  नाम  आर्य  है  l  आर्य  का  अर्थ  है  श्रेष्ठ  पुरुष  l  विदेशियों  ने  हमें  हिंदू  नाम  दिया  l  आर्यों  का  संस्कृत  भाषा  में  साहित्य   ही  संसार  का  सबसे  पुराना  साहित्य  है  l  महाभारत  के   उद्योग  पर्व  में  महात्मा  विदुर  धृतराष्ट्र  से  कहते  हैं ---- " हे  राजन  !  इस  संसार  में   दूसरों  को  निरंतर  प्रसन्न  करने  के  लिए  प्रिय  बोलने  वाले  प्रशंसक  लोग  बहुत  हैं  ,  परन्तु    सुनने  में  अप्रिय  लगे   और  वह  कल्याण  करने  वाला  वचन  हो  ,  उसका  कहने  और  सुनने  वाला   पुरुष  दुर्लभ  है  l "   महर्षि  दयानंद  ऐसे  ही  हितकारक  वचन  कहने  वाले  विरले  मनुष्य  थे  l  वे  राजाओं -महाराजाओं  और  बड़े -से -बड़े  अंगरेज  अफसरों  की  उपस्थिति  में  भी  निर्भीक  होकर  सबके  हित  की  सत्य  बात  कहा  करते  थे  l   महर्षि  दयानंद  कहते  थे  ---- " मेरा  काम  लोगों  के  मन -मंदिर   से  मूर्तियाँ  निकलवाना  है  ,  ईंट -पत्थर  के  मंदिरों  को  तोड़ना -फोड़ना  नहीं  है  l "   फर्रुखाबाद  में  एक  दिन  एक   ' साध ' ( निम्न  जाति  का  व्यक्ति )   स्वामी जी  के  लिए  कढ़ी  और  चावल  बनाकर  लाया   और  उन्होंने  उसे  खा  लिया  l  इस  पर  ब्राह्मणों  ने  कहा ---- " आप  भ्रष्ट  हो  गए  ,  जो  ' साध '  के  घर  का  भोजन  कर  लिया  l "    स्वामीजी  ने  उत्तर  दिया  ---- " भोजन  दो  प्रकार  से  भ्रष्ट  होता  है  --एक  तो  यदि  किसी  को  दुःख  देकर  धन  प्राप्त  किया  जाए  और  उससे  अन्न  आदि  खरीदकर   भोजन  बनाया  जाए  ,  दूसरा   भोजन  मलिन  हो  या  उसमें  कोई  मलिन  वास्तु  गिर  जाए  l  ,साध '  लोगों  का  मेहनत  का  पैसा  है  ,  उससे  प्राप्त   किया  हुआ  भोजन  उत्तम  है  l  "  ' सत्यार्थ प्रकाश  ' उनकी  प्रसिद्ध  कृति  है  l  

10 July 2025

WISDOM ------

   सिकंदरिया का  राजा  टालेमी  , यूक्लिड  से   ज्यामिति  सीख  रहा  था  ,  किन्तु  यह  कठिन  विद्या  उसके  पल्ले  ही  नहीं  पड़  रही  थी  l  एक  दिन  टालेमी  अपना  धैर्य  खो  बैठा  l  उसने  अपने  गुरु  से  पूछा  ---- "  क्या  ज्यामिति  सीखने  का  कोई  सरल  मार्ग  नहीं  है  ? "    यूक्लिड  ने  गंभीरता  से  कहा  --- "  राजन  !  आपके  राज्य  में   जनसाधारण  और  अभिजात  वर्ग  के  लिए   पृथक    मार्ग  हो  सकते  हैं  ,  किन्तु  ज्ञान  का  मार्ग  सबके  लिए   एक  सा  ही  है  l  इसमें  अभिजात  वर्ग  के  लिए   कोई  राजमार्ग  नहीं  है  l "   यह  बात  टालेमी  को  समझ  में  आ  गई  l  फिर  इसके  बाद  टालेमी   ज्यामिति  सीखने  के  लिए  कठोर  परिश्रम  करने  लगा  l  

9 July 2025

WISDOM ---

 कहते  हैं  यदि  भगवान  नाराज  हो  जाएँ  तो  गुरु  बचाने  वाले  हैं  ,  लेकिन  यदि  गुरु  नाराज  हो  जाएँ   तो  उसे   कोई  नहीं  बचा  सकता  l  गुरु  पूर्णिमा  को  ' व्यास  पूर्णिमा '  भी  कहा  जाता  है  l  महर्षि  वसिष्ठ  के  पौत्र  ,  महर्षि  पराशर  के  पुत्र   ' वेदव्यास '  जन्म  के  कुछ  समय  बाद  ही   अपनी  माँ  से  आज्ञा  लेकर  तपस्या  करने  चले  गए  थे  l  वेदों  को  विस्तार  प्रदान  करने  के  कारण   ही  इनका  नाम  'वेदव्यास ' पड़ा  l  ' गुरु पूर्णिमा  '  का  पर्व  गुरु  के  प्रति  समर्पित  है  l  '  सच्चे  गुरु  के  लिए  सैकड़ों  जन्म  समर्पित  किए  जा  सकते  हैं  l  सच्चा  गुरु  वहां  पहुंचा  देता  है  ,  जहाँ  शिष्य  अपने  पुरुषार्थ  से   कभी  नहीं  पहुँच  सकता  l "    गुरु  के  द्वारा  कहे  गए  वाक्य  मूलमंत्र  हैं   , वे  हमें  जीवन  जीना  सिखाते  हैं  l  l    बाहरी  शत्रुओं  से  तो  एक  बार  हम  अपनी  शक्ति  और  सामर्थ्य  से  लड़कर  विजयी  हो  भी  सकते  हैं   लेकिन  अपने  भीतरी  शत्रुओं  ---काम , क्रोध , लोभ  और  अहंकार  पर    विजय   तो  केवल  और  केवलमात्र  गुरु  कृपा  से  ही  संभव  है l  अपनी  पूजा -साधना  से   हम  अपने  मानसिक  विकारों  को  पराजित  नहीं  कर  सकते   l  अहंकार  और  कामवासना  जैसे   दुष्ट   शत्रुओं  पर  विजय  प्राप्त  करना   तो  असंभव  है   लेकिन  सच्चे  गुरु  असंभव  को  संभव  कर  देते  हैं  l  वे  एक   बार  नहीं  अनेकों  बार  अपने  शिष्य  को  गहरी  खाई  में  गिरने  से  बचाते  हैं  ,  उसे  जीवन  जीना  सिखाते  हैं  ,  उसकी  चेतना  का  विस्तार  करते  हैं  l  गुरु  की  कृपा  प्राप्त  करने  के  लिए  शिष्य  को  भी  सच्चा  शिष्य  बनना  होगा  l  गुरु  ने  अपने  प्रवचनों  और  साहित्य  के  द्वारा  जो  विचार  हमें  दिए  ,  जो  मार्ग  दिखाया  ,  उसका   अनुसरण   करें  l 

6 July 2025

WISDOM ------

ईश्वर  ने  इस  स्रष्टि  का  निर्माण  किया  , इसमें  उन्हें  यह  धरती  सबसे  अधिक  प्रिय  है  l  इस  पृथ्वी  का  प्रत्येक  कण  उपयोगी  है  l   एक  बार  ब्रह्माजी  ने  महर्षि  जीवक  को   आदेश  दिया  कि   पृथ्वी  पर   जो  भी  पत्ता -पौधा  , वृक्ष -वनस्पति   व्यर्थ  दिखाई  दे  ,  उन्हें  यहाँ  ले  आओ  l   लगातार  12  वर्षों  तक   पृथ्वी  पर  घूमने  के  बाद   महर्षि  लौटे   और  ब्रह्मा जी  के  समक्ष  नत -मस्तक  होकर  बोले  , प्रभो  !  मैं  इन  12  वर्षों  में   पूरी  पृथ्वी  पर  भटका  हूँ  l  प्रत्येक  पौधे  के  गुण -दोष  को  परखा  है  l  पर  पृथ्वी  पर   एक  भी  ऐसी   वनस्पति  नहीं  मिली   जो  किसी  न  किसी   व्याधि  के  उन्मूलन  में   सहायक  न  हो   l   "  पृथ्वी  पर  विद्यमान  प्रत्येक   तिनके  का , जीव -जंतु , कीट -पतंगे  , वृक्ष , वनस्पति , नदी ,  पर्वत, समुद्र   सबका  महत्त्व  है  l     जब  मनुष्य  अपने  श्रेष्ठ  कर्म  से    धरती  रूपी  इस  बगिया  को  सुन्दर  बनाने  का  प्रयास  करता  है   तो  ईश्वर  को  प्रसन्नता  होती  है   और  लोगों   के    जीवन  सुख -शांति   व  आनंद  रहता  है  l  मनुष्य  की  सबसे  बड़ी  भूल  यह  हो  गई  कि  उसने  ईश्वर  के  सन्देश  को  समझा  नहीं   और  इस  पृथ्वी  को  केवल  भौतिक  द्रष्टि  से  सुन्दर  बनाने  का  प्रयास  किया  l  मनुष्य  शरीर  में  रहकर  पशुवत  व्यवहार  करने  लगा  , अपनी  चेतना  को   उच्च  स्तर  पर  ले  जाने  का  कोई  प्रयास  नहीं  किया  l   अपनी  बुद्धि  का  दुरूपयोग  कर   उसने  सम्पूर्ण  प्रकृति  को  प्रदूषित  कर  दिया  l  यही  कारण  है  कि  अब  संसार  में  आपदाएं -विपदाएं  बहुत  अधिक  हैं  l  प्रकृति  इसी  ढंग  से  अपना  क्रोध  प्रकट  करती  है  l  जब  मनुष्य  स्वयं  को  भगवान  समझने  लगता  है  तब  ईश्वर  इसी  तरीके  से  मनुष्य  को  समझाते  हैं  l  कोरा  विज्ञान    केवल  नाश  कर  सकता  है  , अपने  द्वारा  किए  गए  विकास  को  अपने  ही  हाथों  नष्ट  कर  सकता  है  l  इसलिए  विज्ञानं  को  अध्यात्म  के  साथ  जोड़ो  l  मनुष्य  शरीर केवल  एक  मशीन  नहीं  है  , इसमें  भावनाएं  भी  हैं  , भावनाओं  के  बिना  यह  जीवन   अधूरा  है  , और  अध्यात्म  हमें   श्रेष्ठ  भावनाओं  और  श्रेष्ठ  विचारों  से  जोड़कर  इनसान   बनाता  है  l   पृथ्वी    का  सौन्दर्य  उस  पर  रहने  वाले  मनुष्यों  से  नहीं  है  ,  मनुष्य  नामक  प्राणी  में  कितनी  इंसानियत  है , मानवता  है   यही   उसका  सौन्दर्य  है  l  अपनी  श्रेष्ठ  संतानों  पर  ही  माँ  को  गर्व  होता  है  l  

5 July 2025

WISDOM ------

  श्री माँ ( श्री अरविन्द  आश्रम ) पांडिचेरी  लौट  रही  थीं  l l  तूफ़ान  के  कारण  जहाज  में  हिचकोले  लगने  लगे  l  अंत:द्रष्टि  संपन्न  श्री माँ  ने  देखा   कि  संभवतः  कोई  भी  न  बचे  , ऐसा  भयंकर  तूफान  है  l  उन्होंने  सुप्रसिद्ध  तंत्र  विशेषज्ञ  ' तेओं '  से  दीक्षा  ली  थी  l  वे  केबिन  में  चली  गईं   और  स्वयं  को  बंद  कर  लिया  l  सूक्ष्म  शरीर  से  वे  समुद्र  में  चली  गईं  l  उन्होंने  देखा  , कुछ  सूक्ष्म  शरीरधारी  आत्माएं   समुद्र  के  पानी  को   तीव्र  वेग  से  उछाल  रही  हैं  l  उनसे  उन्होंने  वार्तालाप  किया  l  वे  बोलीं  ---- "  हम  तो  खेल  रहे  हैं  l  आपका  जहाज  ही  बीच  में  आ  गया  l "  श्री माँ  ने  कहा --- " आप  थोड़ी  देर  विराम  कर  लें  l  हम  इस  बीच  जहाज  निकाल  लेंगे  l "   श्री  माँ  यह  विनती  कर  के  केबिन  से  बाहर  आ  गईं  l अचानक  तूफान   थम  गया  l  उन्होंने  कहा --- " तुरंत  जहाज  निकाल  लो  l  फिर  तूफान  आ  सकता  है  l "  स्पीड  बढ़ाकर  जहाज  निकाला  गया  l  देखा  गया  पीछे  फिर  तूफान  आरम्भ  हो  चुका  था  l  ' श्वेत कमल '  ग्रन्थ  में  इस  घटना  का  उल्लेख  है  l