7 September 2020

WISDOM

   मान्यता  है  कि   वाल्मीकि जी  ने  ही    तुलसीदास जी  की   देह  धरकर   सहज , सरस   और  सरल  भाषा  में   रामचरितमानस  का  सृजन  किया  था  l  रामचरितमानस  की  रचना  से  तुलसीदास जी  जन - जन  के  हृदय  में  प्रतिष्ठित  हो  गए  ,  उनकी  ख्याति  तथा  प्रतिष्ठा  में  आशातीत  वृद्धि  हुई   और  उनके  दर्शनों  के  लिए   अनेक  राजा - महाराजे     तथा  भक्तगण   उनका  आशीर्वाद   प्राप्त  करने  के  लिए  आने  लगे  l   यह  सब  देख  एक  व्यक्ति  ने  उनसे  पूछा ---- " आजकल  इतने  बड़े  लोग  उनके  पास   क्यों  आते  हैं   ? "  इसके  उत्तर  में  तुलसीदास जी  ने  कहा --- " यह  सब   भगवान  श्रीराम जी   की  कृपा  है   -- लहइ   न   फूटी  कौड़िहू   को  चाहै   केहि  काज  l   सो  तुलसी  महँगो   कियो  ,  राम  गरीब   निवाज   l 

5 September 2020

WISDOM -----

   संतों  ने  ऋषियों  ने  कहा  है  कि    मृत्यु  का  स्मरण  बने  रहने  से   हम  बुरे  कर्म ,  पाप  कर्म  करने  से  बचेंगे  l   संत  कबीर  ने  कहा  है ---  काल  जीव   को  ग्रासई ,  बहुत  कहा  समुझाय  l   कहै  !  कबीर  मैं  क्या  करूँ ,  कोई  नहीं  पतियाय  l   संत  कबीर  कहते  हैं   मैंने  बहुत  प्रकार  से  समझाकर  कहा  कि  एक  दिन  हर  प्राणी  को  काल  पकड़ेगा  ,  परन्तु  मैं  क्या  करूँ  , कोई  मेरी   बात  पर  विश्वास   ही  नहीं  करता----  l 

रावण , कंस , कुम्भकरण  से  लेकर  औरंगजेब  जैसे  क्रूर  शासकों  ने    अपने जीवन  में  न  जाने  कितने   अत्याचार , अमानवीय  कृत्य  किए  l  शायद  यही  सोचकर  कि  वे  स्वयं  कभी  मरेंगे  ही  नहीं  l  जिन  लोगों  के  लिए  धन , दौलत  , ऐश्वर्य  ही  सब  कुछ  है  , उनका  जीवन  भय  और  आशंका  से  घिरा  हुआ  होता  है  l  उनके  अपने  कर्म  ही  उन्हें  डराते   हैं  l   उनके  प्रभाव   व भय  से   बाहर  उनकी  जय - जयकार   भले  ही  हो  रही  हो  ,  पर  उनके  भीतर  हाहाकार  मचा  हुआ  होता  है   l   समस्त  भौतिक  वैभव   एवं   साधनों  के  बीच   होते  हुए  भी  वे  अंदर  से   दुःखी   व  कंगाल  होते  हैं  l   पं. श्रीराम  शर्मा , आचार्य जी   का  कहना  है  --- जीवन  में  उल्लास , आनंद , मधुरता  तभी  संभव  है   जब  मनुष्य  सच्चाई की , नैतिकता   और  अध्यात्म  की  राह  पर  चले   और  इन  राहों   पर  चलना  तभी  संभव  है  , जब  हमें   यह  बोध  हो  कि   हमारा  जीवन  नश्वर  है , मृत्यु  अटल  है  ,  हमारे  द्वारा  किए   गए  कर्मों  का  फल  मिलना  भी  सुनिश्चित  है  l 

WISDOM -----

   कलकत्ता  बोर्ड  की  अंग्रेजी  की  परीक्षा  देने   एक  युवक  पहुंचा  l   परीक्षा  भवन  में  उससे  पूछा  गया  --- " क्या  आप  हमारे  प्रश्नों  के  लिए  तैयार  हैं  ? "  युवक  ने  उत्तर  दिया  - - " जी  हाँ  ! "  तब  परीक्षकों  ने   अंग्रेजी  में  पूछा ---- " स्कूल    मास्टर  और  स्टेशन  मास्टर   में   क्या   अंतर   है   ? "  उस  विद्दार्थी  ने  अंग्रेजी  में  कहा ---- " दि   स्कूल   मास्टर  ट्रेन्स  दि   माइंड  ,   व्हाइल  दि   स्टेशन   मास्टर  माइंड्स   दि   ट्रेन्स  l  "  परीक्षक     इस अर्थपूर्ण  उत्तर   कि   '  एक  अध्यापक   मस्तिष्क  को  संचालित  करता  है  ,  जबकि   स्टेशन  मास्टर   गाड़ियों  ( ट्रेनों )  को  '    से  बहुत  प्रभावित  हुए  l   वह  युवक  थे  श्री  सुभाषचंद्र  बोस  l  

3 September 2020

WISDOM ----- कर्मफल

  असुर  कठोर  तप  कर  के   अपनी  मृत्यु  को  असंभव  बना  देने  वाले  वरदान  मांगते  हैं   l   ये  इन्हे  मिल  भी  जाते  हैं  l   फिर  सही  समय  पर , सही``  स्था`न   में   उनकी  मृत्यु --- उन्ही  के  बताए   रास्ते  के  अनुसार   उन्हें  खोज  लेती  है   l   उनके  वरदान  के  अनुसार  ही  प्रकृति  उनकी  मृत्यु  का  स्वरुप  व  स्थान  तय  करती  है  l   मृत्यु  से  बचने  का  कोई  प्रयास  उनके    काम  नहीं  आता  l  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  लिखा  है ---- ' जब  किसी  स्थान  में  कोई   किसी  कर्म  को  संपन्न  करता  है   तो  तत्काल  प्रकृति   इसके  परिणाम  देने  की  व्यवस्था  करने  लगती  है  l   परिणाम    का  स्थान  व  समय  काल  निश्चित  करता  है  l   शुभ  कर्म  नियत  स्थान  और  निश्चित  समय  पर  शुभ  फल  देता  है    और  अशुभ  कर्म  अशुभ  फल  देता  है  l 

WISDOM -----

   हमारा   शरीर  व  मन   --- हम  जो  भोजन  करते  हैं , जहाँ  का  पानी  पीते  हैं  ,  जिस  वायुमंडल  में  रहते  हैं  ,  जिस  मिटटी  में   रहते  हैं  उससे  प्रभावित  होता  है  l  यदि  हमने  किसी  ऐसे  व्यक्ति  के  यहाँ  भोजन  किया   जो  राक्षसी  प्रवृति  का  है   या   पाप  की  कमाई  का  अन्न   ग्रहण    किया  है   तो  हमारी  प्रवृतियाँ   भी  कुत्सित  हो  जाएँगी  l   इसी  तरह  आसपास  का  वातावरण  भी  हमारे  मन  को  प्रभावित  करता  है  l 

  वाल्मीकि  रामायण   में प्रसंग  है   कि   रावण  के  यहाँ  रहने  पर  भी  सीताजी  अपवित्र  नहीं  होंगी  l   यह  कैसी  महिमा  है  ?    रावण  के  यहाँ  सीता जी  ने  एक  वर्ष  तक  भोजन  नहीं  किया  l   जब  रावण  के  यहाँ  सीता  जी  गईं ,  तो  महर्षि  अगस्त्य  और  महर्षि  अत्रि  की  प्रेरणा  से    देवराज  इंद्र  पहुंचे    और  माता  सीता  को  खीर  खिलाई  ,  और  उस  खीर  के  प्रभाव  से  माता  सीता  को  भूख  ही  नहीं  लगी   और  न  शरीर  में  कोई  कमी  महसूस  हुई  l   माता  अनसूया  ने  उन्हें   दिव्य  वस्त्र  और  आभूषण  दिए  ,  इससे  उनको  कोई  वस्त्र  परिवर्तन  की  आवश्यकता  नहीं  हुई  ,  वो  स्वत:   ही   रोज  स्वच्छ  हो  जाते  हैं  ,  ते  नित  नूतन  -- रोज  नए , रोज  साफ  l 


2 September 2020

WISDOM -----

 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  का  कहना  है ---- ' दूसरों  द्वारा  किए   जाने  वाले  व्यवहार  पर   हमारा  नियंत्रण  नहीं  हो  सकता   और  न  ही  दूसरों  के  विचारों  और  कार्यों  पर  हमारा  नियंत्रण  हो  सकता  है    लेकिन  हम   स्वयं  के  व्यवहार , विचार  व  कार्यों  पर  नियंत्रण   जरूर  कर  सकते  हैं   l '    यदि  हमारे  जीवन  में    ऐसे  लोग  हैं  जो  हमें  अच्छे  नहीं  लगते   तो  हमें  इन  व्यक्तियों  से  लड़ने  के  बजाय  उनसे  निश्चित   दूरी   बना  लेनी  चाहिए  l   आचार्य श्री  का  कहना  है --- यहाँ  दूरी   का  तात्पर्य    है --- मन  से  उन  सीमाओं  को  निश्चित  करना  ,  जिससे  हमें  व्यक्ति  विशेष  के  साथ  कटु  व्यवहार  करने  के  लिए  विवश  न  होना  पड़े   l   कटु  व्यवहार  करना  किसी  के  लिए  भी  हितकर  नहीं  होता  l   यदि  व्यक्ति  किसी  को  अपना  अच्छा  मित्र  नहीं  बना  सकता   तो  उसे  अपने  शत्रु  भी  नहीं  बनाने   चाहिए  l 

WISDOM ----- जो आंतरिक संपदा से रहित होकर बाहर की संपदा को पाने के इच्छुक बने रहते हैं , उन्हें उनकी इच्छाएं दरिद्र बनाए रखती हैं --- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

    महर्षि  कणाद  केवल  कण  बीनकर   अपनी  गुजर  कर  लेते  थे   इसलिए  उनका  नाम  कणाद  पड़   गया  l  किसान  जब  खेत  काट  लेते  थे  ,  तो  उसके  बाद  जो  अन्न - कण  पड़े  रह  जाते  थे  ,  उन्हें  ही  बीनकर  वे  अपना  जीवन  चलाते   थे   l  उस  देश  के  राजा  को  जब  इस  बात  का  पता  चला   तो  उन्होंने  अपने  मंत्री  को   उनके  पास  प्रचुर  धन  सामग्री  लेकर  भेजा  l  मंत्री  के  पहुँचने  पर  महर्षि  ने  कहा --- ' मैं  सकुशल  हूँ  l  इस  धन  को  तुम  उन्हें  बाँट  दो  ,  जिन्हे  इसकी  आवश्यकता  है  l "  ऐसा  तीन  बार  हुआ  l   अंत  में  राजा  स्वयं  बहुत  सारा  धन  लेकर    उनसे   मिलने  गया  l   उसने  महर्षि  से  उस  संपदा   को  स्वीकार  करने  की  प्रार्थना  की  ,  किन्तु   वे  पहले  की  भांति  बोले  --- " उन्हें  दे  दो  ,  जिनके  पास  कुछ  भी  नही   है  l  देखो   मेरे  पास   तो  सब  कुछ  है  l  "  राजा  ने  चकित  होकर   उनकी  ओर   देखा  l   जिसके  शरीर  पर  बस ,  केवल  एक  लंगोटी  है  ,  वह  कह  रहा  है   कि   उसके  पास  सब  कुछ  है  ,  लेकिन  राजा  ने  महर्षि  से  कुछ  नहीं  कहा   l   वापस  लौटने  पर  राजा  ने  सारी   कथा  रानी  को  कह  सुनाई   l   रानी  विवेकवान  थी   l  उसने  कहा ---- " आपने  भूल  की  है  l   ऋषि  के  पास   उन्हें कुछ  देने  नहीं  ,  बल्कि  उनसे  कुछ  लेने  जाना  चाहिए  l  "  रानी  की  बात  मानकर   उसी  समय  राजा  महर्षि  के  पास  गए   और  उनसे  ज्ञान  की  याचना  की   l  इस  पर   महर्षि  ने  कहा  --- " राजन  !  संपदा   बाहर   भी  है   और  भीतर  भी  l   बाहर  की  संपदा   मिलने  पर    उसका  खोना  सुनिश्चित  है  ,  लेकिन  भीतर  की  संपदा   मिल  जाने  पर   वह  सदा  बनी    रहती  है   और  उसे  पा  लेने  के   बाद  कुछ  और  पा  लेना  शेष  नहीं  रह  जाता  l