मान्यता है कि वाल्मीकि जी ने ही तुलसीदास जी की देह धरकर सहज , सरस और सरल भाषा में रामचरितमानस का सृजन किया था l रामचरितमानस की रचना से तुलसीदास जी जन - जन के हृदय में प्रतिष्ठित हो गए , उनकी ख्याति तथा प्रतिष्ठा में आशातीत वृद्धि हुई और उनके दर्शनों के लिए अनेक राजा - महाराजे तथा भक्तगण उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आने लगे l यह सब देख एक व्यक्ति ने उनसे पूछा ---- " आजकल इतने बड़े लोग उनके पास क्यों आते हैं ? " इसके उत्तर में तुलसीदास जी ने कहा --- " यह सब भगवान श्रीराम जी की कृपा है -- लहइ न फूटी कौड़िहू को चाहै केहि काज l सो तुलसी महँगो कियो , राम गरीब निवाज l
7 September 2020
5 September 2020
WISDOM -----
संतों ने ऋषियों ने कहा है कि मृत्यु का स्मरण बने रहने से हम बुरे कर्म , पाप कर्म करने से बचेंगे l संत कबीर ने कहा है --- काल जीव को ग्रासई , बहुत कहा समुझाय l कहै ! कबीर मैं क्या करूँ , कोई नहीं पतियाय l संत कबीर कहते हैं मैंने बहुत प्रकार से समझाकर कहा कि एक दिन हर प्राणी को काल पकड़ेगा , परन्तु मैं क्या करूँ , कोई मेरी बात पर विश्वास ही नहीं करता---- l
रावण , कंस , कुम्भकरण से लेकर औरंगजेब जैसे क्रूर शासकों ने अपने जीवन में न जाने कितने अत्याचार , अमानवीय कृत्य किए l शायद यही सोचकर कि वे स्वयं कभी मरेंगे ही नहीं l जिन लोगों के लिए धन , दौलत , ऐश्वर्य ही सब कुछ है , उनका जीवन भय और आशंका से घिरा हुआ होता है l उनके अपने कर्म ही उन्हें डराते हैं l उनके प्रभाव व भय से बाहर उनकी जय - जयकार भले ही हो रही हो , पर उनके भीतर हाहाकार मचा हुआ होता है l समस्त भौतिक वैभव एवं साधनों के बीच होते हुए भी वे अंदर से दुःखी व कंगाल होते हैं l पं. श्रीराम शर्मा , आचार्य जी का कहना है --- जीवन में उल्लास , आनंद , मधुरता तभी संभव है जब मनुष्य सच्चाई की , नैतिकता और अध्यात्म की राह पर चले और इन राहों पर चलना तभी संभव है , जब हमें यह बोध हो कि हमारा जीवन नश्वर है , मृत्यु अटल है , हमारे द्वारा किए गए कर्मों का फल मिलना भी सुनिश्चित है l
WISDOM -----
कलकत्ता बोर्ड की अंग्रेजी की परीक्षा देने एक युवक पहुंचा l परीक्षा भवन में उससे पूछा गया --- " क्या आप हमारे प्रश्नों के लिए तैयार हैं ? " युवक ने उत्तर दिया - - " जी हाँ ! " तब परीक्षकों ने अंग्रेजी में पूछा ---- " स्कूल मास्टर और स्टेशन मास्टर में क्या अंतर है ? " उस विद्दार्थी ने अंग्रेजी में कहा ---- " दि स्कूल मास्टर ट्रेन्स दि माइंड , व्हाइल दि स्टेशन मास्टर माइंड्स दि ट्रेन्स l " परीक्षक इस अर्थपूर्ण उत्तर कि ' एक अध्यापक मस्तिष्क को संचालित करता है , जबकि स्टेशन मास्टर गाड़ियों ( ट्रेनों ) को ' से बहुत प्रभावित हुए l वह युवक थे श्री सुभाषचंद्र बोस l
3 September 2020
WISDOM ----- कर्मफल
असुर कठोर तप कर के अपनी मृत्यु को असंभव बना देने वाले वरदान मांगते हैं l ये इन्हे मिल भी जाते हैं l फिर सही समय पर , सही`` स्था`न में उनकी मृत्यु --- उन्ही के बताए रास्ते के अनुसार उन्हें खोज लेती है l उनके वरदान के अनुसार ही प्रकृति उनकी मृत्यु का स्वरुप व स्थान तय करती है l मृत्यु से बचने का कोई प्रयास उनके काम नहीं आता l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने लिखा है ---- ' जब किसी स्थान में कोई किसी कर्म को संपन्न करता है तो तत्काल प्रकृति इसके परिणाम देने की व्यवस्था करने लगती है l परिणाम का स्थान व समय काल निश्चित करता है l शुभ कर्म नियत स्थान और निश्चित समय पर शुभ फल देता है और अशुभ कर्म अशुभ फल देता है l
WISDOM -----
हमारा शरीर व मन --- हम जो भोजन करते हैं , जहाँ का पानी पीते हैं , जिस वायुमंडल में रहते हैं , जिस मिटटी में रहते हैं उससे प्रभावित होता है l यदि हमने किसी ऐसे व्यक्ति के यहाँ भोजन किया जो राक्षसी प्रवृति का है या पाप की कमाई का अन्न ग्रहण किया है तो हमारी प्रवृतियाँ भी कुत्सित हो जाएँगी l इसी तरह आसपास का वातावरण भी हमारे मन को प्रभावित करता है l
वाल्मीकि रामायण में प्रसंग है कि रावण के यहाँ रहने पर भी सीताजी अपवित्र नहीं होंगी l यह कैसी महिमा है ? रावण के यहाँ सीता जी ने एक वर्ष तक भोजन नहीं किया l जब रावण के यहाँ सीता जी गईं , तो महर्षि अगस्त्य और महर्षि अत्रि की प्रेरणा से देवराज इंद्र पहुंचे और माता सीता को खीर खिलाई , और उस खीर के प्रभाव से माता सीता को भूख ही नहीं लगी और न शरीर में कोई कमी महसूस हुई l माता अनसूया ने उन्हें दिव्य वस्त्र और आभूषण दिए , इससे उनको कोई वस्त्र परिवर्तन की आवश्यकता नहीं हुई , वो स्वत: ही रोज स्वच्छ हो जाते हैं , ते नित नूतन -- रोज नए , रोज साफ l
2 September 2020
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का कहना है ---- ' दूसरों द्वारा किए जाने वाले व्यवहार पर हमारा नियंत्रण नहीं हो सकता और न ही दूसरों के विचारों और कार्यों पर हमारा नियंत्रण हो सकता है लेकिन हम स्वयं के व्यवहार , विचार व कार्यों पर नियंत्रण जरूर कर सकते हैं l ' यदि हमारे जीवन में ऐसे लोग हैं जो हमें अच्छे नहीं लगते तो हमें इन व्यक्तियों से लड़ने के बजाय उनसे निश्चित दूरी बना लेनी चाहिए l आचार्य श्री का कहना है --- यहाँ दूरी का तात्पर्य है --- मन से उन सीमाओं को निश्चित करना , जिससे हमें व्यक्ति विशेष के साथ कटु व्यवहार करने के लिए विवश न होना पड़े l कटु व्यवहार करना किसी के लिए भी हितकर नहीं होता l यदि व्यक्ति किसी को अपना अच्छा मित्र नहीं बना सकता तो उसे अपने शत्रु भी नहीं बनाने चाहिए l
WISDOM ----- जो आंतरिक संपदा से रहित होकर बाहर की संपदा को पाने के इच्छुक बने रहते हैं , उन्हें उनकी इच्छाएं दरिद्र बनाए रखती हैं --- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
महर्षि कणाद केवल कण बीनकर अपनी गुजर कर लेते थे इसलिए उनका नाम कणाद पड़ गया l किसान जब खेत काट लेते थे , तो उसके बाद जो अन्न - कण पड़े रह जाते थे , उन्हें ही बीनकर वे अपना जीवन चलाते थे l उस देश के राजा को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने अपने मंत्री को उनके पास प्रचुर धन सामग्री लेकर भेजा l मंत्री के पहुँचने पर महर्षि ने कहा --- ' मैं सकुशल हूँ l इस धन को तुम उन्हें बाँट दो , जिन्हे इसकी आवश्यकता है l " ऐसा तीन बार हुआ l अंत में राजा स्वयं बहुत सारा धन लेकर उनसे मिलने गया l उसने महर्षि से उस संपदा को स्वीकार करने की प्रार्थना की , किन्तु वे पहले की भांति बोले --- " उन्हें दे दो , जिनके पास कुछ भी नही है l देखो मेरे पास तो सब कुछ है l " राजा ने चकित होकर उनकी ओर देखा l जिसके शरीर पर बस , केवल एक लंगोटी है , वह कह रहा है कि उसके पास सब कुछ है , लेकिन राजा ने महर्षि से कुछ नहीं कहा l वापस लौटने पर राजा ने सारी कथा रानी को कह सुनाई l रानी विवेकवान थी l उसने कहा ---- " आपने भूल की है l ऋषि के पास उन्हें कुछ देने नहीं , बल्कि उनसे कुछ लेने जाना चाहिए l " रानी की बात मानकर उसी समय राजा महर्षि के पास गए और उनसे ज्ञान की याचना की l इस पर महर्षि ने कहा --- " राजन ! संपदा बाहर भी है और भीतर भी l बाहर की संपदा मिलने पर उसका खोना सुनिश्चित है , लेकिन भीतर की संपदा मिल जाने पर वह सदा बनी रहती है और उसे पा लेने के बाद कुछ और पा लेना शेष नहीं रह जाता l