पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' इस संसार में एक ओर दैवी शक्तियाँ और दूसरी ओर आसुरी शक्तियाँ कार्य करती हैं l हमें श्रेष्ठता को देखना है , परन्तु बुराई की ओर से आँखों को बंद नहीं कर लेना है क्योंकि बुराई में बहुत आकर्षण होता है और बुराई का आक्रमण भी बड़ी तेजी व् दृढ़ता से और बलपूर्वक होता है l इसलिए देखा जाता है कि निर्बल शक्ति वाले व्यक्ति प्राय: बड़ी आसानी से बुराइयों का प्रलोभन सामने आते ही फिसल जाते हैं और उसके चंगुल में फँस जाते हैं l इसलिए अच्छाई का समर्थन और उसकी सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि असुर पक्ष का विरोध किया जाये , उसे नष्ट किया जाए l बुराई छोटी है , यदि यह समझकर उसकी उपेक्षा की जाये तो वह क्षय रोग की तरह सब ओर अपना कब्ज़ा जमा लेती है l '
20 March 2021
19 March 2021
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' प्रकृति व शक्ति , दोनों ही हमारे जीवन का मूल आधार हैं , उनके बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं l हमारा शरीर प्रकृति के तत्वों से मिलकर बना है और यह संचालित भी होता है प्रकृति की शक्ति से l शरीर में ऊर्जा का संचार प्राणवायु ही करती है , जो कि प्रकृति का एक घटक है l शक्ति का मूलस्रोत प्रकृति है और वह जगदम्बा के रूप में पूरी सृष्टि का पालन - पोषण करती है l पार्वती के रूप में भगवान शिव की अर्द्धांगिनी है और सृष्टि के विभिन्न दैवी रूपों में सृष्टि का कार्यभार संभालती है l इस संसार में शक्ति की ही विजय होती है , यदि शक्ति की कृपा नहीं है तो व्यक्ति सफल नहीं हो सकता l इसी कारण भगवान श्रीराम ने रावण से युद्ध करने से पूर्व शारदीय नवरात्र का अनुष्ठान किया था l अर्जुन ने महाभारत युद्ध करने से पूर्व शक्ति की उपासना की थी और वे अपने विजय अभियान में सफल हुए l '
18 March 2021
WISDOM -----
दुष्ट व्यक्ति विभिन्न तरीकों से लोगों को उत्पीड़ित कर के स्वयं को विजयी समझते हैं किन्तु जो सन्मार्ग पर चलते हैं उनकी शांति को कोई छीन नहीं सकता ---- महात्मा बुद्ध एक बार अपने शिष्यों के साथ पंचशाला गाँव गए l वहां के लोग भगवान बुद्ध की ख्याति से बहुत पीड़ित थे , ईर्ष्या की आग उन लोगों के हृदय को जलाती थी l वहीँ के एक व्यक्ति ' भार ' ने जो भगवान बुद्ध से दुश्मनी रखता था , ग्रामवासियों के मन में बुद्ध के प्रति जहर भर दिया , इस कारण गांव वालों ने बुद्ध और उनके शिष्यों का बहुत अपमान किया l कटु ,वचन गालियाँ , व्यंग्यबाण , कचड़ा - कूड़ा , जूते - चप्पल यही सब उन्हें उस दिन भिक्षा में मिला l संध्या होने पर वे खाली पात्र लिए अपने शिष्यों के साथ गांव से बाहर वटवृक्ष की छाया में बैठ गए l उन्हें दुःखी करने के उद्देश्य से वह दुष्ट व्यक्ति भार भी वहां आ पहुंचा और मुस्कराते हुए उसने कहा --- " क्यों से श्रमण ! देखा मेरा प्रभाव , तुझे कुछ भी भिक्षा नहीं मिली l " भार के इन वचनों पर बुद्ध हँसे और बोले --- ' हाँ , भार ! आज तू भी सफल हुआ और मैं भी l " बुद्ध के इन वचनों को भार समझ न सका और बोला ------ " भला यह कैसे ? या तो तू सफल हुआ या मैं , दोनों -साथ साथ सफल कैसे हो सकते हैं ? यह तो तर्कहीन बात है l बुद्ध ने हँसकर कहा ------- " नहीं , यह तर्कहीन बात नहीं है l तू सफल रहा लोगों को भ्रष्ट करने में , भ्रमित करने में और मैं सफल हुआ अप्रभावित रहने में l तुम्हारी कोई भी चाल मुझे अशांत , अस्थिर व उत्तेजित नहीं कर सकी और यह भोजन से भी ज्यादा पुष्टिदायी है l "
WISDOM ------
पुराने जमाने में लीडिया नामक देश का बादशाह ' कारूँ ' अपने धन के लिए बड़ा विख्यात था l उसने इतना अधिक सोना , चाँदी , रत्न , जवाहरात आदि अपने खजाने में संग्रह किए थे कि संसार में अभी तक उसका नाम उदाहरण के रूप में लिया जाता है l एक बार यूनान का एक महापुरुष ' सोलन ' उसके दरबार में गया l वहां पर कारूँ ने उसे अपना अपार धन दिखाकर पूछा ---- " क्या संसार में मुझसे बढ़कर और कोई सुखी हो सकता है ? " सोलन तो तत्वज्ञानी था l उसने कहा --- " मैं तो उसी व्यक्ति को सुखी समझता हूँ , जिसका अंत सुखमय हो l " यह सुनकर कारूँ अप्रसन्न हो गया और उसने सोलन को बिना विशेष आदर - सत्कार के विदा कर दिया l कुछ समय बाद ईरान देश के राजा साइरस ने कारूँ को हराकर कैद कर लिया और उसे मृत्युदंड दिया l जब वह जीवित जलाया जाने लगा तो उसे सोलन की बात याद आ गई और उसके मुँह से ' हाय सोलन ' , ' हाय सोलन ' शब्द निकला l साइरस के पूछने पर उसने सोलन की बात बता दी l साइरस पर भी इस उपदेश का प्रभाव पड़ा और उसने कारूँ को प्राणदान दे दिया l
17 March 2021
WISDOM ------
शिष्य ने गुरु से पूछा ---- ' मनुष्य एक बुद्धिमान प्राणी है फिर वह स्वाभिमान से क्यों नहीं जीवन व्यतीत करता ? " गुरु ने कहा ---- ' लोभ , लालच , कामना , वासना , धन और पद की अति महत्वाकांक्षा ये मनुष्य की कमजोरियाँ हैं , केवल स्वयं के ईमानदार प्रयास से इनका पूरा होना संभव नहीं है l ये वो खाई है जिसे पाटना संभव नहीं है लेकिन फिर भी जो इन्हें पूरा करने में सहयोग देने का लालच देता है , व्यक्ति अपना स्वाभिमान खो कर उसी के इशारों पर चलने लगता है l अति की इन महत्वाकांक्षा को पूरा करने में भौगोलिक सीमा भी बाधक नहीं होती , हर ताकतवर अपने से कमजोर को लालच देता है और दोनों के स्वार्थ पूरे होते हैं l इसमें मानवीय मूल्यों की उपेक्षा होती है इस कारण समाज का पतन होने लगता है l
WISDOM ------
विक्रमादित्य ने चौथेपन में संन्यास लिया और वे अवधूत जीवन जीने लगे l उनके स्थान पर जो भी राजा बैठता उसे भयंकर ब्रह्मराक्षस रात्रि के समय मार डालता l इस प्रकार कितने ही राजाओं की मृत्यु हो गई l इसलिए कहीं से विक्रमादित्य को खोज निकालने और उनसे इस समस्या का समाधान कराने का निश्चय किया गया l खोजने पर वे एक स्थान पर मिल गए l सारी स्थिति समझाई गई और गुत्थी सुलझा देने के लिए सहमत कर लिया गया l विक्रमादित्य ने अपनी दिव्यदृष्टि से ब्रह्मराक्षस की करतूत समझ ली l उन्होंने शयनकक्ष के बाहर इतने पकवान - मिष्ठान रखवा दिए कि उन्हें खाकर उसका पेट भर गया l फिर भी वह राजा को मारने शयनकक्ष में आ पहुंचा l विक्रमादित्य बड़े बुद्धिमान थे l उन्होंने ब्रह्मराक्षस को सम्मानपूर्वक बिठाया और वार्तालाप में लगाया l उससे उसकी शक्तियां और सिद्धियां पूछीं l राजा ने उसकी भूख शांत करने का अधिक उपयुक्त प्रबंध करा देने का भी आश्वासन दिया l साथ ही मित्रता की शर्त के रूप में यह वर माँगा कि उनकी आयु बता दे l ब्रह्मराक्षस ने 100 वर्ष बताई l राजा ने कहा --- इनमे से आप दस घटा या बढ़ा सकते हैं ? " ब्रह्मराक्षस ने मना कर दिया और कहा --- यह कार्य विधाता का है l विक्रमादित्य तलवार निकाल कर खड़े हो गए और कहा जब आयु निर्धारित है तब तुम मुझे कैसे मार सकते हो ? निर्भय राजा के सामने राक्षस सहम गया और वहां से उलटे पैर भाग गया l इसके बाद उस राज्य में ही प्रवेश का साहस उसने नहीं किया l
16 March 2021
WISDOM ----- कोई भी काम अधूरा न छोड़ें
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है ----- '' स्वर्णिम नियम यही है कि शुरू करने से पहले किसी भी काम या योजना के बारे में अच्छी तरह सोच विचार कर लिया जाए l कोई भी पक्ष , संभावना या कठिनाई अनदेखी न रह जाये l भलीभाँति विचार के बाद जो भी शुरू करें , उसे पूरा कर के ही विराम लें l किसी भी स्थिति में उसे आधा - अधूरा न छोड़ें l ज्ञात इतिहास में भारत को पहली बार एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने वाले सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य को बचपन में कौटिल्य ने पहली शिक्षा यही दी थी l नन्द वंश के सड़े -गले दुराचारी शासन का अंत करने के लिए कौटिल्य ने मुरा नाम की दासी के होनहार पुत्र चन्द्रगुप्त को चुना , तो दीक्षा देते हुए पहला वाक्य कहा --- " आरभ्यते इति " आरम्भ किया जाये , तो इति तक पहुँचने के लिए ही l प्रतिभाशाली छात्र ने उपदेश सुनकर ही ' हाँ ' नहीं कह दिया l उसके मन में प्रश्न उठा कि परिस्थितियां हो सकती हैं , जिनमें कार्य पूरा न हो सके l शिष्य ने शंका रखी तो गुरु ने कहा --- '' राजा दैव विवर्जित " अर्थात सिर्फ शासन और भाग्य ही बाधक हो सकता है l राजसत्ता कोई विध्न उत्पन्न कर दे अथवा कोई रोग , विपत्ति घेर ले तो अलग बात है , अन्यथा काम पूरा होने से पहले विश्राम नहीं l लोक कथा कहती है कि यह पाठ पढ़ने के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अब से ढाई हजार वर्ष पहले सुदृढ़ राष्ट्र की नींव रखी l "