भगवान बुद्ध ने कहा था --- " जिस तरह दुष्कर्म का दंड भुगतने के लिए हर प्राणी प्रकृति का दास है , उसी तरह सत्कर्म के पारितोषिक का भी अधिकार हर प्राणी को है , फिर चाहे वह किसी भी वर्ण का हो l न तो उपनयन धारण करने से कोई संत और सज्जन हो सकता है , न अग्निहोत्र से ------- यदि मन स्वच्छ है , अंत:करण पवित्र है तो ही व्यक्ति संत , सज्जन , त्यागी , तपस्वी और उदार हो सकता है l यह उत्तराधिकार नहीं साधना है l इसलिए आत्मोन्नति का अधिकार हर प्राणी को है l "
30 April 2018
29 April 2018
WISDOM ----- सुन्दर सुनहरे भविष्य के लिए बच्चों का व्यक्तित्व निर्माण बहुत जरुरी है
' व्यक्तित्व निर्माण तब संभव है जब बच्चे सुरक्षित हों l '
बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में माता - पिता और समाज की सम्मिलित भूमिका होती है l यदि माता - पिता अपने ऐशोआराम में व्यस्त हैं तब केवल पैसा खर्च करके बच्चों का व्यक्तित्व नहीं बन सकता l धन कमाना भी जरुरी है , इसके साथ अपने कुछ सुखों का त्याग कर बच्चों को अच्छे संस्कार देना भी जरुरी है l
इसी तरह समाज में विभिन्न क्षेत्रों में लोग अपना कर्तव्य पालन ईमानदारी से करते हैं , समाज में अपनी जिम्मेदारी को समझते हैं तभी बच्चे सुरक्षित रह सकते हैं l आज के समाज में हम देखते हैं कि बच्चे सुरक्षित नहीं हैं l कायरता इतनी बढ़ गई है कि आपसी दुश्मनी का बदला लोग बच्चों से लेते हैं l विभिन्न संस्थाओं का उद्देश्य केवल धन कमाना है , बच्चों की सुरक्षा के प्रति वे लापरवाह हैं l
परिवार और समाज को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी पड़ेंगी कि उन्हें अपना भविष्य कैसा चाहिए l फ्रांस के प्रसिद्ध समाजशास्त्री और प्रजातंत्र के जन्मदाता रूसो ने मानवी भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए बालकों के व्यक्तित्व निर्माण को सर्वोपरि महत्व दिया है l और कहा है कि नवयुग की आधारशिला उन्ही के बलबूते निर्मित की जा सकती है l
बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में माता - पिता और समाज की सम्मिलित भूमिका होती है l यदि माता - पिता अपने ऐशोआराम में व्यस्त हैं तब केवल पैसा खर्च करके बच्चों का व्यक्तित्व नहीं बन सकता l धन कमाना भी जरुरी है , इसके साथ अपने कुछ सुखों का त्याग कर बच्चों को अच्छे संस्कार देना भी जरुरी है l
इसी तरह समाज में विभिन्न क्षेत्रों में लोग अपना कर्तव्य पालन ईमानदारी से करते हैं , समाज में अपनी जिम्मेदारी को समझते हैं तभी बच्चे सुरक्षित रह सकते हैं l आज के समाज में हम देखते हैं कि बच्चे सुरक्षित नहीं हैं l कायरता इतनी बढ़ गई है कि आपसी दुश्मनी का बदला लोग बच्चों से लेते हैं l विभिन्न संस्थाओं का उद्देश्य केवल धन कमाना है , बच्चों की सुरक्षा के प्रति वे लापरवाह हैं l
परिवार और समाज को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी पड़ेंगी कि उन्हें अपना भविष्य कैसा चाहिए l फ्रांस के प्रसिद्ध समाजशास्त्री और प्रजातंत्र के जन्मदाता रूसो ने मानवी भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए बालकों के व्यक्तित्व निर्माण को सर्वोपरि महत्व दिया है l और कहा है कि नवयुग की आधारशिला उन्ही के बलबूते निर्मित की जा सकती है l
28 April 2018
WISDOM ------ शरीर के स्वास्थ्य की अपेक्षा मनुष्य का मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य अधिक महत्वपूर्ण है
चीन के संघर्ष शील तपस्वी साहित्यकार लू - शुन की मृत्यु के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए माओत्से तुंग ने कहा था ---- वे सांस्कृतिक क्रान्ति के महान सेनापति और वीर सेनानी थे l वे केवल लेखक ही नहीं एक महान विचारक और क्रान्तिकारी भी थे l
लू - शुन का जन्म 1881 में चीन में हुआ था l उस समय की चीन की दशा और चीनी नागरिकों के दुःख और वेदना के कारण उनकी आँखें नम हो जाती वे सोचते कि चीनी जनता की यह उदासीनता न जाने कब दूर होगी l आठ वर्ष तक जापान में चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन कर वे जब चीन लौटे तो उनकी वेदना और अधिक बढ़ गई , उन्होंने संकल्प लिया कि वे लोगों की शारीरिक चिकित्सा के स्थान पर मस्तिष्कीय, भावनात्मक और चेतना की चिकित्सा के लिए प्रयत्न करेंगे और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए साहित्य सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम हो सकता है l अत: वे डाक्टर बानने की अपेक्षा स्कूल में अध्यापक हो गए l
अब वे ' नवयुवक ' पत्र का सम्पादन करने लगे l अब वे कहानियां भी लिखने लगे l उनकी कहानियां तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लिखी जाती थीं l जिसमे एक पक्ष में शोषण में पिस रहे लोगों की करुण स्थिति का चित्रण होता , तो दूसरे पक्ष में इसके विकल्प का प्रतिपादन होता कि वर्तमान व्यवस्था को तोड़ा जाये तो इसके स्थान पर क्या किया जाये l अपने साहित्य लेखन से उन्होंने समाजवादी क्रांति की संभावनाओं को मजबूत बनाया l यह सत्य है कि कोई भी परिवर्तन छोटा हो या बढ़ा विचारों के रूप में ही जन्म लेता है l मनुष्य और समाज की विचारणा तथा धारणा में जब तक परिवर्तन नहीं आता तब तक सामाजिक परिवर्तन भी असंभव ही है l और यह कार्य साहित्य से ही संभव है l
लू - शुन का जन्म 1881 में चीन में हुआ था l उस समय की चीन की दशा और चीनी नागरिकों के दुःख और वेदना के कारण उनकी आँखें नम हो जाती वे सोचते कि चीनी जनता की यह उदासीनता न जाने कब दूर होगी l आठ वर्ष तक जापान में चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन कर वे जब चीन लौटे तो उनकी वेदना और अधिक बढ़ गई , उन्होंने संकल्प लिया कि वे लोगों की शारीरिक चिकित्सा के स्थान पर मस्तिष्कीय, भावनात्मक और चेतना की चिकित्सा के लिए प्रयत्न करेंगे और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए साहित्य सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम हो सकता है l अत: वे डाक्टर बानने की अपेक्षा स्कूल में अध्यापक हो गए l
अब वे ' नवयुवक ' पत्र का सम्पादन करने लगे l अब वे कहानियां भी लिखने लगे l उनकी कहानियां तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लिखी जाती थीं l जिसमे एक पक्ष में शोषण में पिस रहे लोगों की करुण स्थिति का चित्रण होता , तो दूसरे पक्ष में इसके विकल्प का प्रतिपादन होता कि वर्तमान व्यवस्था को तोड़ा जाये तो इसके स्थान पर क्या किया जाये l अपने साहित्य लेखन से उन्होंने समाजवादी क्रांति की संभावनाओं को मजबूत बनाया l यह सत्य है कि कोई भी परिवर्तन छोटा हो या बढ़ा विचारों के रूप में ही जन्म लेता है l मनुष्य और समाज की विचारणा तथा धारणा में जब तक परिवर्तन नहीं आता तब तक सामाजिक परिवर्तन भी असंभव ही है l और यह कार्य साहित्य से ही संभव है l
27 April 2018
WISDOM -----
साधनों और सुविधाओं के अभाव का रोना रोकर कई लोग असफलताओं और कठिनाइयों को रोते रहते हैं l जबकि साधन और सुविधाए, व्यक्ति के मार्ग में बाधा नहीं बनती l बाधा बनती है उसकी अपनी अकर्मण्यता और निष्क्रियता l पुरुषार्थी और परिश्रमी व्यक्ति कभी साधनों , सुविधाओं और परिस्थितियों का मुंह नहीं ताकते, वे आगे बढ़ते ही रहते हैं l
26 April 2018
WISDOM ------
मनुष्य को भगवान् ने बहुत कुछ दिया l बुद्धि तो इतनी दी कि वह संसार के सम्पूर्ण प्राणियों का शिरोमणि हो गया l बुद्धि पाकर भी मनुष्य एक गलती सदैव दोहराता है और वह यह कि उसे जिस पथ पर चलने का अभ्यास हो गया है वह उसी पर चलना चाहता है l रास्ते न बदलने से जीवन के अनेक महत्वपूर्ण पहलू उपेक्षित पड़े रहते हैं l ---- धनी , धन का मोह छोड़कर दो मिनट त्याग और निर्धनता का जीवन बिताने के लिए तैयार नहीं होता , नेता भीड़ पसंद करता है , वह दो क्षण एकान्त चिंतन के लिए नहीं निकलता l डाक्टर व्यवसाय करता है ऐसा नहीं कि सेवा का सुख भी देखें , पैसे को माध्यम न बनायें l व्यापारी बेईमानी करते हैं कोई ऐसा प्रयोग नहीं करते कि देखें कि ईमानदारी से भी मनुष्य सुखी और संपन्न रह सकता है l जीवन में विपरीत और कष्टकर परिस्थितियों से गुजरने का अभ्यास मनुष्य जीवन में बना रहा होता तो अध्यात्म और भौतिकता में परस्पर संतुलन बना रहता और धरती पर शान्ति होती l
25 April 2018
WISDOM ------
सफलता के इच्छुक व्यक्ति के लिए उपेक्षा , तिरस्कार और अभावों से परेशान न होकर निरंतर श्रम करते रहना ही सफलता का राजमार्ग है l इस मार्ग का अनुसरण कर व्यक्ति सामान्य ही नहीं विकट से विकट परिस्थितियों में भी ऊँचा उठ सकता है तथा प्रगति के उच्च शिखरों को छू सकता है l
24 April 2018
WISDOM ----- आज देश में सबसे बड़ी आवश्यकता चरित्र - निर्माण और नैतिक जागरण की है l
किसी भी समाज का जब चारित्रिक पतन होने लगे तो समझो कि उस देश की संस्कृति खतरे में है l कुछ जातियों को अपनी जातीय श्रेष्ठता का अभिमान होता है किन्तु पतन बड़ी तेजी से होता है और इसकी चपेट में सभी जाति व सम्प्रदाय आ जाते हैं , श्रेष्ठता केवल दिखावे की रह जाती है l मनुष्य अपनी मानसिक कमजोरियों कामना - वासना का गुलाम होता है l अपना चोला बदल ले , शराफत का कोई भी आवरण ओढ़ ले , इन कमजोरियों से मुक्ति पाना आसान नहीं है l
इसलिए समस्या यह उत्पन्न होती है कि इस चारित्रिक पतन को कैसे रोका जाये l केवल भाषण या कानून बन जाने से समस्या नहीं सुलझती l कोई भी देश अपनी संस्कृति की , अपनी जातिगत श्रेष्ठता की रक्षा करना चाहता है तो उसे उन कारणों पर प्रतिबन्ध लगाना होगा जो मन की कुत्सित भावनाओं को भड़काते हैं --- अश्लील साहित्य , अश्लील फ़िल्मों और इन्हें दिखने वाली साइट पर प्रतिबन्ध हो l भारत जैसे गर्म जलवायु के देश में शराब और हर प्रकार के नशे पर प्रतिबन्ध हो , नशे की वजह से ही व्यक्ति अमानवीय कार्य करता है l समाज जागरूक हो और इससे संबंधित कठोर कानून बने तभी कुछ सुधार संभव होगा l
इसलिए समस्या यह उत्पन्न होती है कि इस चारित्रिक पतन को कैसे रोका जाये l केवल भाषण या कानून बन जाने से समस्या नहीं सुलझती l कोई भी देश अपनी संस्कृति की , अपनी जातिगत श्रेष्ठता की रक्षा करना चाहता है तो उसे उन कारणों पर प्रतिबन्ध लगाना होगा जो मन की कुत्सित भावनाओं को भड़काते हैं --- अश्लील साहित्य , अश्लील फ़िल्मों और इन्हें दिखने वाली साइट पर प्रतिबन्ध हो l भारत जैसे गर्म जलवायु के देश में शराब और हर प्रकार के नशे पर प्रतिबन्ध हो , नशे की वजह से ही व्यक्ति अमानवीय कार्य करता है l समाज जागरूक हो और इससे संबंधित कठोर कानून बने तभी कुछ सुधार संभव होगा l
Subscribe to:
Posts (Atom)