31 January 2020

WISDOM -----

' अहंकार  एक  भयानक  रोग  है   l   इसकी  खास  बात  यह  है  कि   यदि  व्यक्ति  सफल  होता  है   तो  उसका  अहंकार  भी  उसी  अनुपात  में  बढ़ता  जाता  है    और  वह  विशाल  चट्टान  की  भांति  जीवन  के  सुपथ ,   सत्यपथ  या  आध्यात्मिक  पथ  को  रोक  लेता  है  l
  इसके  विपरीत  यदि  व्यक्ति  असफल  होता  है   तो  उसका  अहंकार  एक  घाव  की  भांति  रिसने  और  दुखने  लगता  है   l   साथ  ही  धीरे - धीरे  मन  में  हीनता  की  ग्रंथि  बन  जाती  है  ,  जो  सदा - सर्वदा  डराती   रहती  है   l   अहंकार  भक्ति  और  ज्ञान  दोनों  के  लिए  ही  बाधक  है  l   हमारा  आध्यात्मिक  उत्थान ,  आत्मिक  उत्थान  ,  अपने  ही  अहंकार  के  कारण  अवरुद्ध  है   l 

30 January 2020

वर्तमान जगत के युग - पुरुष --- महात्मा गाँधी

    ' तीस  जनवरी  शाम  को  बापू  बिड़ला  घर  से  बाहर  आए   और  प्रार्थना - सभा  में  जाने  धीरे - धीरे  कदम  बढ़ाए ,  उस  दिन  होनी  अपना  रूप  बदल  कर  आई  और  अहिंसा  के  सीने  पर  हिंसा  ने  गोली  बरसाई  l    बापू  ने  कहा  राम - राम   और  जग  से  किया  किनारा ,  श्रीराम  के  घर  जा  पहुंचा  श्रीराम  का  प्यारा  l '
     मृत्यु  से  पहली  रात  को  जब  वे  विश्राम  के  लिए  बिस्तर  पर  लेट  गए  और  एक  दो  अनुयायी  उनके  थके  हुए  अंगों  को  मल   रहे  थे  ,  उन्होंने  कहा ---- ' अगर  मैं  किसी  बीमारी  से , सामान्य  फोड़े  से  भी  मरीज  होकर  मरुँ  ,  तो  तुम्हारा  यह  कर्तव्य  है  कि   संसार  को  बता  दो   कि   गांधीजी  सच्चे  ईश्वर  भक्त  नहीं  थे  ,  चाहे  इससे  लोग  तुमसे  नाराज  ही  क्यों   न हो  जाएँ  l   अगर  तुम  ऐसा  करोगे  तो  मेरी  आत्मा  को  शांति  मिलेगी  l    साथ  ही  यह  लिखकर  रख  लो  कि   अगर  कोई   गोली  चलकर  मेरे  जीवन  का   अंत  कर  दे   और  मैं  उस  आघात  को   बिना  हाय - तौबा  किये   सह  लूँ  , तब  भी  राम   नाम  लेता  हुआ  प्राण  त्यागूँ  ,  तो  यह  समझना  कि   मैं  जो  दावा   करता  था   वह   'सच  है  l
  संसार  में  गांधीजी  के  देहान्त   होने  का  जितना  अधिक  शोक  मनाया  गया   और  सब  तरह  के  लोगों  ने  इसे   जिस  प्रकार  अपनी  व्यक्तिगत  हानि  माना  ,  वैसा  संसार  में  शायद  ही  पहले  कभी  हुआ  हो  l   अमरीका  के  सबसे  बड़े  अख़बार  ' न्यूयार्क  टाइम्स '  ने  लिखा --- " गांधीजी  अपने  उत्तराधिकार  स्वरुप  एक  ऐसी  आध्यात्मिक  शक्ति  छोड़  गए   जो  भगवान   के  निर्देशित  समय  पर   अवश्य  ही  हथियारों   और  हिंसा  की   दूषित  नीति   पर   विजय  प्राप्त  करेगी  l  "
    पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  वाङ्मय  ' हमारी  संस्कृति  इतिहास  के  कीर्ति  स्तम्भ  '   में    लिखा  है----  '  महात्मा  गाँधी  वास्तव  वास्तव  में  युग  पुरुष  थे  l   ऐसे  महामानव   प्रकृति   अथवा  ईश्वर  के  नियमानुसार  ' युग - परिवर्तन '  के  अवसर  पर  प्रकट  होते  हैं   और  संसार  की  परिस्थितियों  के  अनुकूल  सत्य - मार्ग  का  उपदेश  देते  हैं  l   उनकी  सबसे  बड़ी  विशेषता  यही  होती  है   कि   वे  जो  कुछ  कहते  हैं   उसके  अनुसार  स्वयं  भी  आचरण  कर  के   दिखा  देते  हैं   l  '

28 January 2020

WISDOM ------ शक्ति का सदुपयोग जरुरी है

 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  का  कहना  है --- ' समर्थ  होने , शक्तिसम्पन्न  होने  से  अधिक  जरुरी  है   सद्गुण संपन्न  होना  , क्योंकि  सद्गुणों  के  अभाव  में  शक्ति  के  दुरुपयोग  की  संभावना  हमेशा  बनी   रहती  है   l   गुणहीन   व्यक्तियों  के  पास   जो  भी  शक्ति  आती  है  ,  वो  हमेशा  दुरूपयोग  करते  हैं  ,  फिर  चाहे  यह  शक्ति  सामाजिक  हो , राजनीतिक   हो   या  फिर  वैज्ञानिक    अथवा  आध्यात्मिक   हो  l   इसलिए   पहले  सद्गुण  , फिर  शक्ति  l  व्यक्ति  का  व्यक्तित्व  समर्थ - बलशाली   होने  से  भी  ज्यादा  महत्वपूर्ण  है   उसका  सदगुणसम्पन्न  होना  ,  गुणवान  होना  ,  मानवीय  मूल्यों  के  प्रति  सचेष्ट    एवं    समर्पित  होना  l  '
    रामचरितमानस  में  दो  व्यक्तित्व  हैं ---- एक  हैं  वानरराज  बालि   और  दूसरे  अंजनी पुत्र  हनुमान  l   इन  दोनों  में  हनुमानजी  का  ज्ञान  बालि   से  कहीं  अधिक  था   l
 बालि   को  बल  पर  संयम  करने  की  असाधारण  क्षमता  प्राप्त  थी  ,  इस  वजह  से   जो  भी  प्रतिपक्षी  उसके  सामने  आता  ,  बालि   उसकी  समस्त  शक्तियों   को  स्वयं    में  आत्मसात  कर  लेता  था  l  उसका  स्वयं  का  बल  तो  उसके  पास   था  ही   l   इस  तरह   उसके  सामने  प्रतिपक्षी  योद्धा  का  बल  घटकर  आधा  रह  जाता  था   और  बालि   का  स्वयं  का  बल  ड्योढ़ा - दूना  हो  जाता  l  इस  तरह  बालि   की  विजय  सुनिश्चित  होती  और  प्रतिपक्षी  की  पराजय  सुनिश्चित  l   इस  शक्ति  ने  बालि   को  अहंकारी  और  दम्भी  बना  दिया  था   l  उसने  अपने  छोटे  भाई  सुग्रीव  का  उससे  सब  कुछ  छीन  लिया   l   प्रकृति  किसी  के  अहंकार    को  बर्दाश्त  नहीं  करती  l   प्रकृति  के  दंडविधान  के  अनुरूप  बालि    को  दण्डित  होना  पड़ा  l   हनुमानजी  की  सहायता  से  भगवान   श्रीराम  ने  उसे  दण्डित  किया  l   बालि   की  उस  शक्ति  की  वजह  से  भगवान   को  भी  उसे  छिपकर  मारना  पड़ा  ,  क्योंकि  प्रत्यक्ष  होने  पर  संभावना  यही  थी  कि  बालि   के  पास  उनका  भी  आधा  बल  चला  जाता  l
  बालि   के  स्वभाव   के  ठीक  विपरीत   हनुमानजी  भगवान   के  परम   भक्त  एवं   विनम्र  थे  l   जन  - सेवा , ईश्वर - सेवा  उनका  ध्येय  था  l   प्रकृति  के  सभी  देवी - देवताओं  का  उन्हें  आशीर्वाद  प्राप्त  था , असाधारण  क्षमता संपन्न  थे  l  परन्तु  हनुमानजी  को  अपने   बल  पर  कोई  अभिमान  नहीं  था   इसलिए  वे  प्रभु  की  योजना  व  कार्य  में  उनके  सहयोगी  बने  l   उनसे  सभी  का  कल्याण  हुआ  l   आज  भी  वह  अपने  सद्गुणों  व  शक्ति  के  कारण  अनगिनत  जनों   के  आराध्य  हैं  l
 आचार्य श्री  लिखते  हैं ---  संयम  की  योग्यता , शक्ति  और  उसके  सदुपयोग  के   आदर्श  हैं -  हनुमान जी  , जिन्होंने  अपनी  शक्तियों  का  उपयोग  सदा  ही  लोक - कल्याण  में  किया  l   उनके  जीवन  का  एक  ही  
ध्येय   वाक्य  था ---- ' राम  काजु   कीन्हें   बिनु  मोहि  कहाँ  बिश्राम  l 

27 January 2020

WISDOM ---- उचित यही है कि हम जैसे हैं , वैसे ही बाहर दिखें

    पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  का  कहना  है  ---' महत्व   को  पाने  की  ललक  एक  ऐसा  विष  है  , जो  जिस  क्षेत्र  में  घुलेगा  उसे  विषैला  बनाएगा   l   इसकी  टोह   में  लगा  आदमी   अंदर  से  नीति ,  मर्यादाओं  और  अनुशासन  की  अवहेलना  करते  हुए   बाहर  से  नैतिक , मर्यादित  और  अनुशासनप्रिय   दिखाने   का  प्रयत्न  करता  है  l   सम्मान  पाने  के  लिए  नकली  समाज सेवी  पनपते  हैं , अमीरी  पाने  के  लिए  चोरी , बटमारी , तस्करी  फैलती  है  l '
  आचार्य श्री  लिखते  हैं --- 'नैतिकता  या  अच्छाई  का  खोल  ओढ़े  लोगों  से    अनैतिक  अमर्यादित  दिखने  वाले  लोगों  की  अपेक्षा  कहीं  अधिक  खतरा  है  l   बुराई    बुराई  है  पर  अच्छाई  के  गर्भ  में  बुराई  को  भरण - पोषण  मिलना  और  अधिक  भयंकर  है  l   पाप  को  पाप  समझ  लेने  के  बाद  उससे  बचा  जा  सकता  है  ,  लेकिन  जो  पाप  पुण्य  की  आड़  में  किया  जाता  है  ,  उससे  बच  पाना  बहुत  कठिन  है   l   बुराई  का  अपना  कोई  अस्तित्व  नहीं  है  ,  वह  अच्छाई  में  घुसकर  पनपती  है  l 
  शत्रु   से  बचाव  आसान  है  ,  पर  मित्र  बने  शत्रु  से  बच  पाना  असंभव  है   l   जितने  व्यक्ति  जहर  से  नहीं  मरते   उतने  मिठाई  में  जहर  छिपा  कर  दिए  जाने  से  समाप्त  हो  जाते  हैं  l  डाकू  को  पहचानना  और  उससे  बचना  सामान्य  क्रम  है   किन्तु  साधु  के  वेश  में  घूमने  वाले  डाकू  से  बच  पाना  आसान  नहीं  है   l   डाकू  संसार  की  जितनी  हानि  नहीं  करते    तथाकथित   सफ़ेद  पोश   उससे  कहीं  अधिक  परेशानी  खड़ी  करते  हैं   l
  महानता  कमाई  जाती  है  , इसे  किसी  तरह  छीनना - झपटना  संभव  नहीं  है  l   अपनी  स्थिति  को  बढ़ा - चढ़कर  दिखाने   का  प्रयत्न  विकास  की  राह  से  भ्रष्ट  कर  देता  है   और  हमेशा  यही  डर   बना  रहता  है  कि   कहीं  भेद  न  खुल  जाये  l  '

26 January 2020

WISDOM ----- विद्दा के उपासक ---- श्री रामकृष्ण परमहंस

 कामारपुकुर  से  कलकत्ता  आने  पर  रामकृष्ण  परमहंस  के  बड़े  भाई  ने   उन्हें  स्कूल   में  पढ़ाने  की  बहुत  कोशिश  की  l   इस  पर  उन्होंने  साफ़  इनकार   करते  हुए  कहा --- " दादा  ! मैंने  अक्षर  ज्ञान  पा  लिया  है  , सत्साहित्य  को  पढ़  सकता  हूँ   l   अब  इस  पेट  भरने  वाली  शिक्षा  को  पढ़कर  जिंदगी  बरबाद   नहीं  करूँगा   l    मैं    तो  इनसान   बनूँगा l  '   और  जुट  गए  अपने  व्यक्तित्व  को  संवारने   l   जीवन  विद्दा  के  आचार्य  के  रूप  में  ढालकर    उन्होंने  दक्षिणेश्वर  मंदिर  को  जीवन  विद्दा  का  केंद्र  बनाया    और  जुट  गए  इंसानो  को  गढ़ने  में  l 
  विवेकानंद , अभेदानन्द , ब्रह्मानंद  जैसे  चमचमाते  खरे  व्यक्तित्व   ढालकर  उन्हें   जीवन  विद्दा  के  विस्तारक  के  रूप  में  समाज  को   समर्पित    किया   l   विद्दा  के  आचार्यों  को  गढ़ने  वाले    इस  महामानव  की  स्तुति  में    स्वामी  विवेकानंद  ने  कहा  है --- "  वे  आचार्यों  के  महा आचार्य  थे  l   स्वामीजी  कहते --- मेरे  गुरु  ने   मुझे  विद्दा  दी  है   l   इसको  पाकर  मैं  दार्शनिक  नहीं  हुआ  ,  तत्ववेत्ता  भी  नहीं  बना  हूँ  l   संत  बनने  का  दावा   नहीं  करता  ,  परन्तु  मैं  एक  इन्सान   हूँ   और  इन्सानों   को  प्यार  करता  हूँ  l "
  ब्रह्मानंद  के  शब्दों  में  --- ठाकुर  हम  लोगों  से  कहा  करते  थे  ---- ' जब  तुम  सोलह  आने  बनोगे   तब  तुम्हे  देखकर  लोग   आठ  आने  अपनाने  की  सकेंगे  l "  उनके  ये  शब्द  आज  भी   लोक  शिक्षक  के  लिए  कसौटी  हैं   l

23 January 2020

WISDOM ------

  पं.  श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने   एक  प्रसंग  में   वाङ्मय  में  लिखा  है  ----- '  अपनी  हीन   तथा  निम्न  वृत्तियों  को  संतुष्ट  करने  के  लिए   लोग  प्राय:  अहंकार   का  पालन  किया  करते  हैं  l   वे  मद  में  इतने  मत्त   हो  जाते  हैं  कि  इस  बात  का  विचार  ही  नहीं  करते  कि   उनके  अहंकार  के  नीचे  दबकर    कितने  निरपराध  तथा  असहाय  लोगों  का  बलिदान  हो  रहा  है  ?   किसी  का  भी  त्याग  और  बलिदान  व्यर्थ  नहीं  जाता   l   कम    समझ  लोग  चाहे  उसके  प्रभाव  को  अनुभव  न  कर  सकें   और  अदूरदर्शी  भी   तुरंत  उसका   कोई  परिणाम   न  देखकर   उसे  व्यर्थ  बताने  लगें   l   पर  तत्ववेत्ता   इस  बात  को  अच्छी  तरह  जानते  हैं  कि    इस  जगत  में  छोटे  से  छोटे  काम  की  भी  प्रतिक्रिया  अवश्य  होती  है   l 

22 January 2020

अपने बौद्धिक होने का अहंकार और बढ़ती निष्ठुरता के कारण मनुष्य ऐसा कुछ कर रहा है जिसे देखकर प्राचीनकाल के दैत्यों के दिल दहल जाएँ --- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

 आचार्य श्री  लिखते  हैं --- बौद्धिकता  के  बल  पर  अनेकों  तरह  की  खोजबीन  करने  वाला  मानव  कितना  ही  अभिमान  क्यों  न  करे  पर  संवेदनाओं  के  क्षेत्र  में  वह   पाषाण  युगीन  मनुष्य  से  भी  कोसों  पीछे  है  l  जान   रसेल  ने  लिखा  है --- "प्रत्येक  व्यवहार  विज्ञानी  ईसा , फ्रांसिस , संत पाल , गाँधी  और  बुद्ध  के  व्यवहार  को  ललचाई  नज़रों  से  देखता  है  l   लेकिन  हिटलर , मुसोलिनी  को  व्यवहार  के  कलंक  के  रूप  में   देखता  है  l  "
 आचार्य श्री  लिखते  हैं --- ' निस्संदेह  व्यवहार  सम्बन्धी  दोषों , दुर्बलताओं  और  कमियों  का  एकमात्र  कारण  निष्ठुरता  है   l   कितने  ही  शासन  बदले , सत्ताएं  बदली  लेकिन   क्या  इस  उलट - फेर  में  मनुष्य  सुखी  हो  सका   ?   ' नहीं '  l   क्योंकि  उसने    निष्ठुरता  के   स्थान  पर  अन्त: संवेदना  की  स्थापना  नहीं  की   l   यदि  मनुष्य  के  हृदय  में  संवेदना  जाग  जाये   तो  उसके  व्यवहार  में  स्थायी  सुधार  संभव  है  l
    अन्त : संवेदना  का  जागरण  इस  कदर  बेचैनी  उत्पन्न  करता  है   और  व्यवहार  को  बदलने  के  लिए  बाध्य  करता  है  l 
  एक  ऐतिहासिक  घटना  है ----- विजयनगर  सम्राट   कृष्णदेव  राय  ने  अपने  गुरु  संत  कनकदास  से  पूछा  ---   महाराज  !  भगवान   गज  को  बचाने   स्वयं  क्यों  दौड़े  ?  दौड़े  भी  थे  तो  सवारी  क्यों  नहीं  ली  ?'
  संत  दूसरे  दिन  समझाने   का  वादा  कर  के  चले  गए  l   दूसरे  दिन  उन्होंने  नवजात  राजकुमार  की   ठीक  वैसी  ही  प्रतिमा  बनवाई  ,  बिलकुल  स्वाभाविक  थी ,  और  उसे  गोद   में   खिलाते   हुए  राजमहल  के  तालाब  के  पास  आये   l   राजा  भी  पास  ही  थे  l   उस  कृत्रिम  प्रतिमा  को  उन्होंने  धीरे  से  तालाब  में  डाल   दिया   l   प्रतिमा  बहुत  स्वाभाविक  थी   , नकली  राजकुमार  के  गिरते  ही  राजा  कूद  पड़ा   और  बहुत  देर  बाद  जब  वह  निकला  तो  राजकुमार  की  प्रतिमा  उसके  हाथ  में  थी  l   अपनी  बेवकूफी  पर  खिन्न  भी  था  l   संत  ने  कहा --- उत्तर  मिला  सम्राट  l   अन्त:  संवेदना  का  जागरण  ऐसी  ही  बेचैनी  उत्पन्न  करता  है   l   फिर  भगवान   तो  संवेदनाओं  के  घनीभूत  रूप  हैं  ,  गज  की  पुकार  पर  , द्रोपदी  की  पुकार  पर  दौड़े  चले  आये  l